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हिंदुत्व के समर्थकों को ट्रम्प की हार पचा पाने में क्यों इतनी मुश्किलें आ रही हैं?
ट्रम्प का राष्ट्रपतित्व काल हिंदुत्व की  पारिस्थितिक तंत्र  तंत्र के लिए किसी ऑक्सीजन से कम नहीं था। इस बात की परवाह किये बगैर कि हिन्दुओं सहित अल्पसंख्यकों को इस श्वेत वर्चस्ववादी अभियान में कभी भी बराबरी का दर्जा नहीं मिलने जा रहा है।
निसीम मन्नाथुक्करन
22 Jan 2021
modi trump
छवि साभार: एपी 

ट्रम्प-समर्थक भीड़ द्वारा कैपिटल पर किये गए “बलवे” के बाद से भारत में मौजूद हिंदुत्व पारिस्थितिकी तंत्र में एक विचित्र ही नजारा देखने को मिल रहा है: इसमें डोनाल्ड ट्रम्प एक एलियन के तौर पर नजर आ रहे हैं, जिसका उन्हें पहले कभी भी सामना नहीं करना पड़ा था, जब तक कि उनके समर्थकों के जरिये कैपिटल में कहर बरपाया नहीं गया था।

अपने इस नए प्रचार में हिंदुत्व आकाशमंडल की ताकतें एक असाधारण स्मृतिलोप को अपनाने को आतुर हैं: कि ये और नरेंद्र मोदी कभी भारत और अमेरिका दोनों ही में डोनाल्ड ट्रम्प (उनकी श्वेत सर्वोच्चतावाद की विचारधारा और इसके निहितार्थ) पर सबसे अधिक ताली पीटने वालों में से थे। इस प्रकार यह पूरे मामले को कैपिटल पर शशि थरूर के एक ईसाई समर्थक द्वारा भारतीय झन्डा फहराए जाने तक सिमटा देना चाहते हैं, (जबकि ये खबरें भी निकल कर सामने आ चुकी हैं कि हिंदुत्व समर्थकों ने भी वैसा ही कुछ किया था)।

लेकिन इस छुपने-छुपाने के खेल में सारा ध्यान घिसी-पिटी बातों पर दिया जा रहा है। लेकिन जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है वह है हिंदुत्व और श्वेत राष्ट्रवाद के बीच में एक पूरकता है, जो कि इस्लाम, वामपंथ और उदारवाद के प्रति घृणा से प्रेरित है। इसके साथ ही यह सत्तावादी राजनीति में महान नेता की चाहत पर आधारित है। इसलिए ट्रम्प के शासनकाल में भारत-अमरीकी संबंधों को मात्र साझा भू-रणनीतिक हितों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता है।  

भले ही भारत द्वारा खुद को दुनिया का ‘विश्वगुरु’ और “लोकतंत्र की जननी” का दावा किया जाता रहा हो, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार के पास डोनाल्ड ट्रम्प के खतरनाक नस्लवादी, बहुसंख्यकवादी अभियान या वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र के उपर उनके सत्तावादी प्रभाव को लेकर नैतिक असंतोष की गैर-आश्चर्यजनक कमी बनी हुई थी, ।

इसने भारत की विदेश नीति के इतिहास के सबसे अपमानजनक क्षणों में से एक को पैदा किया है जिसमें: एक भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा एक अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को मोदी के साथ “हावडी, मोदी!” रैली में “अबकी बार, ट्रम्प सरकार” जैसे बयान के साथ अपना समर्थन दिया जाता है। इसके बाद अहमदाबाद में ट्रम्प की भव्य अगवानी के लिए राजकोष से 100 करोड़ रूपये लुटाये जाते हैं।

ये दोनों ही कृत्य राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक कार्यकलापों से परे हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जिन्हें मोदी अपने प्रशिक्षक के तौर पर मानते हैं,  वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि “...मोदी निजी समीकरणों को काफी ज्यादा तरजीह देते हैं, जबकि राष्ट्रीय हित “ठन्डे, कठोर तथ्यों से संचालित होते हैं।” जबकि हकीकत यह है कि “इस प्रकार के निजी संबंधों को सच मान लेना कुछ मूर्खतापूर्ण बात है।” वो भी विशेष तौर पर ट्रम्प जैसे व्यक्तित्व के साथ, जो कि अपने सहयोगियों तक के साथ बेहद अस्थिर देखे गए हैं। लेकिन दक्षिणपंथी टिप्पणीकार आर. जगन्नाथन इस बेतुकेपन को वे ट्रम्प और मोदी के बीच “प्रेमोत्सव” की संज्ञा देते हैं। उनके अनुसार इसके उभरने की वजह “जिस प्रकार की चरम शत्रुता का सामना इन दोनों को अपने देश के सत्तारूढ़ कुलीन वर्गों से झेलना पड़ा, उसमें अमेरिका में मौजूद डीप स्टेट और भारत में वामपंथी-उदारवादी पारस्थितिकी तंत्र” की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

