NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
बात बोलेगी: क्या मामला सिर्फ़ जेएनयू को निपटाना है?
भाजपा के शासनकाल में हिंसक भीड़ तंत्र को जिस तरह से बढ़ावा दिया गया है, उसकी बेशर्म बानगी जेएनयू में दिखाई दी। ज्ञान के केंद्रों पर हिंसा एक ख़ौफ़नाक़ दौर के आने की चेतावनी है।
भाषा सिंह
07 Jan 2020
JNU
Image courtesy: FPJ

दिल्ली चुनावों के लिए जिस दिन देश के गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में प्रचार शुरू किया उसी दिन शाम-रात में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में नकाबपोश लोगों ने पुलिस की छत्रछाया में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं पर हमला बोला, शिक्षकों के सिर फोड़े। क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था कि दोनों चीजें एक ही दिन में घटित हुईं।

पांच जनवरी को दिल्ली में भाजपा बूथ कार्यकर्ता सम्मेलन में अमित शाह ने जेएनयू को लेकर एक बार फिर टुकड़े-टुकड़े गैंग का जिक्र किया। इससे पहले 26 दिसंबर को दिल्ली के ही एक कार्यक्रम में भी अमित शाह ने यही कहा था कि 'दिल्ली की टुकड़े-टुकड़े गैंग को सबक सिखाया जाना चाहिए।'

जेएनयू के ख़िलाफ़ नफ़रत को देश के शीर्ष पर बैठे दो नेताओं ने लंबे समय से हवा दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान से दिल्ली चुनाव प्रचार का जो आगाज किया था, उसमें भी छात्रों के नागरिकता संशोधन कानून पर उमड़े आक्रोश को अर्बन नक्सल कह कर पुलिस की बर्बर कार्रवाई को जायज ठहराया था।

सवाल यह है कि आखिर जेएनयू में खुलेआम इस तरह की हिंसा कराकर आख़िर हासिल क्या करना चाहती है सत्ता।

जेएनयू में हिंसा से पहले अमित शाह ने 'सबक' सिखाने वाली बात को बार-बार दोहराया। उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा 'कांग्रेस का टुकड़े-टुकड़े गैंग लोगों के बीच भ्रम फैलाने में लगा हुआ है। ये लोग दिल्ली के शांतिपूर्ण माहौल को अशांत करने पर तुले हुए हैं। ऐसे सभी लोगों को सबक सिखाने का वक्त आ चुका है'। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का समर्थन करते हैं।

...और कुछ ही घंटे के भीतर नकाबपोश गैंग सबक सिखाने के लिए जेएनयू में लोहे की छड़, हथौड़ा , लट्ठ लेकर पहुंच गये थे। और अगर ध्यान दीजिये की ये हिंसक गैंग क्या नारे लगा रहा था, तो कोई भ्रम ही नहीं रह जाएगा—गोली मारो सालो को, देश के गद्दारों को, नक्सलवाद की कब्र खुदेगी जेएनयू के प्रांगण में, खींच-खींच कर लाएंगे, यहीं पर निपटाएंगे, टुकड़े-टुकड़े गैंग को...ये हिंसा और खून के लिए उकसाने वाले नारे दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में लग रहे थे। पुलिस मूक दर्शक बनी हुई थी, मानो कह रही हो –तुम हिंसा करो हम तुम्हारे साथ हैं--। ये नारे एक विशेष किस्म की राजनीति के खिलाफ नफ़रत से भरे हुए थे। जेएनयू जिस वाम-प्रगतिशील विचारधारा का प्रतीक है, उसे निपटाने के प्रतीक थे।

क्या मामला सिर्फ जेएनयू को निपटाना है। जिस तरह से जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को टारगेट किया गया, उसी तरह से जेएनयू को निशाने पर लिया गया। मामला सिर्फ इतना नहीं दिख रहा। जिस तरह से नागरिकता संशोधन कानून पर हिंदू-मुस्लिम विभाजन करने की नापाक कोशिश सरकार ने की, उसी तरह से दिल्ली में जेएनयू के खिलाफ नफ़रत को हवा देकर दिल्ली के मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने की साजिश दिखाई दे रही है। इसका आभास जेएनयू में बर्बर हमले और जेएनयू अध्यक्ष के सिर फूटने की निंदनीय घटना के एक दिन बाद देश की राजधानी में कई जगहों पर हुआ।

एक राष्ट्रीय बैंक की मैनेजर ने बहुत ही आत्मविश्वास से कहा, और पिटाई होनी चाहिए थी इनकी। "ये साले पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते, मस्ती काटते हैं। सारी ऐंठ निकल जाएगी।" यह कहते कहते कहते उस बैंक मैनेजर ने अपने घर पर फोन मिलाते हुए घर में अपने बच्चे का हाल-चाल पूछा। फिर फोन रखकर दोबारा बोला—इन्हें और पीटना चाहिए, तभी दिमाग ठिकाने आएगा...वह क्रिस्टीना कौन था—टुकड़े-टुकड़े गैंग वाला—उसे भी निपटाना जरूरी है---यह सब सुनते हुए मैं सोच रही थी कि क्या ये वोटर जुटाने के लिए मिशन का हिस्सा है। जेएनयू के बारे में एक खास किस्म की नकारात्मक छवि गढ़ने में भाजपा-संघ और उसके आनुषांगिक संगठन सफल रहे हैं। एक ही तरह का प्रचार-प्रसार हिंसा की इस वारदात के बाद भी व्हाट्सऐप नेटवर्क फैला रहे हैं।

