NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
महिलाएं
भारत
राजनीति
क्या भाजपा को महिलाओं ने जिताया? राशन योजना का वोटिंग पर क्या रहा असर 
पोस्ट पोल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि इस बार यूपी में महिलाओं ने समाजवादी पार्टी के मुकाबले भाजपा को जमकर वोट किया है।
अजय कुमार
16 Mar 2022
women

सीएसडीएस का पोस्ट पोल सर्वे आया है। सीएसडीएस के निदेशक संजय सिंह के मुताबिक यह पोस्ट पोल सर्वे उत्तर प्रदेश के 280 इलाके में तकरीबन 7 से 8 हजार लोगों से बातचीत करके किया है। आप कहेंगे कि तकरीबन 22 करोड़ आबादी वाले उत्तर प्रदेश को समझने के लिए यह सैंपल बहुत छोटा है? तो इस संस्था के बारे में जान लीजिये। सीएसडीएस यानी सेंटर फॉर सोसाइटीज इन डेवलपमेंट स्टडीज। यह संस्था बहुत लंबे समय से समाज में होने वाले परिवर्तनों का वैज्ञानिक पद्धति के तहत अध्ययन करते आई है। अकादमिक और समाज परिवर्तन को भांपने के काम में लगे लोगों के बीच इस संस्था के सर्वे का उल्लेख बार-बार किया जाता है। इस संस्था के कामकाज की साख भारत में समाज विज्ञान की दुनिया में बहुत ज्यादा है।

सीएसडीएस के उत्तर प्रदेश के सर्वे के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी के मुकाबले 13 फीसदी अधिक वोट किया। जबकि मर्दों में भारतीय जनता पार्टी को समाजवादी पार्टी के मुकाबले महज 5 प्रतिशत अधिक वोट मिले है। यह आंकड़ा बताता है कि भाजपा की इस बड़ी जीत में औरतों के वोट का बड़ा योगदान है। 18 से 25 साल की औरतों के बीच तो भाजपा और सपा के वोटरों के बीच तकरीबन 15 फीसदी का अंतर है। भाजपा को 15 फीसदी अधिक औरतों ने वोट दिया है। 56 साल से अधिक की औरतों के बीच यह अंतर 18 फीसदी तक चला जाता है। समाजवादी पार्टी के मुकाबले तकरीबन 18 फीसदी अधिक महिलाओं ने भाजपा को वोट किया। 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो सरकारी राशन के वितरण ने औरतों को भाजपा की तरफ खींचा है। लॉ एंड ऑर्डर को लेकर यह बात कि औरतें भाजपा के दौर में ज्यादा सुरक्षित रहेंगी इस बात पर औरतों ने ज्यादा भरोसा किया। कुल मिलाजुलाकार कहा कहा जाए तो बात यह है कि औरतें ने चुनावी बाजार में भाजपा की मोदी योगी पर अधिक भरोसा जताया है और अखिलेश, प्रियंका पर कम। 

लेकिन यह तो आंकड़ें और आंकड़ों से निकले निष्कर्ष की बात है। समाज की रंगत केवल एक वोट और चुनाव तक सीमित नहीं है। इसलिए बड़े फलक और बड़े गहरे तरीके से देखा जाए तो बात यह है कि जब तक जेब में पैसा नहीं तब तक जिंदगी आजाद नहीं। यह मौजूदा दुनिया की सबसे क्रूरतम सच्चाई है। जो पैसे की तंगी में जी रहे हैं, वह कई तरह के वंचनाओं के शिकार हैं। सशक्तिकरण का असली रास्ता आर्थिक आत्मनिर्भरता से होकर जाता है। महिलाओं के सशक्तिकरण पर भी यही फार्मूला लागू होता है। 

बिना किसी आंकड़े के भी आप समझ सकते हैं कि भारत जैसे गरीब मुल्क में पैसे के लिहाज से पहले से ही सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिलाओं की हैसियत क्या होगी? इनके जीवन में अगर आजादी भी होगी तो वह भी कई तरह के सीमाओं का शिकार होगी। आर्थिक कमजोरी की वजह से देश दुनिया को लेकर महिलाओं की समझ वैसी नहीं बन सकती जैसी आर्थिक तौर पर मजबूत लोगों की बनती हैं । भारत में राजनीतिक पार्टियां इस हालत को सुधारने की बजाए इसे अपने वोट के लिए रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल करने लगी हैं।