पत्रकार आरती टिक्कू सिंह, जिन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में कश्मीर पर सुनवाई के दौरान भारत की कार्यवाही का बचाव किया था, ने “वामपंथी-इस्लामवादी-मीडिया-डीप स्टेट जैसे बेहद भ्रष्ट सत्ता प्रतिष्ठान से पिछले 4 सालों से दिन-रात जूझते हुए” हार का मुहँ देखने वाले डोनाल्ड ट्रम्प की जमकर सराहना की है। 

इस वैचारिक आत्मीयता का आधार असल में गहरी निरंकुश प्रवित्तियों एवं लोकतान्त्रिक संस्थानों के प्रति तिरस्कार की भावना से उपजा है, जिसने इन दोनों नेताओं के बीच की व्यक्तिगत खुशमिजाजी को परवान चढ़ाने का काम किया। दोनों देशों के बीच में व्यापार और आव्रजन जैसे छिटपुट विवादों एवं मत-भिन्नताओं का इस रिश्ते पर कोई असर नहीं पड़ा। इस प्रकार बेहद महत्वपूर्ण तौर पर वैश्विक क्षेत्र में हिन्दुत्व के बहुसंख्यकवाद अभियान की सफलता का दारोमदार काफी हद तक ट्रम्प की बहुसंख्यकवादी परियोजना और इसके पूर्व की क़ानूनी ज्यादतियों पर उसकी मौन स्वीकृति पर टिकी हुई थी। उदाहरण के तौर पर इसे नागरिकता संशोधन अधिनियम और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निरसन में देखा जा सकता है। इसकी और भी मजबूती से पुष्टि, ट्रम्प के शहर में मौजूद होने के बावजूद दिल्ली में जारी सांप्रदायिक हिंसा पर (जिसमें भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं की भूमिका पर भी सवालिया निशान खड़े किये गए थे) उनकी चुप्पी में देखा जा सकता है।

आख़िरकार ट्रम्प का राष्ट्रपतित्व ही वह जरुरी ऑक्सीजन था जिसकी दुनिया में दक्षिणपंथी पॉपुलिस्ट नेताओं को जरूरत थी।

ट्रम्प ने अपने चुनावी अभियान में अपनी निजी मित्रता और वैचारिक आत्मीयता तक को वोटों के रूप में भुनाने की कोशिश में भारत से “जबर्दस्त समर्थन” और अपने “महान दोस्त” पीएम मोदी के समर्थन पर जोर दिया था। यहाँ तक कि पहले भी उन्होंने इसे दोहराया था: “मुझे लगता है कि भारत में वे मुझे जितना पसंद करते हैं, निश्चित तौर पर इस देश में मीडिया द्वारा मुझे पसंद किया जाता है, वे उससे अधिक करते हैं।” चुनावों के दौरान इसे बढ़-चढ़कर प्रदर्शित किया गया जब हिन्दुत्ववादी टिप्पणीकारों, समर्थकों और भाजपा पदाधिकारियों द्वारा बिना किसी झिझक के ट्रम्प पर अपना दाँव खेला गया था। चुनावों के दौरान इसका जोरदार प्रदर्शन किया गया था जब हिंदुत्व के टिप्पणीकार, समर्थक और भाजपा के पदाधिकारी अनायास ट्रम्प पर अहंकार कर रहे थे।

उनके बारे में सर्वसम्मत दृष्टिकोण को हिंदुत्व की पैरोकार शेफाली वैद्य के शब्दों में सार-संकलित किया जा सकता है: “केवल ट्रम्प में ही इस्लामिक आतंक से लोहा ले पाने की हिम्मत है।” ट्रम्प की हार के बाद बिना किसी हैरत के उनमें से कईयों ने रट्टू तोते की तरह अमेरिकी धुर दक्षिणपंथियों के “चुराए हुए चुनाव” के सिद्धांत का ढोल पीटना शुरू कर दिया, जिसने इस वर्तमान “विद्रोह” को हवा देने का काम किया था। यहाँ तक कि स्वराज्य  पत्रिका जो कि खुद को “मध्यमार्गी उदार दक्षिणपंथी” होने का दावा करती है, के जगन्नाथन के विचार में जिस प्रकार से भारी संख्या में मेल-इन के जरिये वोट पड़े थे और अनुपस्थिति मतपत्रों के साथ “किसी प्रकार की हैंकी-पैंकी की गुंजाइश अविवेकी नहीं कही जा सकती है।”

