NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
क्या है किसानों का मुद्दा जिसके चलते हरसिमरत कौर को मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देना पड़ा
कृषि सुधार और दोगुनी आय के दावों के साथ केंद्र की मोदी सरकार ने जिन तीन नए कृषि विधेयकों को पेश किया है, उसके खिलाफ विपक्ष के साथ-साथ अब बीजेपी की पुरानी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को भी विरोध दर्ज कराना पड़ा है। देश भर के किसान पहले ही कई महीनों से इन विधेयकों के विरोध में सड़कों पर हैं।
सोनिया यादव
18 Sep 2020
क्या है किसानों का मुद्दा जिसके चलते हरसिमरत कौर को मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देना पड़ा

"मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया है। किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है।"

केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद शिरोमणि अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल ने ये ट्वीट किया। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल का ये इस्तीफ़ा मोदी सरकार के महत्वकांक्षी तीन कृषि विधेयकों के विरोध में गुरुवार, 17 सितंबर को सामने आया। हालांकि शिरोमणि अकाली दल अभी भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की सहयोगी है लेकिन पार्टी ने इन कृषि विधेयकों के मामले में अपने सांसदों को इसके ख़िलाफ़ वोट करने को कहा है। अकाली दल के सांसद और पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी इन विधेयकों का विरोध किया है।

I have resigned from Union Cabinet in protest against anti-farmer ordinances and legislation. Proud to stand with farmers as their daughter & sister.

— Harsimrat Kaur Badal (@HarsimratBadal_) September 17, 2020

हरसिमरत कौर बादल ने सदन के बाहर पत्रकारों से कहा, "हज़ारों किसान सड़क पर हैं। मैं ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहती जिसने सदन में बिना किसानों की चिंताओं के बारे में बात किए बिल पास कर दिया। यही वजह है कि मैंने इस्तीफ़ा दिया।"

उन्होंने प्रधानमंत्री को सौंपे अपने इस्तीफ़े में लिखा है कि कृषि उत्पाद की मार्केटिंग के मुद्दे पर किसानों की आशंकाओं को दूर किए बिना भारत सरकार ने बिल को लेकर आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया है। शिरोमणि अकाली दल किसी भी ऐसे मुद्दे का हिस्सा नहीं हो सकती है जो किसानों के हितों के ख़िलाफ़ जाए। इसलिए केंद्रीय मंत्री के तौर पर अपनी सेवा जारी रखना मेरे लिए असभंव है।

image

बीजेपी-अकाली दल की क्या मजबूरियां हैं?

मालूम हो कि शिरोमणि अकाली दल के लोकसभा में दो सदस्य हैं तो वहीं राज्यसभा में तीन। भले ही पार्टी के इस विरोध से सरकार के बिल पास कराने के गणित में कोई फर्क न पड़े लेकिन पंजाब में बिना अकाली दल के बीजेपी का कोई खास वजूद नहीं है। अकाली दल द्वारा अपने ही गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने से केंद्र में बीजेपी की किरकिरी जरूर होगी।

उधर, 100 साल पुरानी अकाली दल का भी असली अस्तित्व पंजाब में ही हैं। यहां के किसान अकाली दल की रीढ़ हैं और इस समय किसानों में सरकार को लेकर बहुत ग़ुस्सा है। अकालियों के ख़िलाफ़ कई गाँवों में पोस्टर लगा दिये गए थे ऐसे में अकाली दल अपने वोट बैंक को किसी भी सूरत में और नाराज़ नहीं करना चाहता।

image

क्या हैं ये तीन कृषि अध्यादेश/विधेयक?

