NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जेल में बंद कैदियों को लेकर आया एनसीआरबी का डेटा परेशान करने वाला क्यों है?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2019 के आंकड़ों के अनुसार देश की जेलों में बंद दलित, आदिवासी, मुस्लिमों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से अधिक है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
31 Aug 2020
जेल
प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: देश की जेलों में बंद कैदियों से जुड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक बीते तीन साल में देश में जेलों की संख्या 1361 से घटकर 1350 रह गई लेकिन कैदियों की संख्या 4.50 लाख से बढ़कर 4.78 लाख हो चुकी है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक देश की जेलों में बंद दलित, आदिवासी, मुस्लिमों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से अधिक है। यही नहीं 2019 में जेलों में 4.03 लाख कैदियों को ही रखने की क्षमता थी, इसमें क्षमता के मुकाबले 118.5 प्रतिशत कैदी रखे जा रहे हैं।

परेशान करने वाला डेटा

* रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में जेलों में क्षमता से अधिक 174.9 प्रतिशत अधिक कैदी है यह देश में सर्वाधिक है। इसके बाद यूपी में 167.9 प्रतिशत और उत्तराखंड में 159 प्रतिशत कैदी जेलों की क्षमता से अधिक हैं।

* देश में कुल 31 महिला जेल हैं, जिसमें 6511 कैदियों को रखा गया है। केवल 15 राज्यों में महिला जेल बनाई गई है। उत्तराखंड में क्षमता से अधिक 170 प्रतिशत अधिक महिला कैदियों को रखा गया है।

* देश की जेलों के लिए 87,599 स्टाफ की क्षमता स्वीकृत है, लेकिन 31 दिसंबर 2019 तक इन पदों पर 60,787 लोग ही काम कर रहे थे।

* साल 2019 के अंत में देशभर की जेलों में कैद सभी दोषियों में से दलित 21.7 फीसदी हैं। जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों की संख्या 21 फीसदी है। 2011 के जनगणना के अनुसार देश में इनकी आबादी 16.6 फीसदी है।

* इसी तरह जेलों में बंद दोषियों में से अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी समुदाय से जुड़े लोगों की संख्या 13.6 फीसदी है। इस समुदाय के 10.5 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं। 2011 की जनगणना में इनकी आबादी 8.6 फीसदी थी।

* रिपोर्ट के मुताबिक दोषी ठहराए गए मुस्लिमों की संख्या कुल दोषी कैदियों की 16.6 फीसदी है। इसी तरह जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में से 18.7 फीसदी मुसलमान है। 2011 की जनगणना में इनकी आबादी 14.2 फीसदी के आसपास थी।

जेलों में अमानवीय स्थिति में कैदी

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में 2013 में एक पीआईएल दाखिल कर कहा गया था कि देश भर के 1382 जेलों में बंद कैदियों की स्थिति अमानवीय हो गई है। लिहाजा जेल सुधार के लिए निर्देश जारी किया जाना चाहिए। दिक्कत यह है कि जेल सुधारों के प्रति प्रशासन का रवैया बेहद ढीला-ढाला रहा है।

आजादी के बाद जेल सुधार के लिए कई समितियां बनीं जैसे वर्ष 1983 में मुल्ला समिति, 1986 में कपूर समिति और 1987 में अय्यर समिति लेकिन इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सितंबर 2018 में जस्टिस अमिताव रॉय की अध्यक्षता में दोषियों के जेल से छूटने और पैरोल के मुद्दों पर उनके लिये कानूनी सलाह की उपलब्धता में कमी एवं जेलों की विभिन्न समस्याओं की जाँच करने के लिये एक समिति का गठन किया था।

इस साल फरवरी में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी है। द हिंदू के मुताबिक समिति ने कुछ सुझाव दिए हैं। इसके अनुसार, प्रत्येक नए कैदी को जेल में उसके पहले सप्ताह के दौरान दिन में एक बार अपने परिवार के सदस्यों से फोन पर बात करने की अनुमति दी जानी चाहिये।

चूँकि जेलों में विचाराधीन कैदियों का अनुपात दोषियों के अनुपात से अधिक है इसलिये समिति ने इस संदर्भ में सुझाव दिया है कि प्रत्येक 30 कैदियों के लिये कम-से-कम एक वकील होना चाहिये।

