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भारत
राजनीति
अर्नब गोस्वामी की व्हाट्सएप चैट लीक हमें अपने देश के लोकतंत्र के बारे में क्या बताती है?
2020 में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा में आरोपी बनाए गए उमर ख़ालिद के केस की चार्जशीट हाल ही में प्रेस को लीक हो गई थी। अर्नब की TRP स्कैम मामले में चार्जशीट का लीक होना, उमर के मामले का ही दोहराव है।
मोनिका धनराज
21 Jan 2021
अर्नब गोस्वामी

15 जनवरी को मुंबई पुलिस ने "TRP स्कैम" में एक हजार से ज़्यादा पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। लेकिन यह चार्जशीट प्रेस तक लीक हो गई। इसमें BARC (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) के पूर्व CEO पार्थो दासगुप्ता और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी के बीच कथित निजी वॉट्सऐप चैट भी शामिल थी। 

बता दें BARC टीवी चैनलों के टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट को मापने और प्रकाशित करने के लिए जिम्मेदार संस्था है। इस ट्रांसक्रिप्ट में रिपब्लिक टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) विकास खानचंदानी और BARC के COO रोमिल रामगड़िया, उपाध्यक्ष मुबिन खान और वेंकट सुजीत सम्राट जैसे अधिकारियों की चैट भी शामिल थी।

मोनिका धनराज कहती हैं कि लीक की सामग्री और इसे जारी करने का वक़्त बताता है कि भारत के लोकतांत्रिक संस्थान और संवैधानिक आदर्श बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुके हैं।

"मैं आपके कहे से सहमत नहीं हूं, लेकिन मैं अपनी जान की बाजी लगाकर भी आपके यह बोलने के अधिकार की रक्षा करूंगा"- एवेलिन बेट्राइस हाल, वॉलटेयर की दोस्त 

15 जून, 2020 को एक्टर सुशांत सिंह राजपूत मुंबई स्थित उनके निवास में मृत पाए गए थे। यह दुखद खबर तब आई थी, जब पिछली एक शताब्दी की सबसे भयावह महामारी से भारत जूझ रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नागरिक समूहों और मीडिया द्वारा राष्ट्रीय लॉकडाउन को ठीक ढंग से लागू ना करने पर आलोचना की जा रही थी। इस लॉकडाउन को अचानक 24 मार्च को लागू किया गया था। 

जहां देश एक सामाजिक-आर्थिक संकट से जूझ रहा था, वहीं रिपब्लिक टीवी के एमडी और मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी ने कुछ चौंकाने वाली चीजें कर डालीं। उनके चैनल ने ऐलान कर दिया कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत आत्महत्या नहीं, बल्कि योजना से की गई हत्या थी। जबकि मुंबई के कूपर हॉस्पिटल की पांच डॉक्टर्स की टीम ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसे आत्महत्या बताया था। हॉस्पिटल की रिपोर्ट कहती है कि मौत की वज़ह फांसी लगाए जाने से पैदा हुआ "एसफिक्सिया" है। बाद में AIIMS द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि हो गई। इसके बावजूद तीन महीने तक गोस्वामी ने लगातार राजपूत की "हत्या" पर अपने शो "द डिबेट" और "पूछता है भारत" में चर्चा कराना जारी रखा।

गोस्वामी ने सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व-प्रेमिका और अभिनेत्री रिया चक्रबर्ती को खलनायक बना दिया। गोस्वामी ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर उनकी निजी बातचीत के ख़ास हिस्से चलाए।

गोस्वामी ने दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर और रकुल प्रीत सिंह से वॉट्सऐप चैट के हिस्से भी राष्ट्रीय चैनल पर चलाए। वह उनकी चैट के एक खास हिस्से को अपने चैनलों पर चर्चा के दौरान लगातार दोहराते। उन्होंने इन महिलाओं को "ड्रगीज़", "क्वीन ऑफ द ड्रग सर्किट", "फिल्थ (गंदगी)" करार दिया और उनके फर्जी "इकबालिया बयानों" को चलाया। इस दौरान उन्होंने पत्रकारीय नैतिकता की रत्ती भर भी परवाह नहीं की।

नफरत फैलाने का अभियान

यह किसी कार का दुर्घटना में टकराने को देखना जैसा था। काफ़ी डरावना। लेकिन लोगों ने देखना जारी रखा, क्योंकि वह रिया, दीपिका और दूसरे लोगों के खिलाफ़ नफरत भरा विमर्श गढ़ रहे थे। अर्नब जब भी इनकी चर्चा करते तो वह चर्चा इन लोगों को नीचा दिखाते हुए व्यंगात्मक चर्चा होती।

