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काकेशस में रूसी शांति व्यवस्था को फ़्रांस की चुनौती क्यों
पश्चिमी देशों को इस बात की उम्मीद थी कि रूस और तुर्की नागोर्नो-कारबाख को लेकर एक दूसरे से भिड़ जायेंगे, लेकिन जो कुछ हुआ,वह पश्चिम देशों की इस उम्मीद के ठीक उलट है।
एम. के. भद्रकुमार
23 Nov 2020
नागोर्नो-करबाख के बाहर
19 नवंबर, 2020 को नागोर्नो-करबाख के बाहर,आसकेरन चौकी पर गश्त लगाते हुए एक रूसी शांतिदूत । (एएफ़पी फ़ोटो)

नागोर्नो-कारबाख़ को लेकर आर्मेनिया, अज़रबैजान और रूस के बीच 10 नवंबर को हुए त्रिपक्षीय समझौते से काकेशस क्षेत्र में एक भू-राजनीतिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी है। बहुत दिनों से आर्मेनिया और अज़रबैजान घात लगाकर एक दूसरे से बुरी तरह बड़ी लड़ाई लड़ रहे थे।

लेकिन ज्योंही सात-सप्ताह पहले यह  संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष तक पहुंचा,यानी अज़ेरी सेना ने शुशा पर जैसे ही कब्ज़ा कर लिया और अर्मेनिया  के सामने भगदड़ की  स्थिति पैदा हो गयी,तो मॉस्को ने तत्काल एक युद्ध विराम की मध्यस्थता को लेकर अपने क़दम बढ़ा दिये।

जिस तेज़ी के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फ़ुर्ती दिखायी और रात भर चली वार्ता के ज़रिये अर्मेनियाई और अज़ेरी राष्ट्राध्यक्षों को एक साथ लाने में उनकी जो सक्रिय भूमिका दिखायी दी,वह हैरतअंगेज़ थी। पुतिन के इस क़दम ने इस क्षेत्र के लोगों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी हैरत में डाल दिया।

पुतिन की इस मध्यस्थता से अनिवार्य रूप से रूसी शांति स्थापना को बल मिला। दुनिया को 10 नवंबर की तड़के सुबह इस युद्ध विराम के बारे में जब पता चला, तब तक रूसी सैन्य टुकड़ियां पहले से ही नागोर्नो-करबाख़ के रास्ते में थी।  

इससे फ़्रांसीसी राष्ट्रपति, इमैनुएल मैक्रॉन के चेहरे की रंगत उड़ गयी है। सितंबर के आख़िर में उस संघर्ष के शुरू होने के बाद से उन्होंने काकेशस में ख़ुद को सारथी माना था। बेशक, फ़्रांस में अर्मेनियाई प्रवासी फ़्रांस की राजनीति में एक प्रभावशाली मतदाता वर्ग हैं।

7 नवंबर को मैक्रॉन ने पुतिन को फ़ोन किया था और नागोर्नो-काराबाख़ में "बड़े पैमाने पर चल रहे युद्ध" पर चर्चा की थी और बात “ओएससीई (OSCE: Organization for Security and Co-operation in Europe) मिन्स्क समूह के हिस्से के रूप में रूस और फ़्रांस की तरफ़ से निरंतर समन्वित मध्यस्थता प्रयासों को लेकर आपसी प्रतिबद्धता" तक पहुंच गयी थी।

इसके बाद जैसे ही उन्हें पता चला कि रूसी शांति सेना नागोर्नो-करबाख़ में उतर रही है,तब जाकर तीन दिन बाद एलिसी पैलेस (फ़्रांसीसी राष्ट्रपति का निवास स्थान) में वह नींद से जागे। मैक्रोन के चोटिल अहंकार पर नमक छिड़कते हुए छह दिनों बाद ही पुतिन ने मैक्रॉन को (16 नवंबर को) फ़ोन करके याद किया,जैसा कि क्रेमलिन के एक बयान में कहा गया कि ऐसा "यह देखते हुए किया गया कि रूस और फ़्रांस ओएससीई मिन्स्क समूह के सह-अध्यक्ष हैं।"

पुतिन ने मैक्रॉन को कई घटनाक्रमों की जानकारियां दीं और मैक्रॉन को सूचित किया कि "इस क्षेत्र की सामान्य स्थिति में स्थिरता आ गयी है।" जब पुतिन ने मौक्रॉन से कहा था कि युद्ध एक सप्ताह पहले ख़त्म हो गया है और अब बिना देरी किये हुए “अपने स्थायी ठिकानों में शरणार्थियों को लौटाने,लोगों के लिए स्थिति सामान्य करने, बुनियादी ढांचे को बहाल करने और ईसाई मंदिरों और मठों को सुरक्षित करने सहित मानवीय सरोकारों को लेकर बाक़ी बचे मुद्दों की ओर मुड़ने” का समय आ गया है,उस समय मैक्रॉन काकेशस में एक उच्च स्तरीय कूटनीतिक भूमिका निभाने के लिए तैयार और उतावले थे।