जो बिडेन की जीत के बावजूद भाजपा के विदेश मामलों के विभाग के प्रभारी जैसे शीर्षस्थ पदाधिकारियों द्वारा ट्रम्प की प्रशंसा और बिडेन की खिल्ली उड़ाने में कूटनीतिक तौर पर कुछ भी चूक होने का अंदेशा नजर नहीं आया।

और कैपिटल की घटना के बाद जब विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा ट्रम्प पर प्रतिबंधों को लागू कर दिया गया तो भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या जैसे भाजपा नेताओं ने उनके प्रति अपनी हमदर्दी व्यक्त करने में देर नहीं लगाई। भाजपा के आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय के विचार में ट्रम्प द्वारा हिंसा के लिए उकसाने की घटना, जिसने पाँच लोगों की जानें ले लीं, वह महज उनके द्वारा “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” और एक “भिन्न बिंदु” को बताने का अभ्यास मात्र था। यहाँ कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है, क्योंकि जब हम पाते हैं कि केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर एक जनसभा के दौरान “देश-द्रोहियों को गोली मारने” का नारा देने के बावजूद पिछले एक साल से छुट्टा घूम रहे हैं।

लेकिन हिन्दू राष्ट्रवाद और श्वेत राष्ट्रवाद की सजातीयता तब खुलकर स्पष्ट होती है जब हम अमेरिका में इसकी व्याख्या को देखते हैं। नया हिंदुत्ववादी प्रचार इस बात को मिटाना चाहता हैं कि ट्रम्प 2016 में सत्ता में, “हिन्दूज फॉर ट्रम्प” और रिपब्लिकन हिन्दू गठबंधन (आरएचसी) जैसे आंदोलनों की लहरों पर सवार होकर आए थे। हिंदुत्व (और श्वेत राष्ट्रवाद) दोनों की वैचारिक दुनिया में इस्लाम का भूत लगातार घूम-फिरकर आता रहता है।

इंग्रिड थेरवाथ जिन्होंने प्रवासी हिंदुत्व पर वृहद पैमाने पर शोधकार्य किया है, ने इससे पहले भी इस तर्क को रखा था: “भारतीय अमेरिकी लॉबी में इस्लाम को अतार्किक अन्य के तौर पर पहचाने जाने की प्रवत्ति रही है।” इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि प्रवासी हिन्दुत्ववादियों ने भारत को हिन्दू तक सीमित करके रख दिया है। थेनमोझी सौंदरराजन जैसे दलित अमेरिकी कार्यकर्त्ता इसे ब्राह्मणवादी हिन्दूवाद के तौर पर देखते हैं।

2016 में जिस आरएचसी फण्डरेजर कार्यक्रम में ट्रम्प ने हिस्सा लिया था उसे “आतंकवाद के खिलाफ एकजुट मानवता” नाम दिया गया था। वहां पर ट्रम्प ने अपने बहुचर्चित भाषण में घोषणा की थी कि “मैं हिन्दू धर्म का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। और मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ।” आरएचसी की वेबसाइट के विदेश नीति अनुभाग में मोदी को गले लगाते ट्रम्प की एक तस्वीर है, और इसमें कहा गया है “एक स्वतंत्र विश्व के नेता के तौर पर हमें कट्टरपंथी इस्लाम से निपटने के लिए एक मजबूत विदेश नीति की आवश्यकता है।”

ट्रम्प की रैली में एक भारतीय झण्डे पर हिंदुत्व टिप्पणीकार द्वारा आश्चर्य प्रकट किये जाने के विपरीत लगभग 28% भारतीय-अमेरिकियों ने (सिर्फ हिन्दुओं ने ही नहीं) इस बार ट्रम्प और उनके वर्चस्ववादी “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” प्रोजेक्ट पर अपना मत दिया है, जो कि पिछली बार के 16% से काफी अधिक है। हिंदुत्व समूह इस बात को पूरी तरह से छिपाने की कोशिशों में लगे हैं कि अमेरिकी “वैकल्पिक-दक्षिणपंथी” या धुर दक्षिणपंथी समूह ही ट्रम्प का मूलाधार रहे हैं। या उसके द्वारा चार्लोट्सविले में जिस प्रकार की हिंसा की गई, उस प्रकार के हिंसक नव-नाज़ी हमलों की निंदा नहीं की गई।

