NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
हमारे नेता क्यों कतरा रहे हैं वैक्सीन लेने से?
टीकाकरण से खुद को बचाते नेताओं के रवैये को देख कर पहली नज़र में तो यही लगेगा कि ये लोग देश के लिए कितना सोचते हैं। लेकिन ज़रा सा ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि हक़ीक़त इससे उलट है और इनमें से बहुत से लोग वैक्सीन की गुणवत्ता को लेकर खुद संशय में हैं!
अनिल जैन
19 Jan 2021
कोरोना वायरस

दुनिया के जिन-जिन देशों में कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए टीकाकरण (वैक्सीनेशन) की शुरुआत हुई है, वहां का अनुभव है कि इसकी सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि लोगों का वैक्सीन को लेकर भरोसा बने। उन्हें यह यकीन हो कि वैक्सीन उनको वायरस से सुरक्षा देगी और उनके शरीर पर कोई बुरा असर नहीं होगा। यह भरोसा बनाने के लिए अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी पत्नी ने सार्वजनिक रूप से वैक्सीन लगवाई। अमेरिकी संसद के निचले सदन की स्पीकर और उच्च सदन के सभापति यानी उप राष्ट्रपति ने भी वैक्सीन लगवाई। हालांकि इसके बावजूद अमेरिका में वैक्सीन लेने वालों का भरोसा नहीं बना और जब कई जगह वैक्सीन का स्टॉक फेंका जाने लगा तो उसके स्टॉक के नए नियम बने।

इसी तरह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दिसंबर में अपने देश में टीकाकरण शुरू होते ही सबसे पहले टीका लगवाया। उनको वैक्सीन की दूसरी डोज भी लग गई है। इसके अलावा यूरोपीय संघ के देशों के नेताओं से लेकर अरब देशों के शेखों तक हर जगह बडे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से टीका लगवाया है। रूस में कोरोना की वैक्सीन का पहला टीका राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बेटी को लगाया गया। मकसद इसका यही था कि लोगों का भरोसा बढे ताकि वे टीकाकरण की प्रक्रिया में शामिल हों।

लेकिन भारत में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां सरकार की ओर से दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समारोहपूर्वक टीकाकरण अभियान का उद्घाटन किया, लेकिन खुद उन्होंने टीका नहीं लगवाया। यही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल मीटिंग में कहा कि नेताओं को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगवाने की पहल नहीं करनी चाहिए। एक तरह से उन्होंने नेताओं से कहा कि वे टीका न लगवाएं।

भारत सरकार ने ऐलान किया है कि देश में कोरोना का टीका पहले चरण में एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों और दो करोड फ्रंटलाइन वर्कर्स को लगाया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा कि फ्रंटलाइन वर्कर्स में सफाई कर्मचारी भी शामिल हैं। यानी सफाई कर्मचारियों को भी पहले चरण में कोरोना का टीका लगाया जाएगा। इसके अलावा पुलिस, अर्धसैनिक बल और सैन्य बलों के लोगों को भी पहले चरण में ही टीका लगाया जाएगा।

अब सवाल है कि देश और समाज की सेवा में जुटे प्रधानमंत्री, उनकी सरकार के मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, उनके मंत्री, सांसद, विधायक आदि क्या फ्रंटलाइन वर्कर्स नहीं हैं? क्या इनका काम देश के पहले तीन करोड़ लोगों से कम महत्व का है? सोचने वाली बात है कि जो लोग ऑर्डर ऑफ प्रेसिडेंस यानी प्रोटोकॉल में सबसे ऊपर आते हैं और देश के पहले, दूसरे या तीसरे नागरिक कहे जाते हैं, वे फ्रंटलाइन वर्कर नहीं हैं। इसीलिए ये लोग फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ टीका नहीं लगवा रहे हैं।