मैक्रॉन इसे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। फ़्रांसीसी विदेश मंत्री,ज्यां-यवेस ले ड्रियन को सार्वजनिक रूप से मास्को से यह बताने के लिए आदेश दिया गया कि संघर्ष विराम, ख़ासतौर पर तुर्की और विदेशी लड़ाकों की भूमिका को लेकर जो "अस्पष्टता" बनी है,उसे मास्को साफ़ करे। उन्होंने फ़्रांस की नेशनल असेंबली से कहा, "शरणार्थियों पर संघर्ष, युद्धविराम का परिसीमन, तुर्की की मौजूदगी, सैनिक टुकड़ियों की वापसी और नागोर्न-कारबाख़ की स्थिति पर बातचीत शुरू करने को लेकर जो अस्पष्टता बनी हुई है,उसे हमें दूर करना होगा।"

फ़्रांस ने इसे सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के साथ संपर्क साधा (दोनों मिन्स्क समूह के सह-अध्यक्ष हैं)। फ़्रांस के विदेश मंत्री के इस बयान के कुछ ही घंटों के भीतर अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दे दी। अमेरिकी बयान में युद्ध की समाप्ति का स्वागत करते हुए मास्को की मध्यस्थता की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। बयान में कुछ इस तरह कहा गया,

“हाल की इस लड़ाई की समाप्ति नागोर्नो-कारबाख़ संघर्ष के शांतिपूर्ण बातचीत से निपटारे को हासिल करने की दिशा में पहला क़दम है। हम सेना के इस्तेमाल नहीं करने या बल प्रयोग के ख़तरे, क्षेत्रीय अखंडता और लोगों के आत्मनिर्णय और समान अधिकारों के हेलसिंकी अनंतिम अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर (ओएससीई) मिन्स्क समूह के सह अध्यक्षों को नागोर्नो-करबाख संघर्ष के एक स्थायी राजनीतिक समाधान को पाने के लिए इन पक्षों से यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन (ओएससीई) के साथ जल्द से जल्द फिर से जुड़ने का अनुरोध करते हैं।ओएससीई मिन्स्क समूह के सह-अध्यक्ष के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका इस प्रयास में पूरी तरह से लगा हुआ है।”

फ़्रांस और अमेरिका, दोनों साफ़ तौर पर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि रूस एकतरफ़ा नहीं, बल्कि मिन्स्क समूह के ज़रिये ही कार्रवाई कर सकता है। रविवार को फ़्रांस के राष्ट्रपति ने संघर्ष विराम को लागू करने को लेकर अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण का आह्वान किया। मैक्रॉन के कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा,“हम चाहते हैं कि मिन्स्क ग्रुप निगरानी (युद्ध-विराम) को सुनिश्चित करने में अपनी भूमिका निभाये।”

फ़्रांसीसी अधिकारी ने क्रेमलिन को फटकार लगाते हुए कहा, "हम समझते हैं कि रूस तुर्कों से एक ऐसे संभावित फ़ॉर्मूले को लेकर बातचीत कर रहा है, जो हम नहीं चाहते हैं, जो इस संवेदनशील क्षेत्र में अपनी भूमिकाओं को विभाजित करने वाले अस्टाना प्रक्रिया (सीरिया पर) की हू-ब-हू नक़ल होगा। हमारे एक तरफ़ मिन्स्क (समूह) और दूसरी तरफ़ अस्टाना (सीरिया पर प्रक्रिया) नहीं हो सकता है। किसी न किसी बिंदु पर रूसियों को एक विकल्प तो चुनना ही होगा।”

साफ़ तौर पर फ़्रांस (और अमेरिका) को इस बात का अंदेशा है कि रूस और तुर्की ने भविष्य की शांति वार्ता से पश्चिमी शक्तियों को बाहर रखने को लेकर कोई सौदा कर लिया है। दरअसल, अस्टाना मंच ने रूस और तुर्की को अपने बीच इस बात की वार्ता को लेकर सक्षम बना दिया है कि सीरिया के संघर्ष को किस तरह संभाला जाये और पश्चिमी शक्तियों को किस तरह किनारे रखा जाये। सीरिया की तरह,चोट पर नमक छिड़कने के लिए रूस  ने अजरबैजान में तुर्की के सैन्य कर्मियों की तैनाती पर तुर्की के साथ एक सौदा कर लिया है।