कृषि सुधार के दावों के साथ केंद्र सरकार ने जो तीन नए विधेयक पेश किए हैं, उन्हें सरकार पहले अध्यादेश के तौर पर लागू कर चुकी है। इनमें उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, किसान सशक्तीकरण और संरक्षण अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश शामिल हैं।

नए विधेयकों में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव के साथ-साथ ठेके पर खेती को बढ़ावा दिए जाने की बात कही गई है और साथ ही प्रस्ताव है कि राज्यों की कृषि उपज और पशुधन बाज़ार समितियों के लिए गए अब तक चल रहे क़ानून में भी संशोधन किया जाएगा।

image

उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020

इस अध्यादेश में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है। इसके जरिये सरकार एक देश, एक बाजार की बात कर रही है। यानी अब व्यापारी किसानों से मंडियों के बाहर भी उनकी उपज खरीद सकते हैं। इससे न्यूनतन समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा मंडियों को 6 प्रतिशत अलग से दिए जाने वाले टैक्स से भी व्यापारी बच सकते हैं। मोटा-माटी ये अध्यादेश राज्य सरकारों को मंडियों के बाहर की गई कृषि उपज की बिक्री और खरीद पर टैक्स लगाने से रोकता है।

ये अध्यादेश/विधेयक बड़े कारोबारियों को सीधे किसानों से उपज खरीद की बात तो करता है लेकिन इस व्यवस्था से उन छोटे किसानों का क्या होगा जिनके पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है या व्यपारी जिनका शोषण कर सकते हैं, इस पर बात नहीं करता।

image

किसान सशक्तीकरण और संरक्षण अध्यादेश

इस अध्यादेश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात है। यह फसल की बुवाई से पहले किसान को अपनी फसल को तय मानकों और तय कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा प्रदान करता है। इसके तहत फसलों की बुआई से पहले कम्पनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं। लेकिन कई मामलों में देखा गया है कि जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियाँ किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर देती हैं। यानी अब इस नए अध्यादेश के तहत किसान कहीं अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के न रह जाएं। ये पश्चिमी देशों का कृषि मॉडल है, जहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन नहीं है बल्की एक व्यवसाय है।

कई मामलों में देखा गया है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है। इसका उदाहरण गुजरात है, जहां पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कम्पनी ने वापस ले लिया था।

image

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन

इस अध्यादेश के तहत आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन कर आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को हटाने की बात की जा रही है। यानी अब व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों को एक लिमिट से अधिक भंडारण की छूट दी जा रही है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 किसानों को बड़े व्यापारियों से संरक्षण के लिए लाया गया था। इससे पहले फसलों को व्यापारी किसानों से औने-पौने दामों में खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और कालाबाज़ारी करते थे, इसे रोकने के लिए ही यह अधिनियम बनाया गया था जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गयी थी। लेकिन अब सरकार इसे खत्म करने जा रही है।

image

किसान क्या कह रहे हैं?

किसानों का कहना है कि मंडी समिति के जरिये संचालित अनाज मंडियां उनके लिए यह आश्वासन थीं कि उन्हें अपनी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाएगा। मंडियों की बाध्यता खत्म होने से अब यह आश्वासन भी खत्म हो जाएगा।

ठेके पर खेती के मामले में किसानों कहना है कि जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा। इसका ख़मियाज़ा सिर्फ़ किसान को उठाना पड़ेगा।

वहीं आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन मामले में किसानों का मानना है कि ज्यादतर किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानी यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है। कम्पनियाँ और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। इस बदलाव से कालाबाजारी घटेगी नहीं बल्की बढ़ेगी।

image

क्या हैं किसानों की केंद्र सरकार से प्रमुख मांगे?

  •  केंद्र के तीनों अध्यादेशों/विधेयक को वापस लिया जाए।
  •  संसद में एमएसपी गारंटी कानून पास किया जाए।
  • किसानों को आढ़तियों की मार्फत ही भुगतान हो।
  •  सभी किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा।
  • स्वामीनाथन आयोग के C2+50% फॉर्मूले के तहत एमएसपी तय हो।

किसान संगठन क्या कह रहे हैं?

इन अध्यादेशों/विधेयकों का कई किसान संगठन बहुत पहले से विरोध कर रहे हैं। उनकी आशंका है कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली को खत्म करने का रास्ता साफ हो जाएगा तो वहीं किसान बड़े कॉरपोरेट घरानों की दया के भरोसे रह जाएंगे।

