NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
भारत में महिला रोज़गार की वास्तविकता: पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे से अहम बातें
इस विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय श्रमिक बाज़ार संकट में सबसे ज़्यादा नुकसान महिलाओं को झेलना पड़ता है। चूंकि वे बेरोज़गारी वहन नहीं कर सकती हैं, इसलिए उन्हें जैसा काम मिलता है, वे ले लेती हैं।
शिनेय चक्रबर्ती, प्रियंका चटर्जी
19 Jun 2020
भारत में महिला रोज़गार की वास्तविकता
Image Courtesy: Financial Express

भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) 2011-12 के पांच वर्षीय रोजग़ार और बेरोज़गारी सर्वेक्षण (EUS) को रद्द कर दिया है। श्रमशक्ति आंकड़ों की अहमियत के मद्देनज़र, 2017 में सरकार ने वार्षिक श्रम शक्ति आंकड़ों को जारी करने का फ़ैसला किया है। इसे ''पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे या PLFS'' कहा जाता है। 4 जून 2020 को सरकार ने PLFS के दूसरे बैच के आंकड़ों को जारी किया। इन आंकड़ों के लिए ''नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस (NSO)'' ने जुलाई 2018 से जून 2019 के बीच सर्वे किए थे, जिसमें करीब 1.01 लाख परिवारों के 4.2 लाख लोगों को शामिल किया गया था।

गौर करने वाली बात है कि PLFS आंकड़े बड़े फलक पर रोज़गार-बेरोज़गारी से जुड़े पैमानों के आंकड़े दिखाता है। PLFS और पुराने NSS-EUS की तुलना पर लगातार बहस होती है। इससे बचने के लिए और ज़्यादा से ज़्यादा तुलनात्मक स्वरूप देने के लिए, इस विश्लेषण में PLFS में पहली बार में ही इकट्ठा किए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है (शहरी क्षेत्रों में PLFS के लिए आंकड़ें इकट्ठे करने वालों ने परिवारों के पास चार बार चक्कर लगाए, उनके द्वारा दोबारा की गई यात्राओं के आंकड़े इस विश्लेषण में शामिल नहीं किए गए हैं)।

PLFS (2017-18) के आंकड़ों के मुताबिक़, अखिल भारतीय स्तर पर महिलाओं की ''श्रमशक्ति सहभागित दर (वर्कफोर्स पार्टिशिपेशन रेट- WPR)'' 16.5 फ़ीसदी है। रिपोर्टों के मुताबिक़ यह 2018-19 में बढ़कर 17.6 फ़ीसदी हो गई। पूरे देश की महिलाओं के WPR में जो इज़ाफ़ा हुआ है, उसकी वजह ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के WPR में बढ़ोतरी है, जो 2017-18 के 17.5 फ़ीसदी से बढ़कर 2018-19 में 19 फ़ीसदी पहुंच गया।

सबसे अहम बात है कि 2004-05 के बाद पहली बार ग्रामीण महिलाओं के WPR में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि यह आंकड़ा अब भी 2011-12 में महिलाओं के WPR से काफ़ी कम है (2011-12 में महिलाओं का WPR 25 फ़ीसदी था)। ऊपर से ग्रामीण और शहरी इलाकों में महिलाओं के WPR में बड़ा अंतर भी है, शहरी क्षेत्रों में यह कम ही रहा है। यहां यह भी ध्यान देना है कि 2017-18 और 2018-19 में शहरी महिलाओं के WPR में कोई बदलाव नहीं आया है।

graph new.png

भारत में महिला रोज़गार

रोज़गार के अलग-अलग वर्गों पर करीब़ से नज़र डालने पर पता चलता है कि ग्रामीण महिलाओं के WPR में बढ़ोतरी की वजह स्वरोज़गार (2017-18 से 2019-19) में आया उछाल है। स्वरोज़गार ग्रामीण महिलाओं के लिए रोज़गार का मुख्य साधन है। ग्रामीण महिलाएं ज़्यादातर बिना पैसे के अपने परिवार के सदस्यों को उनका उद्यम चलाने में मदद करती हैं। लेकिन इन्हें कोई नियमित वेतन नहीं मिलता।  लेकिन ग्रामीण महिलाओं में 2017-18 से 2018-19 के बीच ''स्वरोज़गार (Own Account Employment या OAE)'' के अनुपात में तीन फ़ीसदी का इज़ाफा हुआ है। स्वरोज़गार का मतलब है कि बिना किसी दूसरे कर्मचारी को काम पर रखे हुए रोज़गार में संलग्न रहना।

