NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कहां खो गया ‘ग्रेट इंडियन मिडिल’ क्लास, कहां रह गया वर्ल्ड मार्केट बनने का सपना?
भारत अपनी मैन्यूफैक्चरिंग क्षमताओं को विकसित न कर पाने की वजह से चीन की तरह एक बड़ा और भारी खपत क्षमता वाले मजबूत मध्य वर्ग का निर्माण नहीं कर पाया।
दीपक के मंडल
03 Sep 2020
ग्रेट इंडियन मिडिल
फोटो साभार : ट्विटर

सितंबर 2019 में जब देश में कारों की बिक्री तेजी से घटने लगी थी, तो पत्रकारों के पूछने पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ अजीब तर्क दिया था। उन्होंने कहा था कि चूंकि मिलेनियल्स अब ओला-उबर जैसी टैक्सी एग्रीगेटर कंपनियों की सर्विस लेते हैं इसलिए कारों की बिक्री कम हो गई है। सीतारमण का यह जवाब भले ही अजीब हो लेकिन सच से दूर भी नहीं था। वित्र मंत्री के बयान में ‘The great Indian consumption story’ के खात्मे की मुनादी थी।

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही भारत को एक बहुत बड़े कंज्यूमर मार्केट के तौर पर देखा जाने लगा। इकोनोमिस्ट, फॉर्च्यून और टाइम जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं ने एक विशाल उभरते उपभोक्ता बाजार के तौर पर भारत पर स्टोरी की।

इंडियन कंज्यूमर मार्केट की सबसे आशावादी तस्वीर पेश की थी मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की मशहूर ‘Bird of gold’ की रिपोर्ट ने। 2007 में आई इस रिपोर्ट ने दुनिया भर के आर्थिक रणनीतिकारों का ध्यान खींचा था। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत 2025 तक दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट बन जाएगा।

यह अनुमान इस दम पर लगाया गया था कि भारत में बड़ी तेजी से एक ऐसा मिडिल क्लास उभरेगा, जो सिर्फ भोजन, कपड़ा और दोपहिया जैसी चीजों से आगे बढ़ कर ब्रांडेड कपड़ों, महंगी कारों, गैजेट्स और दूसरे लग्जरी गुड्स खरीदेगा। विमान यात्राएं करेगा और विदेश में छुट्टियां मनाएगा। उस वक्त भारत में मिडिल क्लास की साइज 5 करोड़ बताई गई थी और 2025 तक इसके बढ़ कर 58 करोड़ तक पहुंच जाने की उम्मीद लगाई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में बेहद अमीर लोगों की तादाद दो करोड़ 30 लाख यानी ऑस्ट्रेलिया की आबादी से भी ज्यादा होगी।

पिछले 12-13 वर्षों से लगातार इंडियन मिडिल क्लास और इसके उपभोग क्षमता की यह कहानी दोहराई जाती रही है लेकिन देश में न तो वह मिडिल क्लास उभरा और न ही भारतीय उपभोक्ताओं की वह ग्रेट स्टोरी सामने आई, जिसके दम पर दुनिया भर की कंपनियां अपनी तिजोरियां भरने की उम्मीद लगा रही थी।

चीन में सफलता का स्वाद पा चुकी ग्लोबल कंपनियों को उम्मीद थी कि अब सबसे बड़ा मिडिल क्लास भारत में उभरेगा। चीनी मध्य वर्ग की बदौलत पनपे कंज्यूमर मार्केट की सारी संभावनाओं के दोहन के बाद उनकी उम्मीदों का सबसे बड़ा बाजार भारत को ही होना था। एक अरब तीस करोड़ की आबादी वाले देश का मिडिल क्लास इतना बड़ा बाजार मुहैया करा देता, जिसका कोई जोड़ दुनिया में नहीं मिल सकता था।

लिहाजा चीन में भारी मुनाफा कमा चुकी एप्पल, अलीबाबा और चीन में घुसने से रोक दी गई अमेजन और फेसबुक जैसी कंपनियों के भारत के बारे में बड़े सपने थे। लेकिन अब ये सपने पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। भले ही भारत में दोनों का दायरा बढ़ रहा हो लेकिन जिस भारी कमाई की वो उम्मीद लगाए बैठी थीं वो पूरी होती नहीं दिख रही है।

भारतीय ग्राहकों में खर्च करने की ताकत क्यों नहीं?

यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से 2016 के बीच भारत ने 27 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। लेकिन मैकिंजी ने जिस बड़े मिडिल क्लास के उभरने का अनुमान लगाया था वह कहीं से भी बनता नहीं दिखा।

नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने साल में ढाई लाख रुपये या हर दिन 10 डॉलर कमाने वालों को मिडिल क्लास में रखा था। लेकिन 2014 में पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के थॉमस पिकेटी और लुकास चांसल ने पाया कि हर दस भारतीयों में से सिर्फ एक की कमाई ही 3,150 डॉलर (सालाना) से ऊपर थी।

इस हिसाब से सिर्फ 7 करोड़ 80 लाख ही कमाई के हिसाब से मिडिल क्लास में आ रहे थे। भारत में तेजी से बनते मिडिल क्लास के इस मिथक के टूटने का असर अब यहां उतरी कंपनियों के कारोबार पर साफ दिख रहा है।

देश में मिडिल क्लास कंज्यूमर्स के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई ऑनलाइन शॉपिंग के बावजूद दो बड़ी कंपनियां अमेजन और फिल्पकार्ट भारी घाटे में हैं। भारतीय उपभोक्ताओं के बीच वे सस्ते सामान ही बेच पा रही हैं। 2017 में एपल ने पूरी दुनिया में अपनी कमाई का यहां से सिर्फ 0.7 फीसदी ही हासिल किया था।

भारतीय उपभोक्ताओं की कमजोर ताकत का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि मध्य वर्ग के किसी खरीदार को लेटेस्ट आईफोन खरीदने में अपने पांच महीने की कमाई खर्च करनी पड़ सकती है। ऐसे लोग भी देश में सिर्फ दस फीसदी हैं।

तेजी से बढ़ते फूड मार्केट के बावजूद पिछले दो दशक से यहां मौजूद मैक डोनाल्ड ने पोलैंड और ताइवान जैसे छोटे देशों की तुलना में यहां कम आउटलेट खोले हैं। डोमिनो पिज्जा और केएफसी जिस उम्मीद के साथ बाजार में उतरे थे उसे पूरा करने के लिए उन्हें जमीन-आसमान एक करना पड़ रहा है।

स्टारबक्स की भारत की प्लानिंग बहुत बड़ी थी लेकिन अब तक इसके सिर्फ चंद कॉफी शॉप ही खुल पाए हैं। जबकि चीन में हर 15 घंटे में एक स्टारबक्स आउटलेट खुल रहा है। भारत में हर 45 लोगों पर एक कार या लॉरी है। जबकि चीन में इसके पांच गुना लोगों के पास कार या लॉरी है। स्पाइसजेट के मुताबिक देश के 3 फीसदी लोगों ने ही विमान यात्रा की है। 2015 तक सिर्फ दो करोड़ लोगों ने विदेश यात्रा की थी।

जिस बाजार की ताकत पर नाज था वो कहां है?

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में मिडिल क्लास घरेलू गरीबी रेखा से बस थोड़ा ही ऊपर है। लेकिन इसकी हैसियत अंतरराष्ट्रीय स्तर की गरीबी रेखा से नीचे की है, खास कर ग्रामीण आबादी की। यानी भारत में जो मिडिल क्लास के दायरे में है वह अंतरराष्ट्रीय पैमाने के हिसाब से गरीबी में जी रहा है। जिन कंपनियों ने भारत के मिडिल क्लास की संभावनाओं को लेकर यहां निवेश किया था, वे अब निराश हैं। सिर्फ प्रीमियम या महंगा सामान बेचने वाली ही नहीं थोड़ा सा भी अपमार्केट सामान बेचने वाली कंपनियां अब यहां निवेश करने से हिचक रही हैं।

