NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
कला
भारत
पत्रकारिता में दोहरे मापदंड क्यों!
मीडिया लखीमपुर घटना पर आशीष की गिरफ़्तारी को लेकर इतना व्यग्र नहीं दिखा, जितना कि आर्यन की ज़मानत न होने देने के लिए।
शंभूनाथ शुक्ल
13 Oct 2021
पत्रकारिता में दोहरे मापदंड क्यों!

सारे के सारे टीवी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में भी पिछले एक पखवाड़े से एक ही खबर छायी है कि आर्यन ख़ान ड्रग केस में पकड़े गए। यह दो अक्तूबर की घटना है, जब आर्यन को मुंबई के समीप एनसीबी ने एक क्रूज़ से गिरफ़्तार किया। आरोप है कि ड्रग मामले से उनका संबंध है। इसके अगले ही रोज़ लखीमपुर खीरी में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्र ‘मोनू’ पर आरोप लगा कि उन्होंने कृषि बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर अपनी थार जीप चढ़ा दी। इससे चार किसान और एक पत्रकार की मौत हो गई। किसानों ने भी उग्र होकर जीप को आग लगा दी और तीन लोग मारे गए। इस घटना के बाद आशीष मिश्रा भाग निकला। लेकिन मीडिया लखीमपुर घटना पर आशीष की गिरफ़्तारी को लेकर इतना व्यग्र नहीं दिखा, जितना कि आर्यन की ज़मानत न होने देने के लिए।

ऐसा लगता है कि देश की जनता बस यही जानने को आतुर है कि आर्यन ख़ान को सजा हुई या नहीं। आर्यन ख़ान का नाम इसलिए लिया गया क्योंकि वे सुप्रसिद्ध फ़िल्म स्टार शाहरुख़ ख़ान के बेटे हैं। उनकी माँ का नाम गौरी ख़ान है, जो कि विवाह के पूर्व गौरी छिब्बर थीं। छिब्बर मोहियाल ब्राह्मणों का एक सरनेम है। कुछ को इस बात की खुन्दक है कि गौरी ने शाहरुख़ से शादी क्यों की? इसके अलावा शाहरुख़ ख़ान मुसलमान हैं, हालाँकि वे बड़बोले नहीं हैं लेकिन वे दबैल भी नहीं हैं और अक्सर विश्व में मुसलमानों की स्थिति पर टिप्पणी भी करते हैं। उन्होंने मोदी सरकार के विरुद्ध कभी कोई टिप्पणी नहीं की तो तमाम अन्य चाटुकारों की तरह दण्डवत भी नहीं हुए।

यही कारण है कि आज के ज़माने में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों सवालों से घिरे हुए हैं। कोई भी व्यक्ति पत्रकारिता पर उंगली खड़ी कर देता है, और उससे पूरी पत्रकारीय ज़मात ही संदेह के घेरे में आ जाती है। सवाल यह उठता है कि क्यों पत्रकारिता के व्यवसाय में ऐसे तमाम भेद देखने को मिलते हैं। इसका एक जवाब तो यह है कि पत्रकारों के लिए भी वकीलों या डाक्टरों की तरह बीसीआई, एमसीआई जैसी कोई नियामक तथा सर्व शक्तिसंपन्न संस्था बनाई जाए। हालाँकि पीसीआई (प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इंडिया) है जरूर, लेकिन वह नख-दंत विहीन है। उसे किसी पत्रकार को लिखने-पढ़ने से रोकने का कोई अधिकार नहीं है। जबकि वकीलों और डाक्टरों की नियामक संस्था ‘बार काउन्सिल’ तथा ‘मेडिकल काउन्सिल’ को क्रमशः वकीलों एवं डाक्टरों का लाइसेंस रद्द करने का पूरा अधिकार है। पत्रकारिता अगर व्यवसाय है तो किसी न किसी नियामक और दंडात्मक संस्था का होना आवश्यक है, तब ही पत्रकारिता को अराजक होने से रोका जा सकता है।