अलग-अलग उद्योगों में स्वरोज़गार पर नज़र डालने से पता चलता है कि निर्माण उद्योग में ग्रामीण महिलाओं की हिस्सेदारी में 2017-18 से 2018-19 के बीच उछाल आया है। इसमें बड़ा हिस्सा कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का है। दोनों ही उद्योगों में लघु स्तर की ईकाईयों का बोलबाला है। कपड़ा उद्योग में ग्रामीण महिलाओं ज़री लगाने, धागा सिलने और हथकरघे से जुड़ी दूसरी गतिविधियों में हिस्सा लेती हैं। महिला कर्मचारियों की मांग समय के साथ बढ़ती चली आ रही है, क्योंकि महिलाओं के ज़रिए सस्ता और लचीला श्रम आसानी से उपलब्ध हो जाता है। खाद्य उत्पाद बनाने वाले उद्योगों में महिलाएं ज़्यादातर बेकरी आइटम, मिष्ठान और चीनी-अनाज मिल के उत्पादों जैसे- आटा, चावल, दाल पिसाई जैसे दूसरे कामों में ज़्यादा हिस्सा लेती हैं।

जिन महिलाओं का सर्वे किया गया, उनमें से 2018-19 में 97 फ़ीसदी महिलाएं ऐसे उद्यमों में काम कर रही हैं, जिनमें 6 से कम कर्मचारियों की जरूरत होती है। 81 फ़ीसदी महिलाओं के मालिकाना हक़ वाले उद्यम उनके घर से ही चल रहे थे। छठवीं आर्थिक गणना के मुताबिक़, इनमें से ज़्यादातर उद्यमों में शौचालय, कचरा प्रबंधन सुविधा, बैंक और पोस्ट ऑफिस जैसी बुनियादी सेवाओं की भी कमी है। इससे न केवल रोजगार सृजन में इनके कम दायरे और क्षमता का पता चलता है, बल्कि इससे पता चलता है कि यह वह उद्यमी हैं, जो जरूरतों के चलते काम करने पर मजबूर हुए हैं। इसलिए महिलाओं के स्वरोज़गार में बढ़ोतरी से ग्रामीण महिला उद्योग के लक्ष्य और दायरे पर कई सवाल खड़े होते हैं। इससे यह भी झलकता है कि जरूरत के बजाए मौके पर आधारित उद्मयशीलता की ग्रामीण महिलाओं में बहुत कमी है।

इस बीच 2018-19 की बेरोज़गारी दर 2011-12 की तुलना में बहुत ज़्यादा है। यह ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्र में ज़्यादा है। पूरे दौर में ग्रामीण महिलाओं की तुलना में शहरी महिलाओं में यह दर और भी ज़्यादा थी।  लेकिन 2017-18 से 2018-19 के बीच इसमें थोड़ी सी कटौती आई।

यह देखना भी दर्द भरा है कि ज्यादा शिक्षित युवा महिलाओं को रोज़गार मिलने की दर कम है।  ''शहरी क्षेत्रों में युवा महिलाओं'' के बीच बेरोज़गारी दर 12 फ़ीसदी थी, लेकिन शहरी क्षेत्रों में ''शिक्षित युवा महिलाओं'' में यह दर बढ़कर 18 फ़ीसदी हो गई। यह 2018-19 के आंकड़े हैं। शिक्षित युवा महिलाओं से मतलब उन महिलाओं से है, जिन्होंने सेकंडरी या इसके बराबर के स्तर की शिक्षा हासिल कर ली हो। उच्च शिक्षा कई युवा महिलाओं को रोज़गार की गारंटी नहीं देती, इससे शिक्षित युवाओं के लिए नौकरियों की कमी भी साफ़ झलकती है। यह ट्रेंड 2018-19 में भी जारी रहा।

