NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
हम भारत के लोग
भारत
राजनीति
किधर जाएगा भारत— फ़ासीवाद या लोकतंत्र : रोज़गार-संकट से जूझते युवाओं की भूमिका अहम
गहराता रोज़गार संकट और कठिन होती जीवन-स्थितियां भारत में फ़ासीवाद के राज्यारोहण का सबसे पक्का नुस्खा है। लेकिन तमाम फ़ासीवाद-विरोधी ताकतें एकताबद्ध प्रतिरोध में उतर पड़ें तो यही संकट समाज को रैडिकल लोकतांत्रिक बदलाव की ओर भी ले जा सकता है और रोजगार-संकट से जूझते युवा इस लड़ाई के हिरावल ( vanguard ) बन सकते हैं।
लाल बहादुर सिंह
29 Apr 2022
hum bharat ke log

विस्फोटक आयाम ग्रहण कर चुकी बेरोजगारी ने युवा भारत के बहुचर्चित डेमोग्राफिक डिविडेंड को कैसे डेमोग्राफिक डिजास्टर में तब्दील कर दिया है, इसकी एक झलक पूरे देश-दुनिया ने हाल ही में देखी। रामनवमी और हनुमान जयंती के जुलूसों में देश के कई राज्यों में 18-20 साल से लेकर 30-35 साल के उन्मादी युवाओं को हथियार लहराते देखकर पूरा देश सकते में आ गया।

अब CMIE के ताजा आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि युवाओं के इस खौफनाक अवतार की जड़ें कैसे हमारी मौजूदा राजनीतिक अर्थव्यवस्था ( Political Economy ) में मौजूद हैं।

CMIE के अनुसार पहले से जो लोग रोजगार-बाजार से बाहर थे उनमें पिछले 5 साल में 6 करोड़ निराश बेरोजगार और जुड़ गए जिन्होंने रोजगार की तलाश भी अब बंद कर दी है क्योंकि रोजगार की उनकी उम्मीद खत्म हो गयी है। उधर 4 करोड़ के आसपास वे बेरोजगार हैं जो रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। अर्थात कम से कम 10 करोड़ लोग, जिनमें से अधिकांश युवा हैं, सड़क पर हैं, जिन्हें कहीं से भी आजीविका की दरकार है। यही वह vulnerable तबका है जिसे सांप्रदायिकता और कट्टरता की घुट्टी देकर और खिला-पिलाकर उन्मादी हिंसक अभियानों के लिए hire किया जा रहा है।

इन युवाओं की विराट आबादी शहरों और कस्बों के उन परिवारों से आती है जो अच्छी आय वाले संगठित या salaried class से बहिष्कृत हैं और असंगठित क्षेत्र/ स्वरोजगार पर आजीविका के लिए निर्भर हैं।

कहना न होगा रोजगार का सर्वाधिक घनघोर संकट नोटबन्दी-दोषपूर्ण GST और लॉक-डाउन के फलस्वरूप बर्बाद हुए असंगठित व स्व-रोजगार के क्षेत्र में है। यही वह एकमात्र सेक्टर है जहाँ मुसलमानों की उल्लेखनीय उपस्थिति है ( क्योंकि और जगहों से वे आम तौर पर बहिष्कृत हैं ), जाहिर है यहां कारोबार और रोजगार के लिए मौजूद तीखी प्रतिस्पर्धा सांप्रदायिकता का जहर बोने वाले गिरोहों के लिए सबसे उर्वर (conducive ) जमीन मुहैया कराती है।

देश के बड़े कारपोरेट घरानों और चहेते पूंजीपतियों के लिए बेरोजगारी और सांप्रदायिकता दुहरे फायदे का सबब है। बेरोजगारों की विराट reserve army की उपस्थिति के कारण मजदूरी की दरों को कम ( suppressed ) रखने में वे सफल होते हैं, जो उनके अकूत मुनाफ़े का मूल स्रोत है। सांप्रदायिकता की निरंतर सुलगती आग मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए एकजुट नहीं होने देती, फलस्वरूप पूंजीपति मजदूर-आंदोलनों से पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं।

यह अनायास नहीं है कि जिस कोरोना काल में 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे खिसक गए, उसी दौर में मोदी जी के चहेते अडानी दुनिया के 5 सबसे धनी लोगों में शामिल हो गए और भारत दुनिया में आय की सर्वाधिक असमानता वाला देश बन गया है।

सरकार CMIE के नए आंकड़ों के वायरल होने और उन पर छिड़ी चर्चा से घबराई है। वैसे तो अपने राज में बेरोजगारी की भयावहता को छिपाने के लिए मोदी राज में आंकड़े ही नहीं प्रकाशित किये जा रहे थे, लेकिन अब वह तमाम सरकारी आंकड़ों के माध्यम से CMIE के निष्कर्षों को झुठलाने में लगी है, जाहिर है उसकी लीपापोती और सफाई की अब कोई विश्वसनीयता नहीं बची है और वे शायद ही किसी को रोजगार के मौजूदा हालात के बारे में आश्वस्त कर सकें।