पश्चिमी देशों को इस बात की उम्मीद थी कि रूस और तुर्की नागोर्नो-काराबाख को लेकर एक दूसरे से भिड़ जायेंगे, लेकिन पश्चिम देशों की इस उम्मीद के ठीक उलट हुआ है। उन्होंने पश्चिमी शक्तियों को शामिल होने से रोक दिया है। तुर्की और रूस, दोनों ने अमेरिका के साथ के रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया है; फ़्रांस के राष्ट्रपति,मैक्रॉन और तुर्की के राष्ट्रपति, रेसेप एर्दोगन लीबिया से लेकर सीरिया तक और फ़्रांस के "इस्लामवादी आतंकवाद" के साथ कई मुश्किल मोर्चों पर एक दूसरे से टकरा रहे हैं। हाल ही में एर्दोगन ने मैक्रॉन को मनोरोगी कहा था और इसके लिए उन्हें काउंसलिंग का सुझाव दिया था। 

जो बिडेन के राष्ट्रपति पद पर काबिज होने से पहले पुतिन और एर्दोगन को 10 नवंबर के शांति समझौते को मज़बूत करने वाले अपने हितों को अनुरूप बना लिया होता। बिडेन ने एर्दोगन और पुतिन,दोनों का रूख़े तरीक़े से ज़िक़्र किया है। हालांकि,आख़िरी विश्लेषण के तौर पर नागोर्नो-कारबाख़ पश्चिमी गठबंधन प्रणाली में किसी गंभीर दरार को उजागर करता है,क्योंकि एक नाटो शक्ति (तुर्की) ने इस गठबंधन के अस्तित्व के दुश्मन (रूस) के साथ गठबंधन कर लिया है,ताकि अपने अन्य सहयोगियों (अमेरिका और फ्रांस) का अहंकार तोड़ सके और उन्हें किनारे लगा सके। मिन्स्क समूह में दो अन्य नाटो सदस्य-जर्मनी और इटली भी शामिल हैं।

रूस और तुर्की के मिन्स्क समूह में वापस आने की संभावना नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों में से कोई भी देश नहीं चाहता है कि पश्चिमी शक्तियों को काकेशस में कोई ठिकाना मिले। रूस को शायद, तुर्की के मुक़ाबले ज़्यादा खोना पड़े, क्योंकि अज़रबैजान और जॉर्जिया भी उस उत्तरी काकेशस की सीमा के हिस्से हैं, जो बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाला एक अस्थिर क्षेत्र है, और अज़रबैजान भी उस कैस्पियन सागर के समुद्र तट पर स्थित देश है, जहां मास्को अपनी सुरक्षा प्रधानता को बनाये रखने और उन अन्य बाहरी शक्तियों,ख़ास तौर पर अमेरिका और नाटो को दूर रखने को लेकर अड़ा हुआ है, जो इसके प्रभाव को बाधित कर सकते हैं।

अमेरिका ने जॉर्जिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को मज़बूत कर लिया है। अमेरिका,जॉर्जिया को उसके यूरो-अटलांटिक रिश्तों को गहरा करने में मदद करने को लेकर प्रतिबद्ध है और जॉर्जिया के नाटो आकांक्षाओं का समर्थन करता है। दिलचस्प बात यह है कि मॉस्को को संकेत देने के लिहाज़ से निवर्तमान अमेरिकी विदेश मंत्री,माइक पोम्पिओ ने 18 नवंबर को जॉर्जिया का दौरा किया था।

संक्षेप में कहा जाय,तो नागोर्नो-कारबाख़ में रूस-तुर्की के बीच का तालमेल रणनीतिक है। लेकिन, यह ईरान ही है,जिसके साथ रूस की नागोर्नो-कारबाख पर एक मज़बूत समझ है। 10 नवंबर का शांति समझौता ईरान की शांति योजना पर ही आधारित है और तेहरान इस बात लेकर आभार महसूस करता है कि मास्को ने "अस्टाना प्रारूप" का विकल्प चुना है।

ईरान के विदेश मंत्री,जवाद ज़रीफ़ 23-24 नवंबर को मास्को और बाकू की यात्रा कर रहे हैं। शांति समझौते को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ईरान को रूसी कूटनीति के पूरक के रूप में व्यवस्थित किया गया है,क्योंकि इसका आर्मेनिया और अज़रबैजान (और जॉर्जिया) दोनों के साथ दोस्तान रिश्ता हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि शांति योजना को पटरी से उतारने को लेकर बाकू और येरेवन में पश्चिमी शक्तियां बेहद सक्रिय रही हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Why France is Challenging Russian Peacekeeping in Caucasus

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