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भारत
राजनीति
भाजपा की पार्टनर वीआईपी को यूपी चुनाव से पहले क्यों आई फूलन की याद?
“भाजपा पहले निषादों को लेकर चिंतित नहीं थी, लेकिन योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की सीट पर अजेयता के मिथक के टूट जाने के बाद भाजपा अब रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है।"
विजय विनीत
27 Jul 2021
भाजपा की पार्टनर वीआईपी को यूपी चुनाव से पहले क्यों आई फूलन की याद?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के महज कुछ ही महीने बाकी हैं, तो भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलाइंस (एनडीए) के पार्टनर मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को डकैत से राजनेता बनी दिवंगत फूलन देवी की अचानक याद आ गई। मुकेश बिहार के पशुपालन और मत्स्य मंत्री भी हैं। इसी दो जुलाई को उन्होंने अपनी पार्टी वीआईपी को यूपी में लांच किया था। सियासत में गहरी दखल रखने वालों को पता है कि यूपी में चाहे जो भी चुनाव हो, जातिवाद सभी समीकरणों पर भारी पड़ता है। जातियों के वर्चस्व के चलते ही इस राज्य में कई बड़े सियासी दल बन गए हैं। वीआईपी पहले बिहार में निषाद समुदाय का नेतृत्व करती थी और अब उसने यूपी पर निशाना साधा है।

पूर्व सांसद फूलन देवी की शहादत दिवस 25 जुलाई के दिन बनारस में हाईप्रोफाइल ड्रामा हुआ। यूपी में अपनी जड़ें जमाने का सपना लिए वीआईपी सुप्रीमो मुकेश साहनी यहां आए, लेकिन बाबतपुर एयरपोर्ट से ही बैरंग लौटा दिए गए। बनारस के राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप कुमार कहते हैं, “यूपी में भाजपा की नजर केवट-माझी-निषाद समुदाय के सात फीसदी वोटों पर है। इन जातियों का थोक वोट समाजवादी पार्टी की झोली में जाता रहा है। इन्हीं वोटों को बांटने के लिए भाजपा ने नए तरीके का खेल खेला। स्वर्गीय फूलन देवी की प्रतिमा पहले ही गढ़ ली गई थी। फूलन का शहादत दिवस आया तो इन जातियों के वोटों को बांटने के लिए बड़ी चालाकी से “नकली नायक” गढ़ने की चालाक कोशिश की गई। भाजपा के इशारे पर प्रशासन ने बेहद सधे अंदाज में वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी के साथ “नूराकुश्ती” का खेल खेला और बाद में उन्हें बैरंग लौट दिया। नूराकुश्ती का खेल तब तस्दीक हुआ जब प्रशासन ने वीआईपी के किसी कार्यकर्ता के खिलाफ धारा-144 के उल्लंघन तक में कार्रवाई नहीं की, लेकिन सपा के सांसद रहे जवाहर जायसवाल और उनके पुत्र गौरव जासवाल अर्दब में लेने के लिए उनके खिलाफ महामारी अधिनियम व अन्य गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। बनारस के छावनी क्षेत्र में जवाहर जासवाल का होटल रमाडा है और यहीं वीआईपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश साहनी को ठहराया जाना था। कितनी अचरज की बात है कि बनारस में जब पीएम-सीएम आते हैं और मजमा जुटता है तो कोरोना भाग जाता है। विपक्षी दल कोई कार्यक्रम आयोजित करते हैं तो पुलिस कोरोना गाइडलाइन का हथियार निकाल लेती है।”

बनारस से लौटने के बाद पटना में प्रेस कांफ्रेंस करते वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी ।

प्रदीप कहते हैं, “अपने देश में हर जाति ने अपना देवता बना लिया है। ऐसा देवता जिसकी प्रतिमा लगाकर थोक में वोट हथियाया जा सके। अगर प्रतिमा लग गई तो भी अच्छा और नहीं लगी तब तो बहुत ही अच्छा। यह तरीका इतना जादुई है कि समाज की बुनियादी जरूरतों पर सालों-साल चुप्पी साधने वाले कहीं भी अचानक नायक के रूप में खड़े हो जाते हैं। मूर्तियों की बात की जाए तो यह  खेल पहले बसपा खेलती थी और अब भाजपा खेल रही है।”

