NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
इस महामारी में चिकित्सा प्रणाली के सभी गुण-दोष सामने आ गए
कोरोना वायरस महामारी के डर ने एकल-भुगतानकर्ता स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली (single-payer health care system) की मांग करने वाले प्रगतिशीलों को सही साबित कर दिया है।
सोनाली कोल्हटकर
08 Jul 2020
इस महामारी में चिकित्सा प्रणाली के सभी गुण-दोष सामने आ गए

जब कोई महामारी फैली हो, तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को किस तरह बनाया जाय जैसे सवालों को लेकर चर्चा करने का वक्त तो नहीं होता है। मगर यह एक हक़ीक़त है कि संयुक्त राज्य अमेरिका, जहां दुनिया की आबादी के 4 प्रतिशत लोग रहते हैं, वहां कोरोनावायरस संक्रमणों के 25 प्रतिशत मामले हैं और संक्रमितों की संख्या के मामले में यह दुनिया में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। पहली नज़र में यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारे देश की स्वास्थ्य देखभाल को लेकर कुछ तो ऐसा है, जो बुरी तरह से छिन्न-भिन्न हुआ है। कुछ ही महीनों में 40 मिलियन से अधिक अमेरिकी ऐसे देश में बेरोज़गार हो गये, जहां ज़्यादातर लोगों को नियोक्ता की तरफ़ से मुहैया कराये गये बीमा के ज़रिये स्वास्थ्य सेवा पाने की उम्मीद थी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी लिखा है, "एक बेहद संक्रामक और संभावित घातक बीमारी के प्रकोप के बीच बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी की तरह नियोक्ता-आधारित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से जुड़ी समस्यायें भी सामने नहीं आ पा रही है।"

टाइम्स उस राष्ट्रीयकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का शायद ही कभी समर्थक रहा है, जिसकी मांग प्रगतिशील कार्यकर्ता वर्षों से करते रहे है। जैसा कि इस अख़बार के संपादकीय बोर्ड के सदस्य जेनेन इंटरलैंडी कहती हैं, "कोविड-19 से अकल्पनीय रूप से बड़ी (और लगातार बढ़ रही) मौतों की संख्या को स्वास्थ्य सेवा सुधार के लिए नये नज़रिये से देखने का मौक़ा तो नहीं होना चाहिए, लेकिन हो सकता है कि इससे आख़िरकार देश की ऐसी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का पुनर्निर्माण किया जा सके, जो सभी अमेरिकियों के लिए आगे काम आये।" एक राष्ट्र के रूप में, हमें यह बहुत पहले ही समझ लेना चाहिए था।

जैसा कि देश के प्रमुख संक्रामक रोग विशेषज्ञ, डॉ. एंथोनी फौची ने हाल ही में सीनेट की एक सुनवाई के दौरान कहा था कि अनियंत्रित कोरोनोवायरस प्रति दिन 100,000 लोगों तक फैल सकता है। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल इस भयंकर आकलन से ख़ुश नहीं थे, बजाय इस मांग के कि वैज्ञानिक इस बीमारी को लेकर अमेरिकियों को "अधिक आशावाद" की डोर थमाते हैं। लेकिन.बिना लाग लपेट के कहा जा सकता है कि एक एकल-भुगतानकर्ता स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के विरोधियों ने कई वर्षों तक हमारी गहरी त्रुटिपूर्ण नियोक्ता-आधारित प्रणाली को इस तरह से चित्रित किया है, जिसमें महज सकारात्मकता का दिखावा था और जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं था।

