NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के सियासी मिलन की मजबूरी क्या है?
करीब आठ साल बाद उपेंद्र कुशवाहा की ‘घर वापसी’ का बीजेपी पर असर हो न हो लेकिन ये तय है कि कुशवाहा के बहाने नीतीश कुमार अपनी कमज़ोर होती सियासत को फिर से दुरूस्त करने में ज़रूर जुट गए हैं।
सोनिया यादव
15 Mar 2021
नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के सियासी मिलन की मजबूरी क्या है?

“ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे नीतीश कुमार ने ठगा नहीं ”

ये शब्द उपेंद्र कुशवाहा ने जनता दल यूनाइटेड (जद-यू) से अलग होकर अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के गठन के समय कहे थे। हालांकि अब उन्हीं उपेंद्र कुशवाहा ने करीब आठ साल बाद रविवार, 14 मार्च को अपनी पार्टी रालोसपा का नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में विलय कर ‘घर वापसी’ कर ली है। इस मौके पर उन्होंने नीतीश कुमार को बड़े भाई का सम्मान देते हुए कहा कि हम अब साथ मिलकर काम करेंगे। वैसे इस मिलकर काम करने का इतिहास कुछ पुराना है लेकिन इस बार दोनों पार्टियों की मजबूरियां नई जरूर हैं, जिसकी चर्चा राजनीतिक हलकों में बीते कई दिनों से चल ही रही थी।

पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विलय की घोषणा करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने अपने अंदाज़ में कहा, “मीडिया के बंधुओं ने मुझसे पूछा कि आप उधर जा रहे हैं, तो क्या तय हुआ है? इस घर में मुझे कुछ भी तय करने की ज़रूरत नहीं है। मैं बिना किसी शर्त, बिना किसी कंडीशन। नीतीश जी की अगुआई में सेवा करने के लिए वापस आया हूँ। मैंने अपने राजनीतिक जीवन में ढेरों उतार-चढ़ाव देखें हैं, लेकिन अब हर तरह का उतार-चढ़ाव नीतीश जी के नेतृत्व में ही देखना है, यह तय रहा। ऐसा मैंने अपने अनुभव से जाना है कि सारा ज्ञान किताबों को पढ़कर नहीं आ सकता।”

वैसे नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को निराश नहीं किया बल्कि उनका मान बढ़ाते हुए कहा, "उपेंद्र जी ने तो कह दिया कि वे साथ आकर काम करेंगे और उनकी कोई ख़्वाहिश नहीं, लेकिन हम लोग तो सोचेंगे न? आपकी भी प्रतिष्ठा है, आपकी भी इज़्ज़त है, आपकी भी हैसियत है। भाई उपेंद्र कुशवाहा जी तत्काल प्रभाव से जनता दल (यूनाइटेड) के संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने इसके बाबत पत्र तैयार कर दिया है।"

राजनीति में कोई किसी का दोस्त नहीं, कोई किसी का बैरी नहीं

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, ये तो सब जानते हैं लेकिन इस 'सियासी मिलन' की तस्वीर अभी से साफ दिखाई दे रही है। उपेंद्र कुशवाहा का बिना किसी शर्त उस दल में शामिल होना, जिसके कल तक वो खिलाफ खड़े थे और नीतीश कुमार का उन्हें तत्काल प्रभाव से जदयू के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाने की घोषणा करना एक नई सियासत की चाल जैसा प्रतीत होता है।

हालांकि बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि इस मिलन की जरूरत दोनों दलों को थी। कुशवाहा का नीतीश कुमार को आठ साल के बाद फिर से 'बड़ा भाई' कहने के पीछे का कारण पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव का परिणाम बताया जा रहा है। चुनाव में कुशवाहा ने महागठबंधन का साथ छोड़कर एक दूसरे गठबंधन के साथ चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश जरूर की लेकिन मतदाताओं का साथ नहीं मिला। कुशवाहा की पार्टी खाता तक नहीं खोल सकी। तो वहीं चुनाव में जेडीयू का प्रदर्शन भी खराब रहा, राज्य की सत्ता पर काबिज जेडीयू चुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई।

नीतीश का कुशवाहा के बहाने बीजेपी पर निशाना

वैसे कुशवाहा और कुमार के मिलन को एक और नजरिए से देखा जा रहा है, जिसने बीजेपी खेमे में भी कुछ हलचल मचा दी है। पार्टी विलय के दौरान उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि जदयू को फिर से नंबर वन पार्टी बनाना है। दरअसल बीते विधानसभा चुनाव के पहले तक जेडीयू-बीजेपी के साथ में जदयू बड़े भाई की भूमिका में थी। लेकिन चुनाव के परिणाम आते ही बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में आ गई। नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की सियासी हैसियत कमज़ोर हो गई। मौजूदा स्थिति में वह आरजेडी और बीजेपी के बाद तीसरे स्थान पर है।

इसलिए अब कहा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा के बहाने नीतीश कुमार राज्य में बीजेपी के बढ़ते ग्राफ को कम करना चाहते हैं और बीजेपी पर निशाना साधना चाहते हैं। दरअसल बिहार के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की सियासी हैसियत को कमज़ोर किया है और नीतीश कुमार गाहे-बगाहे इस दर्द को बयाँ भी करते रहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ। वे दोस्त और दुश्मन की पहचान करने में चूक गए।

