NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
क्या है ‘फंसे होने’ और ‘छिपे होने’ के पीछे की राजनीति
शब्दों का यह चयन अनायास नहीं हुआ और यह पहली दफ़ा नहीं हुआ। इसके पीछे गंभीर भाषायी राजनीति काम करती है।
सत्यम श्रीवास्तव
01 Apr 2020
निजामुद्दीन मरकज़
Image courtesy: India Today

बीते रोज़ पूरे दिन मीडिया पर तबलीग़ी जमात, निजामुद्दीन मरकज़, मुसलमान और उनका साज़िशन छिपना चलता रहा। उन्हें अपराधी करार दे दिया गया। जैसा कि आजकल हिंदुस्तान में कानून व्यवस्था का चलन है, पहले मीडिया फैसला सुनाएगी, उसके आधार पर सरकार कानून को हुक्म देगी और शाम होते होते 7-8 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली जाएगी। इसे लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। आगे भी तमाम झूठे सच्चे अफ़साने सुनाये जाते रहेंगे।

इस मामले में दो शब्दों ने बहुत ज़ोर पकड़ा और यह साफ़ दिखाई देने लगा कि कैसे भाषा का इस्तेमाल दो अलग अलग मज़हबों के लिए किया जाता है। जो श्रद्धालु वैष्णो देवी या गुरुद्वारे या तिरुपति बालाजी में देशबंदी की वजह से वहीं ठहर गए उनके लिए मीडिया ने ‘फंसना’ शब्द का इस्तेमाल किया और जो श्रद्धालु या धर्म प्रचारक दिल्ली में निज़ामुद्दीन मरकज़ में ठहर गए उनके लिए ‘छिपना’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।

शब्दों का यह चयन अनायास नहीं हुआ और यह पहली दफ़ा नहीं हुआ। इसके पीछे गंभीर भाषायी राजनीति काम करती है।

भाषा विज्ञानी मानते हैं कि यह कहना कि समाज भाषा का निर्माण करता है, उतना ही सही है जितना यह कहना कि भाषा भी समाज का निर्माण करती है। इसे भाषा विज्ञान में एक विशिष्ट अनुशासन के तौर पर गहराई से पढ़ाया जाता है जिसे समाज- भाषा विज्ञान कहा जाता है। यानी भाषा जो मनुष्य होने की विशिष्टता है वह अपने भू-राजनैतिक संदर्भों में ही आकार लेती है।

प्राय: भाषा की निर्मिति प्रभुत्व वर्ग के हितों के संरक्षण में भी होती है। सामान्य बोल-चाल की भाषा और प्रभुत्व वर्ग की भाषा में यह अंतर अब और स्पष्ट होता जा रहा है।

मरकज़ में मुसलमानों के ‘छिपे होने’ और वैष्णो देवी मंदिर में श्रद्धालुओं ‘फंस जाने’ के बीच यही भाषायी निर्मिति है जिसे एक खास उद्देश्य से रचा जाता है।

मुसलमानों के प्रति इस देश में आज़ादी के बाद से ही भाषा ने इसी तरह के रूपक रचे हैं जिनके ध्वन्यार्थ इस लंबी अवधि में विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक विभाजन की ज़मीन तैयार करने के लिए और बहुसंख्यक समाज की संतुष्टि के लिए इस्तेमाल होते आए हैं।

इतिहास की तमाम स्कूली पाठ्य पुस्तकों में हमने इन शब्दों पर कभी आपत्ति नहीं जताई कि क्योंकर इस देश में ‘आर्यों का आगमन’ हुआ और ‘मुग़लों का आक्रमण’ हुआ? तिब्बत या नेपाल या मारिशस से आया हुआ कोई व्यक्ति या अनेक व्यक्ति इस देश में ‘शरणार्थी’ बनकर आए जबकि बांग्लादेश या पाकिस्तान से आए हुए लोग यहाँ ‘घुसपैठिए’ हो गए? हमने नक्सलियों और उग्रवादियों को शालीन भाषा में  ‘ढेर’ होते हुए सुना और पढ़ा है।

असुरों का (यह जानते हुए भी कि देश के कई इलाकों में आदिवासी समुदाय इस नाम से जाने जाते हैं) ‘वध’ एक धार्मिक कार्यवाही हो जाती है। इसी तर्ज़ पर हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लगभग प्रात: स्मरणीय योद्धा नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की जघन्य हत्या को ‘गांधी वध’  कहा। चूंकि ‘वध’ भारतीय जनमानस और विशेष रूप से हिन्दू जन मानस के लिए धर्म रक्षार्थ की गयी कार्यवाही है इसलिए नाथूराम गोडसे में नायकत्व की तलाश जारी रहती है।