15 जनवरी, 2021 को यह चक्र खुद अर्नब गोस्वामी तक पहुंच गया। टीआरपी स्कैम की चार्जशीट प्रेस को लीक हो गई। चार दिन पहले ही मुंबई पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दायर की थी। अब BARC के पूर्व प्रमुख पार्थो दासगुप्ता की अर्नब गोस्वामी के साथ चर्चा सार्वजनिक हो चुकी थी। अगर यह ट्रांसक्रिप्ट वाकई सच्ची है, तो इसमें दोनों नौटंकीबाज शख़्सों की तरफ से बहुत निंदनीय टिप्पणियां की गई हैं।

एक जगह पार्थो दासगुप्ता अर्नब गोस्वामी को बताते हैं कि TRAI (टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) द्वारा डिजिटल तरीके से टेलीविजन दर्शकों की संख्या की गणना करने से रिपब्लिक चैनल और केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को नुकसान होगा। TRAI के प्रस्ताव में सेट-टॉप बॉक्स में लगाए गए एक खास सॉफ्टवेयर के ज़रिए यह मापन किया जाना था। 

जब किसी एक व्यक्ति की संवैधानिक सुरक्षाओं का हनन होता है, भले ही उसके कोई भी विश्वास हों और उसकी कोई भी विचारधारा हो, तो इससे भविष्य में हर नागरिक के अधिकारों के हनन को वैधता मिलती है।

एक दूसरी चैट में दासगुप्ता, गोस्वामी से कहते हैं कि उन्होंने "न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (NBA)" को बाधित कर दिया है। NBA समसामयिक जानकारी और ख़बरों को दिखाने वाले टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स का निजी संगठन है। पार्थो ने अर्नब से प्रधानमंत्री के कार्यालय में उनके संपर्कों के ज़रिए मदद करने के लिए कहा था।

ट्रांसक्रिप्ट के मुताबिक़, जवाब में गोस्वामी ने कहा, "हो जाएगा।"

दासगुप्ता ने जवाब में कहा, "तुम्हारा साथ दिया है और बिना तुमसे कहे, दूसरों को बाधित कर दिया है।"

झकझोरने वाली जानकारी

2 साल पहले 14 फरवरी, 2019 को एक आत्मघाती हमलावर ने पुलवामा में CRPF के काफिले पर बमों से लदी गाड़ी से हमला किया था। लीक हुई चैट में गोस्वामी, पार्थो से इसकी चर्चा करते हुए कहते हैं, "इस हमले से हमें बड़ी जीत मिली है।" हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे, 40 परिवारों से उनके चाहने वाले छिन गए थे। गोस्वामी की उल्लास भरी यह टिप्पणी पत्रकार के तौर पर बेहद निंदनीय है। यह तब ज़्यादा दर्द भरी हो जाती है, जब एक ऐसा व्यक्ति यह टिप्पणी कर रहा होता है, जिसकी खुद की पारिवारिक पृष्ठभूमि सेना से संबंधित है।

इस लीक से कुछ बेहद अहम सवाल खड़े हुए हैं, जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। इन्हें सरल करने के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया गया है।

1) राज्य की गुप्त सूचनाओं का लीक होना

2) निजता के मौलिक अधिकार का कोई सम्मान नहीं रहना

3) जांच एजेंसियों का न्यायालय में चल रहे मामले की चार्जशीट का लीक किया जाना। इस विश्वास की वज़ह लीक के ज़रिए कुछ खास व्यक्तियों को निशाना बनाया जाना है।

4) मीडिया और सत्ता का कुत्सित गठजोड़, इसका मनमर्जी और विमर्श गढ़ने के लिए निजी डेटा का इस्तेमाल। इससे निकलने वाले नतीज़े और जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर रिपोर्टिंग की बात आती है, तब मीडिया की जिम्मेदारी।

चूंकि हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है, इसलिए इनमें बहुत सारी समानताएं भी हैं। यह इस सीरीज़ में पहला लेख है, जिसमें इस तरह की संवेदनशील जानकारी को लीक किए जाने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।

बालाकोट स्ट्राइक और "ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, 1923"

दासगुप्ता की गोस्वामी के साथ चैट से पता चलता है कि गोस्वामी को बालाकोट स्ट्राइक के बारे में 23 फरवरी, 2019, मतलब स्ट्राइक होने के तीन दिन पहले से ही पता था। वह दासगुप्ता से कहते हैं, "पाकिस्तान से जुड़ा कुछ बड़ा होने वाला है।" जब दासगुप्ता पूछते हैं कि क्या यह स्ट्राइक होगी, तो गोस्वामी जवाब में कहते हैं, "यह सामान्य स्ट्राइक से बड़ा होगा.... सरकार विश्वस्त है कि ऐसी स्ट्राइक होगी, जिससे लोगों में बहुत उत्तेजना छा जाएगी।"

