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समलैंगिक शादियों की कानूनी मान्यता क्यों ज़रूरी है?
केंद्र सरकार भले ही दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल तमाम समलैंगिक विवाह को मान्यता दिए जाने से जुड़ी याचिकाओं को फिलहाल ‘गैर-ज़रूरी’ बता रही हो, लेकिन एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग इसे अपने अधिकारों के लिए इस वक़्त सबसे ज़रूरी बता रहे हैं।
सोनिया यादव
26 May 2021
LGBT activist during the 16th Kolkata Rainbow pride walk
Image Courtesy: Indian Express

रूचा सालों से अपनी समलैंगिक पार्टनर वीरा के साथ एक खुशहाल जिंदगी जी रही थी। एक दिन किसी बीमीरी के चलते वीरा दुनिया छोड़ गई। रूचा अब न सिर्फ अकेली हो गई बल्कि आर्थिक तौर पर बेसहारा भी हो गई। क्योंकि रूचा और वीरा के रिश्ते को कानूनी तौर पर कोई मान्यता नहीं मिली थी, इसलिए अब वीरा के जाने के बाद रूचा का वीरा की संपत्ति, उसकी बैंक सेविंग्स पर कोई अधिकार नहीं है।

यहां कहानी के पात्र काल्पनिक हैं, लेकिन हमारे देश में समलैंगिक रिश्तों की हकीकत यही है। केंद्र सरकार भले ही दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल तमाम समलैंगिक विवाह को मान्यता दिए जाने से जुड़ी याचिकाओं को फिलहाल गैर जरूरी बता रही हो, लेकिन एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग इसे अपने अधिकारों के लिए इस वक्त सबसे जरूरी बता रहे हैं।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने छह सितंबर, 2018 को एक अहम फैसला सुनाते हुए समलैंगिकता को अवैध बताने वाली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को रद्द कर दिया था। तब अदालत ने कहा था कि अब से सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध अपराध के दायरे से बाहर होंगे। हालांकि, उस फैसले में समलैंगिकों की शादी का जिक्र नहीं था। अब इसी समलैंगिक विवाह को मान्यता दिलाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में पिछले साल कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिस पर सुनवाई चल रही है।

न्यूज़क्लिक ने इस संबंध में इस समुदाय से जुड़े कुछ लोगों से बात कर पूरे मामले की गंभीरता और उनके पक्ष को समझने की कोशिश की।

विवाह का अधिकार नहीं मिलने से समलैंगिकों के दूसरे अधिकार प्रभावित हो रहे हैं!

ट्रांस एक्टिविस्ट ऋतुपरना सरकार के पक्ष को संवेदनहीन बताते हुए कहती हैं, “आज जब हम महामारी के दौर में जी रहे हैं, तब विवाह का अधिकार नहीं मिलने से समलैंगिकों के कई और अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं। वे अपने सारे हक़ों से महरूम है, जो अपनी शादी का क़ानूनी तौर पर रजिस्ट्रेशन करा चुके स्त्री-पुरुष को मिलते हैं।”

ऋतुपरना के मुताबिक शादीशुदा का जो टैग है वो इसलिए ज्यादा जरूरी हो जाता है क्योंकि इसके बिना आप मेडिक्लेम, इंश्योरेंस, जॉइंट बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी कार्ड और अन्य दस्तावेज में भी अपने पार्टनर का नाम नहीं लिख सकते। कानूनी तौर पर समलैंगिक जोड़ा एक-दूसरे को अपना परिवार नहीं बना सकता। ऐसे में अगर किसी के भी साथ कोई अनहोनी हो जाए तो दूसरा जो उस पर आश्रित है, उसकी पूरी जिंदगी रुक जाती है, ऐसे में जब हम महामारी में रोज अपनों को मरता देख रहे हैं तो सरकार इसे गैर-जरूरी मुद्दा कैसे बोल सकती है।

थर्ड जेंडर को सिर्फ़ क़ानूनी मान्यता ही नहीं उनके अधिकार भी चाहिए!

ग्रेस एक गे हैं, समानाधिकार कार्यकर्ता और पेशे से अधिवक्ता भी हैं इसलिए तमाम कानूनी दांव-पेच को समझाते हुए कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि समलिंगी शादियों को क़ानूनी मंज़ूरी मिलते ही समाज में सब कुछ ठीक हो जाएगा या तुरंत बदल जाएगा लेकिन कम से कम उन तमाम लोगों को बराबरी से रहने का हक तो मिल जाएगा जो आज छुप-छुप कर अपना जीवन बिता रहे हैं।

ग्रेस के अनुसार, समलिंगी शादियों को भारत में क़ानूनी मान्यता नहीं है। इसका जो मुख्य कारण है वो ये है कि शादी की व्यवस्था एक तरह से पितृसत्ता से भरी हुई है। इसमें सिर्फ एक पुरुष और एक महिला का ही कॉन्सेप्ट है। इसमें अलग-अलग धार्मिक क़ानूनों का हिसाब अलग-अलग हैं लेकिन सब में शादी को स्त्री और पुरुष के बीच का ही संबंध माना गया है। साथ ही इनसे जुड़े अन्य क़ानूनों जैसे घरेलू हिंसा, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार और मैरिटल रेप आदि में भी इसी आधार का इस्तेमाल होता है। ऐसे में बदलाव के लिए कई सवाल और जटिलताएं सामने आती हैं। अगर इसमें बदलाव होता है तो वो बहुत व्यापक और क्रांतिकारी बदलाव होगा। जिसके बाद थर्ड जेंडर को सिर्फ क़ानूनी मान्यता ही नहीं उनके अधिकार भी मिल सकेंगे।

मान्यता न मिलना भेदभाव की मुख्य वजह है!