दरअसल, अप्रैल के पहले सप्ताह में अखबारों में headline छप रही थी कि बेरोजगारी दर पहले से घट रही है। रोजगार में सुधार हो रहा है। लेकिन CMIE के जो ताजा आंकड़े आये, उनसे पूरा मामला ही बिल्कुल उलट गया।

अब यह बात सामने आई है कि बड़ी आबादी तो निराश होकर लेबर मार्केट से ही बाहर निकलती जा रही है। अब उसने नाउम्मीद होकर रोजगार की तलाश ही छोड़ दी है।

LFPR ( Labour Force Participation Rate ) अर्थात श्रमशक्ति का वह हिस्सा जो रोजगार में है अथवा उसकी तलाश में है, वह 5 साल पहले के 46% से भी गिरकर 40% ही रह गया है। यह वैश्विक स्तर पर 60% के आसपास है।

भारत में 2016 में 95.9 करोड़ की working age population में 41.2 करोड़ लोग रोजगार में थे, जबकि दिसम्बर, 2021 में हमारे देश की कुल 107.9 करोड़ के कार्यबल में 40.4 करोड़ लोग ही रोजगार में रह गए। मोदी राज के 2016 से 21 के बीच के 5 वर्ष में काम करने वाली उम्र की आबादी 12 करोड़ बढ़ गयी लेकिन रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या पहले से भी 80 लाख घट गई ! ( Udit Mishra, The Indian Express )

एक ओर 25 लाख के आसपास पद केंद्र व राज्यों में सरकारी नौकरियों में खाली पड़े हैं, दूसरी ओर केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव स्तर तक के IAS सेवा के उच्च पद बिना किसी परीक्षा के निजी क्षेत्र से भरे जा रहे हैं।

दरअसल,आंकड़ों के मकड़जाल से रोजगार संकट की जो छवि बनती है , असलियत उससे बहुत अधिक भयावह है। जहाँ वैश्विक स्तर पर 20-25% काम करने में सक्षम आबादी दूसरों पर निर्भर है, वहीं हमारे देश में यह परमुखापेक्षी आबादी उसकी दोगुनी अर्थात 40-45% है !

प्रो. प्रभात पटनायक के शब्दों में, " मौजूदा नवउदारवादी नीतिगत आर्थिक ढांचे में बेरोजगारी का संकट और गहराना अपरिहार्य है।"

जाहिर है इस असह्य बेरोजगारी के न सिर्फ उन रोजगारविहीन लोगों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए गहरे निहितार्थ ( implications ) हैं। "अन्य पूँजीवादी देशों के मुकाबले भी उत्पादक उम्र की आबादी के लगभग 20% अधिक व्यक्तियों को भारत में परनिर्भर या तलछट ( लम्पट, अपराधी, भिखारी ) की श्रेणी में रहने को मजबूर कर दिया गया है। समाज की स्वाभिमान के साथ जीने और सामाजिक विकास में भागेदारी करने में सक्षम आबादी में से आधे से अधिक की यह विवशता समाज में मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व नैतिक अधःपतन का मूल कारण है। " ( एम असीम, यथार्थ )

समाज के तलछट में तब्दील हो चुके dehumanised युवा बेहद आसानी से फासीवादी वाहिनी का हिस्सा बनाये जा सकते हैं और किसी भी मानवताविरोधी अभियान की ओर मोड़े जा सकते हैं। बेरोजगारी युवाओं को आत्मघात या सामाजिक विध्वंस के रास्ते पर धकेल रही है। इलाहाबाद जैसे प्रतियोगी छात्रों के बड़े केंद्रों से लगातार ख़ुदकुशी की रिपोर्ट आना जारी है।

इन युवाओं का दो में से एक ही भविष्य है, या तो ये रोजगार और बेहतर जिंदगी के लिए लड़ेंगे या फ़ासिस्ट गिरोह के तोप का चारा ( cannon fodder ) बनेंगे। अपार untapped ऊर्जा से भरे ये नौजवान या तो सृजन करेंगे या विध्वंस। सवाल यही है कि बेरोजगारी से पैदा उनके संकट को कौन सी वैचारिक दिशा मिलती है।

जरूरत इस बात की है कि सारे छात्र-युवा-मेहनतकश संगठन और लोकतान्त्रिक ताकतें एक मंच पर आएं और रोजगार के सवाल को बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बनाने तथा संविधान के मौलिक अधिकार का दर्जा दिलाने और बेरोजगारों के लिए जीवन-निर्वाह भत्ते के वैधानिक प्रावधान के लिये आंदोलन में उतरें।

