NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
स्टेट बैंक निजी बिल्डरों का घाटा अपने जिम्मे क्यों ले रहा है?
SBI की होम लोन की नई वापसी योजना का नतीजा यह होगा कि निजी बिल्डरों की व्यवसायिक गलतियों से हुई हानि या उनके द्वारा किए गए गबन का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के जिम्मे आ जायेगा। बैंक द्वारा बिल्डर को दिया गया कर्ज तो डूबेगा ही मकान खरीदने वाले द्वारा चुकायी राशि को भी बैंक वापस करेगा न कि बिल्डर जिसे वह रकम मिली थी।
मुकेश असीम
10 Jan 2020
SBI

भारत का शासक पूँजीपति वर्ग किस तरह सार्वजनिक उद्यमों और बैंकों का प्रयोग निजी पूँजीपतियों के हितों में करता है उसका सटीक उदाहरण है 8 जनवरी को देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) द्वारा लाई गई होम लोन की नई वापसी योजना। इस योजना के अनुसार अगर क़र्ज़ लेने वाले ने जिस बिल्डर से फ्लैट खरीदा है वह फ्लैट का निर्माण समय से नहीं करे तो बैंक खरीदार द्वारा चुकाये गये पूरे मूलधन को उसे को वापस कर देगा। 

यह योजना उन बिल्डरों से खरीदे लोन पर लागू होगी जिन्हें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने इमारत बनाने के लिए कर्ज़ दिया हुआ है। अभी यह योजना 7 शहरों में ढाई करोड़ रुपये तक मूल्य वाले फ्लैट के लिए है और आगे इसे 10 और शहरों तक विस्तार दिया जायेगा। बैंक ने अभी एक बिल्डर सनटेक रियल्टी के साथ ऐसा समझौता किया है, आगे बैंक 50 से 400 करोड़ रुपये के क़र्ज़ लेने वाले अन्य बिल्डरों के साथ भी ऐसे करार करने वाला है।

सवाल है कि निजी बिल्डरों द्वारा निर्माण पूरा न करने पर होने वाले जोखिम को मूलधन की वापसी की गारंटी द्वारा एसबीआई अपने जिम्मे क्यों ले रहा है? इस संदर्भ में हमें नोएडा में जेपी इंफ्राटेक, आम्रपाली, आदि बिल्डरों द्वारा ऋण व बिक्री से प्राप्त रकम का गबन कर 30 हजार फ्लैट का निर्माण अधर में छोड़ने के मामले व देश के अन्य हिस्सों में ऐसे ही अन्य बहुत से मामलों को याद रखना होगा। इन मामलों में एक और तो बिल्डरों ने बैंकों से कर्ज लिए हुये थे, दूसरी ओर फ्लैट बेचकर ग्राहकों से भी बड़ी रकम वसूल की थी। किंतु उन्होंने फ्लैट निर्माण का काम अधर में छोड़ दिया और ऋण व बिक्री से प्राप्त रकम को गबन कर अपने दूसरे खातों में पहुँचा दिया। इससे यह कंपनियाँ दिवालिया हो गईं। परिणाम यह हुआ कि एक और तो ऋणदाता बैंकों की रकम डूब गई, दूसरी और फ्लैट खरीदने वाले भी अपने फ्लैट व चुकाई गई रकम दोनों से हाथ धो बैठे।

पर इससे एक और बड़ी मुश्किल पैदा हुई। जब दिवालिया होने का मामला बैंकों द्वारा ऋण वसूली के लिए कंपनी अदालत में पहुँचा तो फ्लैट मालिकों ने भी अपनी डूबी रकम के लिए वहाँ दावा किया। फ्लैट मालिकों की दिक्कत यह भी थी कि उन्होने फ्लैट खरीदने के लिए भी इन बैंकों से ऋण लिया हुआ था और फ्लैट न मिलने पर भी बैंक ऋण वसूली को रद्द करने वाले नहीं थे। दूसरी और यही बैंक यह भी दावा कर रहे थे कि पूरी इमारत उनके पास रेहन रखी गई है और फ्लैट मालिकों का संपत्ति पर कोई दावा नहीं बनता। अर्थात बैंक फ्लैट ख़रीदारों पर दोहरी मार कर रहे थे – फ्लैट की संपत्ति से उनको वंचित कर देना और ऋण की वसूली के लिए भी दबाव देना। अतः यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और उसका समाधान अभी तक भी पूर्णतया नहीं हो पाया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते संकट से घटती आमदनी और बढ़ती बेरोजगारी के साथ ही देश भर में बिल्डरों द्वारा किए गये ऐसे गबन भी संपत्ति खरीदारों में घबराहट पैदा कर उन्हें ऋण लेकर संपत्ति खरीदने से प्रोत्साहित करने के लिए बड़े जिम्मेदार थे। इससे देश भर में संपत्ति की बिक्री में भारी गिरावट आई है जिसने अर्थव्यवस्था के संकट को और भी गंभीर बना दिया है। 2019 की दूसरी छमाही में ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, बैंगलोर सहित 6 बड़े शहरों में पहली छमाही की तुलना में बिक्री में 22% की कमी हुई है।

