NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
डिजिटल मीडिया पर लगाम संबंधी सरकार का हलफ़नामा क्यों परेशान करने वाला है?
सुप्रीम कोर्ट में सुदर्शन टीवी के ‘बिन्दास बोल’ कार्यकम के ख़िलाफ़ दायर याचिका में केंद्र सरकार ने हलफ़नामा दिया है कि डिजिटल मीडिया ‘पूरी तरह अनियंत्रित’ है। अगर अदालत कोई फैसला लेता है तो यह पहले डिजिटल मीडिया के संदर्भ में लिया जाना चाहिए।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
22 Sep 2020
SC

केंद्र की सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने काम के तरीके की वजह से ‘बहुत ही कम सीमा लांघते’ हैं लेकिन डिजिटल मीडिया ‘पूरी तरह अनियंत्रित’ है। सरकार ने कहा कि अगर शीर्ष अदालत मुख्य धारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के लिये दिशा निर्देश प्रतिपादित करना जरूरी समझती है तो ‘समय की दरकार है’ कि यह कवायद पहले वेब आधारित डिजिटल मीडिया से शुरू की जानी चाहिए।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अपने नये हलफ़नामे  में कहा है कि शीर्ष अदालत को व्यापक मुद्दे केंद्र सरकार और सक्षम विधायिका के निर्णय के लिये छोड़ देने चाहिए या फिर डिजिटल मीडिया से यह कवायद शुरू करनी चाहिए। मंत्रालय ने यह हलफनामा सुदर्शन टीवी के ‘बिन्दास बोल’ कार्यकम के खिलाफ दायर याचिका में दाखिल किया गया है। सुदर्शन टीवी के प्रोमो में दावा किया गया था कि चैनल सरकारी सेवाओं में मुसलमानों की घुसपैठ की कथित साजिश का पर्दाफाश करेगा।

डिजिटल मीडिया का नियमन पहले हो

केंद्र ने पिछले सप्ताह इस मामले में एक संक्षिप्त हलफनामा दाखिल किया था। इसमें कहा गया था कि अगर शीर्ष अदालत मीडिया को नियंत्रित करने के लिये निर्देश जारी करने का फैसला करता है तो पहले यह कवायद डिजिटल मीडिया के साथ करनी चाहिए क्योंकि इसकी पहुंच ज्यादा तेज है और व्हाट्सऐप, ट्विटर और फेसबुक जैसे ऐप की वजह से इससे खबरों तेजी से वायरल होती हैं।

इसमें कहा गया, ‘मुख्यधारा के मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट) में प्रकाशन, प्रसारण एक बार ही होता है, वहीं डिजिटल मीडिया की व्यापक पाठकों/दर्शकों तक पहुंच तेजी से होती है तथा वॉट्सऐप, ट्विटर और फेसबुक जैसी कई इलेक्ट्रॉनिक एप्लिकेशंस की वजह से जानकारी के वायरल होने की भी संभावना होती है।’

डिजिटल मीडिया को समानांतर मीडिया कहते हुए केंद्र ने दावा किया मुख्यधारा के मीडिया में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ डिजिटल वेब आधारित समाचार प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनल के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म को भी शामिल किया जाना चाहिए।

क्या है नए हलफ़नामे में?

नये हलफ़नामे में कहा गया है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की संरचना को देखते हुये इनके द्वारा अपनी सीमा लांघने की घटनायें बहुत ही कम होती हैं जिसमें इस न्यायालय के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती हो। इसकी तुलना में वेब आधारित डिजिटल मीडिया मोटे तौर पर अनियंत्रित है।

हलफ़नामे  में कहा गया है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सीमा की तुलना में एक छोटे फोन के अलावा डिजिटल मीडिया के लिये और किसी चीज की जरूरत नहीं होती है। हलफ़नामे  के अनुसार वेब आधारित डिजिटल मीडिया पर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं है। डिजिटल मीडिया नफ़रत फैलाने के साथ ही जानबूझ कर हिंसा ही नहीं बल्कि आतंकवाद के लिये उकसा कर किसी व्यक्ति या संस्थान की छवि खराब करने में सक्षम है। वास्तव में यह सिलसिला बहुत ज्यादा है।