अगर राजनीतिक पार्टियां चाहतीं तो यह घोषणा कर सकती थीं कि महिलाओं के मानव संसाधन विकास पर अधिक ध्यान देंगी। उन चुनौतियों को दूर करेंगी जो महिलाओं के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हैं। उदाहरण के तौर पर जैसे उत्तर प्रदेश सरकार राशन और नमक का थैला बांटकर गरीब महिलाओं के रसोई का बोझ कम कर रही हैं। लेकिन यह पहल ऐसी है जैसे किसी को पांच रूपये की राहत देकर उसकी जिंदगी भर की गुलामी खरीद ली जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वोट हथियाने के तौर तो यह रणनीति कारगर होती है लेकिन महिलाओं की जिंदगी में इससे कोई बुनयादी बदलाव नहीं होता। महिलाओं की अशिक्षा, पिछड़ापन, कमतरी उन्हें यह बात समझ सकने में सक्षम नहीं बनाती कि कैसे सरकार अपनी सत्ता को बचाने और हथियाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहीं है।अगर सत्त्ता वाकई अपना काम लोकल्याण के लिहाज से करना चाहती है तो हजार रूपये खाते में डालने, शराबंदी, राशन पानी की मदद के साथ महिलाओं की शिक्षा मुफ्त कर देने की घोषणा कर सकती है।

राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को लेकर जिस तरह से वोट हासिल करने की रणनीति बना रही है,उस रणनीति का काट यह है कि अधिक से अधिक महिलाएं घर की दहलीज से बाहर निकलें। राजनीति समाज देश जैसे विषयों को लेकर सोचने समझने का ज्यादा से ज्यादा अवसर हासिल करें। यह तभी हो पायेगा जब वह आर्थिक तौर पर सशक्त बनेंगी। तभी जाकर वह उन गुलामियों को तोड़ पायेंगी जो उनकी सोचने समझने की शक्ति पर उन्हें आर्थिक तौर पर कमजोर होने की वजह से पैदा हो पाती है।  

अब कुछ आंकड़ों से समझिये। सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्र में तकरीबन 65 प्रतिशत महिलाओं ने वोट किया और शहरी क्षेत्र में केवल 50 प्रतिशत महिलाओ ने वोट किया। विश्लेषण करने वाले कह सकते हैं कि औरतों में शिक्षा का स्तर बढ़ गया है,इसलिए ग्रामीण इलाके में वोटिंग परसेंटेज बढ़ा है। लेकिन अगर कोई यह कहे कि शिक्षा का स्तर गाँव से ज्यादा शहरों में बढ़ा है तो शहरों में वोटिंग परसेंटेज कम क्यों? शिक्षा से ज्यादा जिस तरह से सरकार ने वोटरों को लाभार्थी में तब्दील कर दिया है ,उसका असर वोटिंग को लेकर ज्यादा है, तो यह विश्लेषण ज्यादा सटीक होगा। लाभार्थी का मतलब यह है कि चंद रूपये या हल्का सा राहत देकर वोट हड़पने की रणनीति। ऐसी रणनीति तभी कारगर होती है जब गरीबी ज्यादा हो और गरीबी के आभाव में पैदा हुए नामसझी के चलते जब लोगों को पता नहीं चलता कि उनके जीवन में सरकार का क्या रोल है?

अगर महिलाओं के बीच सरकार की भूमिका को लेकर जागरूकता होती तो उनका सीधा सवाल होता कि जिस राज्य में महिलाओं की कार्यबल में भगीदारी में केवल 9 प्रतिशत है। 98 प्रतिशत महिलाएं कामकाज की दुनिया से बाहर हैं, वह किसी पार्टी को केवल कुछ किलों राशन मुहैया करवाने को लेकर वोट क्यों दें? इस तरह के चाल से खुद को दूर क्यों ना रखें?