जैसा कि फाइवथर्टीएट महामारी के पहले स्वास्थ्य सेवा के जांच सर्वेक्षणों में बताया गया है, " सामान्य स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली या स्वास्थ्य देखभाल की लागत की तुलना में अमेरिका के लोगों को जो कुछ व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवा हासिल होता है, उसे लेकर वे बहुत ही आशावादी नज़रिया रखते हैं।" ज़बरदस्त प्रचार-प्रसार को देखते हुए अमेरिका के लोगों के इस नज़रिये को लेकर बिल्कुल चकित नहीं होना चाहिए, क्योंकि स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं ने उनके दिमाग़ में इस बात को अच्छी तरह से बैठा दिया है। हालांकि, चाहे जितना भी आशावाद की डोर थामे रखा जाये, यह आशावाद मौजूदा कोविड -19 संकट से बचने में हमारी मदद नहीं करने जा है। मौत के गाल में समा चुके दसियों हज़ार अमेरिकियों को देखते हुए आख़िर क्या कोई आशावाद बचा रह सकता है, ख़ास तौर पर तब, जब दूसरे कई देश अमेरका के उलट इस प्रकोप को नियंत्रित करने में कामयाब रहे हैं। न्यूजीलैंड के एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के शब्दों में कहा जाय, तो "वास्तव में ऐसा महसूस होता है कि अमेरिका ने हार मान ली है।"

इस बीमारी के नये हॉटस्पॉट केंद्रों में से एक एरिज़ोना में स्वास्थ्य देखभाल मुहैया कराने वालों ने स्वास्थ्य देखभाल की योजना को राशनिंग से भी जोड़ दिया है,जो एक तरह से उन विकासशील देशों या समाजवादी शासनों की याद ताज़ा कर दे रही है, जिसकी अमेरिका ने अतीत में जमकर आलोचना की है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि एरिज़ोना की राशन योजना, "स्कोरिंग प्रणाली पर मूल्यांकित रोगियों पर इस बात को निर्धारित करने के लिए नज़र रखेगी कि उनकी स्थिति की गंभीरता के आधार पर किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।" एक और कोविड -19 का एपिसेंटर माना जाने वाले टेक्सास स्थित ह्यूस्टन में बाल रोग विशेषज्ञ अब वयस्क रोगियों पर ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि अस्पताल में उसकी बिस्तर क्षमता से कहीं ज़्यादा रोगी आ रहे हैं।

देश के वे लोग, जिनका बीमा नहीं है, अगर वे अस्पताल में भर्ती होते हैं, तो कोविड-19 के इलाज पर उनके लिए कैसे भुगतान किया जा सकता है, इस बारे में कहीं कोई जानकारी नहीं है। ये हालात ब्रिटेन जैसे देश के ठीक उलट है, जहां राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के अलावा किसी भी दूसरे प्रतिष्ठान को लेकर कोई सवाल ही नहीं बचा है, क्योंकि एनएचएस सभी रोगियों के लिए भुगतान का ख़र्च उठा रहा है। मौजूदा संकट के दौरान, यूके सरकार ने एनएचएस की क्षमता को बढ़ाने के लिए सभी निजी अस्पतालों को मुनाफ़े बनाने की जगह जीवन बचाने के लिए मजबूर करते हुए तैनात कर दिया है। कल्पना कीजिए कि अमेरिका ने अमेरिकियों की स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने के लिए इस तरह का क़दम कभी उठाया है!

द वॉल स्ट्रीट जर्नल, इस बात से भौंचक है कि जिस प्रकार से एक मुक्त बाज़ार प्रणाली को लगातार बढ़ावा दिया गया है, उस तरह से इस स्वास्थ्य प्रणाली ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में काम नहीं किया है, एक ऑपेड में वह लिखता है, "राशनिंग सेवा दिखाती है कि सरकार ने मौत के आगे घुटने टेक दिये हैं।" लेकिन दक्षिणपंथी थिंक टैंक हेरिटेज फ़ाउंडेशन के एक फ़ेलो और ऑप-एड लेखक एलन सी.गुएल्जो के पास मानक पूंजीवाद की ठहरी हुई उस समझ से परे कोई जवाब ही नहीं है, जिसमें कहा गया था कि हमें "सुधार, नवाचार, कल्पना" करने की ज़रूरत है।

