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भारत
राजनीति
पिछड़े और आपदाग्रस्त मुल्कों के बाशिंदे भी भारतीयों के मुकाबले ज़्यादा ख़ुशहाल क्यों?
संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी 'वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट-2021’ में भारत को 149 देशों में 139वां स्थान मिला है। यह रिपोर्ट इस हक़ीक़त को भी साफ तौर पर रेखांकित करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी समाज में ख़ुशहाली नहीं ला सकती।
अनिल जैन
23 Mar 2021
पिछड़े और आपदाग्रस्त मुल्कों के बाशिंदे भी भारतीयों के मुकाबले ज़्यादा ख़ुशहाल क्यों?
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: गूगल

भारत में पहले से ही ढहती अर्थव्यवस्था और उसके चलते बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और खेती की बर्बादी जैसी आम आदमी की तमाम दुश्वारियों के बीच कोरोना के खौफ, बीमार स्वास्थ्य सेवाएं, लोगों की मौतें, लॉकडाउन, औद्योगिक शहरों से बडे पैमाने पर प्रवासी कामगारों के दर्दनाक विस्थापन, वर्क फ्राम होम और ऑन लाइन शैक्षणिक गतिविधियों ने बीते एक साल के दौरान ‘कोढ़ में खाज’ जैसे हालात बना दिए हैं। इसकी स्पष्ट झलक 'वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट’ में भी देखी जा सकती है, जिसमें दुनिया के सबसे खुशहाल देशों की सूची में भारत का मुकाम दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देशों से ही नहीं बल्कि पाकिस्तान समेत तमाम छोटे-छोटे पड़ोसी देशों और युद्ध से त्रस्त फिलिस्तीन से भी पीछे है।

संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी 'वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट-2021’ में भारत को 149 देशों में 139वां स्थान मिला है। पिछले वर्ष 156 देशों में भारत 144वें पायदान पर था और उससे पहले यानी 2019 में 140वें, 2018 में 133वें और 2017 में 122वें पायदान पर था। इस बार सर्वे में शामिल देशों में भारत का स्थान इतना नीचे है, जितना कि अफ्रीका के कुछ बेहद पिछडे देशों का है। यानी इन देशों के नागरिक भी भारतीयों के मुकाबले ज्यादा खुश हैं।

'वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट’ संयुक्त राष्ट्र का एक संस्थान 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क’ (एसडीएसएन) हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वे करके जारी करता है। इसमें अर्थशास्त्रियों की एक टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, दीर्घ जीवन की प्रत्याशा, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता, उदारता आदि पैमानों पर दुनिया के सारे देशों के नागरिकों के इस अहसास को नापती है कि वे कितने खुश हैं। इस बार रिपोर्ट को तैयार करने में दुनिया भर के लोगों पर कोरोना महामारी के पड़ रहे असर को भी केंद्र में रखा गया है।

इस साल जो 'वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट’ जारी हुई है, उसके मुताबिक भारत उन चंद देशों में से है, जो नीचे की तरफ खिसके हैं। हालांकि भारत की यह स्थिति खुद में चौंकाने वाली नहीं है। लेकिन यह बात जरूर गौरतलब है कि कई बड़े देशों की तरह हमारे देश के नीति-नियामक भी आज तक इस हकीकत को गले नहीं उतार पाए हैं कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या विकास दर बढ़ा लेने भर से हम एक खुशहाल समाज नहीं बन जाएंगे।

यह गुत्थी भी कम दिलचस्प नही है कि 129वें स्थान पर श्रीलंका, 105वें स्थान पर पाकिस्तान, 101वें स्थान पर बांग्लादेश, 89वें स्थान पर मालदीव और 87वें स्थान पर नेपाल जैसे देश भी इस रिपोर्ट में आखिर हमसे ऊपर क्यों हैं, जिन्हें हम स्थायी तौर पर आपदाग्रस्त देशों में ही गिनते हैं। हमारे अन्य पडोसी देश म्यांमार और भूटान भी हमसे ज्यादा खुशहाल हैं। सार्क देशों में सिर्फ अफगानिस्तान ही खुशमिजाजी के मामले में भारत से पीछे है। खुशहाल देशों के साथ ही सर्वाधिक नाखुश देशों की सूची भी जारी हुई है, जिसमें अफगानिस्तान शीर्ष पर है और भारत चौथे नंबर पर।

दिलचस्प बात है कि आठ साल पहले यानी 2013 की रिपोर्ट में भारत 111वें नंबर पर था। तब से अब तक हमारे शेयर बाजार तो लगभग लगातार बढत पर ही रहे हैं। फिर भी इस दौरान हमारी खुशी का स्तर नीचे खिसक आने की वजह क्या हो सकती है? दरअसल, यह रिपोर्ट इस हकीकत को भी साफ तौर पर रेखांकित करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी समाज में खुशहाली नहीं ला सकती। इसीलिए आर्थिक समृद्धि के प्रतीक माने जाने वाले ब्रिटेन(17), अमेरिका (19), और संयुक्त अरब अमीरात(25) भी दुनिया के सबसे खुशहाल 10 देशों में अपनी जगह नहीं बना पाए हैं।