फूलन के बहाने यूपी में सियासत

वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी बनारस शहर के नजदीक सूजाबाद में जहां फूलन देवी की प्रतिमा लगना चाहते थे, उसी के पास पड़ाव पर भाजपा सरकार ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विशाल प्रतिमा लगवाई है। विधानसभा चुनाव नजदीक है तो यूपी की एक बड़ी आबादी को लुभाने के लिए बिहार में प्रचार-प्रसार के बल पर अपनी राजनीति चमकाने वाले मुकेश साहनी ने अचानक ऐलान कर दिया कि वह यूपी के 18 जनपदों– संत रविदासनगर, मिर्जापुर, गोरखपुर, महाराजगंज, प्रयागराज, औरैया, आगरा और बलिया आदि में फूलन की प्रतिमा लगवाई जाएगी। यह सब पहले से ही सुनियोजित था। फूलन का शहादत दिवस नजदीक आया तो चार दिन पहले प्रस्तावित सभी जिलों में प्रतिमाएं भेज भी दी गईं। दिलचस्प बात यह है कि प्रतिमाओं के जरिए वोटवैंक कब्जाने के जुगत में वीआईपी के लोग यह भूल गए कि अपने पार्टनर भाजपा सरकार से अनुमति लेना भी जरूरी है। फूलन की प्रतिमा लगवाने के लिए प्रशासन से विधिवत जमीन का आवंटन तक नहीं कराया गया। कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासन की अनुमति मिलने से पहले ही समूचे बनारस शहर में झंडे-बैनर और पोस्टर लगा दिए गए। इसी के साथ शुरू हो गया नूराकुश्ती का खेल। फूलन की प्रतिमा स्थापित करने के लिए प्रशासन को न तो अनुमति देनी थी और दी भी नहीं। प्रशासन ने सख्ती बरती तो वीआईपी के गिने-चुने अपने घरों में ही छिप गए। पत्रकार जमील अहमद कहते हैं, “फूलन देवी की प्रतिमा भले ही नहीं लगी पर भाजपा के पार्टनर वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी का मकसद पूरा हो गया।”

बनारस के सूजाबाद में चबूतरे पर रखी फूलन की प्रतिमा जिसे प्रशासन ने कर लिया था जब्त

फूलन देवी की प्रतिमा वीआईपी इसलिए सूजाबाद में लगाना चाहती थी क्योंकि यह स्थान पूर्वांचल के निषाद-केवटों की सियासत का गलियारा माना जाता रहा है। कुछ महीने पहले कांग्रेस ने निषाद समुदाय को लामबंद करने के लिए इनकी जागरुकता रैली निकाली तो सूजाबाद में ही मछुआरों की बड़ी पंचायत आयोजित की थी। जुल्म-ज्यादती के चलते डकैत के बाद नेता बनीं फूलन देवी को निषाद समाज अपना “आईकन” मानता आ रहा है। फूलन को नायिका बनाने की कवायद में यूपी में इस समुदाय के करीब एक दर्जन दल बन गए हैं। जिनमें निषाद पार्टी की तरह कुछ ताकतवर दल हैं तो प्रगतिशील समाज पार्टी और विकासशील इंसाफ पार्टी सरीके कागजी दल हैं। बनारस में फूलन देवी की प्रतिमा लगाने पर पाबंदी लगाकर भाजपा सरकार ने बड़ा संदेश दिया है। मिर्जापुर की सांसद रहीं फूलन देवी के साथ कदम से कदम मिलाकर काम कर चुके मुरारी लाल कश्यप कहते हैं, “भाजपा का राग हर कोई नहीं समझ सकता है। एक ओर वह फूलन देवी के कातिल शेर सिंह राणा को अपना स्टार प्रचाकर बनाती है और दूसरी ओर फूलन को अपना आईकन मानने वाली वीआईपी के साथ सियासी फायदे के लिए तालमेल करती है। भला एक घाट पर बाघ और बकरी दोनों पानी कैसे पी सकते हैं?”

