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भारत
राजनीति
एनआरसी पर जदयू ने अपना स्टैंड साफ क्यों किया?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार की दरकती ईमेज को बचाने के लिहाज से ही केसी त्यागी को सार्वजनिक तौर पर एनआरसी पर पार्टी का रुख स्पष्ट करना पड़ा। जदयू मुस्लिम वोटरों का विश्वास हासिल करना चाहता है, इसलिए उसने अपना नजरिया साफ किया है।
उमेश कुमार राय
14 Nov 2019
nitish kumar

पिछले दिनों जदयू की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद पार्टी के महासचिव केसी त्यागी ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप (एनआरसी) को लेकर अपना स्टैंड साफ करते हुए कहा कि बिहार में कोई भी बाहरी (घुसपैठी) नहीं है।

उन्होंने अपने बयान में किशनगंज का खास तौर पर जिक्र करते हुए कहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने किशनगंज या बिहार के दूसरी जगहों पर एनआरसी लागू करने को लेकर कोई आदेश दिया है?

उन्होंने आगे कहा कि असम में एनआरसी लागू हुआ, तो वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ। ऐसे में बिहार में एनआरसी लागू करने की मांग का कोई अर्थ नहीं है। इससे जदयू का कोई मतलब नहीं है।

यहां ये भी बता दें कि किशनगंज विधानसभा सीट पर हाल ही में उपचुनाव हुआ है, जहां असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के कमरूल हुदा ने कांग्रेस को पछाड़ कर जीत दर्ज की है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में सीट पर जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार तीसरे नंबर पर चली गई।

करीब 70 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले किशनगंज में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की जीत ने न केवल राजद व कांग्रेस को सकते में डाल दिया है बल्कि इससे जदयू नेताओं के माथे पर भी बल पड़ गए हैं। यही वजह है कि केसी त्यागी को एनआरसी का जिक्र करते हुए किशनगंज का भी नाम लेना पड़ा।

दरअसल, सीमांचल में बिहार के चार जिले आते हैं। इन जिलों में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। भाजपा यहां वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है और यही वजह है कि गिरिराज सिंह जैसे नेता सीमांचल को आतंक का अड्डा तक बताते रहे हैं।

हाल ही में घुसपैठ का मुद्दा उठा कर राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने सीमांचल में एनआरसी लागू करने की मांग की थी। इसके बाद गिरिराज सिंह समेत अन्य नेताओं ने भी यही मांग दोहराई। लेकिन, इस मुद्दे पर जदयू ने अपना रुख साफ नहीं किया। किशनगंज सीट पर जब उप-चुनाव हुआ, तो एआईएमआईएम ने एनआरसी को मुद्दा बना कर चुनाव प्रचार किया, जबकि कांग्रेस, जदयू ने इस पर चुप्पी साधे रखा। ओवैसी की पार्टी को इसका फायदा भी मिला और पहली बार उनकी पार्टी ने हिन्दी प्रदेश में अपना खाता खोला।

2020 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी बिहार की सभी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे, लेकिन सीमांचल की सीटों पर उनका सबसे ज्यादा फोकस रहेगा।

किशनगंज की सीट पर जीत को लेकर कमरूल हुदा से बात हुई, तो उनका कहना था, “एनआरसी को सबसे पहले कांग्रेस ही लेकर आई। भाजपा इसे अब लागू कर रही है। अगर बिहार में एनआरसी लागू होता है, तो कांग्रेस को इसके खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। हमलोग ही इस पर बोलेंगे।”

किशनगंज की सीट पर ओवैसी की पार्टी की जीत से पता चलता है कि मुस्लिम राजद, कांग्रेस या जदयू के विकल्प के रूप में ओवैसी की पार्टी को देख रहे हैं और इसका सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं तीन पार्टियों को झेलना होगा।

हालांकि, जदयू विधायक मुजाहिद आलम कहते हैं कि ओवैसी की पार्टी कांग्रेस की कमजोरी के कारण किशनगंज में जीती है और बिहार का मुस्लिम तबका ओवैसी को अपना नेता नहीं मानता है।

उन्होंने एनआरसी को लेकर कहा, “इस मुद्दे पर जदयू व सीएम नीतीश कुमार का रुख साफ है और इससे समझौता नहीं किया जाएगा। अलबत्ता उन्होंने ये जरूर माना कि भाजपा के आक्रामण रुख के कारण जदयू के अल्पसंख्यक वोटबैंक पर कुछ असर हो रहा है, लेकिन ये भी माना कि गिरिराज सिंह जैसे नेताओं को अब लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं।”

सीमांचल में विधानसभा की 24 सीटें हैं, जबकि लोकसभा की चार सीटें आती हैं। इन सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक होते हैं, अगर वे एकमुश्त किसी एक उम्मीदवार के पास चले जाएं। सीमांचल में कांग्रेस व राजद पॉपुलर रही है। लेकिन, इस साल के आम चुनाव में चार में से दो सीटें जदयू के खाते में गई थीं और एक पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया। एक सीट किशनगंज पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। लेकिन, किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में ओवैसी की पार्टी की जीत के बाद अब समीकरण बदलते दिख रहे हैं।