ऑल्ट-राईट कई प्रकार के श्वेत वर्चस्ववादियों एवं नव-नाजीवादियों जैसे कि प्राउड बॉयज, थ्री पर्सेंटर, ओथ कीपर्स, कन्फ़ेडरेट इत्यादि का एक ढीला-ढाला गठबंधन है, (इसमें से कुछ लोग वैचारिक संसाधन श्वेत अमेरिकी ईसाईयत से जुटाते हैं), जिनके सदस्यों को अब विद्रोह करने पर धर-पकड़ की जा रही है। विद्वान सितारा थोबानी “हिन्दूज फॉर ट्रम्प” अभियान के बारे में कहती हैं कि इसके द्वारा श्वेत ज़ेनोफ़ोबिया से मुकाबला करने के बजाय, अमेरिका में हिन्दुत्ववादी “इस श्वेत रंग के संरक्षण के प्रति ही फ़िदा हैं।”

यह सब इस तथ्य के बावजूद है कि हिन्दुओं या किसी भी अन्य जातीय अल्पसंख्यक को कभी भी किसी भी श्वेत वर्चस्ववादी प्रोजेक्ट में समान रूप से व्यवहार नहीं किया जाने वाला है।

यह तथ्य कि मोदी सरकार को श्वेत वर्चस्ववाद से कोई दिक्कत नहीं रही है, को इस तथ्य द्वारा प्रदर्शित किया गया था कि हर्ष श्रृंगला ने (भारत के वर्तमान में विदेश सचिव और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत) स्टीफन बैनन (ट्रम्प के भूतपूर्व मुख्य रणनीतिकार) से 2019 में मुलाक़ात की थी, जबकि वे उस दौरान ट्रम्प प्रशासन का हिस्सा नहीं थे। बैनन ऑल्ट-राईट की प्रमुख हस्तियों में से एक हैं जो कि आजकल धुर दक्षिणपंथी आंदोलनों एवं दलों के साथ वैश्विक गठबंधन की कोशिशों में जुटे हुए हैं। 

श्रृंगला ने बैनन को एक “पौराणिक सिद्धांतकार” एक “धर्म योद्धा” और भगवद्गीता का “एक प्रबल अनुयायी” के तौर पर व्याख्यायित किया था। हाल ही में ट्विटर ने बैनन को ऍफ़बीआई निदेशक जैसे अमेरिकी अधिकारियों का सर कलम कर देने के फतवे के कारण स्थायी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया है।

हिन्दू राष्ट्रवाद और श्वेत वर्चस्ववाद के बीच का बंधुत्व, असल में “आर्यन नस्ल” वाली श्रेष्ठता की विचारधारा नाजीवाद तक जाती है। यह अन्य स्वरूपों में भी उभरता दिखता है, जैसे नार्वे के धुर-दक्षिणपंथी आतंकवादी अन्द्रेस ब्रेइविक के घोषणापत्र में (जिसने 77 लोगों की हत्या कर दी थी)। यह हिंदुत्व को उसके मुस्लिमों और मार्क्सवादियों के खिलाफ ईसाई धर्मयुद्ध में एक महत्वपूर्ण वैश्विक साझीदार तौर पर चित्रित करता है। निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदुत्ववादी ने अपने भीतर वैचारिक समायोजन किया है, इसमें श्वेत राष्ट्रवाद की यहूदीवाद-विरोध का त्याग, और यहूदीवाद को अपनाने के साथ कश्मीर जैसी जगहों पर इसराइली राज्य को इसके मॉडल के तौर पर अपनाने की बात शामिल है।

मोदी और हिंदुत्व को ट्रम्प और श्वेत राष्ट्रवाद से अलग दिखाने के वर्तमान प्रयास अजीबोगरीब हैं, लेकिन कैपिटल पर भीड़ की हिंसा पर वैश्विक गुस्से को देखते हुए यह त्याग रणनीति अधिक लगता है। लेकिन इनके बीच के रिश्ते और इतिहास कुछ ऐसा है जिसे मात्र उन लोगों की सनक से नहीं मिटाया जा सकता है, जो भीड़ के शासन को सही ठहराते हैं और इसके लाभ की फसल काटते हैं, जैसा कि 1992 वाले अयोध्या या 2002 के गुजरात में देखा जा सकता है।

लेखक डलहौज़ी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करे

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