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क्यों कोविड-19 की लड़ाई में टार्गेटेड नज़रियो की ज़रूरत है ?
पूरे देश में कम्प्लीट लॉकडाउन बहुत अधिक दिनों तक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।  ऐसा करने से बहुत अधिक नुकसान होगा। इसलिए सरकार को कोविड- 19 से लड़ाई में उन तरीकों के बारें में सोचना चाहिए जो टार्गेटेड हो।
बी सिवरामन
05 Apr 2020
कोरोना वायरस
Image courtesy:The Economic Times

प्रधानमंत्री द्वारा घोषित लॉकडाउन का अन्त अप्रैल 14 तक होना है। फिर क्या? प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार लॉकडाउन में क्रमशः ढील दी जाएगी।   फिर भी जिस रफ्तार से केस बढ़ रहे हैं और मौतें हो रही हैं, सरकार खुद कुछ तय कर पाने की स्थिति में नहीं है कि आगे लॉकडाउन को किस तरह से लागू किया जाएगा।  आखिर हम ऐसे वायरस का मुकाबला कर रहे हैं, जहां न तो महामारी के अंत का पता है न ही कोई भविष्यवाणी संभव है।

परन्तु लॉकडाउन से कुछ सीख ली जा सकती है और सोशल डिस्टैन्सिंग को और बेहतर किया जा सकता है। प्रवृत्तियों को देखते हुए, कुछ विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि देशव्यापी लॉकडाउन को जारी रखने से बेहतर परिणाम नहीं मिलेंगे।उनका मानना है कि सरकार को लक्षित दृष्टिकोण यानि टार्गेटेड  एप्रोच अपनाना चाहिये। पूरी तरह से तबतक लाभ नहीं होगा जब तक उसके साथ और भी पूरक कदम नहीं उठाए जाते, जैसे बड़े स्तर पर टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग  लक्षण वाले व्यक्तियों का तुरंत क्वारनटाइन, सामाजिक सुरक्षा का प्रबंध, और इससे भी बढ़कर रोकथाम में सामुदायिक भागीदारी।

आखिर है क्या यह लक्षित दृष्टिकोण? और कौन से कदम उठाने होंगे महामारी के रोकथाम की दिशा में? हमने ये प्रश्न चेन्नई के कुछ चिकित्सकों के सामने रखे और हम उनके विचारों को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

सबसे पहले तो आम सहमति बन रही है कि बुज़ुर्गों को हाइ रिस्क केटेगरी  माना जाए और उनपर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाए। खासकर, ऐसे बुज़ुर्ग, जिन्हें दमा या अन्य श्वास रोग हैं, वे लोग जो मधुमेह या हृदयरोग के मरीज हैं। चिकित्सक इसे को-मोर्बिडीटी  का नाम देते हैं। चेन्नई के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल के एक चिकित्सक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आज सरकार के पास निजी व सरकारी अस्पतालों  से जनता के विभिन्न श्रेणियों में असंक्रामक और संक्रामक रोग वालों के बारे में सारे आंकड़े प्राप्त हैं, तो उसे चाहिये कि इन अतिसंवेदनशील तबकों के लिए विशेष सुरक्षात्मक उपाय इजात करे। उदाहरण के लिए, यूके में बुज़ुर्गों को अलग किया जाता है और शुरुआत में उन लोगों को पत्र लिखकर ‘क्या करें, क्या न करें’ बताया जाता है जो chronic and co-morbid स्थिति में हैं।

जर्मनी जैसे अन्य यूरोपीय देशों में, उनकी विशेष तौर पर स्क्रीनिंग की जाती है। ऐसे लोगों में जो अतिसंवेदनशील हैं, उन सभी का परीक्षण होता है और उनकी सुरक्षा हेतु उन्हें क्वाटंटाइन करने में तनिक भी देरी नहीं की जाती, भले ही उनमें कोई गंभीर लक्षण न दिखाई पड़ें और वे टेस्ट करने पर भी कोविड-संक्रमित न पाए गए हों। यह इसलिए कि उन्हें वायरस से बचाए रखा जाए। इसे shielding procedure कहा जाता है।