यह तो उत्तर प्रदेश की बात हुई। वर्ल्ड बैंक का आंकड़ा कहता है कि पूरे भारत में साल 2020 में महिलाओं की कार्यबल में हिस्सेदारी महज 20 प्रतिशत रही। यानी इस 20 प्रतिशत में वे महिलायें शामिल हैं जो किसी तरह का काम कर रही हैं या काम की तलाश में भटक रही हैं। इसके अलावा 80 प्रतिशत महिलाएं कार्यबल से बाहर हैं। देश की सिर्फ 77 प्रतिशत महिलाओं के पास बैंक खाता है। इसमें से 42 फीसदी खातों में किसी तरह का लेन देन ही नहीं होता। यानी 65 प्रतिशत महिलाएं देश के संगठित वित्तीय बाजार से बाहर हैं। एक सर्वे के मुताबिक ग्रामीण भारत की केवल 20 प्रतिशत महिलाएं डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करती हैं। आधी औरतें इंटरनेट की दुनिया से बाहर हैं। वर्ल्ड इकनोमिक फ़ोरम के मुताबिक आमदनी के लिहाज से बने ग्लोबल जेंडर इंडेक्स के मामलें में भारत का रैंक 149 देशों के बीच 108 हैं। साल 2019 के एक सर्वे के मुताबिक़ एक ही तरह के काम के लिए औरतों को मर्दों के मुकाबले 20 प्रतिशत कम पैसा दिया जाता है।

यह सारा वैचारिक दर्शन और आंकड़ा क्या बताता हैं? यह सब यही बताते हैं कि बिकी हुई टीवी और अखबारों में दुनिया में महिलाओं को आर्थिक तौर कमजोर रखना राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट के लिहाज से फायदेमंद है। महिलाओं के मतदान का प्रतिशत तो बढ़ रहा हैं लेकिन आर्थिक तौर पर कमजोर होने की वजह से उनके वोट का राजनीतिक पार्टियां अपनी सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल भी कर रही हैं। मतदान में से अगर आजाद मत निकालने का चाल कारगर होता रहेगा तो मतदान महज सत्ता हासिल करने का हथियार बनकर रह जायेगा। महिलाएं इस चाल के जाल से बाहर निकलने में तभी कामयाब हो सकती है जब उनकी आर्थिक सशक्तिकरण को सुनिश्चित किये जाने की भरपूर कोशिश की जाए। 

ये भी पढ़ें: यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर

Women Voter
UP elections
BJP
samjwadai party
rataion

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

पिछले 5 साल में भारत में 2 करोड़ महिलाएं नौकरियों से हुईं अलग- रिपोर्ट

बलात्कार को लेकर राजनेताओं में संवेदनशीलता कब नज़र आएगी?

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

बिहार विधानसभा में महिला सदस्यों ने आरक्षण देने की मांग की

तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़


बाकी खबरें

  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 44,230 नए मामले, 555 मरीज़ों की मौत
    30 Jul 2021
    देश में कोरोना के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 15 लाख 72 हज़ार 344 हो गयी है।
  • प्रेफेट डफॉट (हैती), जनरल केन्सन, 1950
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    वाशिंगटन सत्ता परिवर्तन का ढोल पीटता रहता है, लेकिन क्यूबा अपनी क्रांतिकारी लय के साथ काम करता है
    30 Jul 2021
    1959 की क्यूबा क्रांति ग़ुलामी और औपनिवेशिक वर्चस्व के मनहूस इतिहास के ख़िलाफ़ थी। अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया थी? 19 अक्टूबर 1960 को देश पर आर्थिक नाकेबंदी लगा दी गई, जो कि आज भी जारी है।
  • Pegasus snooping row
    भाषा
    पेगासस जासूसी मामले में शीर्ष न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग करते हुए 500 लोगों, समूहों ने सीजेआई को लिखा पत्र
    29 Jul 2021
    पत्र में मीडिया में आई इन खबरों पर हैरानगी जताई है कि स्पाइवेयर का इस्तेमाल छात्राओं, विद्वानों, पत्रकारों, मानवाधिकार के पैरोकारों, वकीलों और यौन हिंसा पीड़िताओं की निगरानी के लिए किया गया।
  • आईसीएफ़
    बढ़ते मामलों के बीच राजद्रोह क़ानून को संवैधानिक चुनौतियाँ
    29 Jul 2021
    राजद्रोह का क़ानून जो भारत में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लाया गया था, उसे इंग्लैंड ने निरस्त कर दिया है।
  • OBC got reservation under All India Medical Education Quota, student organizations said victory of struggle!
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटा के तहत ओबीसी को मिला आरक्षण, छात्र संगठनों ने कहा संघर्ष की हुई जीत!
    29 Jul 2021
    चिकित्सा अभ्यर्थियों की ओर से चिकित्सा शिक्षा के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण देने की लंबे समय से मांग की जा रही थी। कुछ दिनों पहले तक केंद्र सरकार इससे अपना पल्ला झाड़ रही तो और इसे न्यायलय में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License