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राजनीति
पश्चिम बंगाल: क्या हैं विधान परिषद की राजनीति के मायने?
पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से था, जिनमें विधान परिषद थी। 1952 में मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय ने इसका गठन किया था। किंतु 1969 में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने इसे भंग कर दिया। अब 52 वर्ष बाद इसे पुनः गठित करने की क़वायद शुरू हुई।
शंभूनाथ शुक्ल
14 Jul 2021
modi-mamata
image courtesy:IndianExpress

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने वायदे के अनुसार राज्य में विधान परिषद के गठन के लिए विधानसभा में बिल पास करवा दिया है। अब यह मामला संसद को भेज दिया जाएगा। ज़ाहिर है अब गेंद संसद के पाले में है।

छह जुलाई को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधान परिषद के गठन का बिल पास हुआ। इस बिल के पक्ष में 196 और विरोध में 69 मत पड़े। संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार अगर सदन के आधे से एक अधिक सदस्य अथवा उपस्थित विधायकों का बहुमत (जो भी अधिक संख्या हो) इससे सहमत हो तो विधान परिषद के गठन का रास्ता खुलता है। अब यह प्रस्ताव संसद में आएगा और अनुच्छेद 171 के अनुसार अगर संसद में उस दिन उपस्थित सदस्यों का सामान्य बहुमत इसे क्लीयर कर दे और राष्ट्रपति की मोहर लग जाए तो उस राज्य में विधान परिषद गठन की प्रक्रिया पूर्ण मानी जाएगी।

विधानसभा में बीजेपी सदस्यों ने पश्चिम बंगाल में दोबारा विधान परिषद बनाने के प्रस्ताव का विरोध किया था। किंतु विधानसभा चुनाव के समय जब ममता बनर्जी राज्य की जनता को विधान परिषद दिए जाने की चुनावी घोषणा कर रही थीं, तब बीजेपी चुप लगा गई थी। क्योंकि उस वक्त विरोध का अर्थ था, जनता की नाराज़गी मोल लेना लेकिन अब विधान सभा में उसने विरोध किया। सच बात तो यह है कि तब बीजेपी को खुद के बहुमत का भरोसा था।

पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से था, जिनमें विधान परिषद थी। 1952 में मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय ने इसका गठन किया था। किंतु 1969 में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने इसे भंग कर दिया। अब 52 वर्ष बाद इसे पुनः गठित करने की क़वायद शुरू हुई। विधानसभा में जिस दिन यह प्रस्ताव पास हुआ, उस दिन स्वयं मुख्यमंत्री सदन में नहीं थीं और संसदीय मंत्री पार्थो चटर्जी ने इसे प्रस्तुत किया। सदन में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, मुख्यमंत्री ज़ान-बूझ कर सदन में नहीं है ताकि उनकी अनुपस्थिति में यह बिल पास हो जाए और फिर विधान परिषद के रास्ते वे राज्य विधान मंडल की सदस्य बनें। मालूम हो कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य विधानसभा का चुनाव शुभेंदु अधिकारी से पराजित हो गई थीं।

विधान परिषद अभी कुल छह राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना में है। यह ठीक वैसी ही व्यवस्था है, जैसी कि संसद में द्वि-स्तरीय व्यवस्था है- राज्यसभा और लोकसभा। दरअसल संविधान निर्माताओं को लगा था कि कई बार समाज के दिशा निर्देशक और बौद्धिक लोग उस तरह से वाक्-पटु या जनता के बीच घुल-मिल नहीं पाते जैसा कि भाषण-पटु राजनेता। लेकिन ऐसे लोगों की ज़रूरत संसद को होती है ताकि लोक कल्याणकारी क़ानून पास करते समय उनकी विज्ञ राय ली जा सके। दूसरे उनको यह भी अंदेशा था कि कभी भविष्य में ऐसा न हो किसी लोकप्रिय लहर के चलते भावनाओं में ऐसे लोग न जीत जाएँ जो देश या प्रदेश को हिंसा की तरफ़ धकेल दें इसलिए राज्यसभा की नकेल बनी रहे। क्योंकि राज्यसभा के एक तिहाई सदस्यों के चुनाव हर दो वर्ष में होते हैं और राज्यों के विधान मंडल के सदस्य इन्हें चुन कर भेजते हैं। इसी तरह की व्यवस्था कुछ राज्यों ने भी बनाई थी। राज्यों में इस सदन को विधान परिषद कहते हैं।