पूरी तरह से लॉकडाउन  की जगह यदि ऐसा लक्षित दृष्टिकोण अपनाया जाता तो निश्चित ही बेहतर परिणाम मिलते। मसलन, इटली में देखा गया कि कोविड-19 से संक्रमित लोगों में मृत्यु दर 0.66 प्रतिशत है पर 85 वर्ष आयु से अधिक वाले, जिनमें दमा, मधुमेह और हृदय रोग है, उनकी मृत्यु दर कहीं ज्यादा है। इसलिए उन्हें shielding procedure देकर बचाया जा सकता है, यह स्पष्ट है।

दूसरा मुद्दा है कि संभावित वायरस-संक्रमित केस की परिभाषा क्या हो? वर्तमान समय में तीन श्रेणियां हैं, जिन्हें हाई-रिस्क-ग्रुप कहा जाएगा, जिन्हें स्क्रीनिंग और ,मॉनिटरिंग  के लिए चिन्हित किया जाना चाहियेः 1. वे जो विदेश से भारत में आए हैं, 2. वे जो इन बाहर से आए लोगों के नज़दीकी संपर्क में आये या ऐसे लोगों के संपर्क में आए जिनका यात्रा-इतिहास नहीं था पर टेस्ट से संक्रमित पाए गए, 3.जिनमें खांसी, बुखार और सांस लेने में दिक्कत,आदि जैसे गंभीर लक्षण देखने को मिले। अब इन सबको भी नीतिगत तौर पर टेस्ट नहीं किया जा रहा।

यह स्पष्ट है कि लॉकडाउन नहीं, टेस्टिंग ही कोविड के रोकथाम की कुंजी है। हाॅलैंड में व्यापक सामुदायिक टेस्टिंग हुई और पता चला कि बिना लक्षण वाले लोगों में बड़ी संख्या टेस्ट में संक्रमित पायी गई! ऐसे लोगों में 50-60 प्रतिशत लोगों में कुछ हल्के किस्म का संक्रमण पाया गया। पर इन्हें भी अलग करके quarantine में डाला गया। चिकित्सकों का मानना है कि व्यापक टेस्टिंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि कई मरीजों में लक्षण प्रकट नहीं होते पर उन्हें हल्का या निष्क्रिय संक्रमण हो सकता है, जो आक्रामक रूप न ले रहा हो, जिससे कि अस्पताल में भर्ती होने या आईसीयू में रहने की नौबत आए। पर ये लोग दूसरों को वायरस देते रह सकते हैं, और यदि संक्रमण के दायरे में आने वालों की प्रतिरोधक क्षमता कम है, या वे chronic रोग वाले बुज़ुर्ग हैं, तो उनमें गंभीर लक्षण आ सकते हैं, जिससे उनकी मौत तक हो सकती है।

आइसलैंड में संपूर्ण जनसंख्या का परीक्षण हुआ, और देखा गया कि निष्क्रिय केसों में से केवल 1 प्रतिशत में लक्षण पाए गए। कुछ संशयवादी कहेंगे कि आइसलैंड जैसे कम जनसंख्या वाले देश में पूरे देश के लोगों का परीक्षण संभव हो सकता है, पर भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में यह व्यवहारिक नहीं होगा। तो इसका भी उपाय है-सरकार उन क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर संपूर्ण सामुदायिक परीक्षण करवाए जहां से नए केसों का पता चल रहा हो; दूसरे इलाकों में लक्षित टेस्टिंग करे, जो random sampling पर आधारित हो, जैसे कि सारे न्युमोनिया वाले या उसके लक्षण प्रदर्शित करने वाले, या फिर अन्य co-morbid स्थिति वाले।

यानि मूल बात है समय से परीक्षण। केरल में जब 30 जनवरी 2020 को पहला test-positive मामला सामने आया था, उसी समय से सरकार को सामुदायिक परीक्षण शुरू कर देना चाहिये था-केवल screening से काम नहीं चलाना चाहिये था-कम-से-कम उन क्षेत्रों में जहां संक्रमण की संभावना थी। इसे स्थानीय स्तर पर अगले ही दिन से किया जाना चाहिये था। जैसे, वूहान् में पहले केस के पता लगने और एक विलक्षण करोनावायरस के चिन्हित होते ही, ठीक अगले दिन से सामुदायिक परीक्षण शुरू हो गया। पर भारत में संशय वाले मामलों का परीक्षण मध्य मार्च से प्ररंभ हुआ और अश्चर्य की बात है कि अप्रैल के प्रथम सप्ताह में प्रवेश करके भी हमारे देश में केवल 15,000 टेस्ट हुए हैं।

