NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शराबबंदी के बाद भी क्यों सूख नहीं रहे बिहार की ग्रामीण महिलाओं के आंसू?
क्या बिहार में शराबबंदी फेल है? और फेल है तो क्या नीतीश कुमार का यह फैसला गलत था? इन दिनों मीडिया में ये सवाल हर तरफ हैं। मगर इस पूरे डिबेट से वे महिलाएं गायब हैं, जिनकी पहल पर राज्य में शराबबंदी लागू की गयी थी। 
पुष्यमित्र
06 Nov 2021
liquid
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

बिहार के बेतिया जिले के नौतन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियों में धान के पुआल पर बैठी एक महिला अपनी व्यथा सुनाते हुए रो रही है। वह कह रही है कि “दारुआ पियाइ के मारलक तहियो न ऐले परशासन’। मतलब यह कि दारू पिलाकर उसके परिजन को मार डाला गया, मगर तब भी प्रशासन के लोग उसकी सुधि लेने नहीं आये। 

दीपावली के आसपास बिहार में नकली और जहरीली शराब पीने से अब तक 33 लोगों की मौत हो गयी है और कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गयी है। इस घटना पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि बिहार में पिछले पांच साल से पूर्ण शराबबंदी है। इसके बावजूद लोग शराब पी भी रहे हैं और पीकर मर भी रहे हैं।

नौतन की उस महिला का विलाप इसलिए भी परेशान करने वाला है, क्योंकि ऐसी ही ग्रामीण महिलाओं की लगातार मांग और उनके द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों की वजह से बिहार में शराबबंदी लागू की गयी थी। शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार में खुद सरकार हर पंचायत में शराब की बिक्री करती थी, और जगह-जगह भट्ठियां भी खुली होती थीं। इनके खिलाफ पूरे राज्य में ग्रामीण महिलाएं लगातार आंदोलन किया करती थीं। एक सभा में ऐसी ही एक आंदोलनकारी महिला ने राज्य के सीएम नीतीश कुमार से शराबबंदी की मांग की थी और सीएम ने उसकी मांग को मानते हुए अप्रैल, 2016 में पूरे राज्य में शराबबंदी लागू कर दी गयी। मगर दुर्भाग्य है कि शराबबंदी लागू होने के पांच साल बाद भी इन महिलाओं की परेशानियां और विलाप खत्म नहीं हुआ है। पूरे राज्य में आसानी से शराब उपलब्ध है और आंकड़े बताते हैं कि राज्य में इस साल नकली शराब पीने से 70 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

तो क्या बिहार में शराबबंदी फेल है? और फेल है तो क्या नीतीश कुमार का यह फैसला गलत था? इन दिनों मीडिया में ये सवाल हर तरफ हैं। मगर इस पूरे डिबेट से वे महिलाएं गायब हैं, जिनकी पहल पर राज्य में शराबबंदी लागू की गयी थी। 

इन सवालों को समझने के लिए न्यूजक्लिक ने बिहार की ग्रामीण महिलाओं के बीच पिछले कई वर्षों से काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शाहीना परवीन से बातचीत की तो वे कहती हैं, “बिहार में अगर शराबबंदी असफल साबित हो रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि शराबबंदी लागू करने का फैसला गलत था।”

वे आगे कहती हैं, “दरअसल इसके असफल होने की एक बड़ी वजह यह रही कि इसे ठीक से लागू नहीं किया गया। बिहार सरकार ने अंततः इसे कानून व्यवस्था का मसला मान लिया और इसे लागू कराने की पूरी जिम्मेदारी पुलिस विभाग को दे दी। यह नहीं सोचा गया कि शराबबंदी लागू होने के वक्त जो लोग बुरी तरह शराब पीने के आदी हैं, उन्हें कैसे सुधारा जाये। इसे लागू करने में व्यवहार परिवर्तन और इस लत के शिकार लोगों के इलाज की बड़ी भूमिका होनी थी। मगर नशामुक्ति के मसले पर न के बराबर काम किया गया। दूसरा काम जागरूकता का होना था, मगर वह काम भी औने-पौने तरीके से चला। सबसे बड़ी कमी यह हुई कि इस पूरी प्रक्रिया में उन महिलाओं को शामिल नहीं किया गया, जो लंबे समय से शराबबंदी के खिलाफ अभियान चला रही थीं, जो भट्ठियां तोड़ रही थीं, सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रही थीं और कई बार पिट भी रही थीं। अगर उन महिलाओं को जोड़ा जाता, सूचना प्रदाता बनाया जाता तो शायद पुलिसिंग भी आसान होती।”