हलफ़नामे  में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया पर अदालत द्वारा दिशा-निर्देशों के माध्यम से या शिकायत समाधान व्यवस्था के माध्यम से कोई भी नया नियंत्रण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रसारण की बजाय उसी जानकारी को डिजिटल मीडिया के माध्यम से प्रसारित या प्रकाशित करने के लिये प्रेरित करेगा। हलफ़नामे में इस बात को दोहराया गया कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लिये पहले से ही कानून और न्यायिक व्यवस्थायें हैं।

हलफ़नामे  में कहा गया है कि न्यायालय इस मामले में दिशा-निर्देशों के दायरे को अधिक व्यापक नहीं करना चाहिए और इसे सक्षम विधायिका के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। हलफ़नामे  के अनुसार भारत में करीब 385 नियमित समाचार चैनल हैं जिनके पास केन्द्र सरकार की अपलिंकिंग डाउनलिंकिंग नीति दिशा निर्देशों के तहत लाइसेंस हैं या पंजीकृत हैं।

सरकार के हलफ़नामे से क्या परेशानी?

सरकार द्वारा दायर हलफ़नामे में कई तरह की समस्याएं हैं। डिजिटल मीडिया पर किसी तरह का नियमन करने की दिशा में पहला कदम लाइसेंसिंग होगा। यहां आपको बता दें कि डिजिटल मीडिया सार्वजनिक संचार का एकमात्र ऐसा माध्यम है जो बिना लाइसेंस के संचालित हो रहा है।

और अभी बहुत प्रभावी माध्यम भी बन गया है। लेकिन लाइसेंसिंग की दिशा में बढ़ने पर डिजिटल मीडिया जैसा टर्म परेशानी पैदा करने वाला है क्योंकि इसके दायरे में विभिन्न प्रकार के मीडिया, सोशल मीडिया और वेबसाइटों से लेकर व्यक्तिगत ब्लॉग तक शामिल है। क्या किसी नागरिक का ब्लॉग या उसकी ट्वीट-लाइन लाइसेंसिंग के अधीन होना चाहिए? डिजिटल मीडिया की इस तरह की व्याख्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से बाधित करेगी।

इसके अलावा डिजिटल मीडिया को गूगल, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों पर निर्भर होना होता है। इन माध्यमों पर कटेंट निर्माता या मीडिया से जुड़े लोगों का नियंत्रण नहीं है। यह एक अलग डिबेट है। इसे मीडिया की स्वतंत्रता की डिबेट में मिक्स किए जाने की जरूरत नहीं है। वैसे भी आपको बता दें कि सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति पहले से ही सोशल मीडिया कंपनियों के साथ बातचीत कर रही है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि ये प्लेटफॉर्म अपने कंटेंट की सत्यता प्रमाणित करें और फेक न्यूज़ को बढ़ावा देने वाले माध्यम न बनें।

यानी डिजिटल मीडिया पर इस बात के लिए लगाम लगाए जाने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा डिजिटल मीडिया पर कंटेंट उन्हीं कानूनों के दायरे में है जो प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर लागू होते हैं। मसलन डिजिटल कंटेंट पर भी मानहानि होती है तो अलग से कानून बनाने की बेताबी समझ से परे हैं।

इसके अलावा टीवी, रेडियो और प्रिंट के बड़े प्रकाशन डिजिटल मीडिया पर बड़े कंटेंट प्रोड्यूसर में शुमार हैं। अब अगर डिजिटल मीडिया के लिए अलग से नियमन आ जाता है तो यह बेवजह एक ही कटेंट का कई बार नियमन जैसी बात हो जाएगी।

डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश पुरानी

वैसे डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने की तैयारी केंद्र सरकार द्वारा लंबे समय से की जा रही है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सूचना और प्रसारण मंत्रालय में स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान डिजिटल समाचार मीडिया को विनियमित करने के सवाल की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया था। हालांकि डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री के प्रतिरोध के बाद इसका कुछ भी नहीं हुआ।

द वायर के मुताबिक प्रेस एवं पत्रिका पंजीकरण (आरपीपी) विधेयक, 2019 के मसौदे में डिजिटल मीडिया को भारत के समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार या रजिस्ट्रार न्यूजपेपर ऑफ इंडिया (आरएनआई) के तहत लाने की तैयारी की जा रही थी।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार 150 साल पुराने प्रेस और पुस्तक पंजीकरण (पीआरबी) अधिनियम, 1867 में बदलाव लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों का पंजीकरण किया जाता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इसकी जगह पर प्रेस और पत्रिका पंजीकरण (आरपीपी) विधेयक, 2019 का मसौदा तैयार किया है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

Supreme Court
Digital Media
sudarshan tv
Print Media
Electronic media
Narendra modi
BJP
Social Media

Related Stories

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल

फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये

चुनाव के रंग: कहीं विधायक ने दी धमकी तो कहीं लगाई उठक-बैठक, कई जगह मतदान का बहिष्कार

पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे

अफ़्रीका : तानाशाह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कर रहे हैं

‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा

मुख्यमंत्री पर टिप्पणी पड़ी शहीद ब्रिगेडियर की बेटी को भारी, भक्तों ने किया ट्रोल

मृतक को अपमानित करने वालों का गिरोह!

सांप्रदायिक घटनाओं में हालिया उछाल के पीछे कौन?

हेट स्पीच और भ्रामक सूचनाओं पर फेसबुक कार्रवाई क्यों नहीं करता?


बाकी खबरें

  • LAW AND LIFE
    सत्यम श्रीवास्तव
    मानवाधिकारों और न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाता उत्तर प्रदेश : मानवाधिकार समूहों की संयुक्त रिपोर्ट
    30 Oct 2021
    29 अक्तूबर को जारी हुई एक रिपोर्ट ‘कानून और ज़िंदगियों की संस्थागत मौत: उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा हत्याएं और उन्हें छिपाने की साजिशें’ हमें उत्तर प्रदेश में मौजूदा कानून व्यवस्था के हालात को बेहद…
  • migrant
    सोनिया यादव
    महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या
    30 Oct 2021
    एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल भारत में तकरीबन 1 लाख 53 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से सबसे ज़्यादा तकरीबन 37 हज़ार दिहाड़ी मजदूर थे।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    आंदोलन की ताकतें व वाम-लोकतांत्रिक शक्तियां ही भाजपा-विरोधी मोर्चेबन्दी को विश्वसनीय विकल्प बना सकती है, जाति-गठजोड़ नहीं
    30 Oct 2021
    पिछले 3 चुनावों का अनुभव गवाह है कि महज जातियों के जोड़ गणित से भाजपा का बाल भी बांका नहीं हुआ, इतिहास साक्षी है कि जोड़-तोड़ से सरकार बदल भी जाय तो जनता के जीवन में तो कोई बड़ी तब्दीली नहीं ही आती, संकट…
  • Children playing in front of the Dhepagudi UP school in their village in Muniguda
    राखी घोष
    ओडिशा: रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न-आय वाले परिवारों के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि जब अगस्त 2021 में सर्वेक्षण किया गया था तो ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28% बच्चे ही नियमित तौर पर पठन-पाठन कर रहे थे, जबकि 37% बच्चों ने अध्ययन बंद कर दिया था।…
  • climate change
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देश भारी हथियारों से लैस एजेंटों को तैनात करके, परिष्कृत और महंगी निगरानी प्रणाली, मानव रहित हवाई प्रणाली आदि विकसित करके पलायन को रोकने के लिए एक ''जलवायु दीवार'' का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License