फासीवादी ताकतों की कोशिश है कि इसके पहले कि बेरोजगारी या महंगाई जैसे जीवन से जुड़े प्रश्न आंदोलन और राजनीतिक विमर्श में हावी हों, समाज में पूरा माहौल हिन्दू-मुस्लिम मय बना दिया जाय जहाँ और सारे सवाल अर्थहीन हो जाएं।

यह एक लड़ाई है समाज के दिल-दिमाग और imagination को कैप्चर करने और अपने एजेंडा को देश में स्थापित करने की।

रोजगार के अधिकार के लिए एक सशक्त लोकतान्त्रिक आंदोलन ही बेरोजगार युवाओं को फासीवादी वाहिनी का foot-soldier बनने से बचा सकता है और भारत के आसन्न फासीवादी राज्यारोहण को रोक सकता है।

इसलिए, इसके पहले कि पूरे देश का विमर्श irreversibly बदल जाए और साम्प्रदायिक उन्माद की आंधी में डूब जाय, सभी लोकतान्त्रिक ताकतों व भाजपा विरोधी राजनीतिक शक्तियों को युवाओं के रोजगार के अधिकार का समर्थन करना चाहिये और सड़क पर उतर कर इसे एक बड़ा सवाल बना देना चाहिए।

भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है।

गहराता रोजगार संकट और कठिन होती जीवन-स्थितियां भारत में फासीवाद के full-fledged राज्यारोहण का सबसे पक्का नुस्खा (surest recipe ) है। लेकिन तमाम फासीवाद-विरोधी ताकतें एकताबद्ध प्रतिरोध में उतर पड़ें तो यही संकट समाज को रैडिकल लोकतांत्रिक बदलाव की ओर भी ले जा सकता है और रोजगार-संकट से जूझते युवा इस लड़ाई के हिरावल ( vanguard ) बन सकते हैं।

लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

Hum Bharat Ke Log
democracy
Fascism
unemployment
Indian Youth
Increasing Unemployment
Modi government
BJP
CMIE
Political Economy
economic crisis
Economic Recession

Related Stories

शाहीन बाग़ ग्राउंड रिपोर्ट : जनता के पुरज़ोर विरोध के आगे झुकी एमसीडी, नहीं कर पाई 'बुलडोज़र हमला'

सद्भाव बनाम ध्रुवीकरण : नेहरू और मोदी के चुनाव अभियान का फ़र्क़

एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

हम भारत के लोग : इंडिया@75 और देश का बदलता माहौल

हम भारत के लोग : हम कहां-से-कहां पहुंच गये हैं

संविधान पर संकट: भारतीयकरण या ब्राह्मणीकरण

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!


बाकी खबरें

  • varvara rao
    भाषा
    अदालत ने वरवर राव की स्थायी जमानत दिए जाने संबंधी याचिका ख़ारिज की
    13 Apr 2022
    बंबई उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में कवि-कार्यकर्ता वरवर राव की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने चिकित्सा आधार पर स्थायी जमानत दिए जाने का अनुरोध किया था।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,088 नए मामले, 26 मरीज़ों की मौत
    13 Apr 2022
    देश में अब तक कोरोना से पीड़ित 5 लाख 21 हज़ार 736 लोग अपनी जान गँवा चुके है।
  • CITU
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: बर्ख़ास्त किए गए आंगनवाड़ी कर्मियों की बहाली के लिए सीटू की यूनियन ने किया प्रदर्शन
    13 Apr 2022
    ये सभी पिछले माह 39 दिन लंबे चली हड़ताल के दौरान की गई कार्रवाई और बड़ी संख्या आंगनवाड़ी कर्मियों को बर्खास्त किए जाने से नाराज़ थे। इसी के खिलाफ WCD के हेडक्वार्टस आई.एस.बी.टी कश्मीरी गेट पर प्रदर्शन…
  • jallianwala bagh
    अनिल सिन्हा
    जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान
    13 Apr 2022
    जलियांवाला बाग के नवीकरण के आलोचकों ने सबसे महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज कर दिया है कि नरसंहार की कहानी को संघ परिवार ने किस सफाई से हिंदुत्व का जामा पहनाया है। साथ ही, उन्होंने संबंधित इतिहास को अपनी…
  • brooklyn
    एपी
    ब्रुकलिन में हुई गोलीबारी से जुड़ी वैन मिली : सूत्र
    13 Apr 2022
    गौरतलब है कि गैस मास्क पहने एक बंदूकधारी ने मंगलवार को ब्रुकलिन में एक सबवे ट्रेन में धुआं छोड़ने के बाद कम से कम 10 लोगों को गोली मार दी थी। पुलिस हमलावर और किराये की एक वैन की तलाश में शहर का चप्पा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License