अगर इस रिपोर्ट को तैयार करने के तरीकों और पैमानों पर सवाल खडे किए जाएं, तब भी कुछ सोचने का मसाला तो इस रिपोर्ट से मिलता ही है। किसी भी देश की तरक्की को मापने का सबसे प्रचलित पैमाना जीडीपी या विकास दर है। लेकिन इसे लेकर कई सवाल उठते रहे है। एक तो यह कि जीडीपी किसी देश की कुल अर्थव्यवस्था की गति को तो सूचित करती है, पर इससे यह पता नहीं चलता कि आम लोगों तक उसका लाभ पहुंच रहा है या नहीं। दूसरे, जीडीपी का पैमाना केवल उत्पादन-वृद्धि के लिहाज से ही किसी देश की तस्वीर पेश करता है।

ताजा हैपिनेस रिपोर्ट में फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल मुल्क है। वह लगातार चौथे साल शीर्ष पर बना हुआ है। उससे पहले वह पांचवें स्थान पर था लेकिन एक साल में ही वह पांचवें से पहले स्थान पर आ गया। फिनलैंड को दुनिया में सबसे स्थिर, सबसे सुरक्षित और सबसे सुशासन वाले देश का दर्ज़ा दिया गया है। वह कम से कम भ्रष्ट है और सामाजिक तौर पर प्रगतिशील है। उसकी पुलिस दुनिया मे सबसे ज्यादा साफ-सुथरी और भरोसेमंद है। वहां हर नागरिक को मुफ्त इलाज की सुविधा प्राप्त है, जो देश के लोगों की खुशहाली की बड़ी वजह है।

वर्ष 2021 की रिपोर्ट में सबसे खुशहाल मुल्कों में फिनलैंड के बाद क्रमश: डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, लक्समबर्ग, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रिया है। इन सभी देशों में प्रति व्यक्ति आय काफी ज्यादा है। यानी भौतिक समृद्धि, आर्थिक सुरक्षा और व्यक्ति की प्रसन्नता का सीधा रिश्ता है। इन देशों में भ्रष्टाचार भी कम है और सरकार की ओर से सामाजिक सुरक्षा काफी है। लोगों पर आर्थिक सुरक्षा का दबाव कम है, इसलिए जीवन के फैसले करने की आजादी भी ज्यादा है। जबकि भारत की स्थिति इन सभी पैमानों पर बहुत अच्छी नहीं है। फिर भी हम पाकिस्तान, बांग्लादेश और ईरान से भी बदतर स्थिति में है, यह बात हैरान करने वाली है।

लेकिन इस हकीकत की वजह शायद यह है कि भारत में विकल्प तो बहुतायत में हैं, लेकिन सभी लोगों की उन तक पहुंच नहीं है, जिसकी वजह से लोगो में असंतोष है। इस स्थिति के बरक्स कई देशों में जो सीमित विकल्प उपलब्ध हैं, उनके बारे में भी लोगों को ठीक से जानकारी ही नहीं है, इसलिए वे अपने सीमित दायरे में ही खुश और संतुष्ट हैं। फिर भारत में तो जितनी आर्थिक असमानता है, वह भी लोगों में असंतोष या मायूसी पैदा करती है।

दरअसल किसी देश की समृद्धि तब मायने रखती है, जब वह नागरिकों के स्तर पर हो। भारत और चीन का जोर अपने आम लोगों की खुशहाली के बजाय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने पर रहता है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि लंबे समय से जीडीपी के लिहाज से दुनिया में अव्वल रहने के बावजूद चीन 'वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट’ में 84वें स्थान पर है।

बहरहाल ताजा 'हैपिनेस रिपोर्ट’ में बताई गई भारत की स्थिति चौंकाती भी है और चिंतित भी करती है। चौंकाती इसलिए है कि हम भारतीयों का जीवन दर्शन रहा है- 'संतोषी सदा सुखी।' हालात के मुताबिक खुद को ढाल लेने और अभाव में भी खुश रहने वाले समाज के तौर पर हमारी विश्वव्यापी पहचान रही है। दुनिया में भारत ही संभवत: एकमात्र ऐसा देश है जहां आए दिन कोई न कोई तीज-त्योहार-व्रत और धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव मनते रहते हैं, जिनमें मगन रहते हुए गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने सारे अभाव और दुख-दर्द को अपना प्रारब्ध मानकर खुश रहने की कोशिश करता है।

इसी भारत भूमि से वर्धमान महावीर ने अपरिग्रह का संदेश दिया है और इसी धरती पर बाबा कबीर भी हुए हैं, जिन्होंने इतना ही चाहा है जिससे कि उनकी और उनके परिवार की दैनिक जरुरतें पूरी हो जाएं और दरवाजे पर आने वाला कोई साधु-फकीर भी भूखा न रह सके। लेकिन दुनिया को योग और अध्यात्म से परिचित कराने वाले इस देश की स्थिति में यदि तेजी से बदलाव आ रहा है और लोगों की खुशी का स्तर गिर रहा है तो इसकी वजहें सामाजिक मूल्यों में बदलाव, भोगवादी जीवन शैली अपनाने और सादगी के परित्याग से जुड़ी हैं।