2011-12 से 2018-19 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों में स्वरोज़गार में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है, साथ में ''अनौपचारिक भत्ते पर काम करने वाले मज़दूरों'' की संख्या में कमी आई है। 2017-18 से 2018-19 के बीच कुछ गिरावट के बावजूद, स्वरोजगार, ग्रामीण पुरुषों के लिए आजीविका का मुख्य स्त्रोत रहा। शहरी क्षेत्रों में 2011-12 से 2018-19 के बीच ''नियमित वैतनिक रोज़गार'' ही पुरुषों और महिलाओं के लिए आय का मुख्य साधन रहा।

हालांकि शहरी क्षेत्रों में रोज़गार में लगे लोगों में एक बड़ा बदलाव देखा गया। एक तरफ नियमित वेतनभोगी रोज़गार बढ़े हैं, साथ में पुरुषों और महिलाओं के लिए अनौपचारिक रोज़गार में कमी आई है। 2011-12 से 2018-19 के बीच पुरुषों की तुलना में महिलाओं में नियमित वैतनिक रोज़गार के बढ़ने की दर ज्यादा रही है। लेकिन अगर इसी दौर में शहरी महिलाओं के WPR में बढ़ोतरी हो जाती, तो यह एक सकारात्मक बदलाव रहता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं देखा गया, इसका मतलब हुआ कि नियमित वैतनिक नौकरियों में लगी महिलाओं की कुल संख्या में शायद ही कोई बदलाव हुआ हो।

NSSO का EUS नियमित वैतनिक रोज़गार में लगे लोगों और अनौपचारिक भत्ते पर काम करने वाले मज़दूरों के आंकड़े इकट्ठे करता था। वहीं PLFS इनके साथ-साथ स्वरोज़गार में लगे लोगों के आंकड़े भी जुटाता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आंकड़ो से पता चलता है कि प्रतिदिन की मज़दूरी और कुल आय शहरी क्षेत्रों में ज़्यादा रही है। नियमित कर्मचारियों और अनौपचारिक भत्ते पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए भी ऐसा ही है।

इसी तरह प्रतिदिन की औसत मज़दूरी दर, सभी वर्गों में पुरुषों की सबसे ज़्यादा रही है। अब लैंगिक मज़दूरी अंतर की बात करते हैं। मतलब महिला-पुरुषों की आय में अंतर। शहरी और ग्रामीण, ''नियमित रोज़गार'' और ''अनौपचारिक भत्तों पर काम करने वाले मज़दूरों'' की तुलना में ''स्वरोज़गार में लगे कर्मचारियों'' में महिला-पुरुषों के बीच लैंगिक आय में ज्यादा अंतर रहा है। यह आंकड़े 2017-18 से 2018-19 के बीच के हैं। स्वरोज़गार क्षेत्र में लैंगिक वेतन अंतर, ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में ज़्यादा बढ़ा है। शहरी महिलाओं को शहरी पुरुषों की तुलना में 62 फ़ीसदी कम आय होती है। दूसरी तरफ ''नियमित वैतनिक कर्मचारियों'' में शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में 2011-12 से 2018-19 के बीच लैंगिक अंतर कम हुआ है। लेकिन निजी अनौपचारिक काम करने पुरुषों और महिलाओं में लैंगिक अंतर बढ़ा है। यह ट्रेंड शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों में रहा है।

इस विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में श्रम बाज़ार संकट का सबसे बुरे तरीके से शिकार महिलाएँ हैं। चूंकि महिलाएं बेरोज़गार रहना वहन नहीं कर सकतीं, इसलिए उन्हें जैसा रोज़गार मिलता है, वे ले लेती हैं। इससे स्वखाता रोज़गार में लगी महिलाओं की दिक्क़तों का पता भी चलता है। उनके पास रोज़गार का निश्चित दायरा है। उन्हें दूसरे कर्मचारियों के तुलना में लैंगिक अंतर की ज़्यादा मार झेलनी पड़ती है। इससे साफ़ होता है कि MUDRA द्वारा उधार, स्किल डिवेल्पमेंट प्रोग्राम जैसी केंद्र सरकार की तमाम योजनाएं और कदम पर्याप्त नहीं हैं। इन तरीकों के अलावा महिला कर्मचारियों को बुनियादी ढांचागत् सुविधाएं देने की जरूरत है। ताकि उनके काम करने की स्थितियों में सुधार आ सके। इन चीजों से न केवल रोज़गार के मौके बढ़ेंगे, बल्कि देश में महिलाओं के फायदे वाले रोज़गार क्षेत्र के दरवाजे खुलेंगे।

