NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बढ़ती नफ़रत के ख़िलाफ़ विरोध में लोग लामबंद क्यों नहीं होते?
उत्तर भारत की मज़बूत जनाधार वाली पार्टियां जैसे कि समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बाकी अन्य दलों के नेताओं की तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया, जिससे यह लगे कि भारत के टूटते ताने-बाने को बचाने के लिए कोई भरोसा जगा रहा है। सब चुप हैं और चुपचाप भारत की विविधता को बर्बाद होते देख रहे हैं।
अजय कुमार
19 Apr 2022
muslim
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

भारतीय समाज के ताने बाने को बिगाड़ने को लेकर जिस तरह की हरकतें अभी की जा रही हैं, वैसा शायद आजादी के बाद अब तक नहीं हुई थी। साम्प्रदायिकता के आंच में भारतीय समाज जलता तो था, लेकिन इस कदर नहीं जलता था जैसा अब जल रहा है। लग रहा है कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां पर नफरत और साम्प्रदायिकता का कारोबार चल रहा है। पिछले कुछ दिनों की ख़बरें उठाकर देख लीजिये। दिखेगा कि पिछले तीन दशक से जिस तरह से हिंदी अख़बारों और मीडिया वालों ने नफ़रत फ़ैलाने का काम किया है, वह समाज में मुखर होकर दिखने लगा है। अख़बारों और मीडिया के जरिये दिखने वाला हिंदुस्तान दंगाइयों की नाच से कराहते हुए दंगीस्तान की तौर पर नजर आ सकता है।  

रामनवमी की जुलूसों में मुसलमानों को चिढ़ाने को लेकर जिस तरह की हरकतें हिन्दू धर्म के तथाकथित उपद्रवियों की तरफ से की गयीं हैं, उससे हमारी और आपकी आत्मा शर्मसार हो या न हो, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन मूल्य तो जरूर शर्मसार होंगे। न्याय बातचीत, संवाद,पंचायत, अदालत के जरिये नहीं हो रहा है, संविधान को ताक पर रखकर बुलडोजर के जरिये हो रहा है। लोग न्याय के नाम हो रही इस अमानवीयता का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि हंसी मजाक करते हुए सरकार की वाहवाही कर रहे हैं। मस्जिदों के सामने मुस्लिम विरोधी नारे लग रहे हैं। पत्थरबाजी हो रही है। मुस्लिमों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाले गाने बजाए जा रहे हैं।

इन सब को को रोकने की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की थी। सरकारी तंत्र इसलिए बनाया गया है कि  यह समाज के ताने बाने को दरकने नहीं देगा। भले सरकार हिन्दू उपद्रवियों की हो जाए। सरकार अपना कर्तव्य भूलकर हिन्दू उपद्रवियों में समा जाए।  हिन्दू उपद्रवियों और सरकार में अंतर न नजर आने लगे फिर भी यह बात कही जाती है कि संविधान द्वारा संरक्षित सिविल सेवक, पुलिस , अदालत भारत को बिखरने से बचा लेंगी।  भारत की शानदार दिमाग की फ़ौज कही जाने वाली पूरी नौकरशाही ने खुद को सरकार के कुर्कमों के सामने समर्पित कर दिया है। इनके कामों से ऐसा लगता है, जैसे इन्होंने संविधान, सत्यनिष्ठा, नैतिकता से जुडी सारी सीख त्याग दी हो।  अगर यह चाहते तो उपद्रवियों को रोक सकते हैं, कुछ ऐसा करके दिखा सकते हैं जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ जाता हुए लगे। लेकिन इन्होंने अपनी कर्त्वय की रीढ़ की हड्डी गिरवी रख दी है। यह ऐसा कुछ भी नहीं करते जिससे इनकी नौकरी पर आंच आये।  

इनके करतब का उदाहरण देखिये।  हिंदी के लोगों के बीच जमकर पढ़ा जाने वाले दैनिक जागरण ने जहांगीरपुरी के साम्प्रदायिक हिंसा पर लिखा है कि यहाँ के स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ पर एक लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियें रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार रोशन किशोर इस पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि ऐसी बातों का दो ही मतलब है कि अगर यह खबर सही है तो उस क्षेत्र के पूरे पुलिसिया आलाकमान को उसकी असमर्थता के लिए बाहर निकला देना चाहिए या अगर सही नहीं है तो इसका मतलब यह है कि यह अखबार के जरिये साम्प्रदायिकता फैलाने का सबसे खतरनाक तरीका है।  

