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भारत
राजनीति
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणाम क्या सबक दे रहे हैं?
बीजेपी को इन दोनों ही राज्यों में वैसी जीत नहीं मिली जिसकी उसने उम्मीद लगाई थी। ये नतीजे कांग्रेस के लिए भी कोई ठोस संकेत नहीं दे रहे हैं। हरियाणा में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद महाराष्ट्र में पार्टी की हालत ख़राब है। दूसरे शब्दों कहा जाय तो यह जनादेश सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को आईना दिखा रहा है।
अमित सिंह
25 Oct 2019
elections
Image courtesy: Firstnaukri

महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की नैया पार लग गई है। राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना गठबंधन विधानसभा चुनाव में बृहस्पतिवार को घोषित परिणाामों के बाद अपनी सत्ता बरकरार रखने में कामयाब हो गया हालांकि उसके बहुमत में कमी आयी है।

उधर, हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा को सबसे बड़ा दल बनाने के बावजूद त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश दिया। हरियाणा में अब सरकार बनाने की कुंजी दुष्यंत चौटाला की अगुआई वाले जेजेपी और निर्दलीयों के हाथों में आ गयी है। हालांकि निर्दलीयों के समर्थन से बीजेपी की सरकार बनने की खबर भी मीडिया में छाई हुई हैं।

भाजपा ने महाराष्ट्र एवं हरियाणा के जनादेश को ‘विकास एजेंडे की जीत’ बताकर इसकी सराहना की जबकि विपक्षी दलों ने इसे भगवा दल की ‘नैतिक हार’ करार दिया है। विपक्षी दलों ने दावा किया कि ‘जब लोग भूख से मर रहे हो तो अति राष्ट्रवाद नहीं चल सकता।’

गुरुवार रात को नई दिल्ली में स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि महाराष्ट्र एवं हरियाणा के लोगों ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस और मनोहरलाल खट्टर पर भरोसा जताया है। उन्होंने दावा किया कि दोनों नेता जनता की सेवा करने के लिए और परिश्रम करेंगे।

भाजपा सूत्रों ने कहा कि पार्टी के संसदीय बोर्ड ने महाराष्ट्र एवं हरियाणा में सरकार गठन के बारे में निर्णय लेने के लिए पार्टी अध्यक्ष शाह को अधिकृत किया है तथा दोनों मुख्यमंत्रियों को नहीं बदला जाएगा।

बीजेपी के लिए सबक

ये तो बात हो गई राजनीतिक दलों और अभी के हालात की, लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर भी ये चुनाव परिणाम कोई सबक दे रहे हैं। तो उसका जवाब है हां, खासकर भाजपा को।

दरअसल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम भाजपा को आईना दिखाने वाले हैं कि जिस रूप में राष्ट्रवाद, धारा 370 और भावनात्मक मुद्दों सहित झूठ और भ्रम की जो राजनीति की जा रही है, जिस तरह से डर, हिंसा और अविश्वास का माहौल देश में बनाया जा रहा है उसे जनता अब समझ रही है और मुद्दा विहीन राजनीति को देश की जनता ने नकारना शुरू कर दिया है।

साथ ही इस जनादेश ने इस धारणा को भी खारिज कर दिया है कि दल बदल करवाकर, विपक्षी दलों में सेंध लगाकर, मीडिया को खरीदकर, ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल करके बड़ी जीत हासिल की जा सकती है। साथ ही यह परिणाम बताते हैं कि विपक्ष को राजनीति में खत्म नहीं किया जा सकता है। उनकी अपनी जगह है।