मुरारी यह भी कहते हैं कि पीएम-सीएम आते हैं तो कोरोना बनारस से भाग खड़ा होता है और विपक्षी दल अपना कार्यक्रम करना चाहता है तो महामारी कानून पुलिस के लिए हथियार बन जाता है। यूपी में वीआईपी का पदार्पण भाजपा की सोची-समझी साजिश है। वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी अपने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मछुआरा समाज के लिए अनुसूचित जाति का आरक्षण नहीं मांगते और यूपी में आते हैं तो यह जुमला उछाल देते हैं। मुकेश के साथ बनारस में 50 लोग भी नहीं हैं। क्रांतिकारी महिला फूलन को अपमानित कर वीआईपी के लोग अपनी सियासत चमकाना चाहते हैं। अगर फूलन की प्रतिमा सचमुच लगवानी होती तो अपने पार्टनर भाजपा से तलमेल बैठाकर आती। मुकेश साहनी पुराने भाजपाई नेता हैं। इस पार्टी से वह चुनाव भी लड़ चुके हैं। वह भाजपा के एजेंट हैं और उनके लिए सियासी मैदान तैयार करने यहां आए थे ताकि मछुआरा समाज के वोटों को खुर्द-बुर्द कर सकें क्योंकि इस समाज के लोग अब भाजपा को बाय-बाय कर चुके हैं। फूलन देवी के शहादत दिवस के दिन हाईप्रोफाइल ड्रामा वीआईपी और भाजपा की सेटिंग-गेटिंग से खेला गया। इस  ड्रामे में विलेन की भूमिका पुलिस वालों ने निभाई।” हालांकि बनारस के एसीपी दिनेश सिंह बताते हैं, “वीआईपी ने जिला प्रशासन और पुलिस कमिश्नरेट से प्रतिमा लगाने और कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं ली थी। हम प्रतिमा को रामनगर थाने ले गए थे। बाद में वीआईपी के पदाधिकारियों को सूचित किया कि जिले में सीआरपीसी की धारा 144 लागू कर दी गई है। शासन की अनुमित के बगैर किसी सरकारी भूमि पर प्रतिमा रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। माफी मांगने के बाद वीआईपी के जिलाध्यक्ष सुचित साहनी 23 जुलाई 2021 को प्रतिमा को पटना ले गए।”

विवाद बढ़ने पर छावनी बन गया था सूजाबाद

वीआईपी ने हाल ही में लौटन राम निषाद को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नियुक्त किया है। ये पहले समाजवादी पार्टी में थे। लौटन कहते हैं, “हम यूपी के 18 जिलों में “बैंडिट क्वीन” की प्रतिमाएं लगाकर उनकी याद को चिरस्थायी बनाना चाहते हैं। फूलन का गरिमामय जीवन और उनका संघर्ष महिलाओं के लिए प्रेरणादायी है।”   

लौटन राम यह भी बताते है, “मुंबई के कलाकारों ने बिहार में वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी के आवास प्रतिमाएं गढ़ी थी, लेकिन यूपी सरकार ने उन्हें लगाने की अनुमति नहीं दी। सुनहरे रंग में रंगी और 18 फीट ऊंची प्रतिमाओं को 21 जुलाई को यूपी के 18 जिलों में भेजा गया था। पुलिस ने सभी प्रतिमाओं को फिर से बिहार भिजवा दिया है।”

सिर्फ बनारस ही नहीं, बांदा में भी फूलन देवी की प्रतिमा लगाने की तैयारी चल रही थी, लेकिन माहौल बिगड़ने की आशंका बताकर पुलिस ने मूर्तियां जब्त कर ली और जिलाध्यक्ष मुकेश निषाद को गिरफ्तार कर लिया। इस प्रतिमा को चिल्ला कस्बे में यमुना किनारे एक पार्क में स्थापित करने की योजना थी। बनारस समेत यूपी के प्रस्तावित जिलों में फूलन देवी की प्रतिमा न लगाए जाने के बाबत वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी का पक्ष जानने की कोशिश की गई तो सीधी बात करने के बजाए अपने निजी सचिव के जरिए एक प्रेसनोट और कुछ तस्वीरें भिजवा दीं। हालांकि बनारस में वीआईपी के जिलाध्यक्ष सुचित साहनी इन आरोपों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत बताते हैं। वह कहते हैं, “उनकी पार्टी भाजपा का हित साधने के लिए यूपी में नहीं आई है। वीआईपी फूलन देवी को वीरांगना मानती है और उनकी नीतियों पर चलते हुए आगे बढ़ रही है। यूपी में वीआईपी के पदार्पण को सिर्फ सियासी चश्मे से देखा जाना ठीक नहीं है।”

यही स्थापित की जानी थी फूलन की प्रतिमा

कौन थीं फूलन देवी?

 फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को यूपी में जालौन के घूरा का पुरवा में हुआ था। गरीब और ‘छोटी जाति’ में जन्मी फूलन में पैतृक दब्बूपन नहीं था। उन्होंने अपनी मां से सुना था कि चाचा ने उनकी जमीन हड़प ली थी। दस साल की उम्र में वह अपने चाचा से भिड़ गई। जमीन के लिए धरना दिया। तब चचेरे भाई ने उनके सिर पर ईंट मार दी। बाद में इस गुस्से की सजा फूलन को उसके घरवालों ने भी दी। फकत दस साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। वह भी अपने से 30-40 साल बड़े आदमी से। 16 साल की उम्र में कुछ डाकुओं ने उनका अपहरण कर लिया। उसके बाद ही उनका डाकू बनने का रास्ता बन गया था। फूलन ने 14 फ़रवरी 1981 को बहमई में 22 जातिवादी सामंतों की हत्या कर दी थी। इस घटना ने फूलन देवी का नाम बच्चे की ज़ुबान पर ला दिया था। फूलन देवी का कहना था कि दबंग सामंतों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया था जिसका बदला लेने के लिए ही उन्होंने ये हत्याएं कीं।

एक्टिविस्ट डा. लेनिन रघुवंशी कहते हैं, “फूलन देवी ने घोर जातिवादी और सामंती समाज के खिलाफ विद्रोह किया। इसलिए सामंतों के साथ मिलकर पुलिस फूलन के पीछे पड़ गई। मीडिया ने उन्हें नया नाम दिया-बैंडिट क्वीन। फूलन का विरोध करने वाले एक तरह से भारतीय संविधान के विरोधी हैं क्योंकि संविधान हर किसी को इज्जत के साथ जीने का अधिकार देता है और खुरचकर देखेंगे तो ऊंची जातियों के ज्यादातर लोग मनुस्मृति के समर्थन में खड़े नजर आते हैं। ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकारने और बिना क्षमा याचना के एक ओर वीआईपी के मुकेश साहनी और दूसरी ओर शमशेर सिंह राणा को स्टार प्रचारक बनाना एक तरह से अन्याय को भेड़ की खाल में छिपे शातिर भेड़िये को आगे बढ़ना है।”

फूलन कैसे बनीं नेता?

फूलन देवी ने बेहमई कांड को अंजाम दिया तो उसकी कीमत तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह को अपनी कुर्सी छोड़कर चुकानी पड़ी। बाद में एमपी के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने फूलन ने आत्म-समर्पण किया। उस समय उन पर हत्या के 22,  डकैती के 30 और अपहरण के 18 अपहरण केस दर्ज थे। बाद में इन्हें 11 साल जेल काटनी पड़ी। फिर मुलायम सिंह की सरकार ने साल 1993 में फूलन पर सभी आरोप वापस ले लिए। साल 1994 में वह जेल रिहा हुईं और फिर उम्मेद सिंह से शादी रचा ली।

साल 1996 में फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ा और जीत गईं। मिर्जापुर से सांसद बनीं। दूसरी मर्तबा साल 1998 में वह चुनाव हार गईं और साल 1999 में मिर्जापुर से ही लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बनीं।

वहीं से जीत गईं। 25 जुलाई 2001 को शमशेर सिंह राणा फूलन से मिलने आया। फूलन के संगठन ‘एकलव्य सेना’ से जुड़ने की इच्छा जताते हुए पहले खीर खाई  और फिर घर के गेट पर बेहमई हत्याकांड के बदला लेने के लिए फूलन देवी को गोलियों से उड़ा दिया। 14 अगस्त 2014 को दिल्ली की एक अदालत ने शमशेर सिंह राणा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अगर बलात्कार फूलन देवी बनाता तो देश में हजारों फूलन देवियां घूम रही होतीं। ये पूरी ‘मर्दवादी संस्कृति’ की पैदाइश है।

निषाद वोटों की सियासत क्यों?

