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नवउदारवाद और धुर-दक्षिणपंथ की अजीबोगरीब सांठ-गांठ
पहले वाले दौर के फासीवादी आंदोलनों ने अपनी शुरूआत बड़ी पूंजी के खिलाफ आंदोलनों के रूप में की थी। लेकिन अब के नव-फासीवादी तथा धुर-दक्षिणपंथी आंदोलन शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ–जो जनता को बेरोजगार बनाए रखती है-जायज गुस्से को भुनाने का कोई प्रयास करती नहीं दिखाई देती हैं। 
प्रभात पटनायक
19 Jul 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
नवउदारवाद और धुर-दक्षिणपंथ की अजीबोगरीब सांठ-गांठ

पिछले कुछ अर्से में दुनिया भर में धुर-दक्षिणपंथी, फासीवादी, अद्र्घ-फासिस्ट या नव-फासीवादी पार्टियों का उभार देखने को मिला है, जो 1930 के दशक की याद दिलाता है। फासीवादी सरकारें निरपवाद रूप से आम तौर पर इजारेदार पूंजी की, और  खासतौर पर इजारेदार पूंजी के अपेक्षाकृत नये— कहीं कम ‘उदारतावादी’ तथा कहीं ज्यादा प्रतिक्रियावादी— धड़े के हितों की सेवा करती हैं। इसीलिए, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के अध्यक्ष, ज्यार्जी दिमित्रोव ने, इस इंटरनेशन की 7वीं कांग्रेस में फासीवादी राज्य का चरित्रांकन करते हुए उसे, ‘वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी धड़े की खुल्लमखुल्ला आतंकी तानाशाही’ का नाम दिया था।

लेकिन, इस पहले वाले दौर के फासीवादी आंदोलनों ने अपनी शुरूआत बड़ी पूंजी के खिलाफ आंदोलनों के रूप में की थी। अपनी बड़ी-पूंजीविरोधी या ‘दक्षिणपंथी-रैडीकल’ बोली के जरिए अनुयाई जुटाने के बाद, उन्होंने सत्ता में आने के लिए बड़ी पूंजी के साथ गठजोड़ कर लिया और अपने अनुयाइयों के साथ दगा कर दिया था। हिटलर ने यह काम सबसे रक्तपातपूर्ण तरीके से किया था जब ‘बड़े छूरों की रात’ के नाम से जाने गए प्रकरण में, उसी के आदेश पर, उसके पुराने घनिष्ठ सहयोगी तथा एसए के प्रमुख (नाजी पार्टी के अर्धसैनिक संगठन को स्टर्म अबीलुंग कहा जाता है), अन्स्र्ट रोह्म और दूसरे कई नाजियों को कत्ल कर दिया गया था।

बहरहाल, अब के नव-फासीवादी तथा धुर-दक्षिणपंथी आंदोलन, इस पहलू से अपने पूर्ववर्तियों से भिन्न हैं। वे तो शुरूआत से ही किसी भी दक्षिणपंथी-मूलगामी बोली से दूर ही रहे हैं। उनकी ओर से बड़ी पूंजी के खिलाफ कोई विस्फोट, उस व्यवस्था के खिलाफ जो जनता को बेरोजगार बनाए रखती है, उसके जायज गुस्से को भुनाने का कोई प्रयास दिखाई नहीं देगा। 

बेशक, आज के संदर्भ में ऐसी बड़ी पूंजीविरोधी बोली को अनिवार्य रूप से नवउदारवादी आर्थिक नीतियों पर हमलावर बनने का रूप धारण करना होगा क्योंकि ये नीतियांं सारत: उस वैश्वीकृत पूंजी के वर्चस्व को अभिव्यक्त करती हैं, जिसके साथ घरेलू बड़ी पूंजी का एकीकरण हो गया है। लेकिन, दुनिया भर में समकालीन नव-फासीवादी तथा धुर-दक्षिणपंथी आंदोलन, नवउदारवादी आर्थिक नीतियों पर अपनी चुप्पी से ही और निहितार्थत: इन नीतियों के अपने अनुमोदन से ही पहचाने जाते हैं।