थॉमस पिकेटी के मुताबिक अस्सी के दशक में भारत की एक फीसदी आबादी के हिस्से में देश की 22 फीसदी कमाई थी, जबकि चीन में शीर्ष एक फीसदी अमीरों के हिस्से में देश की कमाई का 14 फीसदी था। इस सदी की शुरुआत में भारत के सबसे अमीर दस फीसदी लोगों की देश की कमाई में 40 फीसदी हिस्सेदारी थी।

भारत अपनी मैन्यूफैक्चरिंग क्षमताओं को विकसित न कर पाने की वजह से चीन की तरह एक बड़ा और भारी खपत क्षमता वाले मजबूत मध्य वर्ग का निर्माण नहीं कर पाया। दुनिया की वर्कशॉप बने बगैर भारत में एक बड़ा और मजबूत मांग वाला मिडिल क्लास बनाना असंभव है।

2016 में नोटबंदी और फिर 2017 में अस्त-व्यस्त ढंग से जीएसटी लागू करने की मौजूदा सरकार की जिद ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह झकझोर दिया। इसने निवेश और मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करने की रही-सही संभावना भी भारत से छीन ली।

और अब कोरोनावारयरस संक्रमण की वजह से लगे जबरदस्त आर्थिक झटके ने भारत को एक मजबूत उपभोक्ता बाजार बनाने का लक्ष्य और दूर कर दिया है। मिडिल क्लास के दम पर भारत को दुनिया का बाजार बनाने का सपना अब टूट चुका है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आर्थिक मुद्दों पर लिखते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

Great Indian Middle class
Middle class
India and world market
World Market
The great Indian consumption story
Nirmala Sitharaman
Narendra modi
Economic Recession

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • medical camp
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: सोनभद्र के सिंदूर मकरा में क़हर ढा रहा बुखार, मलेरिया से अब तक 40 आदिवासियों की मौत
    30 Nov 2021
    प्रशासन सिर्फ़ 20 मौतों की पुष्टि कर रहा है। सरकारी दावों के उलट रिहंद जलाशय की तलहटी में बसे सिंदूर मकरा गांव में उदासी और सन्नाटा है। बीमारी और मौत से आदिवासी ख़ासे भयभीत हैं। आदिवासियों की लगातार…
  • Honduras President
    उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: मध्य अमेरिका में एक और कास्त्रो का उदय
    30 Nov 2021
    वामपंथी पार्टी की शियोमारा कास्त्रो बनेंगी होंदुरास की पहली महिला राष्ट्रपति। रविवार को हुए राष्ट्रपति पद के चुनावों में कास्त्रो ने सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी नासरी असफुरा को पीछे छोड़ दिया है।
  •  Mid Day Meal Workers
    सरोजिनी बिष्ट
    बंधुआ हालत में मिड डे मील योजना में कार्य करने वाली महिलाएं, अपनी मांगों को लेकर लखनऊ में भरी हुंकार
    30 Nov 2021
    मिड डे मील योजना में काम करने वाली रसोइयों का आक्रोश उस समय सामने आया जब वे अपनी मांगों के साथ 29 नवम्बर को लखनऊ के इको गार्डेन में "उत्तर प्रदेश मिड डे मील वर्कर्स यूनियन" के बैनर तले एक दिवसीय धरने…
  • workers
    मुकुंद झा
    निर्माण मज़दूरों की 2 -3 दिसम्बर को देशव्यापी हड़ताल,यूनियन ने कहा- करोड़ों मज़दूर होंगे शामिल
    30 Nov 2021
    भारत की निर्माण मज़दूर फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखबीर ने कहा कि इस हड़ताल में केंद्रीय मुद्दों के साथ साथ राज्य के अपने मुद्दे भी शामिल होंगे। इस हड़ताल में हरियाणा और राजस्थान के कई जिलों में…
  • UP farmers
    प्रज्ञा सिंह
    पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान बनाम हिंदू पहचान बन सकती है चुनावी मुद्दा
    30 Nov 2021
    किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सामाजिक पहचान बदल दी है, उत्तरप्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में यहां से 122 सीटें हैं और अगले साल की शुरुआत में यहां चुनाव होने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License