NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार में पुलिस बल के हाथों क्यों कुचली गयी विधायिका?
कई सवाल हैं जो एक दूसरे से पूछने की जरूरत है कि क्या जिस बिहार सशस्त्र पुलिस बल विधेयक को 23 मार्च को पास कराया गया उसे पास कराने से पहले विपक्ष की आपत्तियों का समाधान नहीं होना चाहिये था? विपक्ष ने बहस से बदले सदन को अराजक बनाने का रास्ता क्यों चुना? क्या सदन की अराजकता मार्शल से नियन्त्रित नहीं हो सकती थी?

पुष्यमित्र
24 Mar 2021
bihar

"डीएम ने कहा, इसे मारो। एसपी ने मेरी छाती पर बूट से हमला किया। मैं बुरी तरह जख्मी हो गया हूं। मगर यह हमला मेरे ऊपर नहीं, लोकतंत्र पर हमला है।"

कांग्रेस विधायक सत्येन्द्र सिंह ने यह बात मंगलवार को मीडिया से उस वक्त कही जब वे स्थानीय प्रशासन द्वारा विधानसभा से बाहर निकाल दिये गये थे। उन पर ही नहीं विपक्ष के कई विधायकों पर पटना जिला प्रशासन से जुड़े लोगों ने और पुलिसकर्मियों ने जमकर हाथापाई की। महिला विधायकों को भी बख्शा नहीं गया। विधायकों को स्ट्रेचर पर बाहर निकाला गया। यह सब उस बिहार में हुआ जो बड़े गर्व से खुद को दुनिया का पहला लोकतंत्र बताता है।

कांग्रेस विधायक सत्येन्द्र सिंह की टिप्पणी इसलिये भी वाजिब लगती है क्योंकि यह देश के लोकतंत्र की ऐसी पहली घटना है जब विधायकों को नियन्त्रित करने के लिये जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन को सदन में बुलाया गया। प्रशासन के लोगों ने विधायकों की पिटाई इस तरह की जैसे अपराधियों की की जाती है। इससे पहले सम्भवतः कभी देश की किसी विधायिका में पुलिस प्रशासन को घुसकर कार्रवाई करने की इजाजत नहीं मिली थी।

बिहार में राजनीतिक मसलों पर बारीक निगाह रखने वाली पत्रकार, ई समाद पत्रिका की सम्पादक कुमुद सिंह कहती हैं, अब तक हमने देश की विभिन्न विधानसभाओं में विधायकों के बीच हाथापाई, माइक और मेज तोड़ने और आपस में हिंसक हमले के खूब सारे मामले देखे हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक की विधानसभाओं में तो हिंसा के रिकॉर्ड टूट जाया करते हैं। मगर हमने कभी नहीं सुना कि वहां अन्दर पुलिस को बुलाया गया हो।

विधानसभा के भीतर व्यवस्था बनाने के लिये मार्शल होते हैं। वे प्रशिक्षित होते हैं और सम्मानित तरीके से विधायकों पर बल प्रयोग करते हैं। विधायक जरूर कहते हैं कि उन्हें मार्शल की मदद से बाहर फिंकवा दिया गया। मगर मार्शल के प्रयोग से विधायकों की गरिमा बनी रहती है। मगर कल स्थानीय पुलिस बल का जो प्रयोग विधायकों के साथ किया गया वह उनकी गरिमा और उनके साथ साथ विधायिका की गरिमा पर भी हमला था। पक्ष विपक्ष की राजनीति में उलझे विधायकों को यह बात बहुत देर बाद समझ आयेगी कि इससे एक गलत परम्परा की शुरुआत हो गयी है। अब कोई सत्ताधारी पुलिस बल के प्रयोग से विधानसभा में अपनी मनमानी कर पायेगा। यह विधायिका के अधिकार को कम करने वाला कदम है 

हालांकि सत्ता पक्ष के हिसाब से इसमें कुछ गलत नहीं हुआ है। उनका कहना है कि विधानसभा में स्थितियां इतनी अनियंत्रित हो गयी थीं कि मार्शल से विधायक कंट्रोल नहीं हो पा रहे थे। निश्चित तौर पर मंगलवार को जो घटा उसमें विपक्ष की भूमिका भी बहुत सराहनीय नहीं थी। उनका प्रदर्शन काफी उग्र था। उन पर विधानसभा अध्यक्ष को बन्धक बनाने और खुद विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ कर वोटिंग कराने तक के आरोप हैं। यह सब किसी भी दृष्टि से विधायिका की गरिमा के अनुकूल नहीं रहा। 

मगर जैसा कि कुमुद सिंह कहती हैं विधानसभा में विधायकों द्वारा हंगामे की घटनायें अब अक्सर सुनने को मिल जाती हैं। कल, मंगलवार को विधानसभा में जो कुछ नया घटा वह प्रशासन के लोगों का वहां घुस कर विधायकों से मार पीट करना ही था।

यह विचारणीय तथ्य है कि क्या मंगलवार, 23 मार्च को जो कुछ बिहार विधानसभा में हुआ वह सचमुच ऐसा था कि वह मार्शल से नियन्त्रित नहीं हो सकता था। क्या इससे अधिक अराजकता देश में किसी विधानसभा में नहीं हुई? यह सवाल विधानसभा अध्यक्ष को खुद से पूछने की जरूरत है।

दुखद तथ्य यह है कि यह सब उस बिहार में हो रहा है जो खुद को लोकतंत्र की जननी कह कर इतराता है। वह कहता है कि उसे लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का 2500 साल पुराना अनुभव है जब वैशाली में गणतंत्र की व्यवस्था लागू थी।

क्यों हो रहा है बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 का विरोध?