प्रधानमंत्री भले ही कह रहे हों कि नेता लोग पहले टीका लगाने के लिए मारामारी न करें, लेकिन हकीकत यह है कि कोई नेता मारामारी कर ही नहीं रहा है। सब टीका लगवाने से खुद ही बच रहे हैं। कई मुख्यमंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्रियों ने टीका लगवाने से इंकार कर दिया है और बहाना बनाया है कि पहले जरुरतमंदों को लगे। सबसे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अलग-अलग कारणों से घोषणा की कि वे टीका नहीं लगवाएंगे। शिवराज सिंह ने जहां टीकाकरण में आम जरूरतमंद लोगों को प्राथमिकता देने की बात कही, वहीं अखिलेश यादव ने वैक्सीन की विश्वसनीयता पर संदेह जताया।

टीकाकरण से खुद को बचाते इन नेताओं के इस रवैये को देख कर पहली नजर में तो यही लगेगा कि ये लोग देश के लिए कितना सोचते हैं। लेकिन जरा सा ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि हकीकत इसके उलट है और इनमें से बहुत लोग वैक्सीन की गुणवत्ता को लेकर खुद संशय में हैं और डर के मारे टीका लगवाने से बच रहे हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं है कि जहां तीन करोड़ लोगों को टीके लग रहे हैं, वहां पांच हजार और लोगों को न लग पाएं। जी हां, देश में सांसदों, विधायकों आदि की कुल संख्या पांच हजार के लगभग है। इसमें प्रधानमंत्री, उनके 55 मंत्री और साथ ही राज्यों के राज्यपाल, उप राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक आदि सब शामिल हैं।

हैरान करने वाली बात यह भी है कि कहां तो भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण होना है और कहां पांच हजार लोग भागे फिर रहे हैं कि पहले बाकी लोगों को लग जाए, फिर हम लगवाएंगे। जहां पहले चरण में तीन करोड़ लोगों को टीका लग रहा है, वहां क्या पांच हजार और लोगों को टीका नहीं लग सकता है? क्या इससे टीके घट जाएंगे? हर हफ्ते एक करोड टीके सीरम इंस्टीट्यूट में और लगभग इतने ही टीके भारत बायाटेक में बन रहे हैं, जहां से दुनिया के दूसरे देशों में टीका भेजने का समझौता हो रहा है। लेकिन नेताओं को लगाने के लिए पांच हजार टीके का इंतजाम नहीं हो पा रहा है!

ऐसा नहीं है कि वैक्सीन की विश्वसनीयता को लेकर नेताओं में ही संशय की स्थिति है, सरकार ने जिन तीन करोड़ लोगों को पहले चरण के टीकाकरण के लिए चिह्नित किया है उनमें भी कई लोग वैक्सीन के निरापद होने का भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली में ही एक बडे सरकारी अस्पताल (राम मनोहर लोहिया अस्पताल) के डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ ने भारत बायोटेक की वैक्सीन कोवैक्सीन को लेकर आशंका जताते हुए उसे लेने से इंकार कर दिया है। अस्पताल के रेजीडेंट डॉक्टरों ने अस्पताल के अधीक्षक को पत्र लिख कर कहा है कि अभी कोवैक्सीन का परीक्षण पूरा नहीं हुआ है, इसलिए वे इसे नहीं लेना चाहते। कई शहरों से वैक्सीन लेने वालों के बीमार होने की खबरें भी आई हैं। अकेले दिल्ली में ही 50 ज्यादा लोग टीका लगवाने के बाद बीमार हो गए हैं। हालांकि कहा गया कि ये मामूली साइड इफेक्ट थे। अब तक दो मौतों की भी ख़बर है। हालांकि इन मामलों में सफाई दी गई है कि इन मौतों का संबंध कोविड वैक्सीन से नहीं है।