हमें कभी अजीब नहीं लगा कि जिस रास्ते और जिस उद्देश्य के लिए आर्य इस देश में आए थे ठीक उसी रास्ते और उसी उद्देश्य के लिए मुग़ल भी यहाँ आए थे। जब आर्य इस देश में आए थे तब यहाँ यही आदिवासी थे और जिन्हें दरअसल ‘मूलनिवासी’ कहा जाना चाहिए था लेकिन आज भी भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र में इस बात को मानने से इंकार करती है कि यहाँ कोई मूलनिवासी है बल्कि एक हठधर्मिता दिखाते हुए यह मनवाना चाहती है कि आर्य ही यहाँ के मूलनिवासी हैं। इसलिए आदिवासी यहाँ तमाम राक्षसों के नामों में मौजूद हैं।

हालांकि आदिवासी समुदाय हिन्दू पौराणिकी के अनुसार भस्मासुर, बाकासुर आदि रूपों में जन मानस में मौजूद हैं और इससे आर्यों को यह छूट मिल जाती रही है कि ये मूल निवासी नहीं राक्षस थे और मानव सभ्यता के विकास में इनका वध एक पुनीत कार्य था। ऐतिहासिक सच्चाई यही है कि अगर मुग़ल यहाँ तलवार के ज़ोर पर आए थे तो आर्य भी आदिवासियों/मूलनिवासियों के संसाधनों पर कब्जा जमाने ही आए थे।

तिब्बत या नेपाल या मरीशस से आने वाले भी बेहतर ज़िंदगी की तलाश में यहाँ आते हैं तो बांग्लादेशी और पाकिस्तानी या अफगानी भी यहाँ बेहतर ज़िंदगी का सपना लेकर आते रहे हैं फिर क्योंकर इनके बीच ‘शरणार्थी’ और ‘घुसपैठिये’ जैसे शब्दों से विभेद किया जाता रहा?

बहरहाल भाषा केवल मजहबों के स्तर पर प्रभुत्व का पक्ष नहीं लेती बल्कि लैंगिक मामलों में तो इसने इतनी गहराई से काम किया है कि पति का यह पूछना कि ‘आज अख़बार नहीं आया क्या?’ पत्नी को यह समझ में आता है कि वो दौड़कर घर के बाहर से पति को अख़बार लाकर दे देती है। इसका अभिधा में जवाब हाँ या नहीं भी हो सकता है लेकिन प्राय: पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था में पत्नियां यह सोच भी नहीं पातीं। 

लड़कियां प्रेमियों के संग भाग जाया करती हैं इतना सामान्य वाक्य है कि इसमें हमें किसी तरह के वर्चस्व की ध्वनि ही नहीं सुनाई देती। हम नहीं सोचते कि प्रेमी जो एक पुरुष है वह भी तो भागा ही होगा या दोनों ही अपनी रजामंदी से साथ गए होंगे।  

यही हाल आरक्षण के मामले में वर्चस्ववादी हिन्दू समाज का रहा है। यह कई बार अभिधा में भी झलकता है लेकिन ध्वन्यता में इसकी तमाम अभिव्यक्तियाँ मिल जाएंगी। एक लतीफ़ा बहुत चलता है कि सभी देशों से अन्तरिक्ष में अपने छह एस्ट्रोनोड्स भेजने कहा गया। भारत ने जो लिस्ट बनाई उनमें एक एसटी, एक एससी, एक ओबीसी, एक अल्पसंख्यक, एक महिला। और इस प्रकार भारत से केवल एक ही एस्ट्रोनेड्स अन्तरिक्ष में जा सका। ध्यान से देखें तो यह लतीफ़ा नहीं है बल्कि जिस भाषा में यह रचा गया उसमें यह कहा जा रहा है कि एक एस्ट्रोनेड केवल और केवल सवर्ण हिन्दू पुरुष ही हो सकता है।

वर्चस्व की इस भाषा से हम केवल एक संकीर्ण, विषमतापूर्ण और अन्यायपूर्ण समाज ही निर्मित कर सकते हैं। इससे ही इस बनते हुए हिन्दू राष्ट्र की परिणति होना है। सवाल भाषा पर कम उसे गढ़ने वालों पर होगा और यह कौन गढ़ रहा है हमें समझते रहना होगा।  

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Tablighi Jamaat
Nizamuddin
Coronavirus
COVID 19
covid lockdown

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के घटते मामलों के बीच बढ़ रहा ओमिक्रॉन के सब स्ट्रेन BA.4, BA.5 का ख़तरा 

कोरोना अपडेट: देश में ओमिक्रॉन वैरिएंट के सब स्ट्रेन BA.4 और BA.5 का एक-एक मामला सामने आया

कोरोना अपडेट: देश में फिर से हो रही कोरोना के मामले बढ़ोतरी 

कोविड-19 महामारी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में दुनिया का नज़रिया नहीं बदल पाई

कोरोना अपडेट: अभी नहीं चौथी लहर की संभावना, फिर भी सावधानी बरतने की ज़रूरत

कोरोना अपडेट: दुनियाभर के कई देशों में अब भी क़हर बरपा रहा कोरोना 

कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब पहुंची 

देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, PM मोदी आज मुख्यमंत्रियों संग लेंगे बैठक


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License