NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका को ईरान से घृणा क्यों है?
ईरान के नेतृत्वकारी ये जानते हैं कि ईरान संयुक्त राज्य अमेरिका या उसके सहयोगियों के हमले का सामना नहीं कर सकता।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
24 Jan 2020
Iran-US

शाह के शासनकाल (1941-1979) के दौरान ईरान के साथ अमेरिका के संबंधों में ऐसी कोई नफरत नहीं थी। जब एक राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री, मोहम्मद मोसद्दिक, 1951 और 1953 के बीच सत्ता में आए और जब उन्होंने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने की धमकी दी, तो CIA, शाह और जनरल फ़ज़लुल्लाह ज़ाहेदी के नेतृत्व में ईरानी सेना का दक्षिणपंथी गुट उनके ख़िलाफ़ हो गए। लेकिन तब भी, उन्होंने ईरानी लोगों को नहीं बल्कि कम्युनिस्टों को खतरे के रूप में देखा। उस दौर में सऊदी राजाओं और ईरानी शाह ने मिलकर लोकप्रिय आंदोलनों और कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई; जनता के बीच के शिया-सुन्नी विभाजन से उन्हें कोई परेशानी नहीं थी।

संयुक्त राज्य अमेरिका, सउदी राजाओं और खाड़ी के अरबियों के भड़कने का कारण इस क्षेत्र में 1970 के दशक के अंत में बढ़ रहा उन्माद था, जिसमें अफ़ग़ानिस्तान की क्रांति (1978) और ईरान की क्रांति (1979), 1979 में इस्लामाबाद, पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास का अधिग्रहण और 1979 में सऊदी अरब की मुख्य मस्जिद का अधिग्रहण शामिल था। ये राजशाही विरोधी और अक्सर मार्क्सवादी लहरों का उदय था जिससे अमेरिका और सऊदी भड़क उठे। इन लहरों को नष्ट करना ज़रूरी था।

यही कारण है कि पश्चिमी देशों और खाड़ी के अरबियों ने सद्दाम हुसैन को सितंबर 1980 में ईरान पर हमला शुरू करने के लिए पैसा दिया। ये युद्ध जिसने ईरान को अत्यंत रूप से प्रभावित किया 1988 तक चला। युद्ध के दौरान, तेहरान में शुक्रवार की प्रार्थना अक्सर ईरान के सर्वोच्च नेता, अली ख़ामेनेई, के नेतृत्व में होती थी। 17 जनवरी को शुक्रवार की प्रार्थना में, ख़ामेनेई ने बड़ी कड़वाहट के साथ उस युद्ध का उल्लेख किया। उन्होंने ईरान की जनता से पूछा कि वे पश्चिम पर कैसे भरोसा कर सकते हैं जबकि वे बख़ूबी जानते हैं जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों ने ही सद्दाम हुसैन को उनके विनाश के हथियारों के लिए पैसा और सामान दिए थे।

युद्ध के दौरान, ख़ामेनेई के वरिष्ठ, अयातुल्ला खुमैनी ने अपने मंत्री मोहसिन राफिद्दोस्त से कहा था कि ईरान के लिए सरसों गैस का उत्पादन और परमाणु हथियारों के बारे में बात तक करना वाजिब नहीं है। खुमैनी ने राफिद्दोस्त से पूछा था कि ‘यदि हम रासायनिक हथियारों का उत्पादन करते हैं’ तो ‘मुझ में और सद्दाम में क्या फ़र्क़ रह जाएगा?’ अक्टूबर 2003 में अली ख़ामेनेई ने सामूहिक विनाश के हथियारों के ख़िलाफ़ फतवा सुनाते हुए खुमैनी के शब्दों को दोहराया था। अली ख़ामेनेई ने कई बार कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने वाला पश्चिम नहीं बल्कि ईरान की अपनी धार्मिक प्राथमिकता है।

ईरान का परमाणु एजेंडा प्रमुख मुद्दा नहीं था; असल मुद्दा ईरान को अधीन बनाना था, इसे प्रभावहीन कर पश्चिम एशिया के लिए अप्रासंगिक बनाना था।

image 1_8.JPG

<न्यूशा तवाकोलियन, फिर से मैं ठंड में खड़ी हूँ, अकेले 2010>

ईरान ने हाइब्रिड युद्ध से ख़ुद का बचाव कैसे किया है?