साथ ही त्वरित मुकदमा जेलों में अप्रत्याशित भीड़ को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। जेल विभाग में पिछले कुछ वर्षों से 30% से 40% रिक्तियाँ लगातार बनी हुई हैं इस दिशा में भी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिये।

हालांकि इस समिति के सुझावों पर अमल कब होगा यह पता नहीं है। चूंकि कैदी मतदान के अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते हैं इसलिये अक्सर वे राजनीतिक दलों के मुद्दों से बाहर रहते हैं। यही वजह है कि आज जेलों का बुरा हाल होता जा रहा है।

उनमें कैदी नारकीय जीवन जी रहे हैं। आए दिन विभिन्न जेलों से कैदियों के संदिग्ध स्थिति में मरने, उनके हंगामा मचाने और भागने की खबरें आती रहती हैं।

कोरोना काल में न्याय

पहले से ही जेलों की बदतर होती व्यवस्था में कोरोना ने एक नया संकट पैदा किया है। दैनिक जागरण के अनुसार कोरोना के कारण पांच महीने से अदालतों का कामकाज सुस्त है। इस समय देश की अदालतों में 3.38 करोड़ मुकदमें लंबित है, जबकि अप्रैल के पहले सप्ताह में यह संख्या 3.21 करोड़ थी यानी कोरोना काल में करीब 17 लाख मुकदमें बढ़े है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार जरूरत से ज्यादा भरी जेलों में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए हजारों कैदियों को इसी आधार पर आसानी से जमानत मिली। लेकिन ऐसे कैदियों की संख्या लगभग 30 हजार के करीब ही रही।

फिलहाल एनसीआरबी के आंकड़ें दर्शातें हैं कि गरीबी और अशिक्षा के कारण बड़ी संख्या में दलित, आदिवासी और मुसलमान जेलों में भरे हुए हैं। इसमें से ऐसे लोगों की संख्या भी ज्यादा है जो मामूली अपराधों में जमानत तक नहीं ले पा रहे। ऐसे कैदियों के लिए कोई विशेष प्रावधान किया जाना चाहिए ताकि वे छूट सकें।

साथ ही जेल सुधार से यह कहकर मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि उनमें समाज के गुनहगार रहते हैं। एक सभ्य समाज में जेलों का मकसद अपराधियों को सुधार कर एक बेहतर इंसान बनाना होता है। सरकार को जेलों को सुधारने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

prisoners
NCRB Data
National Crime Records Bureau
tribals
Muslims
Supreme Court

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक


बाकी खबरें

  • संदीपन तालुकदार
    अर्जेंटीना: बिना इलाज के ठीक हुई एचआईवी पॉज़िटिव महिला
    24 Nov 2021
    शोध से पता चला है कि ऐसे कई मरीज़ हो सकते हैं, जो प्राकृतिक ढंग से इस वायरस से लड़ सकते हैं।
  • water body
    नीलाबंरन ए
    रामेश्वरम द्वीप पर जल-मृदा प्रदूषण की वजह झींगा के फार्म
    24 Nov 2021
    तमिलनाडु में भूजल, मिट्टी की उर्वरता और द्वीप का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से बढ़ रहे झींगें के फार्मों से बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
  • ctu
    रौनक छाबड़ा
    दिल्ली में 25 नवंबर को श्रमिकों की हड़ताल, ट्रेड यूनियनों ने कहा - 6 लाख से अधिक श्रमिक होंगे हड़ताल में शामिल
    24 Nov 2021
    ट्रेड यूनियनों की प्रमुख मांगों में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन के रूप में 26,000 रुपये के साथ-साथ असंगठित मज़दूरों को 7,500 रुपये की मासिक नगद सहायता शामिल है।
  • corona
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 9,283 नए मामले, 437 मरीज़ों की मौत
    24 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.32 फ़ीसदी यानी 1 लाख 11 हज़ार 481 हो गयी है।
  • military
    एन.डी.जयप्रकाश
    सैन्य-औद्योगिक जुगलबंदी ने किस तरह शांति और निरस्त्रीकरण को दरकिनार कर दिया: IV
    24 Nov 2021
    साल 1961 निशस्त्रीकरण की दिशा में ठोस प्रगति की चमकती उम्मीदों के साथ ख़त्म हुआ था, लेकिन साठ साल बाद भी इस उम्मीद को मौजूदा समय में भी बुरी तरह झटके लग रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License