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क़र्ज़ मुक्ति के लिए सड़कों पर उतरीं स्वयं सहायता समूहों की महिलायें
महिलाएं पूछ रही हैं सवाल- कोरोना महामारी–लॉकडाउन बंदी और उससे पहले अरबपति कंपनियों के करोड़ों के कर्ज़े माफ़ तो गरीब महिलाओं के छोटे कर्ज़ों की माफ़ी क्यों नहीं?
अनिल अंशुमन
14 Aug 2020
स्वयं सहायता समूहों की महिलायें

कोविड– 19 के खिलाफ जंग में स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की भूमिका को लेकर देश की सरकार का ही मानना है कि इस जंग में ये पहली कतार में खड़ी हैं। पिछले ही वर्ष 12 जुलाई को भी प्रधानमन्त्री जी ने देश भर की स्वयं सहायता समूह की महिलाओं से सीधे वीडियो कान्फ्रेसिंग संवाद में इनकी भूमिका की तारीफों के पुल बांधते हुए अपनी सरकार के महिला सशक्तिकरण की वचनबद्धता दुहराई थी।         

विडंबना देखिये कि आज उन्हीं स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को कोविड आपदा से त्रस्त हाल में अपने घर परिवार को भूखों मरने जैसे संकटों से निज़ात दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से गुहार लगाने के लिए सड़कों पर आना पड़ गया ।

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स्वतन्त्रता दिवस से पूर्व 13 अगस्त को झारखण्ड के सुदूर आदिवासी गांवों से लेकर बिहार समेत देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय लाखों स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने ‘क़र्ज़ मुक्ति दिवस’ मनाते हुए अपनी मांगों के साथ सैकड़ों स्थानों पर आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन किया।

उनकी प्रमुख मांगें हैं कि -- कोरोना महामारी और लॉकडाउन बंदी से उनकी खस्ताहाल आर्थिक स्थिति में भी माइक्रो फाईनांस एजेंसियों और निजी बैंक ज़ालिम माहाजन की तरह उनसे जो जबरिया और मनमाना जो क़र्ज़ वसूली कर रहें हैं, सरकार उसपर रोक लगाए। साथ ही वित्तीय वर्ष 2021 के मार्च तक इनके सभी छोटे ऋणों की वसूली नहीं की जाय। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के सामूहिक कर्ज़ों की वसूली पर भी तत्काल रोक लगाई जाय। कोरोना – लॉकडाउन बंदी के कारण समूह की लाखों महिलाओं के रोज़गार के चौपट होने से उनके बच्चों व परिवार के समक्ष दो जून की रोटी तक मुहाल हो गयी है । जिससे उबारने के लिए सरकार अविलम्ब वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध काराकर भूखों मरने से बचाए। समूह कि जिन महिलाओं के रोज़गार चल रहें हैं, उनके उत्पादों के लिए समुचित खरीद व्यवस्था कि जाय।

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उनके बच्चों के शिक्षा लोन को ब्याज़ मुक्त किया जाय। सामूहिक कर्ज़ों के नियमन के लिए राज्यों के स्तर पर विशेष कमेटियां गठित करने के साथ साथ स्वरोजगार के लिए 10 लाख तक के क़र्ज़ पर 0।4।6 ब्याज़ दर सुनिश्चित किया जाय।  स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की मांगों के समर्थन में आन्दोलन में उतरे अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसियेशन ( ऐपवा ) की राष्ट्रीय माहासचिव मीना तिवारी ने 13 अगस्त को जारी वीडियो बयान में कहा है कि – हर 15 अगस्त को हम सब अपनी आज़ादी को याद करते हैं । जिसे हासिल करने के लिए वर्षों हर धर्म – सम्प्रदाय और समुदाय के लोगों ने बढ़ चढ़ कर अपनी जानें न्योछावर कीं ।