ऐसी हरकत पर पुलिस प्रसाशन को क्या करना चाहिए ? क्या अख़बार के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाना चाहिए। इसका मतलब क्या समझा जाए।  अगर पुलिस प्रसाशन का यह रवैया है कि उसके सामने जहर घोलने का काम किया जा रहा है तो आम आदमी से कैसे इतने साहस की उम्मीद की जा सकती है कि अपने बलबूते साम्प्रदायिकता का डंटकर मुकाबला करें। यह कैसे संभव है? बुलडोजर के सहारे लोकतंत्र चलाने वाले देश में देश की 80 फीसदी जनता का कोई धड़ा देश के 20 फीसदी मुस्लिमों के लिए आगे खड़ा हो जाए, प्रशासन को लकवा मार जाए तो यह धड़ा कहाँ से हिम्मत लाएगा? जब देश में कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर हमारे आपके जेब के पैसे से मोटी तनख्वाह उठाने वाले सरकारी अधिकारी कुछ भी न करें तो कैसे नफरत के माहौल से बचा जा सकता है?

बहुत लोग कह सकते हैं कि भारत में ऐसा ही होता आया है, जिसकी सरकार रही है उसकी ही नौकरशाही रही है। ढेर सारे ऐसे उदाहरण गिना देंगे जब पिछली सरकारों के दौरान नौकरशाही ने कुछ नहीं किया। संविधान, विधान तो भारत में कहने के लिए हैं, इनके जरिये कुछ भी नहीं चलता। इसलिए इनकी आलोचना का क्या फायदा? लेकिन जब सब पार्टियों के ही हो जायेंगे तो परीक्षा कराने की क्या जरूरत है? संविधान की क्या जरूरत है? पढ़ने पढ़ाने की क्या जरूरत? लोकतंत्र की क्या जरूरत? देश की क्या जरूरत? चापलूस कार्यकर्ताओं को ही पुलिस और प्रशासन में भर लेना चाहिए। एक देश केवल चुनाव में मिलने वाले वोटों के जरिये चलेगा तो वह वैसा ही हो जायेगा जैसा वोटों से बनी सरकार। यह बात उन्हें तो समझनी चाहिए जो किसी भी दल से निरपेक्ष होकर काम करने की शपथ लेते है। 

पहले दंगे फसाद चुनावों के समय होते थे। कहने वाले कहते थे कि चुनाव जीतने के लिए साम्प्रदायिक ध्रवीकरण किया जा रहा है। चुनाव खत्म साम्प्रदायिकता खत्म। अपनी जिंदगी से सिद्धांतों और विचारो को मार चुके कुछ विश्लेषक तो यहां तक कह देते थे कि बिना  इसके चुनाव कैसे जीता जा सकता है?  लेकिन बेचारे यह नहीं समझते कि साम्प्रदायिकता का जहर एक बार घुलने पर वह फैलता है, चुनाव के बाद रुक नहीं जाता । बहुत लम्बे समय से साम्प्रदायिकता की दी जाने वाली ख़ुराक भारतीय समाज में इतनी गहरी जगह बना चुकी है कि भारत की सारी राजनीतिक पार्टियां हिन्दू उपद्रवियों का खुलकर मुखालफत करने से खुद को किनारे रख रही हैं। उन्हें लगता है कि भारत की चुनावी जमीन हिन्दू उपद्रवियों का विरोध कर नहीं जीता जा सकता।  वह खुलकर विरोध करेंगी तो वोटरों को खुद से दूर कर देंगी?

हाल की जहांगीरपूरी वाली घटना को देखिये। कौन सी राजनीतिक पार्टियों ने वहां जाकर विरोध करने की जहमत उठाई? किसे ने नहीं किया।  किसे ने खुलकर विरोध नहीं किया? आम आदमी पार्टी जिसका दिल्ली में मजबूत जनाधार है, जिसके ढेर सारे स्वयंसेवी हैं, उसका एक नेता तक दिल्ली के दंगों को खिलाफ मजबूत स्टैंड लेते हुए नहीं दिखाई देता है। उत्तर भारत की मजबूत जानाधार पार्टियां जैसे कि समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बाकी अन्य दलों के नेताओं की तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया जिससे यह लगे कि भारत के टूटते ताने बाने को बचाने के लिए कोई भरोसा जगा रहा है। सब चुप हैं और चुपचाप भारत की विविधता को बर्बाद होते देख रहे हैं।

राजनीतिक जानकरों का कहना है कि पिछले आठ सालों का दौर बताता है कि भारत भाजपा के प्रभुत्व में घिरता जा रहा है।  बाकी सारे राजनीतिक दलों के नेता केवल चुनाव के समय उभरते हैं। इसके अलावा चुप बैठे रहते हैं।  

