NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गांधी के ‘गुरुदेव’ और टैगोर के ‘महात्मा’
बंगाल में चुनावी जंग जीतने के लिए आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। और इस अखाड़े में स्वतंत्रता सेनानी और बंगाल में जन्में महापुरुषों को भी उतार दिया गया है। और उनके नाम और मान-अपमान को लेकर खींचतान तेज़ है।
प्रदीप सिंह
11 Feb 2021
गांधी के ‘गुरुदेव’ और टैगोर के ‘महात्मा’

बंगाल विधानसभा चुनाव होने में अभी समय है। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की जमीन उखाड़ने में लग गयी है। केंद्र सरकार के कई मंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के सबसे खासमखास गृह मंत्री अमित शाह अपना अधिकांश समय बंगाल में रैलियां, सभाएं और बैठकें करने में लगा रहे हैं।

चुनावी जंग जीतने के लिए दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। इस आरोप-प्रत्यारोप में सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। मोदी-शाह की जोड़ी रोज-ब-रोज बंगाल में नए बखेड़े खड़े कर रही है। जिसमें सबसे प्रमुख मुद्दा बंगाल में जन्में महापुरुषों का तथाकथित रूप से अपमानित करना शामिल है। लेकिन इसमें तृणमूल कांग्रेस भी पीछे नहीं है।

इस कड़ी में यह भी देखा जा रहा है कि बीजेपी नेता स्वयं बंगाल के महापुरुषों को अपने क्रियाकलाप से अपमानित कर रहे हैं। अमित शाह के शांति निकेतन दौरे के बीच तृणमूल कांग्रेस ने विश्व भारती यूनिवर्सिटी कैंपस में लगी तस्वीरों का मुद्दा उठाया है जिसमें अमित शाह के फोटो के नीचे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की फोटो लगी थी। टीएमसी ने इसे गुरुदेव का अपमान बताते हुए बीजेपी पर निशाना साधना शुरू कर दिया।

स्वतंत्र भारत की राजनीति के मानक और आदर्श स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गढ़े गये मूल्यों से प्रेरित हैं। लंबे समय तक चले स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हमारे क्रांतिकारियों और राजनेताओं ने अपने चाल-चरित्र से यह तय किया कि विरोधी विचार वालों के साथ कैसा व्यवहार किया जाये।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ अनोखे पहलू हैं, जो उसके नेताओं द्वारा गढ़े गये थे। किसी भी आंदोलन को समझने के लिए उसके नेतृत्व को जांच-परख कर देखना भी एक तरीका है। व्यक्तिवाद का यह माध्यम अपने नेताओं को व्यक्ति के रूप में जांचना है। हालांकि, यह प्रतिमान कुछ विशेषताओं को पकड़ने में विफल रहता है जो आंदोलन के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी भी व्यक्ति का संबंध अपने समान विचार-व्यवहार वालों से ही होता है। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सैकड़ों ऐसे शख्स एक साथ शामिल थे जो एक समान विचार और पृष्ठभूमि के नहीं थे। असमान विचार वाले व्यक्तियों का यह संबंध एक साझा स्वप्न एवं साझा आदर्श से प्रेरित था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को पढ़ते समय आपको ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल सकते हैं।

यहां पर हम गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के रिश्ते की पड़ताल करते हैं। टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।

टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?

गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।

इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।

यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’  शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’  शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।

गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं  कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।

इसलिए, इस संबंध की अंतर्निहित प्रकृति व्यक्ति-केंद्रितता के बजाय संबंध-केंद्रित थी। रिश्ते राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में थे। उस समय विपरीत विचारों वाले व्यक्तियों से असहमति के बावजूद विचारों का आदान-प्रदान और संवाद चलता रहता था। उस दौरान अच्छे विचारों को स्वीकार करने और पिछड़े मूल्यों से लड़ने और नेतृत्व में नए लोगों को लाने जैसे कई काम राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान किए गए।

एक खेल प्रशिक्षक एथलीटों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए उन्हें विभिन्न प्रतिद्वंद्वियों के सामने लाता है। यदि प्रतिद्वंद्वी अधिक मजबूत है, तो प्रशिक्षण को और अधिक तीव्र होना चाहिए -जैसा कि भारत के सामने उस समय अदम्य ब्रिटिश सरकार थी। प्रभावी प्रशिक्षण कभी-कभी यह मांग करता है कि शिक्षक प्रतिकूल भूमिका निभाता है। हालांकि, वास्तविक मुकाबले के विपरीत, इस मॉक संघर्ष या रोल-प्ले को आपसी विश्वास पर स्थापित करना होगा। यदि शिक्षक छात्र पर कठोर है, तो वह उसे प्रशिक्षण देने के इरादे से है।