सरकार का दावा है कि भारत में अब तक सामुदायिक संक्रमण नहीं हुआ है। पर ऐसे दावे और यह दावा कि सभी मामले यात्रा संबंधित हैं तथ्यों पर आधारित होने चाहिये, यानि परीक्षण के परिणमों के आधार पर प्रमाणित होने चाहिये। संपूर्ण समुदाय का परीक्षण इसलिए भी आवश्यक है कि इससे पता चल जाएगा कि किनके शरीर में antigens पैदा हो गए हैं (ये वे जीवित वायरस हैं जो हमारे शरीर के प्रतिरोधक तंत्र को antibodies पैदा करने हेतु प्रेरित करते हैं), या जिनमें केवल antibodies हैं। जर्मनी में इन दोनों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वे केस भी, जिनमें वायरस का खतरा समाप्त हो चुका है और शरीर में केवल antibodies पाए गए हैं, बीते पखवाड़े में दूसरों को संक्रमण दे चुके होंगे, तो इन्हें और इनके संपर्क में आये लोगों को केवल सामुदायिक-परीक्षण के माध्यम से ही track किया जा सकता है। व्यक्तिगत संक्रमण की भांति सामुदायिक संक्रमण भी एक समय तक निष्क्रिय रह सकता है।

परीक्षण बढ़ाने के बजाय सरकार लोगों को self-quarantine का निर्देश दे रही है। पर बंगलुरु जैसे मेट्रो शहर में भी 40 प्रतिशत जनसंख्या एक कमरे वाली झोपड़पट्टियों में रहती है। इनमें परिवार के 5-6 सदस्य ठुंसे हुए रहते हैं; तो ऐसे कमरों में क्वारंटाइन कैसे सफल होगा?

इसलिए, यह आवश्यक है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का अधिसंरचनात्मक ढांचा युद्ध स्तर पर विस्तारित किया जाय। सैद्धान्तिक तौर पर किसी महामारी में यह संभव है कि 3-4 प्रतिशत जनसंख्या संक्रमित हो जाए और उसे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़े। इसके मायने हैं कि हमें 3-4 करोड़ वेंटिलेटरों की आवश्यकता होगी! नर्सों की जांच और इलाज में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है जितनी डाक्टरों की, पर भारत में नर्स-मरीज अनुपात जरूरत से बेहद कम है। अस्पतालों में बेड भी जरूरत से काफी कम हैं। सरकार को प्राथमिक चिकित्सीय सेवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। जिन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण और निगमीकरण हुआ है वे महामारी की स्थिति में असफल साबित हुए हैं और इटली में तो अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले जीवन प्रत्याशा भी कम है।

एक और बात-समुदाय में ही रोकथाम हो और अस्पतालों पर अति-निर्भरता न हो, क्योंकि अस्पतालों से आने वाले संक्रमण कई बार करोनावायरस से भी घातक होते हैं। लॉकडाउन के फलस्वरूप जो नुक्सान हो रहा है वह इतना अधिक है कि दूसरे पहलू, जैसे अन्य बीमारियों का बढ़ना व कई किस्म की परेशानियां नज़रंदाज़ की जा रही हैं।

दुर्भाग्यवश कोविड संकट ने अलग किस्म का स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है। आम चिकित्सीय मामले और क्रोनिक केसेस  पर कौन ध्यान दे? अस्पतालों के तमाम मरीजों को पास दिये जाने चाहिये और आवश्यक दवाओं को घर तक पहुंचाया जाना चाहिये, खासकर वृद्ध नागरिकों को, जिन्हें  असंक्रामक बीमारियां है। हमारे पास आशा कर्मियों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा देने वालों की फौज है ही। अस्पतालों में मरीजों को लम्बी लाइनों में खड़ा होने से बचाया जा सकेगा, क्योंकि सभी चिकित्सक कोविड और आपात्कालीन सेवाओं में व्यस्त हैं। रोकथाम के साथ सामाजिक सुरक्षा अनिवार्य है ताकि लोग भुखमरी के शिकार न हों।

आवश्यक सेवा देने वाले स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉयज , मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों और बाल-आश्रमों में रहने वाले, हाॅस्टलों और पीजी में फंसे लोगों, रेड़ी-ठेले वालों और दुकानों में काम कर रहे लोग भी हाई रिस्क वाली श्रेणी में आते हैं और सरकार उनकी सुरक्षा कैसे करे हम आगे चर्चा करेंगे।

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