2001 और 2003 के बीच अमेरिका ने ईरान के विरोधियों— तालिबान और सद्दाम हुसैन— के ख़िलाफ़ दो युद्ध लड़े। उनकी हार ने ईरान को पूरे क्षेत्र में अपने पंख फैलाने का हौसला दिया। इन युद्धों की रणनीतिक त्रुटि को स्वीकार करते हुए, अमेरिका ने ईरान को फिर सीमाबद्ध करने का त्वरित काम किया। अमेरिका ने 2005 के सीरिया जवाबदेही अधिनियम और बाद में 2011 से सीरिया पर युद्ध के माध्यम से ईरान और सीरिया के संबंध को कमजोर करने की कोशिश की, और लेबनान पर 2006 के इजरायली हमले के माध्यम से लेबनानी राजनीतिक दल हिज़्बुल्लाह को ध्वस्त करने की कोशिश की।

दोनों कोशिशें नाकाम रहीं। 2006 में, अमेरिका ने ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर संकट गढ़ा और सुनिश्चहित किया कि अमेरिका समेत संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ईरान की अर्थव्यवस्था के खिलाफ प्रतिबंध लागू करें। जब ये भी काम नहीं किया तो 2015 में अमेरिका एक परमाणु समझौते के लिए सहमत हुआ (जिसे ट्रम्प ने अब अस्वीकार कर दिया है)। उस समय ईरान की जनता ने पूछा, क्या अब सर्दियां ख़त्म हो गयीं? नहीं। हाइब्रिड युद्ध जारी रहा।

image 2_5.JPG
<कवेह गुलिस्तां, अबादान के पास सामने की तरफ मुल्ला, इराक-ईरान युद्ध, 1983>

1980 में ईरानियों ने क़ुद्स बल— क़ुद्स यरूशलेम का अरबी नाम है— बनाया था। इस बल का उद्देश्य घेरे जा चुके ईरान के लिए क्षेत्रीय संबंध विकसित करना था। अपने प्रारंभिक वर्षों में क़ुद्स बल ने पश्चिमी हितों के खिलाफ और मोहम्मद नजीबुल्लाह की अफगान कम्युनिस्ट सरकार पर हमले सहित क्षेत्रीय वामपंथियों के खिलाफ भी अभियानों में भाग लिया। लेकिन पिछले एक दशक में, मेजर जनरल क़ासम सुलेमानी और इराक-ईरान युद्ध के अन्य दिग्गजों के नेतृत्व में, क़ुद्स बल ने ज़्यादा सटीक एजेंडा विकसित किया है।

ईरान के नेतृत्वकारी ये जानते हैं कि ईरान संयुक्त राज्य अमेरिका या उसके सहयोगियों के हमले का सामना नहीं कर सकता; अमेरिकी क्रूज मिसाइलों और बमों के बैराज ईरान के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा कर सकते हैं। इस तरह के युद्ध से बचना ज़रूरी है। उत्तर कोरिया के विपरीत, ईरान के पास न तो परमाणु कवच है और न ही बनाने की क्षमता या इच्छा है; दूसरी ओर, इराक और लीबिया— जिन्होंने बड़े पैमाने पर अपने विनाशकारी हथियार छोड़ दिए— के उदाहरण दिखाते हैं कि उन देशों को क्या किया जा सकता है जिनके पास कोई परमाणु निवारक नहीं है। न तो इराक और न ही लीबिया पश्चिम के लिए किसी तरह का ख़तरा थे, फिर भी दोनों देशों को नष्ट कर दिया गया। क़ुद्स बल ने ही ईरान पर पश्चिम के एक हमले के खिलाफ आंशिक निवारक तैयार किया था।

सुलेमानी के क़ुद्स बल ने लेबनान से अफगानिस्तान तक ईरान के समर्थक समूहों के साथ संबंध बनाये और उन्हें आम सैनिक बल तैयार करने का प्रोत्साहन और समर्थन दिया। सीरिया पर युद्ध इन समूहों के लिए एक परीक्षण का आधार था। अगर ईरान पर किसी भी तरह से हमला किया जाता है तो ये समूह अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने के लिए तैयार हैं। सुलेमानी की हत्या के बाद, ईरानियों ने कहा है कि अगर उन पर और हमला किया गया, तो वे दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) और हाइफ़ा (इज़राइल) को नष्ट कर देंगे। ईरान की कम दूरी की मिसाइलें दुबई को ध्वस्त कर देंगी; और हिज़्बुल्लाह हाइफ़ा पर हमला करेगा। इसका मतलब है कि ईरान पर किसी भी तरह की बमबारी की सूरत में संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों को पूर्ण रूप से क्षेत्रीय गुरिल्ला युद्ध का सामना करना होगा। ये आम सैनिक बल ही ईरान के रक्षक हैं। इसी कारण से ट्रम्प ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध से संकोच कर रहा है; लेकिन वो लंबे समय तक इस संकोच में शायद न रहे।

image 3_3.JPG
<मेघदाद लूर्पुर, आदेशिर सिंहासन, 2018>

ईरान की राजनीति संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों (इज़राइल और सऊदी अरब) के भारी दबाव से परिभाषित होती है। 1979 की ईरानी क्रांति के बहुत से आयामों में एक ईरानी वामपंथ भी था, जो अब मौजूद नहीं है (सईद सुल्तानपुर अपनी पीढ़ी के अन्य वामपंथियों की तरह 1981 में मार दिए गए थे)। इराक में, कम्युनिस्ट धीरे-धीरे फिर से उभरे हैं, और 2011 के बाद से सरकार व उसकी IMF निर्धारित नीतियों के ख़िलाफ़ विद्रोह में शामिल हैं। ‘हम स्वदेश चाहते हैं’— इराकियों ने अपने हालिया विरोधों में जताया। लेबनान से लेकर अफगानिस्तान तक लोग यही चाहते हैं। ईरानी क्रांति के दौरान, एक वामपंथी समूह ने न्याय मंत्रालय की दीवारों पर लिखा था: आज़ादी की सहर में, आज़ादी की जगह खाली है (dar tulu-e azadi, ja-ye azadi khali)। विद्रोह तो हुआ था, लेकिन क्रांति का वादा पूरा नहीं किया गया।