लेकिन पत्रकारों को अपने तईं भी अपने लिए पैमाने तय करने होंगे। क्योंकि यह पूरी तरह सच है कि पत्रकारों के लिए अभी तक कोई नियम-क़ानून नहीं है। न तो उन्हें प्रोफेशनल समझा जाता है न ठीक से नौकरी-पेशा। इस वज़ह से उनके लिए सब कुछ अस्त-व्यस्त है। जबकि पत्रकारों के लिए अब प्रशिक्षण या उसके अनुकूल कोर्स निश्चित कर दिया गया है। लगभग हर विश्वविद्यालय पत्रकारों के लिए कोई न कोई कोर्स चलाता है, तब उसके लिए कोई नियामक संस्था क्यों नहीं, यह प्रश्न उठना लाजिमी है। दरअसल अगर नियामक संस्था बनती है तो डग्गामार अख़बारों से मुक्ति मिलेगी। ऐसे अख़बार, जो पीत पत्रकारिता करते हैं अथवा मौसम-मिजाज़ देख कर निकाले जाते हैं। उनके लिए पत्रकारिता ब्लैकमेलिंग का एक जरिया है। वे हर तरह ऐसी किसी भी कोशिश का विरोध करने लगते हैं। मज़े की बात ऐसे ही अखबार के लोग उन सरकारी विभागों में नामजद हैं, जहाँ से पत्रकारों को मान्यता दी जाती है। तब भला कैसे अंकुश लगाया जाए। एक बात और भी है कि मुख्यधारा के अख़बार ऐसी बातों से अपने को अलग कर लेते हैं। वे अपने संस्थान को तो पाक-साफ़ रखना चाहते हैं, लेकिन पत्रकारिता के नियमतीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं लेते।

पिछले दिनों मुझे एक मज़ेदार अनुभव हुआ। गाजियाबाद स्थित एक पत्रकारिता संस्थान के मास कम्युनिकेशन विभाग ने ‘संचार माध्यमों में वैचारिक लेखन’ विषय पर बोलने के लिए मुझे बुलाया। विभागाध्यक्ष महोदय, जो कि स्वयं भी एक सक्रिय पत्रकार हैं और देश के विभिन्न अख़बारों में वरिष्ठ संपादकीय जिम्मेदारियों को निभा चुके हैं, ने यह भी कहा कि आप छात्रों को पत्रकारिता की व्यावहारिक दिक्कतों के बारे में भी बताइएगा। हमारे समाज में पत्रकार को एक खबरदाता से अधिक नहीं समझा जाता अथवा अपने हाव-भाव से आकर्षित करने वाला एक टीवी एंकर। इसके अतिरिक्त पत्रकार के बारे में और कोई छाप हमारे अंदर नहीं होती। लेकिन एक पत्रकार का क्या बस इतना ही दायित्त्व है? क्या सूचना देने के अतिरिक्त उस खबर का विश्लेषण करना उसकी जिम्मेदारी नहीं? हर विषय और हर मुद्दों पर आखिर उसकी भी एक समझ होती है और चूँकि वह निरंतर ख़बरों से जुड़ा है इसलिए उसकी समझ ज्यादा व्यापक और ज्यादा सटीक होती है। लेकिन उसे व्यक्त करने में पत्रकार मात खा जाता है। क्योंकि इसके लिए जिस तरह के कम्युनिकेशन स्किल की जरूरत होती है वह उसके अंदर विकसित नहीं हो पाती। पत्रकारिता की नौकरी में जो त्वरा (हड़बड़ी) है उसके चलते उसे थोडा रुक कर चीजों के विश्लेषण का समय नहीं मिलता या कहना चाहिए कि उसके अंदर हड़बड़ी की वज़ह से उस तरह की दूरदृष्टि विकसित नहीं हो पाती जिससे वह उस चीज के दूरगामी नतीजे सोच ले।

इसके लिए एक पत्रकार को अपने अंदर ऐसा कम्युनिकेशन स्किल डेवलप करना चाहिए जिसके चलते उसका लेखन वैसा ही हो जैसा कि वह बोलता है। साहित्यकारों की तरह उसे भाषा को जलेबी की तरह घुमाना नहीं चाहिए। और जटिल विषय को सहज बनाकर पेश करना चाहिए। बहुत से साहित्यिक लोग अक्सर एक सहज विषय को जटिल बनाकर पेश करते हैं ताकि उन्हें बौद्धिक समझा सके। मगर एक पत्रकार को चाहिए कि वह उस जलेबी को सीधा कर दे। अपने लेखन से भी और विजुअल मीडिया में बोलते समय भी। दूसरा अहम विषय है कि वह निंदक भले न हो पर उसे क्रिटिकल जरूर होना चाहिए। जब वह क्रिटिकल बनेगा तब ही वह एक अच्छा विश्लेषक बन सकेगा। तीसरा वह चीजों के संभावित नतीजों का पूर्वानुमान कर ले। इसके बाद ही वह सही में एक अच्छा और विचारवान पत्रकार बन सकेगा। अगर इन सबमें वह परफेक्ट है, तो कोई शक नहीं कि वह एक ऐसा पत्रकार बनेगा, जो समाज को तो संदेश देगा ही साथ में अपने व्यवसाय को प्रमाणिक भी बनाएगा।