आश्चर्य की बात यह भी है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त भोग-विलास का जीवन जी रहे लोगों की तुलना में वे लोग अधिक खुशहाल दिखते हैं जो अभावग्रस्त हैं। हालांकि अब ऐसे लोगों की तादाद में लगातार इजाफा होता जा रहा है जिनका यकीन 'साई इतना दीजिए...’ के उदात्त कबीर दर्शन के बजाय 'ये दिल मांगे मोर’ के वाचाल स्लोगन में है। यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो, कोई खास हर्ज नहीं था। लेकिन मुश्किल तो यह है कि 'यथा राजा-तथा प्रजा' की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे सामूहिक अथवा राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे है। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने 'ऋणं कृत्वा, घृतं पीवेत' की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछा कर अपने खजाने खोल रखे हैं।

लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। शान-ओ-शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिग मॉल्स पर लगने वाली भीड देखकर भी इस वाचाल स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों- खासकर यौन अपराधों की वजह यही है।

यह अकारण नही है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है, जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है। यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना नहीं है, बल्कि यह आवारा पूंजीवाद के सहारे पैदा हुई अनैतिक समृद्धि और उसके सह-उत्पादों की रचनात्मक आलोचना है।

भारतीय आर्थिक दर्शन और जीवन पद्धति के सर्वथा प्रतिकूल 'पूंजी ही जीवन का अभीष्ट है' के अमूर्त दर्शन पर आधारित नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों और वैश्वीकरण से प्रेरित बाजारवाद के आगमन के बाद समाज में बचपन से अच्छे नंबर लाने, कॅरिअर बनाने, पैसे कमाने और सुविधाएं-संसाधन जुटाने की एक होड़ सी शुरू हो गई है। इसमें जो पिछड़ता है वह निराशा और अवसाद का शिकार हो जाता है, लेकिन जो सफल होता है वह भी अपनी मानसिक शांति गंवा बैठता है। एकल और डिजाइनर परिवारों के चलन ने लोगों को बड़े-बुजुर्गों के सानिध्य की उस शीतल छाया से भी वंचित कर दिया है जो अपने अनुभव की रोशनी से यह बता सकती थी कि जिंदगी का मतलब सिर्फ 'सफल’ होना नहीं, बल्कि समभाव से उसे जीना है। जाहिर है, इसी का दुष्प्रभाव बढ़ती आत्महत्याओं, नशाखोरी, घरेलू कलह, रोडरेज और अन्य आपराधिक घटनाओं में बढोतरी के रूप में दिख रहा है।

दरअसल, विकास और बाजारवाद की वैश्विक आंधी ने कई मान्यताओं और मिथकों को तोड़ा है। कुछ समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की आई एक अध्ययन रिपोर्ट में भी बताया गया था कि भारत दुनिया में सर्वाधिक अवसादग्रस्त लोगों का देश है, जहां हर तीसरा-चौथा व्यक्ति अवसाद के रोग से पीड़ित है। यह तथ्य भी इस मिथक की कलई उतारता है कि विकास ही खुशहाली का वाहक है। अध्ययन में दुख, निराशा, अरूचि, अनिद्रा आदि अवसाद के जो मानक बनाए गए थे, उनके आधार पर हमारे देश को स्वाभाविक रूप से सर्वाधिक अवसादग्रस्त कहा जा सकता है, क्योंकि हमारे यहां व्यवस्था के जितने भी प्रमुख अंग है चाहे वह राजनीतिक नेतृत्व हो, कार्यपालिका हो, न्यायपालिका हो, पुलिस हो, सभी से आम आदमी को निराशा-हताशा ही हाथ लगी है।

देश के प्राकृतिक संसाधनों पर मुट्‌ठीभर लोगों के कब्जे के चलते भी देश में आर्थिक और सामाजिक विषमता को बढ़ावा मिला है। लोकविमुख विकास की सरकारी नीतियों के चलते देशभर में व्यापक पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ है। उनका यह विस्थापन महज अपने घर जमीन से ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिकता और संस्कृति से भी हुआ है जिसने उनमें दुख और नैराश्य भर दिया है।

कुल मिलाकर संयुक्त राष्ट्र की 'हैपिनेस रिपोर्ट’ में भारत की साल दर साल गिरती स्थिति और विश्व स्वास्थ्य संगठन का भारत को सर्वाधिक अवसादग्रस्त देश बताने वाला सर्वे इसी हकीकत की ओर इशारा करता है कि विपन्नता और बदहाली के महासागर में समृद्धि के चंद टापू खड़े हो जाने से पूरा महासागर समृद्ध नहीं हो जाता।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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