नेहा एक लेस्बियन हैं और चार साल से अपनी पार्टनर के साथ रह रही हैं। नेहा के मानें तो भेदभाव हमारे देश में ऑफिशियल फॉर्म से ही शुरू हो जाता है। हम एलआईसी की ज्वाइंट पॉलिसी नहीं ले सकते। पार्टनर के तौर पर वीज़ा के लिए एप्लाई नहीं कर सकते।  एक-दूसरे को जरूरत पड़ने पर किडनी नहीं दे सकते क्योंकि कानून के अनुसार किडनी देने की इज़ाजत परिवार के ही सदस्य को होती है। कुल-मिलाकर शादीशुदा होने पर एक स्पाउस के जो भी अधिकार हैं वो हमें बिना शादी के टैग के नहीं मिल सकते। अस्पताल से लेकर बैंक और तमाम जगह स्पाउस के नाम की जरूरत होती है। अगर रिश्ता ही डिफाइन नहीं होगा, तो आप अपना अधिकार कैसे ले पाएंगे।
नेहा आगे कहती हैं, “आज जब हम कह रहे हैं कि जिंदगी का भरोसा नहीं है, तो ऐसे में पता नहीं कि किसी को कब अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ जाएं। कोई कब हमारा साथ छोड़ दे, ऐसे में शादी की मान्यता और भी जरूरी हो जाती है क्योंकि बिना कानूनी मान्यता के आप अपने पार्टनर के लिए चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते। आप अस्पताल में क्या अपनी आईडेंटीटी बताएंगे, आप किसी पार्टनर के चले जाने के बाद उसकी चीजों पर उसकी प्रापर्टी पर कैसे अपना क्लेम करेंगे।”

क्या है पूरा मामला?

सोमवार, 24 मई को केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को तमाम कानूनों के तहत मान्यता प्रदान करने के लिए दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में तत्काल सुनवाई के लिए विरोध किया और कहा कि इसके बिना कोई मर नहीं रहा है।
लाइव लॉ की खबर के मुताबिक केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा कि अस्पतालों में विवाह सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती है, कोई इसके बिना मर नहीं रहा है। केंद्र सरकार ने इस मामले को टालने की गुजारिश की और कहा कि न्यायालय इस समय सिर्फ ‘बेहद जरूरी’ मामले सुन रहा है। इस पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने छह जुलाई तक इस मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।

इससे पहले केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में समलैंगिक विवाह का विरोध करते हुए कहा था कि हमारा समाज, हमारा कानून और हमारे नैतिक मूल्य इसकी मंजूरी नहीं देते। केंद्र ने अपने हलफ़नामे में कहा कि संसद ने देश में विवाह क़ानूनों को केवल एक पुरुष और एक महिला के मिलन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया है। ये क़ानून विभिन्न धार्मिक समुदायों के रीति-रिवाजों से संबंधित व्यक्तिगत क़ानूनों/ संहिताबद्ध क़ानूनों से शासित हैं। इसमें किसी भी हस्तक्षेप से देश में व्यक्तिगत क़ानूनों के नाजुक संतुलन के साथ पूर्ण तबाही मच जाएगी।

क्या हैं याचिकाएं?

इस मामले से जुड़ी दिल्ली हाईकोर्ट में कुल तीन याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इन याचिकाओं में कहा गया कि विशेष विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम की व्याख्या इस तरह कि जाए कि वो समलैंगिक विवाह पर भी लागू हो सके।
इसमें से एक याचिका में मनोचिकित्सक डॉ. कविता अरोड़ा और थेरेपिस्ट अंकिता खन्ना ने मांग की है कि अपना पार्टनर चुनने के उनके मौलिक अधिकार को लागू किया जाए। विशेष विवाह अधिनियम के तहत उनकी शादी को मान्यता प्रदान करने के आवेदन को दिल्ली के मैरिज ऑफिसर ने समलैंगिक होने के आधार पर खारिज कर दिया था।

दूसरी याचिका भारत के एक प्रवासी नागरिक कार्डधारक पराग विजय मेहता और एक भारतीय नागरिक वैभव जैन द्वारा दायर की गई थी, जिनकी 2017 में वॉशिंगटन डीसी में शादी हुई थी और जिनके विदेशी विवाह अधिनियम के तहत विवाह के पंजीकरण के लिए आवेदन को न्यूयॉर्क में भारत के दूतावास ने खारिज कर दिया था।

इसी तरह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर मित्रा और तीन अन्य लोगों द्वारा एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में कहा गया कि हिंदू मैरिज एक्ट यह नहीं कहता कि शादी महिला-पुरुष के बीच ही हो। साल 2018 से भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं है, फिर भी समलैंगिक शादी अपराध क्यों है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में 29 देश ऐसे हैं जहाँ समलैंगिक विवाह को तमाम कानूनी दिक्कतों के बावजूद कोर्ट के ज़रिए या क़ानून में बदलाव करके या फिर जनमत संग्रह करके मंज़ूरी दे दी गई है। हालांकि भारत में इसकी मान्यता को लेकर केंद्र सरकार के नकारात्मक रुख के बाद इस समुदाय के लोगों को भी अपने हकों के लिए और कितना लंबा रास्ता तय करना होगा, ये गंभीर सवाल है।

Same-sex Marriage
LGBTQ Community
LGBTQ Rights
Delhi High court
IPC-377
Legalization of same-sex marriage

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