इन व्हाट्सऐप संदेशों के जरिए 100 फीसदी झूठ फैलाया जा रहा है और वह लोगों को हिंसा के पक्ष में खड़ा कर रहा है। आज एक कार ड्राइवर ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा, इस यूनिवर्सिटी में पढ़ाई नहीं होती, धंधा होता है। मैंने खुद देखा है...यहां अमीरजादे पढ़ते हैं, जो देश के खिलाफ काम करते हैं.....और शाम को तकरीबन यही तर्क ऑटोवाले ने कहा। जब उनसे मैंने पूछा कि कहां से पता चला तो उन्होंने कहा कि सब कुछ फोन पर मिल जाता है। फिर वह एक वीडियो का जिक्र करने लगे, जिसमें दिखाया गया कि किस तरह से लाल झंडे वाले पहले खुद मार रहे थे और बाद में खुद को चोट लगाकर चिल्ला रहे थे...। ऑटो वाले और कार ड्राइवर...दिल्ली के वोटर हैं और उनका मानना है कि जेएनयू में देशद्रोही के खिलाफ कार्रवाई होनी जरूरी है।

अब देखिए रेडियो के एफएम चैनल भी तकरीबन इसी तरह से का प्रचार दिन भर करते रहे। अलग-अलग ढंग से वह एक तरफ कहते कि हिंसा तो सही नहीं है लेकिन कैम्पस में राजनीति नहीं होनी चाहिए। वे कहते हैं, "कैम्पस में राजनीतिक पार्टियों की इंट्री होनी ही नहीं चाहिए।"

ये सारा प्रचार नौजवानों के गुस्से को, यूनिवर्सिटी को, सरकार की गलत नीतियो के खिलाफ उठ रही आवाजों को आपराधिक बताने का काम कर रहा है। यहां गुस्सा हिंसा करने वालों पर नहीं, कैम्पस में पढ़ने वालों पर मोड़ दिया गया।

एक और अहम संकेत इस घटना से मिलता है। यह लिचिंग भीड़ थी, जो जेएनयू में उतरी। कैम्पस में उतरी इस भीड़ को भी उसी तरह से सत्ता का वरदहस्त मिला हुआ था, जैसे गाय के नाम पर हिंसा करने वाली भीड़ को मिला होता है। वे भी हिंसा सरेआम करते हैं, यहां भी नकाबपोश सरेआम जेएनयू में घूम-घूम कर विद्यार्थियों-अध्यापकों का खून बहा रहे थे और कोई नहीं पकड़ा गया। सारे के सारे भाग गये। मेन गेट पर योगेंद्र यादव के साथ अभद्रता करने वाले गुंडों के पीछे पुलिस खड़ी थी, लेकिन पकड़ा किसी को नहीं गया, रोका किसी को नहीं गया। भाजपा के शासनकाल में हिंसक भीड़ तंत्र को जिस तरह से बढ़ावा दिया गया है, उसकी बेशर्म बानगी जेएनयू में दिखाई दी। ज्ञान के केंद्रों पर हिंसा एक ख़ौफ़नाक़ दौर के आने की चेतावनी है।

JNU
Attack on JNU
JNUSU
JNUTA
BJP
Lynching
Delhi Elections
Delhi Assembly Election 2020
politics

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल


बाकी खबरें

  • लाल बहादुर सिंह
    सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 
    26 Mar 2022
    कारपोरेटपरस्त कृषि-सुधार की जारी सरकारी मुहिम का आईना है उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित कमेटी की रिपोर्ट। इसे सर्वोच्च न्यायालय ने तो सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन इसके सदस्य घनवट ने स्वयं ही रिपोर्ट को…
  • भरत डोगरा
    जब तक भारत समावेशी रास्ता नहीं अपनाएगा तब तक आर्थिक रिकवरी एक मिथक बनी रहेगी
    26 Mar 2022
    यदि सरकार गरीब समर्थक आर्थिक एजेंड़े को लागू करने में विफल रहती है, तो विपक्ष को गरीब समर्थक एजेंडे के प्रस्ताव को तैयार करने में एकजुट हो जाना चाहिए। क्योंकि असमानता भारत की अर्थव्यवस्था की तरक्की…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,660 नए मामले, संशोधित आंकड़ों के अनुसार 4,100 मरीज़ों की मौत
    26 Mar 2022
    बीते दिन कोरोना से 4,100 मरीज़ों की मौत के मामले सामने आए हैं | जिनमें से महाराष्ट्र में 4,005 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा गया है, और केरल में 79 मरीज़ों की मौत के संशोधित आंकड़ों को जोड़ा…
  • अफ़ज़ल इमाम
    सामाजिक न्याय का नारा तैयार करेगा नया विकल्प !
    26 Mar 2022
    सामाजिक न्याय के मुद्दे को नए सिरे से और पूरी शिद्दत के साथ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने के लिए विपक्षी पार्टियों के भीतर चिंतन भी शुरू हो गया है।
  • सबरंग इंडिया
    कश्मीर फाइल्स हेट प्रोजेक्ट: लोगों को कट्टरपंथी बनाने वाला शो?
    26 Mar 2022
    फिल्म द कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग से पहले और बाद में मुस्लिम विरोधी नफरत पूरे देश में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है और उनके बहिष्कार, हेट स्पीच, नारे के रूप में सबसे अधिक दिखाई देती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License