यूपी में गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद, फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या काफी अधिक है। इन जिलों में सात से 14 फीसदी आबादी मल्लाह, केवट और निषाद जातियों की है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की करीब बीस सीटें और विधानसभा की 60 के करीब ऐसी सीटें हैं जहां हार-जीत का फैसला निषाद जातियों के लोग करते हैं।

यूपी में जोर पकड़ रही निषाद बनाम निषाद की सियासत में बीजेपी अपने राज्यसभा सांसद जय प्रकाश निषाद को बढ़ावा दे रही है। इन्हें हाल में ही मछुआरा प्रकोष्ठ का राज्य संयोजक नियुक्त किया गया है। बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एके लारी कहते हैं, “आगले साल विधानसभा चुनाव होना है। यूपी में ताकतवर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद का मुकाबला करने के लिए भाजपा ने यह कदम उठाया है। संजय काफी दिनों से विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा नेतृत्व के साथ सौदेबाजी में जुटे हैं। वह गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तक से मिल चुके हैं। निषाद पार्टी के मुखिया को पटखनी देने के लिए भाजपा ने पहले जय प्रकाश निषाद का कद बढ़ाया और बाद में मछुआरा समाज का वोट बांटने के लिए चुपके से वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी को बिहार से बुलवाकर नूराकुश्ती करा दी। भाजपा अब इसलिए संजय निषाद को पटखनी देने के मूड में हैं क्योंकि वह संत कबीर नगर से भाजपा सांसद अपने बेटे प्रवीण निषाद के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद और केंद्रीय मंत्रिमंडल में सीट की मांगी थी जिसे पूरा करने में भाजपा के पसीने छूट रहे थे। प्रवीण निषाद तब से सुर्खियों में हैं जब साल 2018 में गोरखपुर लोकसभा सीट पर सपा के टिकट से भाजपा प्रत्याशी को बुरी तरह हरा दिया था। इस सीट से पहले योगी आदित्यनाथ चुनाव लड़ते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी।”   

पूर्वांचल में मछुआरा समुदाय की जनसांख्यिकीय संरचना के साथ-साथ उनके इतिहास के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यूपी में करीब 7 फीसदी निषाद मतदाता हैं। पत्रकार सुनील कश्यप कहते हैं, निषादों को "गंगापुत्र" के रूप में भी जाना जाता है। इनकी आजीविका नदियों और जल निकायों के आसपास केंद्रित है। उनमें से कुछ  नाविक-मछुआरे हैं तो कुछ जाल बुनने वाले। निषाद समुदाय के लोगों ने आर्यों, मुगलों और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसलिए उन्हें एक आपराधिक जाति मान लिया गया। सच यह है कि मछुआरा समाज शांतिपूर्ण जीवन जीता रहा है और हर किसी के दुख-सुख में शरीक होता रहा है। किंवदंदियों की मानें तो लंगा फतह करने जा रहे राम-लक्षमण की नैया केवटों ने ही पार लगाई थी। मछुआरा समाज की माली हालत दलितों से भी बदतर है। इसके बावजूद इन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया।”

1990 के दशक तक निषाद समुदाय के अंतर्गत आने वाले समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया था, लेकिन मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने के बाद, निषाद समुदाय की "सबसे अधिक आबादी वाली उप-जातियां- केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप को पिछड़ी” ओबीसी के रूप में पुनर्वर्गीकृत किया गया। दिसंबर 2016 में, सपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने 17 ओबीसी जातियों को, जिनमें से कुछ निषाद भी थे, अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का आदेश पारित किया, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस आदेश पर रोक लगा दिया। निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद कहते हैं, "हमारी प्राथमिक मांग अनुसूचित जाति कोटे के तहत आरक्षण पाना है और हम अपनी संख्या के अनुपात में सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं।"

संजय दावा करते हैं, "गोरखनाथ मंदिर उनके समुदाय का है क्योंकि इसके संस्थापक मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे, जो ‘निषाद’ थे। पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डी गामा और इतालवी खोजकर्ता क्रिस्टोफर कोलंबस भी मछुआरा समाज के पूर्वज रहे।” संजय निषाद के दावों को ऐतिहासिक दस्तावेज कितना प्रमाणित करते हैं, यह अभी शोध का विषय है, लेकिन वह जो कहना चाहते हैं, निषाद समुदाय उसे पूरी तरह स्वीकार कर चुका है।

निषाद वोटों के लिए भाजपा परेशान क्यों?