कुछ मामलों में, ऐसी नीतियों के लिए और ऐसी नीतियों के पीछे खड़े बड़े पूंजीपति वर्ग के लिए शुरूआत से ही, परोक्ष अनुमोदन नहीं बल्कि खुल्लमखुल्ला तथा मुखर समर्थन का रुख देखा गया है। भाजपा इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बड़े कारोबारियों और वैश्वीकृत पूंजी के साथ बहुत घनिष्ठ रूप से जुड़ गयी है। सच तो यह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने बड़े कारोबारियों के साथ जो घनिष्ठता कायम की थी, उसी ने कुछ साल पहले हुए गुजरात इन्वेस्टर्स मीट के बाद भारत के बड़े पूंजीपतियों ने मोदी को खुलेआम ‘गोद’ ही ले लिया था और प्रधानमंत्री पद के अगले उम्मीदवार के तौर पर सफलता के साथ उन्हें आगे भी बढ़ाया। 

मोदी ने कार्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ कायम किया, जिसने उनके सत्ता तक पहुंचने में मदद की है। और इस गठजोड़ के गढ़े जाने का एक महत्वपूर्ण पहलू था, हिंदुत्व के ही स्वदेशी जागरण मंच जैसे मोर्चों का हाशिए पर धकेला जाना, जो इससे पहले तक किसी न किसी प्रकार के रैडीकल-दक्षिणपंथी कार्यक्रम की पैरवी किया करते थे। 

सत्ता में पहुंचने के बाद मोदी ने अपने कार्पोरेट समर्थकों को खूब पुरस्कृत किया है। उसने अपने कार्पोरेट समर्थकों को सिर्फ खास-खास ठेकों या सौदों के जरिए पुरस्कृत नहीं किया है, जिनके सिलसिले में रफाल सौदे को एक प्रमुख उदाहरण माना जा सकता है। उन्हें सिर्फ ऐसे कानूनों के माध्यम से भी पुरस्कृत नहीं किया गया है, जो मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करते हैं और किसानों की स्वतंत्रता को कमजोर करते हैं। उन्हें, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के जबर्दस्त निजीकरण के कार्यक्रम के जरिए भी पुरस्कृत किया गया है। उन्होंने इस सब को इस दलील के जरिए सही ठहराया है कि बड़े पूंजीपति तो, राष्ट्र के ‘संपदा निर्माता’ हैं! विडंबना यह है कि उनके हिसाब से इसलिए राष्ट्र की संपदा उनके हवाले कर दिया जाना सही है!

बहरहाल, हम मोदी को छोड़ ही देते हैं क्योंकि वह खुद में एक उदाहरण हैं। दुनिया की दूसरी धुर-दक्षिणपंथी पार्टियां भी, जैसे इटली में मैट्टिओ सेल्वनी की नार्दन लीग पार्टी, अब खामोश हो गयी हैं और उन्होंने यूरोप के लिए योरपीय यूनियन के तमाम पूंजीवादी रूढि़वादी कदमों को मंजूर कर लिया है। याद रहे कि नार्दन लीग की शुरूआत में कम से कम यूरोपीय यूनियन के संदर्भ में नवउदारवादी नीतियों का विरोध करती नजर आती थी, जिसकी अभिव्यक्ति यूरोपीय यूनियन की साझा मुद्रा यूरो के उसके विरोध में दिखाई देती थी।

यूरोप में धुर-दक्षिणपंथ द्वारा नवउदारवाद का अनुमोदन बकायदगी से हाल ही में यूरोप की सोलह धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों की एक संयुक्त घोषणा के माध्यम से सामने आया है। इन पार्टियों में हंगरी में विक्टर ओर्बान की फिदेस्ज, फ्रांस में मेरीन ला पेन की नेशनल फ्रंट, आस्ट्रिआ की फ्रीडम पार्टी, पोलेंड की लॉ एंड जस्टिस पार्टी, स्पेन की वॉक्स और इटली से नार्दर्न लीग तथा ब्रदर्स ऑफ इटली आदि शामिल हैं। इस घोषणा में आर्थिक नीति के मुद्दे पर एक शब्द तक नहीं कहा गया है (‘द डेल्फी इनीशिएटिव’ में, थॉमस फॉजी का लेख)।

