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महिलाओं को सड़क हादसों के बाद आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है!
विश्व बैंक की ताज़ा जारी रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण और शहरी महिलाओं पर सड़क हादसों का अलग-अलग असर पड़ता है। महिलाओं की जिम्मादारियां बढ़ जाती है तो वहीं उन्हें अपने कामकाजी पैटर्न में बदलाव करना पड़ता है। 
सोनिया यादव
25 Feb 2021
महिलाओं को सड़क हादसों के बाद आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है!
image credit - Newsmeter

हमारे देश में सड़क पर आज भी पुरुषों की अपेक्षा भले ही कम महिलाएं आपको गाड़ियां दौड़ाती दिखाई दें, लेकिन इस सच को कोई नहीं नकार सकता कि सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं से आधी आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। विश्व बैंक की "Traffic Crash Injuries and Disabilities: The Burden on Indian Society" नाम से जारी नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि ग्रामीण और शहरी महिलाओं पर सड़क हादसों का अलग-अलग असर पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार शहरी और ग्रामीण दोनों ही परिवार की महिलाओं पर सड़क हादसों का प्रभाव पड़ता है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं के बाद महिलाओं की जिम्मादारियां बढ़ जाती है, उन्हें परिवार का ज्यादा काम करना पड़ता है। परिवार में पीड़ित व्यक्ति के देखभाल का जिम्मा भी उन्हें ही उठाना पड़ता है।

महिलाओं को कामकाजी पैटर्न में बदलाव करना पड़ता है!

सड़क हादसों के बाद करीब 40 प्रतिशत महिलाओं को अपने कामकाजी पैटर्न में बदलाव करना पड़ा, जबकि करीब 11 प्रतिशत महिलाओं को परिवार को आर्थिक संकट से बाहर निकलने के लिए ज्यादा काम करना पड़ता है। कम आय वाले ग्रामीण परिवारों पर सड़क हादसों का सबसे अधिक असर पड़ता है, जो कि 56 प्रतिशत है। वहीं, कम आय वाले शहरी परिवारों पर 29.5 प्रतिशत और उच्च आय वाले ग्रामीण परिवारों पर 39.5 प्रतिशत असर पड़ता है।

सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि सड़क हादसे के बाद 50 प्रतिशत महिलाएं अपनी पारिवारिक आमदनी कम होने के चलते बुरी तरह प्रभावित हुई हैं और जितने भी ट्रक ड्राइवर सड़क हादसों का शिकार हुए थे, उनमें से किसी ने भी अस्पताल में इलाज के दौरान कैशलैस सुविधा के लिए आवेदन नहीं किया था।

विश्व बैंक की रिपोर्ट में और क्या है?

विश्व बैंक ने गैर-सरकारी संगठन सेव लाइफ फाउंडेशन के साथ मिलकर इस रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट को बनाने के लिए विश्व बैंक ने साल 2020 में मई से जुलाई महीने में अध्ययन किया है। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि उच्च आय वर्ग वाले परिवार की तुलना में कम आय वर्ग वाले परिवार के लोग सड़क दुर्घटना में अधिक शिकार हुए हैं।

वर्ल्ड बैंक की इस रिपोर्ट में सड़क हादसे के आर्थिक नुकसान के अलावा समाजिक नुकसान के बारे में भी बताया गया है। कम आय वाले करीब 64 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि सड़क हादसे के बाद उनके जीवनस्तर में गिरावट आई है। 50 प्रतिशत से अधिक परिवारों ने बताया कि सड़क हादसे के बाद उन्हें डिप्रेशन का सामना करना पड़ा।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 75 प्रतिशत से अधिक गरीब परिवारों की आय में कमी का कारण सड़क दुर्घटना है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सड़क दुर्घटना के चलते गरीब परिवारों को 7 महीने से ज्यादा आय का नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं, अमीर परिवार को एक महीने से कम की आमदनी का नुकसान होता है।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सड़क दुर्घटना में मरने वाले या घायलों की बड़ी संख्या पैदल यात्री और साइकिल चालकों की थी जो गरीब परिवारों से आते थे। ये सभी अपने परिवार में कमाने वाले थे। अध्ययन में बताया गया है कि ग्रामीण इलाकों में सड़क हादसे के बाद कम आय वाले परिवारों के पीड़ित व्यक्ति के विकलांग होने का जोखिम दोगुना बढ़ जाता है।

आपको बता दें कि 13 फरवरी 2021 को आई विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2005 से जुलाई 2019 के बीच हुए सड़क हादसों में शहरी इलाकों के 11.6 प्रतिशत परिवारों की तुलना में 44 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में कम से कम एक मौत हुई है।

क्या निष्कर्ष है इस रिपोर्ट का?

रिपोर्ट लॉन्चिंग पर विश्व बैंक के दक्षिणी एशिया क्षेत्र के उपाध्यक्ष हार्टविग शाफर ने कहा कि सड़क दुर्घटना का गरीब परिवारों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, इसके चलते पहले से गरीब परिवार और अधिक गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाता है।

सेव लाईफ फाउंडेशन के सीईओ पीयूष तिवारी ने बताया कि इस रिपोर्ट के परिणाम उन क्षेत्रों की पहचान करते हैं, जहां तुरंत सुधार की जरूरत है जैसे सड़क हादसों के बाद इमरजेंसी देखभाल, प्रोटोकॉल, बीमा और मुआवज़े की व्यवस्था। इस रिपोर्ट में सड़क हादसों के पीड़ितों और उनके परिवारों को तुरंत आर्थिक, मेडिकल और कानूनी सहायता प्रदान करने की सिफारिश की गई है, जिससे वे जल्द से जल्द ठीक हो सकें।

गौरतलब है कि भारत में दुनिया के एक फीसदी वाहन हैं पर सड़कों पर वाहन दुर्घटनाओं के चलते विश्वभर में होने वाली मौतों में 11 प्रतिशत मौत भारत में होती हैं। भारत में सालाना करीब साढ़े चार लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है। देश में हर घंटे 53 सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं और हर चार मिनट में एक मौत होती है, जो कि पूरे विश्व में सबसे ज्यादा है।

सड़क दुर्घटनाओं के चलते जीडीपी का 3.14 प्रतिशत के बराबर नुकसान होता है!

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2018 में आई रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सड़क हादसों में हर दिन 400 से अधिक मौतें होती है, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (2018) की एक रिपोर्ट  के अनुसार भारत में विश्व के वाहनों का सिर्फ एक प्रतिशत ही है लेकिन सड़क हादसों में 10 प्रतिशत मौतें भारत में होती है। भारत में 6 प्रतिशत सड़क हादसे होते हैं। पिछले दशक में सड़क हादसों में 13 लाख लोगों की मौतें हुई थी, जिसमें पांच लाख से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

पिछले एक दशक में भारतीय सड़कों पर 13 लाख लोगों की मौत हुई है और इनके अलावा 50 लाख लोग घायल हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं के चलते 5.96 लाख करोड़ रुपये यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.14 प्रतिशत के बराबर नुकसान होता है। ऐसे में इन दुर्घटनाओं को कम करने की जिम्मेदारी सड़क पर चल रहे आम लोगों के साथ-साथ सरकार की भी बनती है।

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