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भारत
राजनीति
रोटी-बेटी के रिश्ते वाला नेपाल अपने ही लोगों से क्यों मुंह मोड़ रहा है?
विधायक पुष्कर सिंह धामी कहते हैं कि यहां से लगते नेपाल के कंचनपुर जिले के प्रशासन के साथ प्रवासियों को ले जाने की सहमति नहीं बन पा रही है। बहुत से प्रवासी ऐसे भी हैं जिन्होंने कंचनपुर से आगे महेंद्र नगर जैसे जिलों में जाना है। नेपाल सरकार इन्हें आने की अनुमति नहीं दे रही है। इस संबंध में उनकी राज्य के मुख्य सचिव और एसएसबी से भी बात हुई है।
वर्षा सिंह
20 May 2020
uttrakhand

उत्तराखंड और नेपाल से लगती सीमाओं पर आम बोलचाल में कहा जाता है कि नेपाल के साथ हमारा रोटी-बेटी का संबंध है। नेपाल से बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए सीमा पार कर उत्तराखंड में आते हैं। यहां के खेतों में नेपाली मज़दूरों का पसीना भी बहता है। नेपाल के साथ कारोबारी रिश्ते भी हैं तो सामरिक दृष्टि से भी ये पूरा क्षेत्र संवेदनशील है।

उधमसिंह नगर में बड़ी संख्या में फंसे हुए हैं नेपाल के लोग

उधमसिंहनगर में इस समय बड़ी संख्या में नेपाली मूल के लोग मौजूद हैं जो पहले चरण के लॉकडाउन के समय से ही अपने घरों को लौटना चाहते थे लेकिन अंतर्राष्ट्रीय सीमा सील होने की वजह से फंसे हुए हैं। लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद दिल्ली-मुंबई समेत देशभर से बड़ी संख्या में नेपाली प्रवासी भी लगातार वतन वापसी के लिए लौट रहे हैं। इनकी संख्या बढ़ रही है लेकिन सीमा बंद है। ऐसे में भोजन की व्यवस्था, रहने की व्यवस्था जैसी समस्याएं भी हैं।

खटीमा के विधायक ने गृह मंत्रालय को लिखा पत्र

उधमसिंहनगर के खटीमा से विधायक पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को गृह मंत्रालय को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा सील होने के कारण यहां बड़ी संख्या में भीड़ जुट रही है। नेपाली लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। विधायक के साथ ही सामाजिक संस्थाएं भी राशन सामाग्री, भोजन, मास्क की व्यवस्था कर रही है। लेकिन प्रशासन को निर्देशित करने की आवश्यकता है कि नेपाल सरकार से बात कर सीमा खुलने तक भोजन और रहने की व्यवस्था करें।

नेपाल सरकार से नहीं मिल रही प्रवेश की अनुमति

कुमाऊं का अधिकांश क्षेत्र नेपाल सीमा से लगा हुआ है। पिथौरागढ़, चंपावत और उधमसिंहनगर की सीमाएं नेपाल से जुड़ती हैं। उधमसिंहनगर के खटीमा के मेलाघाट और नगरा तराई से नेपाल जाने की खुली सीमा है। काली नदी भी यहां भारत-नेपाल के बीच सीमा बनाती है। विधायक पुष्कर सिंह धामी कहते हैं कि यहां से लगते नेपाल के कंचनपुर जिले के प्रशासन के साथ प्रवासियों को ले जाने की सहमति नहीं बन पा रही है। बहुत से प्रवासी ऐसे भी हैं जिन्हेंने कंचनपुर से आगे महेंद्र नगर जैसे जिलों में जाना है। नेपाल सरकार इन्हें आने की अनुमति नहीं दे रही है। इस संबंध में उनकी राज्य के मुख्य सचिव और एसएसबी से भी बात हुई है।

खटीमा आए नेपाली प्रवासी.jpg

पुष्कर सिंह धामी के मुताबिक पूरे जिले में 4-5 हज़ार नेपाली प्रवासी हो सकते हैं। क्वारनटीन सेंटर में 14 दिन बिताने के बाद ये जिले में ही इधर उधर छिटके हुए हैं। वह बताते हैं कि 16 नेपाली क्वारनटीन सेंटर से ही चुपचाप निकल गए। कहां गए ये पता नहीं चला। देश के अन्य हिस्सों से खटीमा-बनबसा तक उनका परमिट बन जा रहा है। लेकिन इससे आगे वे अपने आप जा नहीं पा रहे।