बीजेपी के लिए एक सबक यह भी है कि सिर्फ उग्र राष्ट्रवाद की आग से ही चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं। जीएसटी और नोटबंदी ने छोटे और मझौले उद्यमियों, किसानों, मजदूरों और गरीब लोगों की कमर तोड़ दी है। बेरोजगारी की समस्या देश में लगातार बनी हुई है। लेकिन सरकार की इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर कोई गंभीरता नहीं है। उसे इन समस्याओं का सामना करना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, 'विधानसभा चुनाव आम तौर स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, लेकिन बीजेपी ने जानबूझकर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीयता, अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान को कड़ा जवाब देने जैसे तमाम मुद्दों का सहारा लिया। ये मुद्दे काम कर सकते थे लेकिन स्थानीय समस्याएं बड़ी बन गईं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विदर्भ (महाराष्ट्र) में किसानों की बदहाली, मानेसर (हरियाणा) में ऑटोमोबाइल सेक्टर की समस्याएं, रोजगार के घटते अवसर और दोनों राज्यों के प्रभुत्वशाली वर्गों यानी जाटों और मराठों की अनदेखी वास्तविक समस्याएं थीं। बीजेपी को अब यह देखना होगा कि इन समस्याओं का समाधान कैसे हो?'

कांग्रेस समेत विपक्ष के लिए सबक

राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव परिणाम कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के लिए भी कोई ठोस संकेत नहीं दे रहे हैं। हरियाणा में कांग्रेस का प्रदर्शन जहां बेहतर रहा है तो वहीं महाराष्ट्र में उसका प्रदर्शन निराशाजनक ही कहा जाएगा। चुनाव परिणाम से यह साफ जाहिर है कि महाराष्ट्र में शरद पवार और हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मेहनत के बावजूद विपक्ष जितना कमजोर और दिशाहीन है उतना इससे पहले कभी नहीं था। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात नहीं है।

उनके लिए सिर्फ इतनी खुशी की बात है कि विपक्ष के समाप्त हो जाने जैसी बात के बीच जब चुनाव परिणाम आए हैं वह उनमें आशा का संचार कर सकते हैं। लेकिन जैसे दोनों राज्यों में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस रही है तो उसके लिए जनता ने अलग संदेश दिया है।

इस चुनाव में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने चुनावों से पर्याप्त दूरी बना रखी थी। इसके बावजूद प्रदर्शन संतोषजनक रहा है। मतलब साफ है कि गांधी नेहरू परिवार ही सबकुछ नहीं है। पार्टी को क्षेत्रीय क्षत्रपों पर भरोसा करना होगा और उन्हें उभरने का मौका देना होगा।

साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी गांधी परिवार से अलग विकल्प पर विचार किया जा सकता है। इस परिणाम से साफ जाहिर है कि जनता एक मजबूत विपक्ष की तलाश कर रही है। अगर कांग्रेस के पास एक मजबूत नेतृत्व होता और वह जनता से जुड़े मुद्दे चुनकर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में उतरती तो परिणाम कुछ और होते। इन दोनों में राज्यों में यह माहौल नहीं बनता कि कांग्रेस कमजोर विकल्प है।

फिलहाल शुक्रवार को ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में पार्टी के विशेष समूह की बैठक हो रही है इसमें महाराष्ट्र एवं हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों सहित कई मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

आपको बता दें कि सोनिया गांधी ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और भविष्य की रणनीति पर पार्टी का रुख तय करने के मकसद से हाल ही में 17 सदस्यीय विशेष समूह का गठन किया है, जिसकी यह पहली बैठक है। शायद इस बैठक में कुछ सार्थक चर्चा की जाय।

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, 'चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए कई सबक दे रहे हैं। सबसे पहले कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस पर चिंतन-मनन कर सकता है कि उन्होंने हरियाणा में हुड्डा परिवार पर पहले भरोसा क्यों नहीं किया, जिन्होंने भाजपा की जीत का रास्ता रोक दिया। अब कांग्रेस को कैप्टन अमरिंदर सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे स्थानीय दिग्गजों को ज्यादा महत्व देना चाहिए।'