इस घोषणा में यूरोप के अंदर राष्ट्रीय ‘संस्कृति’ को बचाने की जरूरत पर जोर दिया गया है और इस महाद्वीप की जूडो-क्रिश्चियन परंपरा की हिफाजत करने पर जोर दिया गया है, जिसका सहारा दक्षिणपंथ द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के लिए किया जाता है। लेकिन, इसमें न तो यूरोपीय साझा मुद्रा से हटने की मांग का कोई जिक्र है और न इस साझा मुद्रा से जुड़े हरेक सदस्य देश पर अंधाधुंध तरीके से कटौतियां थोपे जाने का कोई विरोध शामिल है। 

बेशक, महामारी के चलते फिलहाल योरपीय यूनियन ने अपनी स्थिरता तथा विकास संधि (एसजीपी) के तहत, कड़े राजकोषीय अनुशासन के तकाजों को स्थगित कर दिया है और सदस्य देशों को राजकोषीय घाटे के मामले में कुछ गुंजाइश दे दी है। लेकिन, यह स्थगन सिर्फ अस्थायी है। यूरोपीय कमीशन तो पिछले ही दिनों यह कह भी चुका है कि 2023 से एसजीपी फिर से लागू हो जाएगा। लेकिन, धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों की उक्त घोषणा में तो एसजीपी के दोबारा थोपे जाने की इस लक्षित समय सीमा को और आगे बढ़ाए जाने तक की मांग नहीं की गयी है।

इससे एक सवाल यह उठता है कि धुर-दक्षिणपंथ, जो इनमें से ज्यादातर देशों में सत्ता तक पहुंचा भी नहीं है, फिर भी वह बड़ी पूंजी के सामने इतना पालतू और उदार क्यों हो गया है? क्यों इसका यह पहलू 1930 दशक के अपने पिछले अवतरण से इतना भिन्न है? इस सवाल का बुनियादी उत्तर तो इसी तथ्य में छुपा हुआ है कि 1930 के दशक के विपरीत, जब हरेक देश की वित्तीय पूंजी, भले ही उसकी पहुंच अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक क्यों न हो, वह सारत: अपने राष्ट से बंधी हुई तथा राष्ट-राज्य से समर्थित हुआ करती थी। जबकि आज की वित्तीय पूंजी वैश्वीकृत है। आज वैश्वीकृत पूंजी, राष्ट-राज्य से मुकाबिल है। 

नवउदारवाद तथा राजकोषीय कमखर्ची की काट करने का अपरिहार्य रूप से अर्थ यह है कि संबंधित देश को उस वैश्वीकरण के खांचे से बाहर निकलना होगा, जो उसे वैश्विक वित्तीय प्रवाहों के भंवर में फंसाए रखता है और इस तरह शासन की राजकोषीय स्वायत्तता को कमजोर करता है। 

यूरोपीय संदर्भ में इसका अर्थ होगा, यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना क्योंकि यूरोपीय यूनियन वह औजार है जिसके जरिए वैश्वीकृत पूंजी का वर्चस्व अभिव्यक्ति पाता है। लेकिन, किसी भी देश विशेष से निकली वित्तीय पूंजी, वैश्वीकरण के खांचे से इस तरह बाहर निकले जाने का विरोध करेगी क्योंकि उसका तो वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी की व्यवस्था के साथ पहले ही एकीकरण हो चुका है। इसलिए, इस दायरे से बाहर निकलने का एजेंडा तो दूसरे ही वर्गों और सबसे बढक़र मजदूर वर्ग के समर्थन के आधार ही खड़ा किया जा सकता है। और धुर-दक्षिणपंथ को कभी मजदूर वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करते या उन्हें आगे बढ़ाते हुए देखा ही नहीं गया है। हां! मजदूर वर्ग को ठगने के लिए जरूर वह ऐसा कर सकता है।

इसलिए, यूरोपीय यूनियन को लेकर धुर-दक्षिणपंथ की आपत्तियां ‘सांस्कृतिक’ मुद्दों तक ही सीमित रहती हैं, जिन्हें वैश्वीकृत पूंजी के वर्चस्व के लिए किसी तरह का खतरा पैदा किए बिना उसके साथ आसानी से समायोजित किया जा सकता है। वास्तव में, इस सब में तो वैश्वीकृत वित्त का ही कुछ न कुछ फायदा है क्योंकि इससे विमर्श को, बेरेाजगारी तथा आर्थिक दबाव जैसे रोजी-रोटी के मुद्दों की तरफ से मोडऩे में और ‘राष्ट्रीय पहचान’ तथा ‘जूडो-क्रिश्चियन परंपरा’ के लिए खतरे के सवालों तक सीमित करने में मदद मिलती है। यह विमर्श को मजदूर वर्ग पर असर डालने वाले भौतिक मुद्दों की ओर से दूर मोड़ देता है और इसलिए वैश्वीकृत पूंजी के ही हित साधता है।