अगर यह सच है, तो लीक हुई ट्रांसक्रिप्ट में वो सबूत मौजूद हैं, जो बताते हैं कि गोस्वामी के पास भारतीय सेना से जुड़ी संवेदनशील जानकारी थी। यह ऐसी जानकारी थी, जिस तक उनकी पहुंच नहीं होनी चाहिए थी और इस जानकारी को उन्होंने दासगुप्ता से साझा किया। इस खुलासे के चलते गोस्वामी पर "ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, 1923" की धारा 3(1)(a) के तहत मामला बनता है। यह धारा कहती है:

"यदि कोई व्यक्ति, राज्य की सुरक्षा या हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले किसी प्रयोजन के लिए- किसी प्रतिषिद्ध स्थान पर जाएगा, उसका निरीक्षण करेगा, उससे गुजरेगा;

या कोई ऐसा रेखाचित्र, रेखांक, प्रतिमान या टिप्पण बनाएगा, जो शत्रु के लिए प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उपयोगी होने के लिए प्रकल्पित है, हो सकता है, या होने के लिए आशयित है; 

या कोई ऐसी गुप्त शासकीय संकेतकी या संकेत शब्द, या कोई ऐसा रेखाचित्र, रेखांक, प्रतिमान, टिप्पण, अन्य दस्तावेज/जानकारी ‘अभिप्राप्त, संगृहित, अभिलिखित, प्रकाशित या किसी अन्य व्यक्ति को संसूचित करेगा’, जो शत्रु के लिए प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उपयोगी होने के लिए आशयित है, हो सकती है; 

या जो ऐसे मामले से संबंधित है जिसके सामने आने से भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा या विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के प्रभावित होने की संभाव्यता है; 

तो वह कारावास से दण्डनीय होगा, जिसकी अवधि उस दशा में जिसमें वह अपराध ‘किसी रक्षा परिसर, आयुधशाला, नौसैनिक, सैनिक या वायुसैनिक बल के स्थापन, सुरंग क्षेत्र, कारखाने, डाकयार्ड, शिविर, पोत या वायुयान से संबंधित या किसी गुप्त शासकीय संकेतक से संबंधित जगह में’ किया जाता है, तो वह चौदह वर्ष तक के कारावास और अन्य मामलों में तीन वर्ष तक के कारावास की सजा से दंड का भागीदार बनेगा।"

हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि यहां सिर्फ़ गोस्वामी ने ही कानून का उल्लंघन नहीं किया है। गोस्वामी के स्त्रोत के पास बालाकोट स्ट्राइक की जानकारी कम से कम हमले के तीन दिन पहले से थी और उसने एक बेहद अहम राज्य की गुप्त सूचना को एक पत्रकार को सौंपा था।

निजता का मौलिक अधिकार

फरवरी, 2019 में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई हिंसा के मामले में उमर खालिद को आरोपी बनाया गया था। उनके मामले में दाखिल हुई चार्जशीट भी हाल ही में प्रेस को लीक कर दी गई थी। अर्नब का मामला भी इसी लीक का एक दोहराव है। खालिद को 13 सितंबर 2020 को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था। उन पर UAPA (1967), आर्म्स एक्ट (1959) और IPC की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। 26 जनवरी, 2020 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रॉन्च ने उनके खिलाफ़ 100 पेज की चार्जशीट दाखिल की थी, जिसे 1 जनवरी, 2020 को प्रेस को लीक कर दिया गया।

जब खालिद की गिरफ़्तारी हुई थी, तो कई दक्षिणपंथी लोगों ने जश्न मनाया था। वामपंथी धड़े के बहुत सारे लोगों को भी गोस्वामी की चार्जशीट के लीक होने से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तमाम राजनीतिक विचारधारा के लोगों को समझना चाहिए कि संवैधानिक सुरक्षाएं सभी के लिए होती हैं और उनका उल्लंघन भी सभी के लिए ख़तरा है।

हिंसा उकसाने में खालिद की भूमिका पर दिल्ली पुलिस के नित बदलते दावों और इन दावों के पक्ष में कोई सबूत ना होने के बावजूद, बिलकुल रिया चक्रवर्ती की तरह प्रेस ने उन्हें साजिशकर्ता बता दिया। झूठी बातें गढ़ीं गईं कि उनके आतंकवादियों, पीपल्स फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और ऐसे ही संगठनों के साथ संबंध हैं। यहां तक कि उनके साथ सहआरोपी का कथित "इकबालिया बयान" तक जारी करवा दिया गया, ताकि खालिद के खिलाफ़ जनता में एक धारणा तैयार की जा सके।