खास तौर पर पिछले दो दशकों से गृह निर्माण का क्षेत्र कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त हो गये श्रमिकों को भवन निर्माण के काम में मजदूरी द्वारा खपाने का एक बड़ा जरिया होने से अर्थव्यवस्था में रोजगार देने वाला का एक मुख्य क्षेत्र था। इसमें आए संकट से भवन निर्माण के काम में भारी गिरावट हुई है और बड़ी तादाद में श्रमिकों के काम से वंचित होने के कारण बेरोजगारी के बढ़ते संकट में भी इसका योगदान है। इसके अतिरिक्त भवन निर्माण के काम में आने वाले ईंट, सरिया, सीमेंट, काँच, आदि उद्योगों की बिक्री पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव हुआ है।

साथ ही इसका नतीजा यह भी हुआ है कि एचडीआईएल जैसी कुछ बड़ी कंपनियों सहित चार सौ से अधिक रियल स्टेट कंपनियाँ दिवालियाँ हो गईं हैं और बैंकों तथा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा इन्हें दिये गये ऋण भी डूब गये हैं। परिणामस्वरूप पीएमसी जैसा सहकारी बैंक व दीवान हाउसिंग फ़ाइनेंस व अल्टिको सहित आवासीय व व्यावसायिक संपत्ति ऋण देने वाली कई गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ भी दिवालिया होने के कगार पर हैं। सिर्फ दीवान हाउसिंग फ़ाइनेंस पर ही बैंकों की 97 हजार करोड़ रुपये की बड़ी रकम बकाया है। इससे बैंकों के पहले से ही ऊँचे एनपीए अर्थात डूबे ऋणों की मात्रा में और वृद्धि का खतरा पैदा हो गया है।

जब सरकार पहले ही आर्थिक संकट, उच्च बेरोजगारी दर व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के 5% से भी नीचे आने से जूझ रही है, तब संपत्ति क्षेत्र की बिक्री में आई गिरावट व उसके चलते बिल्डरों, बैंकिंग वित्तीय कंपनियों तथा बैंकों सभी के सामने आए संकट ने सरकार की चिंता को और भी बढ़ा दिया है। इससे उसके ऊपर भारी दबाव है कि वह अन्य कारोबारी क्षेत्रों की ही तरह इन सब को भी संकट से राहत देने के लिए कुछ बड़े कदम उठाये। एसबीआई की यह नई ऋण योजना इसी दिशा में एक कदम है। सरकार व बैंक को उम्मीद है कि इससे वर्तमान में ख़रीदारों में जड़ जमाने वाली घबराहट कुछ हद तक कम होगी और कम से कम मूलधन वापसी की इस गारंटी से लोग फ्लैट खरीदने के लिए प्रोत्साहित होंगे तथा संपत्ति की बिक्री तेज होगी।

किंतु इसका नतीजा होगा कि निजी बिल्डरों की व्यवसायिक गलतियों से हुई हानि या उनके द्वारा किए गए गबन का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के जिम्मे आ जायेगा। बैंक द्वारा बिल्डर को दिया गया कर्ज तो डूबेगा ही मकान खरीदने वाले द्वारा चुकायी राशि को भी बैंक वापस करेगा न कि बिल्डर जिसे वह रकम मिली थी। बिल्डर पूँजीपति आराम से रकम का हेरफेर कर खुद को दिवालिया घोषित कर साफ निकाल भागने में सक्षम होगा। साथ ही बैंकिंग व्यवस्था में जिसे नैतिक जोखिम या मॉरल हजार्ड कहा जाता है उसका खतरा भी बढ़ जायेगा। इसका अर्थ होता है कि अगर किसी को हेराफेरी करने से सजा के बजाय लाभ मिलने वाला हो तो उसकी हेराफेरी करने की संभावना बढ़ जाती है।

लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इससे होने वाली हानि को कहाँ से पूरा करेंगे? उनके पास कुछ तरीके हैं – एक, बहुत सारी सेवाओं पर शुल्क बढ़ा देना; दो, खातों में न्यूनतम या औसत बैलेंस आदि पर जुर्माना लगाना; जमा खातों में ब्याज घटा देना; चार, इस सबसे भी काम न चले तो सरकार से अतिरिक्त पूँजी माँगना। स्पष्ट है कि हानिपूर्ति के यह सब स्रोत आम जनता की जेब से आते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि हालाँकि मकान खरीदने के लिए क़र्ज़ लेने वाले कुछ व्यक्तियों को इसका लाभ होगा पर कुल मिलाकर यह योजना निजी पूँजीपतियों के घाटे के जोखिम को उनके सिर से हटा से देश की आम जनता के जिम्मे डालने वाली योजना है। भारत का पूँजीपति वर्ग लंबे समय से इसी तरह अपने घाटे को सार्वजनिक क्षेत्र के जिम्मे डाल उसे घाटे में पहुंचाता रहा है और बाद में आर्थिक संकट के लिए भी सार्वजनिक क्षेत्र को जिम्मेदार बताया जाता है जबकि मूलतः इसका कारण पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में ही है

SBI
Private Builders
Builders Loan
Home Loan
capitalist class
Debt collection
indian economy
Economic Recession
unemployment
modi sarkar
GDP

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

GDP से आम आदमी के जीवन में क्या नफ़ा-नुक़सान?

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License