देश में टीकाकरण की इस स्थिति पर कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि तीसरे चरण के परीक्षण का डाटा आए बगैर ही सरकार ने कोवैक्सीन की मंजूरी देकर देश के लोगों को गिनी पिग बना दिया है। कांग्रेस को इस पर भी आपत्ति है कि सरकार लोगों को अपनी पसंद की वैक्सीन चुनने नहीं दे रही है। इस पूरी स्थिति पर सरकार की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं आया है। बस प्रधानमंत्री मोदी यही कह रहे हैं कि भारत बायोटेक की वैक्सीन को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही स्वीकृति दी है, इसलिए लोग अफवाहों से दूर रहे। इसी तरह स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी कह रहे हैं कि वैक्सीन कोरोना के खिलाफ संजीवनी की तरह काम करेगी।

देश और दुनिया में अनेक असाध्य और जानलेवा बीमारियों से बचाव के लिए सैकड़ों किस्म की वैक्सीन बनी हैं और बचपन से ही लोगों को लगनी शुरू हो जाती हैं। लेकिन ज्ञात इतिहास में कभी किसी वैक्सीन को लेकर संशय का ऐसा माहौल नहीं बना, जैसा कोरोना की वैक्सीन को लेकर बना है। असल में वैक्सीन से किसी बात की गारंटी नहीं मिल रही है। वैक्सीन की डोज के साथ यह नसीहत दी जा रही है कि मास्क लगाए रखना है, दो गज की दूरी रखनी है, हाथ धोते रहना है या सैनिटाइज करते रहना है। जब तक वैक्सीन नहीं थी तब तक भी इसी उपाय से लोग बचते रहे थे और वैक्सीन के बाद भी ये ही उपाय करने है तो वैक्सीन का क्या मतलब है?

इन्हीं उपायों से देश की 99 फीसदी आबादी अब तक कोरोना के संक्रमण से बची हुई है। जो एक फीसदी के करीब लोग संक्रमण की चपेट में आए हैं, उनमें से भी 99 फीसद के करीब ठीक हो गए हैं। इसीलिए सवाल उठ रहा है कि ऐसी वैक्सीन की क्या जरूरत है? उसके लिए इतना हल्ला मचाने की क्या जरूरत है कि वैक्सीन सीरम इंस्टीट्यूट से निकल रही है, नारियल फोड़ा जा रहा है, वैक्सीन के बक्सों पर फूल चढ़ाए जा रहे हैं, वैक्सीन लेकर हवाई जहाज उड़ गया है, जहाज उतर गया है, जेड सुरक्षा में वैक्सीन की गाड़ी निकली आदि आदि?

वैक्सीन की पहली डोज लगाने के 28 दिन बाद दूसरी डोज लगानी है और उसके 14 दिन के बाद इससे सुरक्षा मिलेगी। यानी पहले 42 दिन तो कोई सुरक्षा नहीं है। पूरी डोज लगाने के 14 दिन बाद तक कोरोना का संक्रमण हो सकता है। उसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि संक्रमण नहीं होगा, क्योंकि कोई भी वैक्सीन सौ फीसदी सुरक्षा नहीं दे रही है। इसलिए मास्क लगाने और दूरी बनाए रखने की नसीहत भी दी जा रही है। जिनको वैक्सीन लगाई जा रही है और संयोग से उन्हें 42 दिन के अंदर कोरोना नहीं होता है और उसके बाद भी बच जाते हैं तो वह संयोग होगा। यह संयोग कब तक रहेगा, कोई नहीं बता सकता।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Coronavirus
COVID-19
corona vaccine
Covid-19 Vaccination
BJP

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • russia ukrain
    अजय कुमार
    यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!
    24 Feb 2022
    तमाम आशंकाओं के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए युद्ध की शुरुआत कर दी है। इस युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कौन से कारण इसके पीछे हैं? आइए इसे समझते हैं। 
  • up elections
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
    24 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
  • ayodhya
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
    24 Feb 2022
    अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही…
  • mali
    पवन कुलकर्णी
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है
    24 Feb 2022
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाने की मांग करने वाले बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों का उभार 2020 से जारी है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में, माली की संक्रमणकालीन सरकार ने फ़्रांस के खिलाफ़ लगातार विद्रोही…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License