महज इलाज और अस्पताल में भर्ती करा देना ही हमारी वह स्वास्थ्य सेवा नहीं है,जो किसी महामारी के सामने ख़ुद को पूरी तरह से अपर्याप्त दिखा रही है। दवा उद्योग, जिसने बहुत लंबे समय तक अमेरिकियों को लूटा है, वे इस समय दवाओं के लिए लोगों से बेरहमी से क़ीमतें वसूल रहा है, दिलचस्प बात है कि इन्हीं करदाताओं के पैसे की मदद से ये कंपनियां फली-फूली हैं।

आधुनिक इतिहास में सबसे खराब चिकित्सा संकट के बीच, दवा निर्माता कंपनी,गिलियड ने रेमेडिसविर के लिए जो क़ीमत तय की है,वह प्रति मरीज़ 3,120 डॉलर है, जो एक भारी भरकम राशि है, जबकि यह एक ऐसी दवा है, जिसने कोविड-19 के इलाज में मामूली कामयाबी दिखायी है। हैरानी की बात है कि यह वही कंपनी है, जिसने अपने शोध और विकास में अमेरिकी करों का अच्छा-ख़ासा इस्तेमाल किया है, लेकिन यही कंपनी ग़ैर-अमेरिकी रोगियों के लिए काफ़ी कम लागत पर रेमेडिसवीर का उत्पादन करने के लिए अमेरिका के बाहर जेनेरिक निर्माताओं को इस दवा का लाइसेंस दे रही है। 

संयुक्त राज्य अमेरिका में कोरोनोवायरस संकट की दिल दहला देने वाली सीमा की व्याख्या बहुत हद तक एक उदार आर्थिक नज़रिये से की गयी है। यह नज़रिया भी ठीक उसी प्रकार का है, जिसे एक के बाद एक आने वाले प्रशासनों ने हमारी स्वास्थ्य देखभाल की ज़रूरतों को पूरा करने में अपनाया है और इसे एक मशहूर कहावत की मदद से कहा जाय, तो कहा जा सकता है कि "सबसे मज़बूत व्यक्ति को ही ज़िंदा रहने का हक़" है। राष्ट्रीयकृत स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और आजीवन दवाओं के लिए एक आक्रामक लागत नियंत्रण तंत्र के माध्यम से अमेरिकियों के बचाव में नियम और कानून को लागू करने के बजाय अमेरिकियों को उनके नियोक्ताओं, स्वास्थ्य बीमा और दवा कंपनियों और निजी अस्पतालों की दया पर छोड़ दिया गया है। इसी तरह, अन्य देशों की तरफ़ से कामयाबी के साथ कोरोनावायरस के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए एक मज़बूत संघीय दृष्टिकोण को अपनाने के बजाय, ट्रम्प प्रशासन ने इस वायरस के फैलने को लेकर किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी से अपने हाथ खींच लिये हैं। लोगों को ख़ुद की रक्षा करने की ज़रूरत को लेकर मज़बूत संघीय दिशानिर्देशों के नहीं होने के चलते हास्यस्पद स्तर पर एक कई समुदायों, धर्मों और इसी तरह के अन्यू समूहों के बीच टकराहट पैदा हुई है, ऐसी ही हास्यास्पद स्थिति में फ़ॉक्स न्यूज़ पोषित रिपब्लिकन का दावा है कि सुरक्षात्मक फ़ेस मास्क की ज़रूरत वाले नियम-क़ायदे "शैतानी तौर-तरीक़ों को अपनाने" जैसे हैं।