कहीं से विरोध की छोटी से किरण दिखती है तो वह कुछ नौजवान है। सिविल सोसाइटी के चुनिंदा सदस्य हैं। कुछ जनांदोलन हैं। कुछ डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म हैं। लेकिन इन सबके साथ जब तक वह चेहरे और दल मुखरता से कदम नहीं मिलाएंगे, जो चुनावी राजनीति में भाजपा के विरोधी हैं, तब तक बहुत बड़ा जनमानस खुद को अलग-थलग महसूस करेगा। उस नफरत से नहीं लड़ पायेगा जो भारत में उपद्रवी हिन्दू धर्म का नाम लेकर फैला ले रहे हैं।  

इन सब तर्कों के बावजूद भी एक मोटा सवाल तो रह ही जाता है। वह यह है कि आखिरकार क्यों समाज को बर्बाद होते हुए सब चुपचाप देख रहे हैं। लेकिन कोई बड़ा विरोध नहीं हो पा रहा है। समाज और राजनीती को भांपने वाले कहते हैं कि भारतीय समाज में धार्मिक अलगाव हमेशा से रहा है। यह उस जमाने में भी था जब ताजमहल बना था, जब अंग्रेज थे, आजादी के बाद भी धर्मों के  सदस्यों के बीच ऐसा घुलना मिलना नहीं था कि कोई उनके बीच तीखी दीवार न खड़ी कर पाए। यह भारत की नेताओं की जिम्मेदारी थी कि वह अलगाव को मुखर होने देते हैं या दबा कर देते हैं। आजादी के बाद कई सारे दंगे हुए लेकिन फिर भी सांप्रदायिक सामंजस्य का माहौल था।

साल 2014 लेकर अब तक की धार्मिक माहौल बिगाड़ने के बाद भी भाजपा ने उत्तर भारत में दमदार जीत दर्ज की है। उसे यह भरोसा हो चला है कि भारतीयों के अंदर मौजूद धार्मिक अलगाव के भाव को उसने उभार दिया है। लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि वह दूसरे धर्म का सम्मान करते हैं, लेकिन भीतर से खुरचने पर उस सीख को दिखा देंगे जो बरसों से भाजपा ने उनके भीतर भरा है।  इसके अनगिनत उदाहरण हैं। यही वजह है कि लोगों की कई साम्प्रदयिक मामलों पर चुपचाप सहमति रहती है। वह मुखर होकर विरोध नहीं करते। हम साम्प्रदायिकता के दुष्चक्र में फंस गए है। हम में से अधिकतर नफरत करने की आदत लगा दी गयी है। जिस तरह के माहौल में हम जी रहे हैं, उससे लगता है कि मुश्किल से हम बाहर निकल पाएंगे। 

Muslims
muslim hate
Indian Muslim
hindu-muslim
Jahangirpuri Violence
Communal Hate
communal violence

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

बनारस में ये हैं इंसानियत की भाषा सिखाने वाले मज़हबी मरकज़

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’


बाकी खबरें

  • sultanpur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनावः सुल्तानपुर चीनी मिल राज्य सरकार की अनदेखी से हुई जर्जर
    21 Feb 2022
    "सुल्तानपुर चीनी मिल के सही ढ़ंग से न चलने की वजह से इस इलाके के गन्ने की उपज प्राइवेट क्रशर मशीन में किसान मजबूरन दे देते हैं जहां से उनको गन्ने की कीमत आधी या दो-तिहाई ही मिल पाती है।"
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में पीएम मोदी ने पार की चुनावी मर्यादा, जागो चुनाव आयोग
    21 Feb 2022
    आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अखिलेश यादव पर साधे गए निशाने पर बात की और उसको हास्यास्पद बताया। उसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी टिप्पणी की कैसे एक…
  • election
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव चौथा चरण: लखीमपुर हिंसा और गोवंश से फ़सलों की तबाही जैसे मुद्दे प्रमुख
    21 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में तीन चरणों के चुनावों के बाद अब चौथे चरण के लिए जंग शुरू हो गई है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाद अब अवध की चुनावी परिक्रमा लगातार जारी है। लेकिन चौथे चरण में अवध की वो सीटे भी हैं जहां…
  • Ballia
    विजय विनीत
    बलिया: ''सबके वोटे के चिंता बा, चुनाव बाद रसड़ा चीनी मिल के बात केहू ना करे ला''
    21 Feb 2022
    देसी चीनी और गुड़ के लिए मशहूर रसड़ा, कभी ''रसदा'' के नाम से जाना जाता था। रसड़ा इलाके में कई घंटे गुजारने के बाद हमें इस बात का एहसास हो चला था कि रसड़ा में हर आदमी की जुबां पर सिर्फ़ एक ही सवाल है…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : …अब साइकिल भी आतंकवादी हो गई...और कूकर...और मोटरसाइकिल!
    21 Feb 2022
    एक चुनाव की ख़ातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साइकिल को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश आमतौर पर पसंद नहीं की जा रही है। मज़दूर-कामगार के लिए तो आज भी साइकिल ही उनकी मोटरसाइकिल और कार है। सोशल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License