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भारत
राजनीति
विश्व जनमत हिंदुत्ववादी भारत के ख़िलाफ़ है
साफ़ शब्दों में कहें तो एक विचारधारा के रूप में हिंदुत्व, 21वीं सदी के साथ समसामयिक नहीं रहा है। यह भारत को विश्व जनमत से अलग-थलग करने का काम कर रहा है।
एम. के. भद्रकुमार
26 Dec 2019
modi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पुर्तगाली पीएम एंटोनियो कोस्टा का इंतज़ार करते हुए। नई दिल्ली, 19 दिसंबर 2019। फ़ोटो: एपी

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ भारत के समीकरणों में यह एक असामान्य दौर वाला समय रहा है। मोदी-अमित शाह की कार्य योजना, पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम(CAA) थोपने और इसके उपरान्त राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लागू करने के ख़िलाफ़ चल रहे जन आंदोलन ने विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी इस बात से गहरे सदमे में है कि इतनी कम समय के मोदी शासनकाल के दौरान, भारत एक तानाशाही शासन के रूप में कैसे पतित हो गया है। भारत में हो रही वर्तमान घटनाओं को परिपेक्ष्य में रखने के लिए पश्चिमी लेखक समूह इसके सूत्र मोदी के राजनैतिक कैरियर में तलाश रहे हैं।

जब लोकतांत्रिक तौर पर चुनकर आई कोई सरकार बेहद ठण्डे दिमाग से उससे असहमति का प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को गोलियों से भून देती है और बेपरवाह आगे बढ़ने लगती है, तो यह सभ्य दुनिया में वितृष्णा के भाव को जन्म देता है। आज बाहरी दुनिया, वो चाहे मुस्लिम दुनिया हो या ईसाई दुनिया, दोनों ही एक समान सीएए(CAA) और एनआरसी (NRC) को निःसंदेह तौर पर ‘मुस्लिम विरोध’ के रूप में देखता है।

हालाँकि यह ईसाई विश्व की प्रतिक्रिया है जिसने खासकर उन हिंदू कट्टरपंथियों के लिए इसे पीड़ादायक बना दिया है, जिन्हें इस बात का भ्रम था कि ईसाई संसार में ’इस्लामोफ़ोबिया’ का भूत दोनों के लिए एक साझा मंच था, और कोई विरोध देखने को नहीं मिलेगा।

लेकिन पांडित्य और वैश्विक दृष्टिकोण के अभाव के चलते यह बात मोदी भक्तों की समझ से परे है, कि वे इस बात को समझ सकें कि अब्राहमिक धर्मों-यहूदी धर्म,ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच कड़वाहट की अपनी जटिलताएं हैं, और जिसकी जडें इतिहास में हैं। यह किसी पारिवारिक कलह के तरह कहीं अधिक प्रतीत होती हैं, जो पसंद और नापसंद, तालमेल और घृणा,तालमेल और घृणा, इच्छाओं और अनिच्छाओं वाली उछाह मारती एक दूसरे पर लदी भावनाओं के ज्वार से लिपटी हुई है।

इसके अलावा हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा इस मान्यता को प्रचारित-प्रसारित किए जाने के बावजूद, तथ्य यह है कि प्राचीन अब्राहमिक धर्मों के विपरीत, हिंदूवाद एक 'धर्म'के रूप में हाल ही की उत्पत्ति है। यक़ीनन यह उतना ही पुराना है जितना कि ब्रिटिश भारत का काल - और यह बाहर खड़ा होकर, अंदर झाँक रहा है।

अपनी पुस्तक “प्राचीन भारत में क्रांति और प्रति-क्रांति” में डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर लिखते हैं, “सर्वप्रथम इस बात को समझने की आवश्यकता है कि आम भारतीय संस्कृति जैसी कोई चीज़ कभी नहीं रही।ऐतिहासिक रूप से तीन भारत रहे हैं - ब्राह्मण भारत,बौद्ध भारत और हिंदू भारत।”

अंबेडकर ने इसकी व्याख्या करते हुए बताया है कि मुस्लिम आक्रमणों से पहले का भारत का इतिहास "ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच चलने वाला एक अनवरत संघर्ष का इतिहास रहा है।" ब्राह्मणवाद ने बौद्ध धर्म पर अपनी निर्दयतापूर्वक जीत हासिल करने के बाद, अंततः, हिंदुत्व की आड़ में खुद को ढँकने की कोशिश की। यह हिंदुत्व का पर्याय बन गया। यही कारण है कि जहाँ-जहां अब्राहमिक धर्म प्रचलन में है, वहाँ हिंदुत्व, शेष दुनिया के साथ अपनी वैचारिक आत्मीयता की उम्मीद नहीं कर सकता।

इसके साथ ही यह रेखांकित किया जाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत में मौजूदा हिंसा और कट्टरता के बारे में दुनिया की राय में जिस तरह का व्यापक अलगाव दिखाई पड़ रहा है, वह धर्म के मामले से बहुत आगे निकल जाता है। मुद्दा यह है कि, अगर एक बार फिर से अंबेडकर को उद्धृत करते हुए कहें तो “हिंदूवाद स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के लिए ख़तरा है। और इस प्रकार यह लोकतंत्र का दुश्मन है।” भारत में हिंदुत्व के ग़ुस्से पर पश्चिमी दुनिया की प्रतिक्रिया, पूरे तौर पर अंबेडकर ने जो लिखा, से मेल खाती है।