इस तरह की अजीब-ओ-ग़रीब भाषा ओबामा प्रशासन के शुरुआती वर्षों के कथित "डेथ पैनलों" को लेकर सामने आये पागलपन की याद दिलाती है। उस कहावत का इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के सरकारी नियमों के सबसे मामूली हिस्से को एक परिदृश्य के रूप में रखने के लिए किया गया था, जहां टेक्नोक्रेट की निष्पक्ष कमेटी तय करेगी कि किसको जीना है या किसको मरना है। इस बात पर कभी विचार ही नहीं किया गया कि इस तरह की व्याख्या हमारी मौजूदा देखभाल प्रणाली के लिए ज़्यादा उपयुक्त था, जहां कॉर्पोरेट अधिकारी यह तय करते हों कि किस इलाज के लिए भुगतान करना है और किसे छोड़ देना है। जिस तरह एक दशक से अधिक समय पहले प्रगतिवादी बिल्कुल सही थे कि एक एकल-भुगतानकर्ता या सभी प्रणाली के लिए मेडिकेयर हमारी स्वास्थ्य देखभाल की जरूरतों को पूरा करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है, उसी तरह की सार्वभौमिक और मुफ्त स्वास्थ्य देखभाल योजना पर ज़ोर देना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और उपयुक्त है। शायद थोड़ी अनिच्छा के साथ स्वीकार करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स भी इस बात पर सहमत है, "एक एकल-भुगतानकर्ता प्रणाली, जिसमें एक इकाई (आमतौर पर संघीय सरकार) उम्र या रोज़गार की स्थिति की परवाह किए बिना हर नागरिक को इस दायरे में शामिल करती है, सरकार इस पर काम कर सकती है।" लेकिन, अब बहुत देर हो चुकी है?

अगर 2008 में या इसके बाद के दशक में यह देश एक अलग रास्ते पर चला होता, तो हम मौजूदा संकट से निपटने को लेकर बेहतर स्थिति में होते। मगर,हमारे इस मौजूदा विकट परिस्थितियों में स्वास्थ्य देखभाल के मुद्दे पर सही होना थोड़ा-बहुत आश्वास्त ज़रूर करता है।

 सोनाली कोल्हटकर, फ़्री स्पीच टीवी एण्ड पैसिफ़िका स्टेशन्स पर प्रसारित होने वाले टेलीविजन और रेडियो शो- “राइज़िंग अप विद सोनाली” की संस्थापक, मेजबान और कार्यकारी निर्माता हैं।

इस लेख को इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टिट्यूशन की एक परियोजना,इकोनॉमी फ़ॉर ऑल की तरफ़ से प्रस्तुत किया गया है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

The Merits of Medicare for All Have Been Proven by This Pandemic

Medicare for All
Medicare
Universal Health Care
COVID-19
Coronavirus
privatisation of health

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • Sitaram Yechury
    संदीप चक्रवर्ती
    स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करने एवं हिंदू राष्ट्र को नए सिरे से आगे बढ़ाने की संघ परिवार की योजना को विफल करें: येचुरी 
    25 Feb 2022
    माकपा महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का “फोकस 5 अगस्त को देश की वास्तविक स्वतंत्रता की तारीख के रूप में बढ़ावा देने पर है।"  
  • russia ukrain
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन पर रूस के हमले से जुड़ा अहम घटनाक्रम
    25 Feb 2022
    यूरोपीय संघ रूस पर और आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने को सहमत। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र ने यूक्रेन में मानवीय सहायता के लिए दो करोड़ डॉलर देने की घोषणा की।
  • ASHA Workers
    अनिल अंशुमन
    बिहार : आशा वर्कर्स 11 मार्च को विधानसभा के बाहर करेंगी प्रदर्शन
    25 Feb 2022
    आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में भी टाल मटोल कर रही है। कार्यकर्ताओं ने ‘भूखे रहकर अब और नहीं करेंगी बेगारी’ का ऐलान किया है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    25 Feb 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 94 हज़ार 345 हो गयी है।
  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : अयोध्या के प्रस्तावित  सौंदर्यीकरण में छोटे व्यापारियों की नहीं है कोई जगह
    25 Feb 2022
    अयोध्या के व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित लेआउट के परिणामस्वरूप दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त या उन दुकानों का ज़्यादातर हिस्सा तोड़ दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License