सीटू के उपाध्यक्ष ज्ञान शंकर मजूमदार ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि कि ये तीनों विधेयक एक बार फिर से किसानों को बंधुआ मज़दूरी में धकेल देंगे। नए विधेयक की वजह से इन समितियों के निजीकरण का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा।

image

उनका कहना है कि अब पशुधन और बाज़ार समितियाँ किसी इलाक़े तक सीमित नहीं रहेंगी। अगर किसान अपना उत्पाद मंडी में बेचने जाएगा, तो दूसरी जगहों से भी लोग आकर उस मंडी में अपना माल डाल देंगे और किसान को उनकी निर्धारित रक़म नहीं मिल पाएगी।

इस संबंध में इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सचिव के राजीव आरोड़ा कहते हैं कि ठेके पर खेत लेने वाले को किसानों और उनके नुकसान से कोई मतलब नहीं होगा। अगर किसी भी कारण से फसल बर्बाद होती है, तो सिर्फ़ किसान को ही उस नुक़सान को झेलना पड़ेगा।

किसान संगठनों का ये भी कहना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में पहले किसानों पर खाद्य सामग्री को एक जगह जमा कर रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी। ये पाबंदी सिर्फ़ कृषि उत्पाद से जुडी व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी। अब संशोधन के बाद जमाख़ोरी को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाएगी, जिससे बड़े पूँजीपतियों को तो फ़ायदा होगा, लेकिन किसानों को इसका नुक़सान झेलना पड़ेगा।

किसान सभा के विजू कृष्णन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वे आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन विधेयक को किसान "जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी की आज़ादी" का विधेयक मानते हैं।

इन विधेयकों को किसान "मंडी तोड़ो, न्यूनतम समर्थन मूल्य को ख़त्म करने वाले और कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले" विधेयक के रूप में देख रहे हैं।

गौरतलब है कि इन तीनों बिलों के खिलाफ खड़े किसानों ने बीते दिनों तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के तमाम हिस्सों में सड़क पर उतरकर जमकर प्रदर्शन किए थे। किसानों का सबसे ज़्यादा विरोध पंजाब और हरियाणा में देखने को मिल रहा है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ किसानों की झड़प भी हुई थी, जिसके कारण पंजाब और हरियाणा में तनाव के हालात बन गए थे।

इसे भी पढ़ें : कृषि विधेयकों के विरोध में किसानों का सड़क रोको, रेल रोको आंदोलन

Harsimrat Kaur Badal
Farmers Issues
BJP
modi cabinet
Narendra modi
modi sarkar
Shiromani Akali Dal
Farmers Organization
minimum support price
CITU

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई


बाकी खबरें

  • उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा : क्या रहे जनता के मुद्दे?
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा : क्या रहे जनता के मुद्दे?
    09 Mar 2022
    उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के चुनाव की चर्चा भले ही मीडिया में कम हुई हो, मगर चुनावी नतीजों का बड़ा असर यहाँ की जनता पर पड़ेगा।
  • Newschakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    Akhilesh Yadav का बड़ा आरोप ! BJP लोकतंत्र की चोरी कर रही है!
    09 Mar 2022
    न्यूज़चक्र के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार Abhisar Sharma बात कर रहे हैं चुनाव नतीजे के ठीक पहले Akhilesh Yadav द्वारा की गयी प्रेस कांफ्रेंस की।
  • विजय विनीत
    EVM मामले में वाराणसी के एडीएम नलिनीकांत सिंह सस्पेंड, 300 सपा कार्यकर्ताओं पर भी एफ़आईआर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की मतगणना से पहले राज्य कई स्थानों पर ईवीएम को लेकर हुए हंगामे के बाद चुनाव आयोग ने वाराणसी के अपर जिलाधिकारी (आपूर्ति) नलिनी कांत सिंह को सस्पेंड कर दिया। इससे पहले बना
  • बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की
    09 Mar 2022
    मौजूदा 17वीं विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 26 है। 2020 के चुनाव में 243 सीटों पर महज 26 महिलाएं जीतीं यानी सदन में महिलाओं का प्रतिशत महज 9.34 है।
  • सोनिया यादव
    उत्तराखंड : हिमालयन इंस्टीट्यूट के सैकड़ों मेडिकल छात्रों का भविष्य संकट में
    09 Mar 2022
    संस्थान ने एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे चौथे वर्ष के छात्रों से फ़ाइनल परीक्षा के ठीक पहले लाखों रुपये की फ़ीस जमा करने को कहा है, जिसके चलते इन छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License