बहरहाल, वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी के वर्चस्व के लिए धुर-दक्षिणपंथ की सम्मति का एक और पहलू है, जो ध्यान देने वाला है। विकसित दुनिया में पूंजीवाद और इसलिए विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही गतिरोध के जिस संकट में फंसे हुए हैं, उससे उबरने के लिए अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडेन केन्सवादी नीतियों के पुनर्जीवित किए जाने की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे कुछ कदमों का एलान किया है, जिनसे सरकारी खर्चों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी और इसके लिए अमरीका के राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी करने तथा पूंजीपतियों पर कर लगाने के जरिए, वित्त जुटाने की भी घोषणा की गयी है। पूंजीपतियों पर कर लगाने के लिए वह कार्पोरेट कर की एक न्यूनतम दर पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता भी सुनिश्चित करना चाहते हैं। 

बाइडेन के इस पूरे एजेंडा की सफलता के लिए जरूरी है कि इसी प्रकार के एजेंडा के लिए अन्य पूंजीवादी सरकारों की भी कम से कम न्यूनतम सम्मति हो। बहरहाल, अगर सभी विकसित देशों की सरकारें इसी प्रकार के एजेंडा पर सहमत भी हो जाएं, तब भी जब तक तीसरी दुनिया के देशों को भी राजकीय स्वायत्तता नहीं मिलती है यानी उन्हें राजकोषीय ‘कमखर्ची’ के शिकंजे से आजादी नहीं मिलती है, तब तक एक ओर ‘कमखर्ची’ से बंधी तीसरी दुनिया और दूसरी ओर न्यू डील की शैली के एजेंडा पर चल रही पहली दुनिया के बीच का द्वैध, तीसरी दुनिया के लिए द्वेषजनक बना रहेगा। लेकिन, अगर पहली दुनिया में भी आर्थिक विस्तारकारी केन्सवादी एजेंडे के लिए सहमति नहीं बन पाती है, तब तो अमरीका अगर अकेले ऐसे एजेंडा पर चलता है तो वह तो काम भी नहीं करेगा।

इसकी वजह यह है कि अगर अमरीका अकेले ही केन्सवादी नीति को लागू करता है, तो जब तक वह खुद को आयात पाबंदियों के जरिए पूरी तरह से दूसरी अर्थव्यवस्थाओं से काट नहीं लेता है, वह ऐसे देशों से अपनी अर्थव्यवस्था में आयातों को ही बढ़ा रहा होगा, जो ऐसी नीति पर नहीं चल रहे होंगे। यह उन देशों से अमरीका का व्यापार घाटा बढ़ाने का ही काम करेगा। इसका नतीजा यह होगा कि अमरीका, रोजगार तो दूसरे देशों में पैदा कर रहा होगा और खुद व्यापार घाटे की भरपाई के लिए, अपने ऊपर इन देशों का कर्जा भी चढ़ा रहा होगा। यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं चल सकती है।

लेकिन, अब जबकि धुर-दक्षिणपंथ यूरोप में राजकोषीय कमखर्ची के फिर से थोपे जाने के लिए सम्मति दे रहा है, जबकि अनेकानेक ‘प्रतिष्ठानिक’ राजनीतिक पार्टियों का तो उसे वैसे भी समर्थन हासिल है और दूसरी ओर योरपीय वामपंथ की इतनी ताकत नहीं है कि वह इस तरह की कमखर्ची का प्रतिरोध कर सके, ऐसे में यूरोप के बाइडेन की शैली का एजेंडा अपनाने के शायद ही कोई आसार नजर आते हैं। और इसका मतलब यह है कि विश्व पूंजीवाद अपने वर्तमान गतिरोध तथा संकट में ही फंसा रहने जा रहा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Why Neo-Fascist and Far Right Parties are so Tame Toward Big Business

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