यह पूछने पर कि अब लोग कहते हैं, शराबबंदी गलत फैसला था, इसलिए असफल हो रहा है। शाहीना कहती हैं, “इस तरह से तो दहेजप्रथा और बाल विवाह का कानून भी असफल है। क्या उसे भी हटा दिया जाये। अगर सरकार इसे लागू कराने में असफल है तो यह व्यवस्था की चूक है। इससे यह साबित नहीं होता कि कानून गलत था।”

आखिर शराबबंदी के बाद बिहार में क्यों नशामुक्ति और जागरूकता जैसे उपायों पर काम नहीं किया गया, यह जानने के लिए न्यूजक्लिक ने पटना स्थित दिशा नशामुक्ति केंद्र की संचालिका राखी सिंह के बातचीत की तो उन्होंने बताया, “शुरुआत में इसकी योजना बनी थी। राज्य के सभी 38 जिलों में नशामुक्ति के लिए बेड रिजर्व किये गये थे। पटना में एनएमसीएच और पीएमसीएच में विशेष केंद्र पहले से संचालित थे। हम खुद मरीजों को वहां भेजा करते थे। मगर धीरे-धीरे ये केंद्र बंद होने लगे। कोविड के दौरान तो पूरी तरह बंद हो गये। इसलिए जिस बड़े पैमाने पर राज्य में नशामुक्ति अभियान की जरूरत थी, वह हो नहीं पाया।”

राखी कहती हैं, “जब तक शराबबंदी को सिर्फ कानून व्यवस्था का मसला समझा जायेगा, समाधान नहीं निकलेगा। अभियान चलाकर लोगों को नशामुक्ति के लिए प्रेरित करना होगा। शराब के खिलाफ अभियान चलाना होगा और साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि आखिर युवा क्यों नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। उनके खेलकूद, रोजगार और राज्य में ही बेहतर पढ़ाई के इंतजाम करने होंगे। यह सब एक दिन में नहीं होगा। मगर निरंतर प्रयास जारी रखना होगा।”

राखी आगे कहती हैं, “शराबबंदी के बाद हमने देखा है कि युवा शराब के बदले चरस, गांजा और भांग जैसे नशे की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। अगर युवाओं को नशे की लत से बचाना है तो पूर्ण नशाबंदी ही उपाय है।”

राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नशाबंदी के अभियान से सहमत हैं। उनकी तरफ से 2017 में ही पूर्ण नशाबंदी की बात कही गयी थी। मगर वे अपनी प्रशासनिक कमजोरियों और दूसरे उलझनों की वजह से इसे लागू नहीं करा पाये हैं। इन दिनों नकली शराब से लोगों की मौत के बाद वे एक बार फिर नये सिरे मे शराबबंदी अभियान को मजबूत तरीके से लागू करने की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि छठ के बाद बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जायेगा। मगर इस अभियान में भी वे नशामुक्ति की बात नहीं कर रहे।

बिहार में सबसे बड़ी दिक्कत स्वास्थ्य सुविधाओं में मैनपावर की कमी की है। राज्य में मनोचिकित्सकों की तो घोर कमी है, सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों के आधे से अधिक पद अभी भी खाली हैं। ऐसे में राज्य सरकार कहने के लिए तो वादा कर देती है कि हर सदर अस्पताल में नशामुक्ति केंद्र संचालित होगा और बेड रिजर्व होंगे, मगर वह व्यावहरिक रूप से लागू हो नहीं पाता है। राज्य सरकार अभियान मोड में रहती है। नशामुक्ति से चमकी बुखार, चमकी बुखार से बाढ़, बाढ़ से कोरोना, जब-जब जो संकट आता है, उसका गोल शिफ्ट होता रहता है। इसलिए कोई भी काम स्थायी रूप से नहीं हो पाता। अब देखना है कि इस आपदा के बाद बिहार सरकार का गोल जब शराबबंदी और नशामुक्ति की तरफ शिफ्ट होता है तो वह कितनी देर तक सक्रिय रहता है।

liquor ban
Bihar
Nitish Kumar
Poisonous liquor
Death by poisonous liquor

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License