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कोविड-19 के आने से बाक़ी सभी बीमारियां ख़त्म तो नहीं हो गईं न?
“लॉकडाउन के दो महीने और मेरा दवाख़ाना” यह कहानी है एक डॉक्टर की, जिन्होंने इस संकट के समय में भी अपना क्लीनिक लगातार खोले रखा और मरीज़ों का इलाज किया। हमारे आग्रह पर उन्होंने अपने अनुभव लिखे। हालांकि उनका मानना है कि उन्होंने कोई बहादुरी का काम नहीं किया है जो उन्हें वॉरियर इत्यादि कहा जाए या ताली बजाई जाए। उनके मुताबिक जैसे दूध-ब्रैड और राशन की दुकान वाले बहादुरी दिखा रहे थे। दवा की दुकानें खुल रही थीं। बैंक वाले काम कर रहे थे। पत्रकार काम कर रहे थे, वैसे ही बस वे भी अपना काम कर रहे थे।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
29 May 2020
कोरोना वायरस
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : healthline

लॉकडाउन के दो महीने पूरे हो चुके हैं। चौथा चरण भी ख़त्म होने जा रहा है। लॉकडाउन की शुरुआत, हम दिल्ली वाले कह सकते हैं, 22 मार्च से यानी कि जनता कर्फ़्यू के दिन से ही हो गई थी। 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू के साथ ही अगले 31 मार्च तक के लिए राज्य स्तर पर पाबंदियां लग गईं थीं। लेकिन इसके बाद 24 मार्च की रात आठ बजे घोषणा कर दी गई कि रात के बारह बजे से ही पूरे देश में 21 दिन का सम्पूर्ण लॉकडाउन (तालाबंदी) लागू है। अचानक किये गए इस लॉकडाउन से सभी लोग अचंभित रह गये। कोरोना के संकट के बारे में पता था और उससे निपटने के लिए एक औजार के रूप में लॉकडाउन की बातें की जा रही थीं। कुछ देशों में लागू भी हुआ था पर हमारे देश में जिस तरह से अचानक ही लागू हुआ, न तो शायद किसी को उम्मीद थी और न शायद ही इतना अचानक कहीं और लागू हुआ होगा।

लॉकडाउन की घोषणा भी प्रधानमंत्री जी द्वारा आदतन रात को आठ बजे ही की गई। लॉकडाउन लगना तो था ही पर इतना जल्दी और इतना अचानक, इसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। 24 मार्च को रात आठ बजे, जब मोदी जी ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की, उस समय मैं अपने दवाखाने में मरीज़ देख रहा था। किसी मरीज़ ने ही बताया कि रात बारह बजे से पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई है। जब नोटबंदी की घोषणा की गई थी तब भी मैं इसी तरह अपने दवाखाने में ही मरीज़ देख रहा था और तब भी किसी मरीज़ ने ही मुझे नोटबंदी की सूचना दी थी। उस समय जब तक मुझे उस सूचना पर विश्वास होता, कई लोग मुझे हजार और पुराना पांच सौ का नोट थमा चुके थे।

खैर देश में लॉकडाउन यानी तालाबंदी की घोषणा कर दी गई थी। अपना दवाख़ाना बंद करते समय मैंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों से कहा कि कल सुबह आना है और तब निश्चय करेंगे कि आगे क्या करना है। घर पहुंच मैंने भोजन आदि से निवृत्त हो इस बारे में पत्नी और साथ रह रहे बेटे से विमर्श किया। उनका कहना था कि क्लीनिक क्यों नहीं खोला जाना चाहिए। क्लीनिक को जरूर खोले रखना चाहिए। अगर मैं और अन्य डाक्टर क्लीनिक बंद करेंगे तो बीमार लोग कहाँ जायेंगे। यद्यपि मैं उम्र के पैंसठवें वर्ष में चल रहा हूँ और मधुमेह का मरीज़ भी हूँ, अतः 'हाई रिस्क ग्रुप' में आता हूँ, फिर भी रोगियों का हित ध्यान रखते हुए हमने क्लीनिक खोलने का निर्णय लिया।

अगले दिन सुबह क्लीनिक पर पहुंचने पर पाया कि सभी कर्मचारी भी सहमत हैं कि क्लीनिक खोलना ही चाहिए। आखिर ऐसा तो नहीं हुआ है कि कोविड-19 के आने से बाकी सभी बीमारियां समाप्त हो गई हैं। अन्य सभी बीमारियों के मरीजों को भी इलाज चाहिए। अतः अपने कर्मचारियों के सहयोग से मैं इस निर्णय पर पहुंचने में सफल हुआ कि हमें अपना क्लीनिक खुला रखना चाहिए। हमने मिलकर उन सब सावधानियों पर ध्यान दिया जो हमें आने वाले मरीजों की और अपनी सुरक्षा के लिए बरतनी होंगी। तो परिवार की इच्छा और सहयोगियों के सहयोग से मेरा दवाख़ाना लॉकडाउन लगने के बाद भी निरंतर खुल रहा है।

