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भारत
राजनीति
आधी नहीं पूरी आबादी का विकल्प बनें महिलाएं
महिलाओं की राजनीति में भागीदारी और भूमिका को लेकर “मेरा रंग फाउंडेशन ट्रस्ट” के वार्षिक समारोह में 'राजनिति और महिलाएं' विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में महिलाओं की समस्याओं, राजनीति, संपत्ति और वैश्विक स्तर पर आ रहे बदलाओं की चर्चा की गई।
प्रदीप सिंह
14 Oct 2019
मेरा रंग फाउंडेशन ट्रस्ट

महिला आरक्षण लंबे समय से संसद में पास होने का इंतजार कर रहा है। लेकिन देश में कभी भी राष्ट्रीय स्तर पर महिला आरक्षण के लिए कोई सशक्त आंदोलन नहीं चला। महिलाओं का एक वर्ग महिला आरक्षण की मांग उठाता रहा है। आरक्षण न होने के बावजूद आज महिलाएं समाज और जीवन के हर क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

लेकिन चुनावी राजनीति में जिस तरह से शासक वर्ग की परेशानियां बढ़ रही है उसे देखते हुए बुद्धजीवियों का कहना है कि महिला आरक्षण देर-सबेर संसद में पास हो जाएगा। ऐसे में संसद और विधानसभा में महिलाओं की राजनीतिक दिशा क्या होगी? महिला सवालों पर उनका नज़रिया क्या होगा? क्या उनके पास महिलाओं और देश के लिए कोई मॉडल है? क्या उनका भी वहीं हश्र नहीं होगा जो दलित और ओबीसी प्रतिनिधियों का हुआ?

अब तक की लोकसभा को देखा जाए तो सत्रहवीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन महिलाओं के सवालों पर उनकी 'आपराधिक चुप्पी' है। कठुआ, उन्नाव और भाजपा नेता स्वामी चिन्मयानंद के मुद्दे पर एक भी महिला सांसद ने सवाल नहीं उठाया। ऐसे में आने वाले दिनों में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी और भूमिका को लेकर “मेरा रंग फाउंडेशन ट्रस्ट” के वार्षिक समारोह में 'राजनिति और महिलाएं' विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में महिलाओं की समस्याओं, राजनीति, संपत्ति और वैश्विक स्तर पर आ रहे बदलाओं की चर्चा की गई।

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे ने कहा कि “अगर राजनीति में महिलाएं आ रही हैं तो उन्हें एक वैकल्पिक राजनीति के बारे में भी सोचना होगा। नहीं तो पितृसत्ता को कोई चुनौती नहीं मिलेगी और एक महिला भी परोक्ष रूप से पितृसत्ता को ही मजबूत बनाती रहेगी। इसके लिए यह जरूरी है कि इस वैकल्पिक राजनीति का सैद्दांतिक सूत्रीकरण भी किया जाए।”

अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि भारत की राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रणाली ऐसी है कि कोई भी अल्पसंख्यक, दलित,पिछड़ा और महिला लोकसभा-विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद यह नहीं कह सकता कि वह अपने जाति-धर्म का ज्यादा प्रतिनिधत्व करता है। इसलिए किसी वर्ग के प्रतिनिधि को सबका प्रतिनिधि बनना पड़ेगा तभी वह अपने वर्ग-समुदाय के लिए कुछ काम कर सकता है।

अभय दुबे ने कहा कि आज देश में पहले के मुकाबले दलित और पिछड़ों के प्रतिनिधि पहले से ज्यादा चुनकर आ रहे हैं। कई राज्यों में दलित और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली पार्टियों की सरकार रही,लेकिन कोई राजनीतिक मॉडल न होने के कारण दलितों-पिछडों के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया।  

गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित इस कार्यक्रम में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका और भागीदारी पर विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने कहा कि एक महिला का राजनीति में आना ही साहसिक कदम है। राजनीति में बने रहना उससे भी अधिक कठिन है। सबने यह स्वीकार किया कि बदलाव आ रहा है और आने वाले समय में इस प्रश्न पर ज्यादा गहराई से विचार-विमर्श करना होगा कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी कैसे बढ़ाई जाए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता रागिनी नायक ने कहा कि बिना किसी पोलिटिकल बैकग्राउंड के राजनीति में आना बहुत मुश्किल होता है, वह भी एक स्त्री के लिए। उन्होंने कहा कि जब एक स्त्री राजनीति मे आती है तो उस पर उम्मीदों का बहुत बड़ा बोझ भी लाद दिया जाता है। वो बदलाव तभी लाएंगी जब वह कुर्सी पर आसीन होंगी। महिला मुद्दों पर महिला ज्यादा संवेदनशील तरीके से सोच सकती है।

शीबा असलम फ़हमी ने कहा कि महिलाओं में राजनीतिक चेतना का विकास न हो इसकी शुरुआत घर से ही होने लगती है। क्योंकि अगर लड़की के भीतर विवेक पैदा होगा तो वह इसकी शुरुआत सबसे पहले अपने घर से ही करेगी। वह सवाल करेगी, अधिकार मांगेगी। लेकिन महिलाओं को ससुराल से नहीं मायके से ही अधिकार मिलने चाहिए। मायके मे यदि उसे बराबरी, सम्मान, संपत्ति और अपने मन से कुछ करने का अधिकार होगा तभी वह ससुराल में अधिकार की बात कर सकती है। महिलाओं को संपत्ति में अधिकार मिले तो वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है।
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सपा नेता एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष रिचा सिंह ने कहा कि “जब एक लड़की राजनीति में आना चाहती है तो घर से लेकर बाहर तक उसके मनोबल को तोड़ने का पूरा प्रयास किया जाता है। अगर कहीं वह सफल हो जाती है तो माना जाता है कि वह अपनी प्रतिभा के दम पर सफल नहीं हुई है बल्कि उसने कुछ शॉर्टकट तलाशे हैं। महिलाओं को तो समाज में क्या गर्भ से ही मारने की साजिश रची जाती है। यदि पैदा हो गई तो पढ़ाई,नौकरी या राजनीति कहीं भी जाना चाहे तो परिवार और समाज से संघर्ष करना पड़ता है। महिलाएं राजनीति में आकर तभी महिलाओं का प्रतिनिधि बन सकती हैं जब वे पूरे समाज का प्रतिनिधि बनें।”

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा स्त्री मुद्दों पर मुखर लेखक तारा शंकर ने कहा कि बड़े अफसोस की बात है कि बहुत बुनियादी हक भी हमें आजादी के बहुत साल बाद मिले हैं। राजनीतिक भागीदारी तो बहुत दूर की चीज लगती है।

जेएनयू से अध्यक्ष पद की छात्र राजद प्रत्याशी प्रियंका भारती ने कहा कि जब हम सदन में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण की बात कहते हैं तो इस बात पर गौर करना होगा कि कहीं यह एक खास वर्ग तक तो नहीं सिमटकर रह जाएगा। उन्होंने फूलन देवी का जिक्र करते हुए कहा कि फूलन से हमें हथियार उठाना नहीं सीखना है मगर शोषण के खिलाफ आवाज उठाना जरूर सीखना है।

कथाकार व पत्रकार गीताश्री ने कहा कि 'मेरा रंग' ने महिला मुद्दों पर वीडियो बनाने से शुरुआत की थी और शालिनी के सतत प्रयासों से आज यह एक स्त्री विमर्श का एक प्रमुख मंच है। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी आज के समय में एक बहुत जरूरी विषय है। 'मेरा रंग' की संस्थापक शालिनी श्रीनेत ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।  

कार्यक्रम का संचालन आँचल बावा ने किया और अंत में जाने-माने आर्टिस्ट सीरज सक्सेना ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

gender inequality
Mera Rang Foundation Trust
Politics and Women
Women reservation
Richa Singh
Delhi University
JNU

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