मेरे द्वारा कुछ सवाल पूछे जाने पर क्लास में एक लड़की ने बहुत अच्छा जवाब दिया कि वह लिखकर पैसे कमाना चाहती है। लिखकर पैसा कमाना यानी अपनी मेहनत का सेवायोजक से पूरा पैसा लेना, सिर्फ तब ही कोई पत्रकार ईमानदारी से लिख सकेगा वर्ना वह राजनेताओं, अपराधियों और धनपतियों की दलाली करेगा। मेरे विचार से तो अच्छा पत्रकार वह है जो अपने सेवायोजक से जीवन निर्वाह के लिए उचित भुगतान मांगे। आजकल बहुत से मीडिया हाउस हैं जिनके ‘मालिक’ खुद भी दलाली करते हैं और अपने पत्रकारीय स्टाफ को भी कहते हैं-  कमाओ-खाओ! ऐसी पत्रकारिता से तो अच्छा है कि आदमी कुछ भी कर ले पर पत्रकारिता न करे। तब ही वह वैचारिक लेखन कर पायेगा और अपने पेशे के साथ एक प्रोफेशनल और ईमानदार रवैया रख पाएगा।

इसके साथ ही उसे सम-सामयिक विषयों पर तार्किक रूप से विश्लेषण करते रहना चाहिए। तर्क जब समक्ष होगा तब ही कोई पत्रकार चीजों को हवा में बह कर नहीं लिखे या पढ़ेगा वरन उस पर अपनी वैज्ञानिक समझ का परिचय देगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Aryan Khan
Ashish Mishra
Monu
Ajay Mishra
NCB
Mumbai
bollywood
Shahrukh Khan

Related Stories

लता मंगेशकर की उपलब्धियों का भला कभी कोई विदाई गीत बन सकता है?

जब सार्वजनिक हित के रास्ते में बाधा बनती आस्था!

चमन बहार रिव्यु: मर्दों के नज़रिये से बनी फ़िल्म में सेक्सिज़्म के अलावा कुछ नहीं है

हर आत्महत्या का मतलब है कि हम एक समाज के तौर पर फ़ेल हो गए हैं

ज़ायरा, क्रिकेट और इंडिया

"ये हिटलर के साथी...इनकी सूरत को पहचानों भाई"


बाकी खबरें

  • रवि शंकर दुबे
    ‘’मुसलमानों के लिए 1857 और 1947 से भी मुश्किल आज के हालात’’
    05 Apr 2022
    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव रहमानी ने आज के दौर को 1857 और 1947 के दौर से ज़्यादा घातक बताया है।
  • भाषा
    ईडी ने शिवसेना सांसद संजय राउत से संबंधित संपत्ति कुर्क की
    05 Apr 2022
    यह कुर्की मुंबई में एक 'चॉल' के पुनर्विकास से संबंधित 1,034 करोड़ रुपये के कथित भूमि घोटाले से जुड़े धन शोधन की जांच से संबंधित है। 
  • सोनया एंजेलिका डिएन
    क्या वैश्वीकरण अपने चरम को पार कर चुका है?
    05 Apr 2022
    पहले कोरोना वायरस ने एक-दूसरे पर हमारी आर्थिक निर्भरता में मौजूद खामियों को उधेड़कर सामने रखा। अब यूक्रेन में जारी युद्ध ने वस्तु बाज़ार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। यह भूमंडलीकरण/वैश्वीकरण के खात्मे…
  • भाषा
    श्रीलंका के नए वित्त मंत्री ने नियुक्ति के एक दिन बाद इस्तीफ़ा दिया
    05 Apr 2022
    श्रीलंका के नए वित्त मंत्री अली साबरी ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। एक दिन पहले राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने अपने भाई बेसिल राजपक्षे को बर्खास्त करने के बाद उन्हें नियुक्त किया था।
  • भाषा
    हरियाणा के मुख्यमंत्री ने चंडीगढ़ मामले पर विधानसभा में पेश किया प्रस्ताव
    05 Apr 2022
    हरियाणा विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान मनोहर लाल द्वारा पेश प्रस्ताव के अनुसार, ‘‘यह सदन पंजाब विधानसभा में एक अप्रैल 2022 को पारित प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त करता है, जिसमें सिफारिश की गई है कि…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License