इस विधेयक के मुताबिक किसी को गिरफ्तार करने के लिए वारंट या मजिस्ट्रेट की इजाजत की जरूरत नहीं होगी। विशेष सशस्त्र पुलिस बिना वारंट के किसी की तलाशी कर सकेगी, इसका विरोध नहीं कर सकते। इन मामलों में कोर्ट संज्ञान नहीं ले सकती। न ही कोई हस्तक्षेप कर सकती है। विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के बाद सरकार को अपने विरोधियों को परेशान करने का अधिकार मिल जायेगा। वह संदेह के आधार पर किसी को गिरफ्तार कर लेगी।

सरकार का तर्क

यह बिल बिहार सैन्य पुलिस (BMP) की भूमिका का ही विस्तार है। बिहार तेजी से विकास कर रहा है, सांस्कृतिक महत्व के स्थलों, विद्युत संयंत्रों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। औद्योगिक ईकाइयां, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डा, मेट्रो रेल की सुरक्षा के लिए सशस्त्र पुलिस बल जरूरी है। ऐसा नहीं है कि बिहार ने अलग से ऐसा कोई कानून बनाया है। देश के अलग अलग राज्यों में इस तरह के कानून हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सदन को बताया कि सम्भवतः अधिकारियों ने इसके बारे में मीडिया को ठीक से नहीं बताया इसी वजह से इसकी गलत व्याख्या हो रही है। यह एक चूक है।

आज भले सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप लगायें मगर यह बात दोनों कह रहे हैं कि कल का दिन बिहार के लोकतंत्र का काला दिन था। जो घटा वह शर्मनाक था।

कई सवाल हैं जो एक दूसरे से पूछने की जरूरत है कि क्या जिस बिहार सशस्त्र पुलिस बल विधेयक को 23 मार्च को पास कराया गया उसे पास कराने से पहले विपक्ष की आपत्तियों का समाधान नहीं होना चाहिये था? विपक्ष ने बहस से बदले सदन को अराजक बनाने का रास्ता क्यों चुना? क्या सदन की अराजकता मार्शल से नियन्त्रित नहीं हो सकती थी? क्या पुलिस बल को सदन में बुलाना इतना जरूरी था? इतने मतभेद के बाद भी आखिर विपक्ष की गैरहाजिरी में उस बिल को पास कराना जरूरी था? क्या अब सरकारें इसी तरह पुलिस को बुलाकर विवादित बिलों को पास कराया करेंगी? 

(लेखक पटना स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

Bihar
Bihar government
Bihar Assembly
Nitish Kumar
RJD
jdu

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर एक हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 71 मरीज़ों की मौत
    06 Apr 2022
    देश में कोरोना के आज 1,086 नए मामले सामने आए हैं। वही देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार 871 रह गयी है।
  • khoj khabar
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, देश के ख़िलाफ़ है ये षडयंत्र
    05 Apr 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने दिल्ली की (अ)धर्म संसद से लेकर कर्नाटक-मध्य प्रदेश तक में नफ़रत के कारोबारियों-उनकी राजनीति को देश के ख़िलाफ़ किये जा रहे षडयंत्र की संज्ञा दी। साथ ही उनसे…
  • मुकुंद झा
    बुराड़ी हिन्दू महापंचायत: चार FIR दर्ज लेकिन कोई ग़िरफ़्तारी नहीं, पुलिस पर उठे सवाल
    05 Apr 2022
    सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि बिना अनुमति के इतना भव्य मंच लगाकर कई घंटो तक यह कार्यक्रम कैसे चला? दूसरा हेट स्पीच के कई पुराने आरोपी यहाँ आए और एकबार फिर यहां धार्मिक उन्माद की बात करके कैसे आसानी से…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमपी : डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे 490 सरकारी अस्पताल
    05 Apr 2022
    फ़िलहाल भारत में प्रति 1404 लोगों पर 1 डॉक्टर है। जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मानक के मुताबिक प्रति 1100 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए।
  • एम. के. भद्रकुमार
    कीव में झूठी खबरों का अंबार
    05 Apr 2022
    प्रथमदृष्टया, रूस के द्वारा अपने सैनिकों के द्वारा कथित अत्याचारों पर यूएनएससी की बैठक की मांग करने की खबर फर्जी है, लेकिन जब तक इसका दुष्प्रचार के तौर पर खुलासा होता है, तब तक यह भ्रामक धारणाओं अपना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License