NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
स्पेशल रिपोर्ट: सू ची की जीत पर क्या सोचते हैं दिल्ली के कैंपों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमान?
हाल ही में म्यांमार के आम चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी को एक बार फिर जीत मिली। उनको मिला बहुमत बहुत कुछ बयां करता है। मैं जानना चाहती थी कि दिल्ली के कैम्पों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमान इस जीत पर क्या सोचते हैं और इस जीत के उनके लिए क्या मायने हैं?
नाज़मा ख़ान
30 Nov 2020
रोहिंग्या मुसलमान

'उनके सामने लोगों को जला दिया गया''  एक गहरी सांस खींचने के बाद वो सामने टूटे टेबल पर भिनभिनाती मक्खियों को निहारने लगा और कुछ देर की खामोशी के बाद बोला ''शायद उनकी चुप्पी की भी कोई मजबूरी होगी''  ये बात सुनकर मैं कुछ हैरान हुई लेकिन मेरी हैरानी उस वक्त कुछ और बढ़ गई जब किसी ने कहा कि '' वो सही रास्ते पर थीं पर कुछ नहीं कर सकती'' दिल्ली के शाहीन बाग़ के क़रीब रोहिंग्या कैंप में रह रहे ये उन लोगों की बातचीत का हिस्सा था जो अपनी जान बचाकर रातों रात म्यांमार से निकले थे, कोई 2012 से तो कोई 2014 से तो कोई 2017 से भारत में रह रहा है। 

हाल ही में म्यांमार के आम चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी को एक बार फिर जीत मिली। उनको मिला बहुमत बहुत कुछ बयां करता है। मैं जानना चाहती थी कि दिल्ली के कैम्पों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमान इस जीत पर क्या सोचते हैं और इस जीत के उनके लिए क्या मायने हैं? इन लोगों की बातचीत में एक बात जो सबने दोहराई वो ये कि सू ची रोहिंग्या मुसलमानों के लिए कुछ नहीं करेंगी, लेकिन इसके साथ ही जब वो कहते हैं कि उनकी( सू ची) चुप्पी की भी कोई मजबूरी होगी तो भाव ऐसा समझ में आ रहा था कि उन्हें आज भी शायद उम्मीद है कि सू ची उनके लिए कुछ कर सकती हैं।

इस विश्वास की वजह क्या थी? जो वजह मुझे समझ में आ रही थी वो ये कि शायद अब इनके पास अच्छा सोचने के अलावा चारा भी क्या है। 15 साल कै़द में रहने वाली सू ची को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था, और रोहिंग्या कैम्प में रह रहे लोगों ने दावा किया कि जब वो क़ैद में थीं तो रोहिंग्या मुसलमानों ने भी उनकी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई थी। पर आज वही सू ची खामोश हैं और पूरी दुनिया की उनकी तरफ सवालिया नज़रें हैं। 

सुबह का वक़्त था। सूरज की गुनगुनी धूप में इतनी धूल मिली हुई थी कि मैं जहां बैठी थी वहां की पॉलीथील वाली छत फटी हुई थी और उसमें से छन के आ रही धूप में मैं धूल के कणों को साफ़ देख पा रही थी। ना सिर पर सलामत छत,  ना बिजली, ना पानी, और ना ही तमाम बुनियादी ज़रूरतों का सही इंतज़ाम था फिर कोरोना को तो भूल ही जाइए, मैं ये सब देखकर सोच ही रही थी कि ये लोग यहां कैसे रहते हैं,  कि तभी मेरे सामने से करीब एक चार-पांच साल की बच्ची हिजाब पहने अपने छोटे भाई के कंधे पर हाथ रखे हुए मेरे सामने से फुदकती हुई चली जा रही थी मैंने पीछे से आवाज़ लगाई तो पलट कर खिलखिलाई और धूल भरे रास्ते पर दो बार ऐसे कूदी की धूल का गुबार कुछ और गहरा गया जिसने मुझे समझा दिया कि यहां की जिन्दगी कैसी है। 

जैसा कि इन लोगों ने मुझे बताया कि इस कैम्प में 95 परिवार रह रहे हैं, मैंने बातचीत करनी शुरू की तो हर दूसरे का दामन ग़म से भरा था, अपने सामने पति और दो बेटों की मौत देख चुकी अनवरा बेग़म अपनी सिर्फ़ एक बेटी के साथ यहां रहती है और सब्ज़ी बेचकर गुज़ारा करती है, इतना बड़ा गम झेल चुकी अनवरा जब मुझे अपनी आपबीती सुना रही थी तो उनकी आंखों को देखकर एहसास हुआ कि उनके आंसू भी अब जज़्ब हो चुके हैं, अनवरा, आजिदा बेग़म, रुकैया, मोहम्मद फ़ारूक़, और मोहम्मद क़ासिम इनमें से ज़्यादातर लोग रखाइन प्रांत के हैं, मैंने वापस जाने, एनआरसी समेत कई सवाल उनके सामने रखे, तो हर कोई भारत के एहसान तले दबा नज़र आया, अनवरा बेगम ने कहा कि ''हम यहां मेहमान हैं जब हमारे वतन में सब ठीक हो जाएगा तो हम चले जाएंगे'', वहीं मो. फ़ारूक़ ने कहा कि ''अगर आज मैं अपने देश वापस जाता हूं तो गारंटी देता हूं कि मैं ज़िन्दा नहीं बचूंगा'', तमाम सवालों में से मेरा एक सवाल था कि ''सीएए, एनआरसी के तहत अगर वो भारत में नहीं रह पाएंगे और म्यांमार उन्हें वापस नहीं लेगा तो ऐसे में वो क्या करेंगे''? औरतें जहां हालात की पेचिदगी से वाक़िफ़ नहीं थी इसलिए ख़ामोश रहीं तो कुछ का जवाब था कि ''वापस भेजने से बेहतर होगा हमें यहीं पर गोली मार दी जाए''। पर एक बात साफ़ थी कि हर किसी में अपने वतन लौटने की तड़प थी।