विधान परिषद की सदस्य संख्या उस राज्य की विधान सभा की कुल संख्या की एक तिहाई निर्धारित की गई थी। और इनके चुनाव भी राज्य सभा की तरह द्वि-वार्षिक तय किए गए थे। अर्थात् हर दो वर्ष में एक तिहाई सदस्य अवकाश मुक्त होंगे। लेकिन विधान परिषद की कुल संख्या के एक बटे बारह सदस्य स्नातक निर्वाचन क्षेत्र (जिनमें सिर्फ़ स्नातक वोटर ही मतदान कर सकते हैं) से आएँगे और इतने ही शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से (सिर्फ़ शिक्षक मतदाता) चुने जाएँगे। विधान परिषद के एक तिहाई सदस्यों को स्थानीय निकाय चुनेंगे तथा बाक़ी के एक तिहाई विधानसभा के सदस्यों के द्वारा। शेष सदस्यों को राज्यपाल नामज़द करेंगे। ये नामजद सदस्य साहित्य, कला, समाज सेवा, विज्ञान के क्षेत्र में नामचीन होंगे। इसके अतिरिक्त सहकारी समितियों से भी सदस्य नामज़द किए जाएँगे। कुल मिला कर यह एक ऐसी व्यवस्था थी, ताकि हर क्षेत्र के अव्वल लोगों को भी विधायिका में लाया जा सके।

अब चूँकि राजनीतिकों ने संविधान के हर नियम को अपने मुताबिक़ कर लिया, इसलिए इस मामले में भी छूट ली गई। साहित्य, कला और विज्ञान के नाम पर पसंदीदा सिने स्टार लाए गए या क्रिकेट के सितारे। पत्रकार के नाम पर उन लोगों को लाया गया, जो सत्ता की स्तुति किया करते थे। इसी तरह कुछ छोटे-छोटे दलों ने राज्यसभा अथवा विधान परिषद के लिए पैसे लेकर टिकट बेचे। ताज़ा मामला सत्तारूढ़ भाजपा के सहयोगी अपना दल का है। उस पर आरोप है कि जौनपुर ज़िले में पंचायत प्रमुख पद के लिए ख़ुद उसके प्रत्याशी ने पैसा लेकर अपना ही टिकट बेच दिया। ऐसे एक नहीं अनगिनत क़िस्से हैं। संसद की एक अलिखित परंपरा है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे पद लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव जीत कर आया व्यक्ति ही सँभालेगा ताकि पब्लिक को लगे कि सरकार का मुखिया उसके द्वारा चुना गया नुमाइंदा है। लेकिन मनमोहन सिंह दो बार प्रधानमंत्री रहे और दोनों बार वे राज्यसभा में चुन कर आए। मज़े की बात कि 2009 में कांग्रेस ने उनकी अगुआई में 200 से ऊपर सीटें पाईं किंतु वे सदा राज्यसभा से रहे। इसी तरह देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दोनों उप मुख्यमंत्री- केशव प्रसाद मौर्य तथा दिनेश शर्मा विधानसभा से नहीं बल्कि विधान परिषद से निर्वाचित हैं। ऐसी स्थिति में यदि ममता बनर्जी भी ऐसा करना चाहती हों तो इसमें ग़लत क्या है? ख़ासतौर पर ऐसी स्थिति में जब उन्हें पता हो कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार हर तरह से उन्हें सदन में न पहुँचने देने को आमादा है।

यह सच है कि केंद्र सरकार किसी भी स्थिति में संसद से पश्चिम बंगाल में विधान परिषद का गठन नहीं होने देगी। मगर इसके बावजूद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में आ गई है और हर एक को यह पता भी चल गया है। इसलिए विधानसभा द्वारा पारित इस प्रस्ताव पर बीजेपी की अड़ंगेबाजी एक मुद्दा बनेगी। तथा 19 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में हंगामा मचेगा। ऐसे में मोदी सरकार के गले में यह फाँस बन गई है। वैसे उसने हरसंभव कोशिश की है कि उपचुनाव टाले जाएँ ताकि ममता किसी तरह विधानसभा में न पहुँचें। लेकिन भाजपा के खुद के लिए भी बंगाल में उच्च सदन का बनना फ़ायदे का सौदा होगा। इस समय विधानसभा में उसकी संख्या आशातीत है। अगर उसे दूर की राजनीति करनी है तो विधान परिषद ख़ुद उसके लिए भी बेहतर है। अपनी सदस्य संख्या के बूते वह विधान परिषद में भी अपने विधायक पहुँचा लेगी। इसके बाद स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भी उसके कुछ सदस्य पहुँचेंगे। सबसे आसान होता है स्थानीय निकाय के ज़रिए मैनेज करना। और उसके बाद राज्यपाल उसी का है। ये सब बातें बीजेपी को भी विधान परिषद के ज़रिए राजनीति का मौक़ा दे रही हैं। इसलिए संभावना इस बात की भी है कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में विधान परिषद के गठन के इस प्रस्ताव को पास हो जाने दे। अभी पक्के तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता लेकिन राजनीति में असंभव के भी पूरा हो जाने की संभावना कभी शून्य नहीं होती।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

West Bengal
mamta banerjee
legislative assembly

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