लेखक नई दिल्ली और बंगलुरू में में इकनॉमिस्ट हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Stark Reality of Women’s Employment in India: Insights from the Periodic Labour Force Survey

EUS
PLFS
nsso
NSS
WPR
women employment
Labour Force Participation
Jobs Crisis
Labour force

Related Stories

उत्तर प्रदेश में ग्रामीण तनाव और कोविड संकट में सरकार से छूटा मौका, कमज़ोर रही मनरेगा की प्रतिक्रिया

जम्मू-कश्मीर: बीएसएफ़, सीआइएसएफ़ अभ्यर्थियों का प्रदर्शन 60वें दिन पार, भाजपा के मंत्री पर झूठा आश्वासन देने का आरोप

प्रधानमंत्री जी! न आंदोलन षड्यंत्र है, न किसान आपके शत्रु!

कृषि व्यापार में अनियंत्रित कॉरपोरेट प्रवेश के निहितार्थ

8 जनवरी हड़ताल : 7.3 करोड़ बेरोज़गारों के लिए ज़िंदा रहने की जंग

"और मुज़फ़्फ़रनगर नहीं सहेंगे" कुपोषण मुक्त भारत के लिए आइफ़ा का देशव्यापी विरोध प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • Drugs worth Rs 313 crore seized from three people in Gujarat
    भाषा
    गुजरात में तीन लोगों के पास से 313 करोड़ रुपये मूल्य की मादक पदार्थ जब्त
    11 Nov 2021
    एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि इससे पहले पुलिस ने मंगलवार को महाराष्ट्र के ठाणे के रहनेवाले सज्जाद घोसी नाम के व्यक्ति को एक गुप्त सूचना के आधार पर खम्भलिया कस्बे के एक अतिथिगृह से गिरफ्तार किया…
  • sc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    त्रिपुरा हिंसा:सुप्रीम कोर्ट वकीलों, पत्रकार के खिलाफ यूएपीए के तहत दर्ज प्राथमिकी रद्द करने के अनुरोध पर करेगी सुनवाई
    11 Nov 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और हिमा कोहली की पीठ को अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सूचित किया कि तथ्य खोज समिति का हिस्सा रहे दो वकील और एक पत्रकार के खिलाफ उनकी सोशल मीडिया…
  • Varun Gandhi said on Kangana Ranaut's remarks about independence - call it madness or sedition
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    आजादी को लेकर कंगना रनौत की टिप्पणी पर बोले वरूण गांधी - इसे पागलपन कहूं या देशद्रोह
    11 Nov 2021
    कंगना रनौत की आलोचना करते हुए गांधी ने ट्वीट कर कहा, ''कभी महात्मा गांधी जी के त्याग और तपस्या का अपमान, कभी उनके हत्यारे का सम्मान, और अब शहीद मंगल पाण्डेय से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह,…
  •  PM's parliamentary constituency Banaras breathing poisonous air
    विजय विनीत
    स्पेशल रिपोर्टः ज़हरीली हवा में सांस ले रहे पीएम के संसदीय क्षेत्र बनारस के लोग
    11 Nov 2021
    दिवाली के बाद से ही पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में स्थिति दमघोंटू बनी हुई है। इस शहर की एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 300 से नीचे उतरने का नाम नहीं ले रही है। यह स्थिति उन लोगों के…
  • maharastra
    भाषा
    महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम के कर्मचारियों की हड़ताल जारी, मंत्री ने यूनियन से बात की
    11 Nov 2021
    एमएसआरटीसी के एक अधिकारी ने कहा, "आज राज्य भर में सभी 250 डिपो बंद हैं। कल, कम से कम तीन डिपो चालू थे, लेकिन आज वे भी बंद हैं।" एमएसआरटीसी के कर्मचारी, घाटे में चल रहे निगम के राज्य सरकार में विलय की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License