मो. फ़ारूक़ ने मुझसे कहा कि ''मेरा घर, मेरी ज़मीन है वहां, मेरी पैदाइश हुई है वहां, आख़िर कौन अपना वतन छोड़कर भागना चाहता है''? और ये कहते-कहते एक बार फिर वो कहीं गुम हो गया और सामने की टेबल पर एक दूसरे पर बैठती भिन-भिन करती मक्खियों को देखने लगा। इन रोहिंग्या मुसलमानों के पास कहने को बहुत कुछ था पर शायद सुनने वाला कोई नहीं है ना उनके देश में और ना ही कहीं और। 

मैं काफी देर इन लोगों से बात करती रही लेकिन जब मैं वापस लौट रही थी तो मेरे ज़ेहन में मुगल सल्तनत के आख़िरी सुल्तान बहादुर शाह ज़फ़र का वो शेर गूंजने लगा जो उन्होंने रंगून (म्यांमार) में अपने वतन की तड़प में लिखा था- कितना है बद नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए, दो गज़ ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में।

(नाज़मा ख़ान स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

सभी फोटो नाज़मा ख़ान

Aung San Suu Kyi
Myanmar
Myanmar election
Rohingya Muslims
Rohingya Community

Related Stories

भारत के कर्तव्यों का उल्लंघन है रोहिंग्या शरणार्थियों की हिरासत और उनका निर्वासन

म्यांमार के प्रति भारतीय विदेश नीति अब भी अस्पष्ट बनी हुई है

म्यांमार की पुरानी रिपोर्ट कोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्या के नाम पर शेयर की

रोहिंग्या कैंप: आग लगने के बाद अब क्या हैं हालात

दिल्ली के इकलौते रोहिंग्या कैंप में बार-बार आग लगने से उठते सवाल

सुप्रीम कोर्ट का रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने का फ़ैसला कितना मानवीय?

निर्धारित प्रक्रिया के बिना प्रत्यर्पण नहीं, नक्सलियों ने किया सीआरपीएफ़ जवान को रिहा और अन्य ख़बरें

हिरासत में लिए गए रोहिंग्याओं को निर्धारित प्रक्रिया के बिना म्यांमा प्रत्यर्पित नहीं किया जायेगा:सुप्रीम कोर्ट

रोहिंग्या शरणार्थी : डर के साये में जीने को मजबूर! 

म्यांमार ,महबूबा पर बड़ा दिल दिखाओ बीजेपी सरकार !


बाकी खबरें

  • Lenin
    अनीश अंकुर
    लेनिन: ‘‘कल बहुत जल्दी होता... और कल बहुत देर हो चुकी होगी... समय है आज’’
    22 Apr 2022
    लेनिन के जन्म की 152वीं सालगिरह पर पुनर्प्रकाशित: कहा जाता है कि सत्रहवी शताब्दी की अंग्रेज़ क्रांति क्रामवेल के बगैर, अठारहवीं सदी की फ्रांसीसी क्रांति रॉब्सपीयर के बगैर भी संपन्न होती लेकिन बीसवीं…
  • न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,451 नए मामले, 54 मरीज़ों की मौत 
    22 Apr 2022
    दिल्ली सरकार ने कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए, 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को बूस्टर डोज मुफ्त देने का ऐलान किया है। 
  • पीपल्स डिस्पैच
    नाटो देशों ने यूक्रेन को और हथियारों की आपूर्ति के लिए कसी कमर
    22 Apr 2022
    जर्मनी, कनाडा, यूके, नीदरलैंड और रोमानिया उन देशों में शामिल हैं, जिन्होंने यूक्रेन को और ज़्यादा हथियारों की आपूर्ति का वादा किया है। अमेरिका पहले ही एक हफ़्ते में एक अरब डॉलर क़ीमत के हथियारों की…
  • एम. के. भद्रकुमार
    सामूहिक विनाश के प्रवासी पक्षी
    22 Apr 2022
    रूसियों ने चौंकाने वाला दावा किया है कि, पेंटागन की जैव-प्रयोगशालाओं में तैयार किए गए डिजिटलीकृत प्रवासी पक्षी वास्तव में उनके क़ब्ज़े में आ गए हैं।
  • रश्मि सहगल
    उत्तराखंड समान नागरिक संहिता चाहता है, इसका क्या मतलब है?
    21 Apr 2022
    भाजपा के नेता समय-समय पर, मतदाताओं का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने के लिए, यूसीसी का मुद्दा उछालते रहते हैं। फिर, यह केवल एक संहिता का मामला नहीं है, जो मुसलमानों को फिक्रमंद करता है। यह हिंदुओं पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License