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क्यों ज़रूरी है रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट?
एंटीबॉडी टेस्ट एक तरह से सर्वे का काम करता है, जिसके आधार पर कई तरह के ज़रूरी सरकारी फ़ैसले लिए जा सकते हैं। ख़ासतौर से लॉकडाउन और हॉटस्पाट के संबंध में। 
अजय कुमार
05 May 2020
 रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट
Image courtesy: Navbharat Times

वायरस पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि एक नए वायरस से लड़ने के लिए सबसे ज़रूरी बात संक्रमण का स्तर पता लगाने की होती है। इसलिए वायरस के फैलाव से जुड़े आंकड़ों की बहुत ज़रूरत होती  है। जब तक वायरस का इलाज नहीं मिल जाता, तब तक आंकड़ें ही दवाई की तरह काम करते हैं। इसी के आधार पर वैज्ञानिक और सरकार फैसले लेते हैं कि उन्हें किस तरह के कदम उठाने हैं? क्या छूट देनी है, कहाँ कितनी रियायत देनी है? कोरोना के संक्रमण के मामले में भी ठीक ऐसा ही है। यहाँ भी किसी भी तरह का फ़ैसला लेने के लिए आंकड़ों की बहुत ज़रूरत है।  

अब सवाल उठता है कि यह आंकड़ें कैसे मिलेंगे? किसी भी देश के लिए यह नामुमकिन है कि वह अपनी पूरी जनता का कोरोना का टेस्ट करवा पाए। और यह पता लगाए कि स्थिति क्या है? इसलिए बहुत सारे देश कोरोना की वास्तविक स्थिति समझने के लिए रैंडम तरीके से एंटीबॉडी टेस्ट कर रहे हैं। तो आइये समझते हैं कि एंटीबॉडी टेस्ट क्या होता है? इसकी ज़रूरत क्यों है? इसके बारे में हमें एक सजग नागरिक के तौर पर क्या जानने की ज़रूरत है?

कोरोना के टेस्ट दो तरीके से हो रहे हैं। पहला है जेनेटिक टेस्ट या पीसीआर टेस्ट और दूसरा है एंटीबॉडी टेस्ट या सेरोलॉजिकल टेस्ट। जेनेटिक टेस्ट से किसी व्यक्ति के शरीर में एक्टिव स्टेट में मौजूद वायरस का पता चलता है। इससे उनकी जानकारी नहीं मिलती है, जिनके शरीर में कोरोना वायरस आया और चला भी गया। यानी उन लोगों के बारे में जानकारी जो कोरोना वायरस से ठीक हो चुके हैं। यह जानकारी एंटीबॉडी टेस्ट से मिल जाती है।

एंटीबॉडी जांच भी दो तरह की होती है। इसमें पहली है आईजीएम जांच, जिसके जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि संक्रमित मरीज में विषाणु हाल ही में आया है। जबकि दूसरी आईजीजी जांच से पता चलता है कि संक्रमण काफी दिन पुराना है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिचर्स (ICMR) के डॉ. रमन गंगाखेड़कर ने एक सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एंटीबॉडी टेस्ट का जिक्र किया था। किसी के शरीर में जब विषाणुओं यानी वायरस का प्रवेश होता है तो उनसे लड़ने के लिए शरीर कुछ शस्त्र तैयार करता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एंटीबॉडी कहते हैं। वायरस के आकार से ठीक विपरीत आकार की एंटीबॉडी खुद-ब-खुद शरीर में तैयार होकर वायरस से चिपक जाते हैं और उसे नष्ट करने का काम करते हैं। एंटीबॉडी कई प्रकार के होते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक खून में मौजूद एंटीबॉडी से ही पता चलता है कि किसी शख्स में कोरोना या किसी अन्य वायरस का संक्रमण है या नहीं।

कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच सरकार ने क्लस्टर और हॉटस्पॉट इलाकों में रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट करने का फैसला किया था। इस ब्लड टेस्ट में मरीज के खून का सैंपल लिया जाता है। आसान भाषा में कहे तो उंगली में सुईं चुभोकर खून का सैंपल लेते हैं, जिसका परिणाम भी 15 से 20 मिनट में आ जाता है। एंटीबॉडी टेस्ट को ही सेरोलॉजिकल टेस्ट कहा जाता है। सेरोलॉजिकल टेस्ट, जेनेटिक टेस्ट के मुकाबले काफी सस्ता होता है। रिवर्स-ट्रांसक्रिप्टेस रीयल-टाइम पोलीमरेज चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) यानी जेनेटिक टेस्ट में नौ घंटे में रिजल्ट मिलता है। इस तरह से सेरोलॉजिककल टेस्ट यानी एंटीबॉडी टेस्ट से कम समय लगता है। यहाँ एक और बात समझने वाली है कि पीसीआर टेस्ट शुरुआती दौर में संक्रमण का पता तभी लगा सकता है जब वायरस के संक्रमण से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडी डेवलप हो चुका हो। इसलिए एंटीबॉडी टेस्ट में जो पॉजिटिव आते हैं, उनमें संक्रमण का सही से पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्ट यानी पीसीआर टेस्ट के लिए भेजा जाता है।  

इस जानकारी से यह बात साफ है कि अगर सही तरह से एंटीबॉडी टेस्ट किया जाए तो बहुत बड़े स्तर पर टेस्ट किया जा सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि कोरोना की स्थिति क्या है। कौन सा इलाका हॉटस्पॉट है और कौन सा इलाका हॉटस्पॉट नहीं है? लॉकडाउन कहाँ इस्तेमाल किया जाए और कहाँ इससे छूट मिले? यानी एंटीबॉडी टेस्ट एक तरह से सर्वे का काम करता है, जिसके आधार पर कई तरह के ज़रूरी सरकारी फ़ैसले लिए जा सकते हैं।  

पिछले दो हफ्ते में इस टेस्ट के जरिये अमेरिका में मिले आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में कोरोना के मामलें जितने रिकॉर्ड किया जा रहे हैं, उससे कई अधिक मामले कोरोना के अमेरिका में मौजूद हैं। अगर केवल आंकड़ों के लिहाज से ही इसे समझने की कोशिश करे तो इससे कोरोना से होने वाले मृत्यु दर में बदलाव आएगा। क्योंकि कोरोना के मामले अधिक होंगे और कोरोना से होने वाली मौतें उतनी ही होंगी जितनी रिकॉर्ड की जा रही हैं। इस लिहाज से भारत के संदर्भ में सोचें तो अगर रैपिड टेस्ट से यह पता चलता है कि भारत की बहुत बड़ी आबादी में कोरोना का संक्रमण है और रिकार्डेड मौतें उतनी ही हैं, जितनी बताई जा रही है तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि बहुत बड़ी आबादी में कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी विकसित कर लिया है। अगर ऐसे निष्कर्ष निकलते हैं तो यह सरकार के लिए ज़रूरी फैसले लेने के लिए महत्वपूर्ण औजार की तरह काम करेंगे।  

लेकिन यहाँ एक पेच है। इंडियन कॉउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च की तरफ से बहुत बड़ी मात्रा में एंटीबॉडी टेस्ट किट मांगवाये गए थे लेकिन इनसे होने वाली जाँच में बहुत अधिक गड़बड़ी निकली। सही से जाँच होने की दर केवल 6 से 30 फीसदी के आसपास थी। इसलिए भारत सरकार ने इस टेस्ट को रोक दिया।  इसलिए अभी तक रैपिड टेस्ट नहीं हो रहा है। कुछ विदेश की कंपनियों से करार किया जा रहा है और कुछ देशी कंपनियां इस काम में लग गयी है। इन सारी कंपनियों का दावा है कि उनके एंटीबॉडी टेस्ट से 90 फीसदी से अधिक मामलों में सही परिणाम निकलेगा।  

इस लिहाज से कुछ कमियों के बावजूद भी रैपिड टेस्ट की बहुत अधिक ज़रूरत है। सरकार जितनी जल्दी इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दे, सरकारी फैसले के लिए यह उतना ही अधिक बेहतर हो सकता है।  

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