वर्ष 2005 में नीतीश कुमार जब बिहार के सीएम बने, तो सरकार में भाजपा के सहयोगी होने के बावजूद उन्होंने अपनी सेकुलर छवि को भरसक बरकरार रखने की कोशिश की और इसमें सफल भी रहे। मुस्लिमों के एक वर्ग में उनकी अच्छी ईमेज भी बनी, लेकिन हाल के वर्षों में बिहार में बढ़े दंगों व सरकार की लाचारी के चलते उनकी छवि को नुकसान हुआ है।

एनसीआरबी की हालिया जारी रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017 में देशभर में सबसे ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे बिहार में दर्ज किए गए। हाल ही में जहानाबाद में मूर्ति विसर्जन को लेकर दो समुदायों में हिंसक झड़प हो गई थी जिसमें 40 से ज्यादा दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया था। हालत ऐसी हो गई थी कि दो हफ्ते तक इलाके में धारा 144 लगाना पड़ा था।

इसी महीने पटना में भी मूर्तियों के विसर्जन को लेकर दो पूजा समितियों के बीच हुई झड़प ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया था। उस पर बिहार में एनआरसी की मांग पर चुप्पी ने मुस्लिमों में एक खौफ भर दिया है। उन्हें लगता है कि एनआरसी के जरिए उनकी नागरिकता खत्म कर दी जाएगी। यही वजह है कि वे दूसरे विकल्प की तलाश में हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार की दरकती ईमेज को बचाने के लिहाज से ही केसी त्यागी को सार्वजनिक तौर पर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप (एनआरसी) पर पार्टी का रुख स्पष्ट करना पड़ा। जदयू मुस्लिम वोटरों का विश्वास हासिल करना चाहता है, इसलिए उसने अपना नजरिया साफ किया है।

जदयू के एक नेता ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “ओवैसी की पार्टी की किशनगंज में जीत नीतीश कुमार की सेकुलर नेता की छवि पर भी धक्का है। भाजपा के साथ रहते हुए भी नीतीस कुमार अपनी छवि सेकुलर रखने के लिए कई मुद्दों पर खुले तौर पर भाजपा के स्टैंड के खिलाफ बोलते थे। लेकिन, लोकसभा चुनाव में भाजपा की दमदार जीत के बाद मुस्लिमों से ताल्लुक रखनेवाले कई मुद्दों पर पार्टी के आलाकमान ने चुप्पी साध रखी थी। एनआरसी भी ऐसा ही मुद्दा था। लेकिन, पार्टी को अब इस चुप्पी के नुकसान का अहसास हुआ है, इसलिए वह कोर्स करेक्शन कर रही है।”

गौरतलब हो कि सीमांचल भाजपा के लिए ऐसा इलाका रहा है, जिसका जिक्र कर वह वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करती रही है और उसे इसका फायदा भी मिला है।

पिछले साल सीमांचल की अररिया लोकसभा सीट पर जब उपचुनाव की तैयारी चल रही थी, तो भाजपा के वरिष्ठ नेता नित्यानंद राय ने कहा था कि अगर राजद उम्मीदवार सरफराज आलम जीत जाते हैं, तो अररिया आईएसएआईएस के लिए सुरक्षित स्थान बन जाएगा।

लेकिन, उस चुनाव में राजद उम्मीदवार की जीत हुई थी। इस जीत पर गिरिराज सिंह ने कहा था, “सरफराज आलम की जीत ने कट्टरपंथी विचारधारा को जन्म दिया है।” दूसरे नेताओं ने भी ऐसे ही बयान दिए थे। इस साल हुए आम चुनाव में भाजपा को इसका फायदा मिला और अररिया सीट भाजपा ने राजद से छीन ली। हालांकि, इस सीट पर भाजपा पहले भी जीतती रही है।

1998 में भाजपा के टिकट पर रामजी दास ऋषिदेव ने और वर्ष 2004 के चुनाव में सुकदेव पासवान ने जीत दर्ज की थी। वर्ष 2009 में भाजपा ने प्रदीप कुमार सिंह को टिकट दिया था। उन्होंने भी पार्टी की जीत बरकरार रखी, लेकिन 2014 के मोदी लहर के बावजूद भाजपा ये सीट हार गई थी।

वैसे सीमांचल की लोकसभा सीटों पर भाजपा जीतती आई है, लेकिन विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है।

अररिया की तरह सीमांचल की कटिहार लोकसभा सीट पर भाजपा तीन बार लगातार जीती थी, लेकिन 2014 की मोदी लहर में से हार का मुंह देखना पड़ा था और एनसीपी के तारिक अनवर ने यहां से जीत दर्ज की थी। वर्ष 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने ये सीट जदयू को दे दी थी। जदयू ने इस सीट से जीत हासिल की।

किशनगंज लोकसभा सीट पर भाजपा सिर्फ एक बार वर्ष 1999 में जीत दर्ज कर पाई। पूर्णिया लोकसभा सीट पर भी भाजपा तीन बार जीत दर्ज कर चुकी है। लेकिन, विधानसभा चुनाव में सीमांचल की दो दर्जन सीटों में से भाजपा 20 प्रतिशत से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज नहीं कर सकी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा और जदयू चूंकि मिल कर चुनाव लड़ेंगे, इसलिए सीटों का जब बंटवारा होगा, तो जदयू सीमांचल की अपने खाते की सीटों के लिए प्रचार में एनआरसी जैसे मुद्दों पर स्पष्ट रुख रखेगा और संभव है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रचार में भाजपा नेताओं को शामिल नहीं भी कर सकते हैं। अगर करता भी है, तो वो चाहेगा कि एनआरसी जैसे मुद्दे को भाजपा न उछाले।

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