उन्होंने आगे कहा, 'निश्चित ही इस वक्त कांग्रेस को नए नेतृत्व की अत्यंत आवश्यकता है। इसके अलावा पार्टी में ऊपर से नीचे तक सांगठनिक पुनर्गठन और जिम्मेदारियां देने के साथ जवाबदेही तय करने की भी जरूरत है।'

जनता सर्वोपरि

इन चुनाव परिणामों से यह भी जाहिर है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे यह साफ-साफ कह रहे हैं कि मोदी सरकार के प्रति सकारात्मक रवैया रखने वाले मतदाता भी भाजपा की राज्य सरकारों के प्रति अपनी नाखुशी जाहिर करने में पीछे नहीं रहने वाले।

वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक कहते हैं, ‘दोनों प्रदेशों की जनता से एग्ज़िट पोल वालों ने जो उम्मीदें रखी थीं, वे बिल्कुल गलत साबित हुई हैं और यह बात भी गलत साबित हुई है कि हमारी जनता भाजपा को सिर पर बिठाने के लिए मजबूर है। दोनों प्रदेशों की जनता ने दिखा दिया है कि वह मजबूर नहीं है। उसने भाजपा के कान उमेठ दिए हैं। उस पर भाजपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का असर बिल्कुल भी नहीं दिखा। अगर वह दिखता तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता और दोनों प्रदेशों में भाजपा को अपूर्व बहुमत मिल जाता। मोदी ने चुनाव के एक दिन पहले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक (फर्जीकल) का दांव मारा लेकिन वह बेकार हो गया और राहुल गांधी का जो हाल पहले था, वह अब भी जारी रहा।’

और अंत में गोपाल कांडा

हरियाणा में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने के बाद जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं उसमें गोपाल कांडा का जिक्र किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती है। दरअसल हरियाणा लोकहित पार्टी के नेता गोपाल कांडा ने सिरसा विधानसभा सीट से महज़ 602 वोटों से जीत दर्ज की है। निर्दलीय विधायक गोपाल कांडा ने बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही है। मीडिया में दावा किया जा रहा है कि वह बीजेपी के संकटमोचक बने हुए हैं। साथ ही में गुरुवार शाम से ही सोशल मीडिया में ट्रेंड हो रहे हैं।

गोपाल कांडा इससे पहले 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत कर विधायक बने थे। उस समय उन्होंने कांग्रेस की हुड्डा सरकार को बनाने में बहुत मेहनत की थी। इनाम में उन्हें मंत्रीपद भी मिला था। हालांकि उनका नाम चर्चा में तब आया था जब 2012 में उनकी एयरलाइन कंपनी में काम करने वाली महिला कर्मचारी गीतिका शर्मा ने आत्महत्या कर ली थी।

गोपाल कांडा पर बलात्कार, आत्महत्या के लिए उकसाने, आपराधिक साजिश रचने जैसे तमाम आरोप लगे थे। उन्हें हुड्डा सरकार से इस्तीफा भी देना पड़ा था। गोपाल कांडा को लगभग 18 महीने जेल में रहना पड़ा था। बाद में मार्च 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन पर लगे रेप के आरोप हटा लिए थे और उन्हें जमानत दे दी थी।

हालांकि अभी गोपाल कांडा ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'मेरा परिवार आरएससएस से जुड़ा है। मेरे खिलाफ घोटाले की बातें गलत हैं। मेरी लाइफ में एक ही झूठा केस दर्ज हुआ। कांग्रेस सरकार ने 306 का केस किया था। बीजेपी को बिना शर्त समर्थन दे रहा हूं। मोदीजी के नेतृत्व में देश का विकास हो रहा है।'

आपको बता दें कि कांडा ने गुरुवार रात को ही बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की है। यहां यह याद रखने वाली बात है कि गीतिका आत्महत्या मामले में बीजेपी ने गोपाल कांडा को लेकर पूरे हरियाणा में प्रदर्शन किए थे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या गोपाल कांडा का समर्थन लेने वाली बीजेपी उनके ऊपर लगे सभी आरोपों को भूल जाएगी।

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