ईरान के सबसे शानदार कवियों में से एक, फ़ोरो फ़रोज़ज़ाद, जिनकी 1967 में एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई, ने शाह विरोधी प्रतिरोध के हलकों में लिखा था कि,

मुझे कुछ कहना होगा।

मुझे कुछ कहना होगा।

...

मैं कुछ विद्रोह करना चाहता हूं।

मैं उस विराट मेघ को उधेड़ना चाहता हूं।

मैं कहना चाहता हूं कि नहीं नहीं नहीं।

पश्चिम की ईरान को नष्ट करने की चाह ने देश को देशप्रेम की ओर झुका दिया है। पश्चिम के दबाव ने ईरान के सामाजिक विकास को दरकिनार कर दिया है, अर्थव्यवस्था को अनुबंधित (पिछले साल 10%) किया है, और सामाजिक जीवन को विकृत किया है। ऐसी ‘सर्दियां’ हमेशा के लिए नहीं बनी रह सकतीं।

मार्च में नौरूज़ (फ़ारसी नव वर्ष) के दिन, तेहरान में चेरी फूल केवल खिलेंगे नहीं; उनका आगमन संकेत होगा, जैसा कि सईद सुलतानपुर ने भी लिखा था, ईरान के खिलाफ 1979 में शुरू हुई लंबी घेराबंदी के अंत का। यह घेराबंदी तभी खत्म हो सकती है जब साम्राज्यवाद मध्य पूर्व से बाहर उखाड़ फेंका जाए।


सूचना: ट्राईकॉन्टिनेन्टल समाचार- पत्र को अन्य भाषाओं, अंग्रेज़ी से लेकर पुर्तगाली में भी पढ़ सकते हैं, हमारी वेबसाइट से साझा कर सकते हैं, और अगर कोई अन्य भाषाओं में अनुवाद करने के लिए हमारा साथ देने के लिए वालांटियर करना चाहते हों तो हमसे सम्पर्क करें

America
IRAN
Iran-US
US-Iran Tension
Donand Trump

Related Stories

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

ईरानी नागरिक एक बार फिर सड़कों पर, आम ज़रूरत की वस्तुओं के दामों में अचानक 300% की वृद्धि

असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की

क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की ज़ोर-ज़बरदस्ती की कूटनीति

यूक्रेन में छिड़े युद्ध और रूस पर लगे प्रतिबंध का मूल्यांकन

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई

ईरान पर विएना वार्ता गंभीर मोड़ पर 

लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें


बाकी खबरें

  • Hemant Soren
    अनिल अंशुमन
    झारखंड-बिहार: स्थानीय भाषा को लेकर विवाद कहीं महज़ कुर्सी की राजनीति तो नहीं?
    22 Sep 2021
    “किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों…
  • Varanasi
    विजय विनीत
    बदहाली: रेशमी साड़ियां बुनने वाले हाथ कर रहे हैं ईंट-पत्थरों की ढुलाई, तल रहे हैं पकौड़े, बेच रहे हैं सब्ज़ी
    22 Sep 2021
    बनारस से ग्राउंड रिपोर्ट: विश्वविख्यात बनारस की रेशमी साड़ियों का ताना-बाना बिखर रहा है। इसी ताने-बाने में सिसक रही है बुनकरों की जिंदगी। जानने के लिए आपको लिए चलते हैं बनारस की संकरी गलियों में..
  • school
    सौम्या गुप्ता, सी. सरतचंद
    स्कूलों को वक़्त से पहले खोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए
    22 Sep 2021
    केवल स्कूलों को फिर से खोलने से असमान शिक्षा प्रणाली अधिक समान नहीं हो जाएगी जब तक कि सरकारें शिक्षा पर अपने ख़र्च को नहीं बढ़ाती हैं स्थिति में बदलाव लाना असंभव है। स्कूल खोलने से कोविड म्यूटेशन का…
  • SCO
    एम. के. भद्रकुमार
    ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है
    22 Sep 2021
    तेहरान का एससीओ में ज़ोरदार स्वागत के साथ शामिल किया जाना और इस संगठन का जल्दबाज़ी के साथ विस्तार किया जाना दिखाता है कि बीजिंग और मॉस्को के बीच ज़बरदस्त तालमेल है।
  • यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    22 Sep 2021
    योगी जी का विकास का सारा जश्न दरअसल अर्थव्यवस्था के ध्वंस और कोविड से हलकान, हैरान-परेशान जनता को मुंह चिढ़ाने और उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा है। कुछ विश्लेषकों ने ठीक नोट किया है कि "यूपी विकासोत्सव…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License