मैं इस संदर्भ का उपयोग टैगोर और गांधी के बीच कुछ असहमति को समझने के लिए करूंगा। गांधी और टैगोर के बीच एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक मतभेद असहयोग आंदोलन को लेकर था। टैगोर ने इसे नकारात्मकता और निराशा का सिद्धांत करार दिया। गांधी ने इसका उत्तर नकारात्मक और सकारात्मक मुक्ति के बीच अंतर करके दिया। मुक्ति की धारणा को सकारात्मक मानते हुए, उन्होंने अपने शिक्षक को बौद्ध धर्म में मुक्ति के एक और समान रूप से महत्वपूर्ण विचार के बारे में याद दिलाया -अर्थात् निर्वाण- जो कि सत्य के नकारात्मक पक्ष से संबंधित है। गांधी के अनुसार यह दूसरी तरह की मुक्ति, टैगोर के ध्यान से बच गई थी।

विदेशी कपड़ों के बहिष्कार पर भी गांधी-टैगोर के बीच असहमति थी। टैगोर की नजर में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और जलाना एक ऐसे देश में विरोध का उपयुक्त रूप नहीं है, जहां लाखों लोगों के पास पर्याप्त कपड़े नहीं हैं। गांधी ने काव्यात्मक रूप से जवाब देते हुए कहा, “मेरे विदेशी कपड़ों को जलाने में मुझे शर्म आती है।” टैगोर ने सूत कताई करके कपड़े बनाने का भी विरोध किया, उनका मानना था कि इससे भारत तकनीकी प्रगति में पीछे छूट जायेगा।

शिक्षक-छात्र संबंध के प्रारूप के बाहर देखे जाने पर ये मतभेद, टैगोर और गांधी के बीच तीखे विवादों की तरह दिखते थे और कालेलकर, जवाहरलाल नेहरू और अन्य लोगों में बेचैनी पैदा करते थे। नेहरू ने कहा कि “कोई भी दो व्यक्ति शायद इतना अलग नहीं हो सकते”, लेकिन साथ ही, उनके पास भी बहुत कुछ एक समान था।”

जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।

गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।

इन सबके बीच राजनीतिक दल स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को भी खेमे में बांटकर अपना और पराया बता रहे हैं। गांधी-टैगोर के रिश्ते को देखने के बाद यह आवश्यक है कि जब हम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के किसी नायक के मान-अपमान की बात करें तो उस संदर्भ में नेताओं के विचारों के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों को भी समझने का प्रयास करें, तभी हम यह समझ सकते हैं कि राजनेताओं का मूल्यांकन कितना सही है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

West Bengal
West Bengal Elections
BJP
TMC
Amit Shah
Narendra modi
mamta banerjee
Rabindranath Tagore
Mahatma Gandhi

Related Stories

राज्यपाल की जगह ममता होंगी राज्य संचालित विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति, पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने पारित किया प्रस्ताव

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • KISAN
    भाषा
    नोएडा में सांसद के आवास का घेराव करने के आरोप में करीब 600 किसानों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज
    03 Nov 2021
    अपनी विभिन्न मांगों को लेकर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ धरना दे रहे 81 गांव के किसानों ने मंगलवार शाम को सांसद डॉ. महेश शर्मा के आवास का घेराव करने का प्रयास किया। हालांकि, पुलिस ने आवास से कुछ दूर पर…
  • By-election results: Himachal gave a big lesson to BJP, a setback in Bengal too
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    उपचुनाव परिणाम: हिमाचल ने दिया भाजपा को बड़ा सबक़, बंगाल में भी झटका
    03 Nov 2021
    राजस्थान और कर्नाटक ने भी भाजपा को चेताया है, जबकि हरियाणा में इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला की जीत किसान आंदोलन की जीत मानी जा रही है, क्योंकि उन्होंने किसानों के मुद्दे पर ही इस्तीफ़ा दिया था।
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में क़रीब 12 हज़ार नए मामले सामने आए, 311 मरीज़ों की मौत
    03 Nov 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 11,903 नए मामले दर्ज किए गए है | देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 43 लाख 8 हज़ार 140 हो गयी है।
  • नीतीश सरकार ने एससी-एसटी छात्रवृत्ति फंड का दुरूपयोग कियाः अरूण मिश्रा
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नीतीश सरकार ने एससी-एसटी छात्रवृत्ति फंड का दुरूपयोग कियाः अरूण मिश्रा
    03 Nov 2021
    समाज के हाशिए पर मौजूद एससी
  • US
    एम.के. भद्रकुमार
    दो क्वाडों की कथा
    03 Nov 2021
    क्वाड-1 और क्वाड-2 दोनों का लक्ष्य चीन है। दोनों की कल्पना 'इच्छुकों के गठबंधन' के रूप में की जाती है। दोनों प्रारूपों में समुद्री शक्ति एक प्रमुख प्रतिमान के रूप में मौजूद है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License