शुरू में मन में एक डर भी था। सड़कें बिल्कुल सुनसान थीं। शुरुआती दिनों में तो इतनी सुनसान कि उन पर चलते हुए भी डर लगता था, विशेष रूप से रात को क्लीनिक से लौटते समय। डर अंदर भी था और बाहर भी। अंदर यह डर था कि यदि कोरोना हो गया तो! सारी बहादुरी धरी रह जायेगी। लोग-बाग हर तरह की बातें बनायेंगे। कुछ कहेंगे कि हो गया न कोरोना, बहुत बहादुर बनता था, जैसे इसे तो कोरोना हो ही नहीं सकता है। कुछ लोग क्लीनिक खोलने में सेवा भाव नहीं, कमाई का एंगल ढूंढेंगे। पर यह पता था कि लोगों को जीने के लिए सिर्फ़ राशन की ही नहीं, बीमार होने पर इलाज की भी जरूरत है। यदि कोरोना नहीं रुक रहा था तो बाकी बीमारियां भी ठहर नहीं गईं थीं।

इस दौरान, जब अधिकतर प्राइवेट क्लीनिक बंद थे, दिल्ली सरकार के अधिकतर मोहल्ला क्लीनिक भी बंद हो चुके थे तथा बड़े सरकारी अस्पताल कोरोना अस्पताल में तब्दील हो चुके थे, मेरे पास कुछ ऐसे भी मरीज़ आये जो विभिन्न सरकारी अस्पतालों में भटक रहे थे और उनका इलाज नहीं हो पा रहा था।

ऐसा ही एक मरीज़ जिसे तपेदिक और मधुमेह की बीमारी थी और जो दिल्ली के एक बड़े टीबी अस्पताल में भर्ती था, उसके खून की जांच में गुर्दे की खराबी भी पाई गई। टीबी अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई कि वह किसी बड़े अस्पताल में गुर्दा विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाये। वह लगभग सभी बड़े अस्पतालों से निराश होकर मेरे पास आया। उसे किसी भी अस्पताल में गुर्दा विशेषज्ञ ने नहीं देखा। मैंने अपने सामर्थ्य अनुसार उसे दवाइयां लिखीं। वह बेहतर है और अब जब अस्पताल ओपीडी शुरू करने जा रहे हैं, वह गुर्दा विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखा सकेगा।

ऐसे ही एक बच्ची, यही कोई बीस साल की, उसे बुखार हो गया। उसके मां-बाप किसी कार्यवश कोलकाता गये हुए थे कि लॉकडाउन लग गया और उसके माता पिता वहीं फंस गये। वह बच्ची अपने एक छोटे भाई के साथ यहां रह रही थी। उसको टायफायड बुखार हो गया। वह इलाज के लिए मेरे पास आयी। मैं तो अपनी व्यवसायिक गतिविधि निभा रहा था पर उस बच्ची का ही जीवट था कि वह अपने छोटे भाई को भी सम्हाले रही और अपना इलाज और परहेज भी करती रही।

और भी बहुत से मरीज़ आये। हर तरह की बीमारियों के। ऐसी बीमारियों के भी जो मेरी विशेषज्ञता से बाहर थे पर वे मेरे पास इसलिए आये क्योंकि और कोई डाक्टर उपलब्ध नहीं थे। काफी दूर से भी मरीज़ आये क्योंकि उनके घर के पास कोई भी क्लीनिक खुला नहीं था। मुझे संतोष है कि मैं इस कठिन समय में अपने पेशे के साथ न्याय कर सका।

अब जबकि लॉकडाउन का चौथा चरण चल रहा है। लॉकडाउन में काफी ढील भी दे दी गईं हैं, अधिकतर डॉक्टरों ने अपना क्लीनिक खोल लिया है। पर मुझे एक बात अभी तक समझ नहीं आई है कि जब दूध ब्रैड की दुकानें खुली थीं, खाने पीने के सामान की दुकानें खुली हुई थीं, दवाई की दुकानें खुली थीं, बैंक काम कर रहे थे और उनमें कर्मचारी आ रहे थे, पत्रकार काम कर रहे थे और अख़बार भी छप और बंट रहे थे, तो डॉक्टर अपने क्लीनिक बंद कर क्यों बैठ गए थे। डॉक्टरों को तो अधिक समझदारी दिखानी चाहिए थी। वे तो सामाजिक दूरी, बार बार हाथ धोने और सैनेटाईजेशन जैसी व्यवाहरिक चीजों से अधिक परिचित हैं। उन्हें तो इनका पालन करते हुए अपनी सेवाएं प्रदान करना जारी रखना ही चाहिए था। मुझे इस कोरोना काल में अपनी बिरादरी के पीठ दिखाने पर बहुत ही अफ़सोस है।

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