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सबने देश यह सपना देखा था कि अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी के साथ साथ ज़मींदारी – महाजनी शोषण व्यवस्था से भी मुक्ति मिले । लेकिन आज उस आजादी के 73 वर्षों देश की वर्तमान सरकार फिर से उसी महाजनी शोषण व्यवस्था को देश की करोड़ों महिलाओं और गरीबों पर माइक्रो फाइनांस कंपनियों और निजी बैंकों के रूप में थोप दिया है । जो इस माहामारी की आपदा में भी रिज़र्व बैक के निर्देशों को धता बताकर गरीब महिलाओं से मनमाना क़र्ज़ वसूली का अमानवीय शोषण चलाये हुए हैं । जिसे सरकार ने भी अपनी मौन सहमति दे रखी है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के मंत्री – नेताओं से लेकर उनकी पार्टी की सभी राज्य सरकारें दिन – रात महिला सशक्तिकरण का दिन रात ढोल पिटती हैं। लेकिन जब घोर गरीबी – तंगहाली से त्रस्त महिलायें अपने व परिवार के जीविकोपार्जन के लिए क़र्ज़ लेने को मजबूर हो जाती हैं तो इन्हीं के खुले संरक्षण में माइक्रो फाइनांस कम्पनियां और निजी बैंक मनमाना सूद वसूल रहीं हैं । ऐसे में हम प्रधानमंत्री जी से कहना चाहतीं हैं कि जब आपकी सरकार देश कि जनता के टैक्सों से भरे ख़ज़ाने से अरबपति कॉर्पोरेट कंपनियों – घरानों के करोड़ों के कर्ज़ों को माफ़ कर सकती है तो देश की गरीब महिलाओं के छोटे छोटे कर्ज़ों को क्यों नाहीं माफ़ कर सकती है ।  

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झारखण्ड के जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. प्रोफ़ेसर रमेश शरण ने भी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की मांगों का पुरज़ोर समर्थन करते हुए कहा है कि –- खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि माइक्रो फायनांस एजेंसियों तथा निजी बैंकों से लोन लेनेवाली स्वयं सहायता समूह की महिलायें कभी भी डिफाल्टर नहीं रहीं हैं। इन्होंने जो भी ऋण लिए वे किसी मज़बूरी में ही और मोदी सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित किये जाने की घोषणा के बाद ही लोन लिए। ऐसे में सरकार को बिलकुल चाहिए कि न वह सिर्फ इनके लोन चुकता करने का ज़िम्मा उठाये बल्कि तात्कालिक तौर पर वैकल्पिक आर्थिक सहायता देकर कोविड महामारी व लॉकडाउन बंदी से इनकी चरमराई घरेलू आर्थिक गाड़ी को पटरी पर लाये। उन्होंने भी कहा कि यदि केंद्र सरकार लॉकडाउन बंदी से हुई आर्थिक मंदी से उबारने के लिए देश की अरबपति कंपनियों के करोड़ों के कर्जे माफ़ कर उन्हें सहायता दे सकती है तो स्वयं सहायता समूहों की गरीब महिलाओं के छोटे कर्ज़ों को भी माफ़ कर उन्हें संकटों से उबारे।

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गौरतलब है कि मोदी जी की सरकार ने महिला सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे कार्यों का ताज़ा आंकड़ा पेश करते हुए ये दावा किया था कि 2014 में उनका शासन आने के बाद पूरे देश में 20 लाख से भी अधिक नए स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। सरकार के ग्रामीण मंत्रालय ( नावार्ड ) तथा दीनदयाल अन्त्योदय योजना , राष्ट्रिय ग्रामीण आजीविका मिशन ( डीएवाय – एनआरएलएम ) के तहत देश भर में कुल 63 लाख स्वयं सहायता समूहों का सफल संचालन हो रहा है। ‘ नारी तू नारायणी ’ विशेष योजना के तहत 2019 – 20 के लिए कई योजनाओं की भी घोषणाएं की गयी जिन्हें बाद में स्टैंड अप इंडिया मिशन से भी जोड़ दिया गया। यदि आज ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाओं से जुड़ी लाखों वैसी गरीब महिलाओं के साथ माइक्रो फाइनांस कम्पनियां और निजी बैंक जब एक कुटिल सूदखोर का व्यवहार कर रहें हैं जिनके घरों में कोरोना बंदी चूल्हे भी नहीं जलने दे रही है, क्या सरकार और उसके मंत्रालय इस अमानवीयता पर मौन रहेंगे ? ...सवाल तो बनता ही है!

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