उधमसिंहनगर के खटीमा में एसडीएम निर्मला बिष्ट कहती हैं कि राहत शिविरों में नेपाली लोगों के ठहरने की व्यवस्था की गई है। नेपाल सरकार से और कंचनपुर जिले के प्रशासन से लगातार बातचीत की कोशिश की जा रही है लेकिन अभी तक नेपाल की ओर से कोई पॉजीटिव रिस्पॉन्स नहीं मिला। निर्मला बताती हैं कि उनके क्षेत्र में 500 से अधिक लोग मौजूद हैं लेकिन ये कभी आ रहे हैं, कभी लौट रहे हैं, इसलिए इनकी संख्या घट-बढ़ रही है। उनके मुताबिक प्रशासन ने इनके भोजन और ठहरने की पूरी व्यवस्था की है। एसडीएम के मुताबिक उनके जिले में नेपाल के साथ खुली सीमा होने की वजह से लोगों के चोरी-छिपे जाने की आशंका भी बनी रहती है। आधिकारिक तौर पर उधमसिंहनगर से कोई भी नेपाली अपने देश नहीं लौटा है। जबकि देशभर से नेपाली लोग लगातार आ रहे हैं।

पिथौरागढ़ प्रशासन ने नेपाली नागरिकों का प्रवेश रोका

हालांकि इससे पहले 30 अप्रैल को पिथौरागढ़ से करीब ढाई हज़ार नेपाली नागरिकों को उनके देश भेजा गया था। नेपाल के दारचुला जिले के प्रशासन से बातचीत के बाद सहमति बन गई थी। फिर मेडिकल परीक्षण के बाद नेपाल सरकार ने अपनी बसें अपने लोगों को लाने के लिए भेजीं। पिथौरागढ़ में धारचुला के एसडीएम अनिल शुक्ला कहते हैं कि अब हम नेपाली लोगों को अपने जिले में प्रवेश ही नहीं करने दे रहे। हल्द्वानी, रुद्रपुर से ही उन्हें लौटा दिया जा रहा है।

कोरोना से भयभीत नेपाल के लोग हर हाल में चाहते हैं वतन वापसी

उधर, टिहरी के चंबा में परिवार समेत फंसे नेपाल के दैलेख जिले के रहने वाले पद्मबहादुर किसी भी कीमत पर अपने देश लौटना चाहते हैं। वह कहते हैं कि कोरोना जैसी बीमारी और उसके बाद बने हालात ने उन्हें डरा दिया है। अब अपने वतन, अपनी मिट्टी की ओर ही लौटना है। तभी चैन पड़ेगा। वह कहते हैं कि इस बीमारी का कोई भरोसा नहीं, अपने घर पहुंच जाएंगे तो राहत मिलेगी। पद्मबहादुर ने बताया कि टिहरी के जिलाधिकारी से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि खुद ही गाड़ी की व्यवस्था कर लो। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।

पद्मबहादुर टिहरी में चंबा-मसूरी के बीच सड़क निर्माण के कार्य में मज़दूरी करते थे। नजदीक के गांवों के खेतों में भी मज़दूरी करते थे। लॉकडाउन में काम ठप हो गया तो पद्मबहादुर जैसे कई नेपालियों के आगे भी रोटी का संकट आ गया। वह बताते हैं कि पहले उनके करीब 40-50 साथी थे। इनमें से कुछ जा चुके हैं। अभी फिलहाल चंबा में करीब 24 नेपाली नागरिक हैं। इनमें महिलाएं-बच्चे भी हैं। अब तक इन लोगों ने अपनी ही बचत के पैसों से राशन की व्यवस्था की। लेकिन अब पैसे भी खत्म हो चुके हैं। ये पूछने पर कि अब तो लॉकडाउन में ढील दी गई है, काम शुरू हो गया है, पद्मबहादुर अब यहां रुकना नहीं चाहते।

(वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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