पश्चिमी मत सीएए (CAA) और एनआरसी(NRC) को भारत में लोकतंत्र की हत्या के साथ जोड़कर देखता है। और इस प्रकार, पश्चिमी लेखक वर्तमान राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों में भारतीय लोकतंत्र के उद्धार को देखते हैं। मोदी और आरएसएस पर उनके हमले दिन-ब-दिन (यहाँ और यहाँ) तीखे ही होते जा रहे हैं।

पश्चिमी उदारवादी राय के रूप में इस बर्फीले तूफ़ान जैसी आलोचना को झेलते हुए, मोदी सरकार की मुश्किलें तब और अधिक खुलकर सामने आ गईं, जब 19 दिसंबर को मोदी के निमंत्रण पर महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के आयोजन समिति की दूसरी बैठक में भाग लेने के लिए पुर्तगाली प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा 'वर्किंग विज़िट' पर दिल्ली आए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधीजी की 150 वीं जयंती जैसे समारोह में कोस्टा को इसके प्रतिष्ठित 'आयोजक' के रूप में जोड़ना, मोदी जी की ओर से लिया गया बुद्धिमानीपूर्ण फ़ैसला था। लेकिन अब यह बीते इतिहास की बात हो गई है, क्योंकि मोदी सरकार ने जिस वहशीपन से बीजेपी शासित प्रदेशों में प्रदर्शनकारियों पर दमन ढाए हैं, ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में,उसने गांधीवादी विरासत का जश्न मनाने का उसका नैतिक हक़ खो दिया है।

कोस्टा जिस समय दिल्ली में उतरे, उस समय शहर के कुछ हिस्से हिंसा की चपेट में थे और दिल्ली की सड़कों पर ख़ून के छींटे देखे जा सकते थे। पीएम कोस्टा के आगमन से ठीक दो दिन पहले, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय को लुटेरे पुलिसकर्मियों द्वारा 'युद्ध क्षेत्र' में बदल दिया गया था।

बिलकुल सधे अंदाज़ में विदेश मंत्रालय ने कोस्टा की यात्रा को, मात्र उनके आगमन की घोषणा करते हुए परंपरागत प्रेस विज्ञप्ति के ज़रिये पूरी तरह से गुप-चुप तरीके से निपटा दिया। इस अवसर की असंगति के लिए किसी व्यापक जवाबदेही की आवश्यकता नहीं है।

कोस्टा के दिवंगत पिता ऑरलैंडो दा कोस्टा का संबंध गोवा से रहा है। वे एक प्रसिद्ध लेखक और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें पुर्तगाल में तत्कालीन क्रूर तानाशाही द्वारा बंदी बना लिया गया था। (ऑरलैंडो कोस्टा के नाटक, नों फ्लावर्स, नों व्रेअथ्स का मंचन 1961 में गोवा में पुर्तगाली शासन के अंत की रात पर आधारित है।) प्रधानमंत्री कोस्टा खुद एक समाजवादी हैं, जिन्होंने लोकलुभावन और अंध-राष्ट्रवादी बहसों और फासीवाद की अन्य अभिव्यक्तियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, अपने देश को "एक विश्व-नागरिक चरित्र और स्वागत करने वाले समाज के रूप में दुनिया के लिए खुला" के रूप में चित्रित करने में गर्व करते हैं।

दो साल पहले हिंदुस्तान टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में कोस्टा ने कहा था, “पुर्तगाल में, वर्तमान में राजनीतिक रूप से कोई चरमपंथी दक्षिणपंथी पार्टी अस्तित्व में नहीं है… पुर्तगाली चुनावों में नस्लवादी और अंधराष्ट्रभक्ति बहसों ने कभी भी बड़ी बढ़त बना पाने में सफलता प्राप्त नहीं की है। इसके विपरीत: हमारी सरकार इस बात के लिए तैयार थी कि जितने शरणार्थियों का कोटा यूरोपीय संघ ने हमारे लिए निर्धारित किया था उससे कहीं अधिक लोगों को हम शरण देने को तैयार थे। और सबसे बड़ी बात यह है कि उस निर्णय का सभी राजनीतिक दलों और आम तौर पर पुर्तगाली समाज की ओर से सर्वसम्मति से स्वागत किया गया। यही कारण है कि पुनर्वास कार्यक्रम के ढांचे में स्वागत किए गए शरणार्थियों के मामले में पुर्तगाल आज यूरोपीय देशों में चौथे स्थान पर है।”

बीजेपी के नेताओं को इस बात का अहसास ही नहीं है कि मोंटब्लैंक पेन या पर्स को फड़फड़ाने से, अपने कोट की जेब में रेशमी रुमाल को खोंसने से, या पाटेक फिलिप की घड़ी पहनने से ही वे 'आधुनिक' नहीं बन जाते हैं। आधुनिकता का संबंध दिमाग और बौद्धिकता से है। मोदी एक ही साथ भारत को मध्ययुगीन यूरोप में हुए धार्मिक युद्धों से मिलते-जुलते एक आदिम युग में वापस खींचने, और उसी समय इस बात का दावा कि वे भारतीयों के बीच आधुनिकता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं, का दावा नहीं कर सकते।

साफ़ तौर पर कहें तो एक विचारधारा के रूप में हिंदुत्व, 21वीं सदी के साथ समसामयिक नहीं है। यह भारत को विश्व जनमत की निगाह में अलग-थलग कर देता है। यह वर्तमान के मंथन से निकला हुआ सबक है। कोई इस बात पर विमर्श कर सकता है कि क्या पीएम कोस्टा के पास मोदी को देने लायक कोई सलाह थी। 

(अक्टूबर में कोस्टा की चुनावी जीत पर मेरा ब्लॉग देखें, पुर्तगाल में सेंटर-लेफ़्ट समाजवादियों की चुनावों में दोबारा-जीत।)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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