हिन्दुत्व को अपनी ढाल बनाने वाली भाजपा की चिंता इस बात से है कि निषाद और यादव नेताओं का गठबंधन यूपी में जातीय गणित बिगाड़ने में सक्षम है। पत्रकार आकाश यादव कहते हैं, “भाजपा पहले निषादों को लेकर चिंतित नहीं थी, लेकिन योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की सीट पर अजेयता के मिथक के टूट जाने के बाद भाजपा अब रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है। शायद इसीलिए वह वीआईपी मुखिया मुकेश साहनी को बुलाकर इन जातियों के वोटरों को छिन्न-भिन्न करना चाहती है।”

मछुआरों पर डोरे डालने की कवायद

निषाद समुदाय और उसकी उप-जातियों के वोटरों को रिझाने के लिए भाजपा ने सांसद जयप्रकाश निषाद को राज्य में निषाद बहुल निर्वाचन क्षेत्रों का सफर तय करने और भाजपा के समर्थन में खड़ा करने के लिए निर्देश दिया है। निषाद समुदाय के साथ इनकी 16 उपजातियां हैं। इनमें कहार, कश्यप, केवट, निषाद, बिंद, भर, राजभर, बाथम, गौर, तुरा, मांझी, मल्लाह, धीमर, धीवर आदि हैं जो अनुसूचित जाति में सूचीबद्ध होने के लिए सालों से आवाज बुलंद कर रहे हैं। पत्रकार राजीव सिंह कहते हैं, “निषादों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति दलितों की तुलना में बेहतर नहीं है, हालांकि वाराणसी समेत समूचे पूर्वांचल में इनकी राजनीतिक उपस्थिति काफी मजबूत है।”

वाराणसी के जाने-माने चिंतक और साहित्यकार रामजी यादव कहते हैं, “वक़्त कैसे करवट बदलता है और हमारे नेताओं की भाषा व चरित्र कैसे बदल जाते हैं,  यह फूलन देवी के नाम से जाहिर होता है। जिस महिला के नाम का इस्तेमाल सत्ता कब्जाने के लिए किया जा रहा है, लेकिन उनके कुनबे की खोज-खबर कोई नहीं ले रहा है। फूलन का परिवार तंगहाली में जीवन-यापन कर रहा है, लेकिन उनके नाम पर सियासत चमकाने वाले उनके नाम का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ रहे हैं।”

रामजी यह भी कहते हैं, “महिलाओं का पुरुष सत्ता को ललकारना असभ्यता है, जिसकी परिणीति उसके सामाजिक बहिष्कार में ही होती है। फूलन बहुत ताकतवर थीं, इसलिए उनका समाज उनके अंदर अपना उत्तर ढूंढता नजर आ रहा है। अपने ऊपर अत्याचार के कारण मरने के बजाये लड़ना और प्रतिरोध करना अपने जीवन का उद्देश्य बनाया, जो आज की परिस्थितियों में महिलाओं में सम्मान और स्वाभिमान जगाने के लिए आवश्यक है। समाज में फेमिनिज्म की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन फूलन के ऊपर हुए अत्याचार के बाबत आज तक न कोई रपट दर्ज हुई है और न ही स्त्री आंदोलन की कोई मांग उठी। फूलन की ज्वलंतता इस बात में है कि वे जिंदा लाश नहीं बनीं। ख़त्म नहीं हुई और न ही उन्होंने अपनी जिंदगी को ख़त्म समझ लिया। शायद इसीलिए वह एक लीजेंड बन गईं। सामंतवादी समाज में औरत की दशा ऐसे ही होनी है, चाहे वह किसी भी जाति की हो। उम्मीद है कि फूलन के जीवन संघर्ष से लाखों महिलाओं को समाज में आत्म-सम्मान से जीने की ताकत मिलेगी।”

(बनारस स्थित विजय विनीत वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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