दूसरी तरफ BARC के पूर्व प्रमुख दासगुप्ता के साथ गोस्वामी की चैट अगर सच्ची है, तो साफ़ तौर पर गोस्वामी दोषी हैं। लेकिन दोनों को अपनी निजी बातों को गुप्त रखने का भी अधिकार है। भारतीय संविधान की धारा 21 सभी नागरिकों को इसकी गारंटी देती है।

24 अगस्त, 2017 को 9 जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच, जिसकी अध्यक्षता तबके मुख्य न्यायाधीश जे एस केहर कर रहे थे और जिसमें जस्टिस चेलमेश्वर, एसए बोबड़े, डी वाय चंद्रचूड़, अब्दुल नजीर, नरीमन, आर के अग्रवाल, अभय मनोहर सप्रे और संजय किशन कौल शामिल थे, उस बेंच ने "जस्टिस के एस पुट्टास्वामी (रिटायर्ड) बनाम् भारत संघ" मामले में ऐतिहासिक फ़़ैसला दिया था। इसमें "एमपी शर्मा बनाम् सतीश चंद्रा, डीएम, दिल्ली" और "खड़क सिंह बनाम् उत्तरप्रदेश व अन्य" मामले में दिए गए फ़ैसले को पलटा गया था। 9 जजों द्वारा हस्ताक्षरित एक पेज का फ़ैसला कहता है: 

"अनुच्छेद 21 में दिए जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत निजता का अधिकार अंतर्निहित है और संविधान के तीसरे हिस्से द्वारा दी गई स्वतंत्रताओं का हिस्सा है।"

जस्टिर केहर, अग्रवाल, नजीर और खुद की तरफ से बोलते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था, "जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता आपस में विभाजित ना किए जा सकने वाले अधिकार हैं.... इन्हें एक सम्मानजनक मानवीय अस्तित्व से अलग नहीं किया जा सकता। एक व्यक्ति का सम्मान, इंसानों के बीच में समता और उनकी स्वतंत्रता भारतीय संविधान के बुनियादी स्तंभ हैं.... जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा नहीं बनाए गए हैं। इन अधिकारों को किसी भी नागरिक में अंतर्निहित होने और उसके भीतर के मानवीय तत्व से इन अधिकारों को अलग ना किए जा सकने वाली बात को संविधान ने मान्यता दी है।"

इसके बाद से इस फ़ैसले को कई अहम मामलों में पू्र्वगामी फ़ैसले के तौर पर उद्धरित किया जाता रहा है। इनमें "नवतेज सिंह जोहर बनाम् भारत संघ" (IPC की धारा 377 की संवैधानिकता), "जोसेफ शाइन बनाम् भारत संघ" (व्याभिचार के अपराधीकरण का ख़ात्मा) और "विनीत कुमार बनाम् CBI" (राज्य की निगरानी करने की शक्तियों में कटौती) शामिल हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि रिया, दीपिका पादुकोण और दूसरे लोगों की निजी बातचीत प्रकाशित करने में गोस्वामी ने मनमानी दिखाई और उनके पास इसके अधिकार भी नहीं थे। साथ ही अर्नब गोस्वामी ने इन लोगों की निष्पक्ष सुनवाई और निजता के अधिकार को भी रौंदा। अगर चैट्स वाकई सच्ची हैं, तो गोस्वामी के वक्तव्य खुद को दोषी साबित करने वाले हैं और उनकी पत्रकारिता पर सवाल उठाते हैं। लेकिन इसके बावजूद इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि इस लीक के द्वारा उनके "जीवन के अधिकार" का उल्लंघन हुआ है। यह पुट्टास्वामी मामले में दिए गए फ़ैसले का उल्लंघन है।

जब खालिद की गिरफ़्तारी हुई थी, तो कई दक्षिणपंथी लोगों ने जश्न मनाया था। वामपंथी धड़े के बहुत सारे लोगों को भी गोस्वामी की चार्जशीट के लीक होने से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन तमाम राजनीतिक विचारधारा के लोगों को समझना चाहिए कि संवैधानिक सुरक्षाएं सभी के लिए होती हैं और उनका उल्लंघन भी सभी के लिए ख़तरा है।

यह लेख मूलत: द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

(मोनिका धनराज एक वकील हैं। उन्होंने नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ ज्यूरिडिकल साइंस, कोलकाता से ग्रेजुएशन किया है। वे द लीफ़लेट में स्टाफ़ राइटर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

What do Arnab Goswami’s WhatsApp Leaks Tell us About the State of our Democracy?

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