बीते विधानसभा चुनाव में एनडीए के साथ रहते हुए भी लोक जनशक्ति पार्टी ने जदयू प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार खड़े कर नीतीश कुमार के सामने अच्छी-खासी दिक्कत खड़ी कर दी थी। तब कहा यही जा रहा था कि इस सियासी चाल के पीछे बीजेपी का हाथ है। परिणामों में इसका असर देखने को मिला और जदयू को 28 सीटों का घाटा हुआ। पार्टी महज़ 43 सीटों पर सिमट गई। ऐसे में नीतीश कुमार ख़ुद को बीजेपी की तुलना में मजबूत करने के लिए ख़ासी मशक्कत कर रहे हैं।

मालूम हो कि इसी कड़ी में बसपा के एकमात्र विधायक को जदयू में शामिल कराके कैबिनेट मंत्री बना दिया गया और एकमात्र निर्दलीय विधायक को भी मंत्री पद मिल गया। इतना ही नहीं अब वे कभी ख़ुद के साथ और अलग रहे उपेंद्र कुशवाहा को भी साथ ले आए हैं। जबकि उपेंद्र कुशवाहा बीते लोकसभा चुनाव यूपीए में रहकर और विधानसभा चुनाव अलग मोर्चा बनाकर बुरी तरह हारे। बीते विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ ही बोलते रहे।

एक नज़र उपेंद्र कुशवाहा के सियासी सफ़र पर

माना जाता है कि उपेंद्र कुशवाहा एक ज़माने में नीतीश के करीबी थे।  नीतीश ने ही उन्हें साल 2004 में नेता प्रतिपक्ष बनवाया, जहां से उनका कद ऊँचा हुआ और उनकी अपनी पहचान बनी।

साल 2013 में जदयू से अलग होकर उन्होंने अपना अलग दल बनाया और तब से अब तक वे दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि वे अपने दल के गठन के पहले और जदयू से बाहर-भीतर होने के क्रम में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के साथ भी रहे।

गौरतलब है कि नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा के साथ आने के भी कई सियासी निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। फिर से लव-कुश समीकरण की बातें होने लगी हैं। यानी बिहार में तीन से चार फीसदी कुर्मी और 12 से 13 फीसदी कुशवाहा या कोइरी समुदाय को साथ रखने का समीकरण। सियासी पंडित ऐसा मानते हैं कि कुशवाहा के अलग होने के बाद नीतीश के इस वोट बैंक में दरार आ गई है, जिसे नीतीश फिर से दुरूस्त करने में जुटे हैं।

बीते दिनों रालोसपा के प्रभारी प्रदेश अध्यक्ष बीरेंद्र कुशवाहा समेत दल के संस्थापक कई नेता राजद में शामिल हो गए थे। उस समय राजद ने कहा था कि रालोसपा के भीतर अब सिर्फ़ उपेंद्र कुशवाहा ही बच गए हैं। ऐसे में अब ये देखना दिलचस्प है कि क्या कमज़ोर उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार को एक-दूसरे का साथ सियासी लाभ देता है या बीजेपी पर इसका कोई नया असर होता है।

Bihar
upendra kushwaha
Nitish Kumar
jdu
RLSP
BJP

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • NAM
    एन.डी.जयप्रकाश
    गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत के एशियाई-अफ़्रीकी रिश्तों को बढ़ावा देने के प्रयास: III
    23 Nov 2021
    एशियाई और अफ़्रकी देशों के भीतर सैन्य-समर्थक गुटों के अड़ंगे को आख़िरकार मज़बूती मिल गयी, जिसने स्थायी एकता और सहयोग के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
  • vir das
    वसीम अकरम त्यागी
    वीर दास के बहाने: हमने आईना दिखाया तो बुरा मान गए
    23 Nov 2021
    वीर दास के बयान की मुखालिफत सरकार का बचाव कैसे नहीं है? उनकी आलोचना कीजिए मगर उनके सवालों का जवाब मिलना चाहिए, कम से कम इस देश की महिलाओं को।
  • Gopal Rai
    न्यूज़क्लिक टीम
    भाजपा की नफ़रत को ‘आप’ के काम से काटेंगे : गोपाल राय
    22 Nov 2021
    ‘ख़ास बातचीत’ में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने इंटरव्यू किया दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय का और उनसे जानना चाहा कि दिल्ली में प्रदूषण की मार के साथ-साथ, भाजपा की केंद्र सरकार से जो रस्साकशी चल रही…
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    लखनऊ में किसान महापंचायत आज, बर्ख़ास्तगी को चुनौती देंगे कफ़ील ख़ान, और अन्य ख़बरें
    22 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी लखनऊ में किसान महापंचायत, कफ़ील ख़ान बर्ख़ास्तगी को सुप्रीम कोर्ट में देंगे चुनौती और अन्य खबर
  • संदीप चक्रवर्ती
    'अगर बीजेपी वोट लूटने की कोशिश करे तो उसका विरोध करो' : त्रिपुरा पूर्व सीएम माणिक सरकार ने की अपील
    22 Nov 2021
    राजनीतिक विवाद के बीच राज्य के 13 नगरपालिका सीटों पर चुनाव होने वाले हैं, इससे पहले सीपीआईएम ने मार्च और रैलियाँ निकालने का फ़ैसला किया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License