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गैंगरेप पीड़ित परिवार के ख़िलाफ़ क्यों खड़ी है योगी सरकार?
हाथरस की घटना में पीड़िता की मौत हुई है इससे बड़ा सच कुछ नहीं हो सकता। मरने से पहले पीड़िता ने गैंगरेप करने वालों के नाम बताए हैं। यह मृत्युपूर्व बयान है जिस पर शक करने का अधिकार कानूनन किसी को नहीं है, पुलिस को भी नहीं।
प्रेम कुमार
03 Oct 2020
गैंगरेप पीड़ित परिवार के ख़िलाफ़ क्यों खड़ी है योगी सरकार?

हाथरस गैंगरेप-मर्डर केस में योगी सरकार पीड़ित पक्ष के ही खिलाफ खड़ी दिख रही है। नार्को टेस्ट कराने का फैसला इसका बड़ा, मजबूत और ताजातरीन उदाहरण है। दोनों पक्ष का नार्को टेस्ट समझ से परे है। नार्को टेस्ट इसलिए कराया जाता है ताकि झूठ पकड़ा जा सके। हाथरस की घटना में पीड़िता की मौत हुई है इससे बड़ा सच कुछ नहीं हो सकता। मरने से पहले पीड़िता ने गैंगरेप करने वालों के नाम बताए हैं। यह मृत्युपूर्व बयान है जिस पर शक करने का अधिकार कानूनन किसी को नहीं है, पुलिस को भी नहीं। ऐसे में पीड़ित पक्ष का नार्को टेस्ट बताता है कि शक आरोपी पक्ष से ज्यादा पीड़ित पक्ष पर है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो योगी सरकार और उसके प्रशासन को गैंगरेप पीड़िता के खिलाफ खड़ा दिखाते हैं।

क्यों लगाई मीडिया पर पाबंदी, पहरे में रहा पीड़ित परिवार?

पूरे हाथरस को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। मीडिया तक के प्रवेश पर रोक लगा दी गयी। आज 3 सितंबर को बात करने की इजाजत दी गई। इससे पहले कर्फ्यू जैसे माहौल में उस एसआईटी ने कथित जांच की जिसका गठन 30 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था। मगर, यह कैसी जांच थी कि पीड़िता के परिवार को समाज से अलग-थलग रखा गया। उनके मोबाइल फोन छीन लिए गये। सुबह से देर रात तक महिला पत्रकारों समेत किसी भी पत्रकार को रिपोर्टिंग करने नहीं दी गयी। देश स्तब्ध था। टीवी पर एक-एक पल का नज़ारा सामने दिख रहा था। सिर्फ प्रतिबंध नहीं था, एक जबरदस्ती थी। पुलिसवालों की अभद्रता, धक्का-मुक्की और पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए गये। ये घटनाएं ऐसा संदेश बिल्कुल नहीं दे रही थीं कि पीड़ित परिवार के साथ न्याय किया जा रहा है।

किसने की फोन टैपिंग, क्या ये स्टिंग है?

2 अक्टूबर की शाम होते-होते एक निजी न्यूज चैनल में फोन पर हुई बातचीत के दो अंश प्रसारित किए जाते हैं। इनमें बातचीत पीड़िता के परिजन और पत्रकार के बीच है। जबकि, एक अन्य बातचीत में एक स्थानीय व अन्य हैं। इस बातचीत के माने-मतलब लगाकर इसे स्टिंग बताया जाता है और नैरेटिव बनायी जाती है कि पीड़िता परिवार को लोभ-लालच देकर गलतबयानी के लिए उकसाया जा रहा था। आरोप मीडिया के एक धड़े पर और कांग्रेस पर लगाया गया।

मीडिया का वह धड़ा भी पीड़ित परिवार से मिलने और रिपोर्टिंग करने के लिए मैदान में खड़ा था और कांग्रेस भी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हाथरस नहीं जा सके क्योंकि उनके साथ भी धक्का-मुक्की हुई। भारी पुलिस बल ने पीड़ित परिवार के लिए सहानुभूति दिखाने वालों को हाथरस जाने से रोक दिया। और, अब उन पर ही उल्टे इल्जाम मढ़ दिए गये। इस कदम से भी योगी सरकार की तनिक भी सहानुभूति पीड़ित के लिए नज़र नहीं आती।

इंडिया टुडे समूह ने एक बयान जारी कर पूछा है कि उसके रिपोर्टर की मोबाइल किस कानून और अधिकार के तहत टैप की गयी। या फिर लड़की के भाई के फोन को भी सर्विलांस पर क्यों रखा गया? निश्चित रूप से इस कार्रवाई को एक योजना के तहत ही अंजाम दिया गया है। इसके नतीजे जल्द देखने को मिलेंगे। जिन लोगों ने भी पीड़िता के लिए आवाज़ उठाने की कोशिश की है उन्हें इस फोन टैपिंग के जरिए फंसाया जाने वाला है, इसकी आशंका बन आयी है।

क्यों नहीं हुआ श्मशान घाट में ‘अंतिम संस्कार’, क्यों खेत में जला दी गयी लाश?

योगी सरकार का बदला हुआ रुख तब भी बहुत वीभत्स दिखा जब रातों रात पीड़िता को हाथरस ले जाया गया लेकिन उसका ‘अंतिम संस्कार’ नहीं होने दिया गया। एक मां की विनती ठुकरा दी गयी कि वह अपनी बेटी का अंतिम बार मुंह देखना चाहती है। पूरे परिवार को उसके घर में बंद कर बाहर भारी पुलिस बल का पहरा बिठा दिया गया। लाश को न जाने किस ज्वलनशील पदार्थ से आग के हवाले कर दिया गया। यह किसी भी दृष्टि से ‘अंतिम संस्कार’ नहीं था।

अब तक यह मामला मीडिया में सुर्खियां पा चुका था लिहाजा रात 2 बजे के बाद लाश जलाने का फैसला सिर्फ पुलिस या स्थानीय प्रशासन का नहीं हो सकता। एक तस्वीर भी इस बात की पुष्टि करती है जो इन दिनों में सोशल मीडिया में तैर रही है। इस तस्वीर में योगी आदित्यनाथ जलती हुई लाश को एक लैपटॉप पर देख रहे हैं। यह पता नहीं कि वह वीडियो उसी वक्त देख रहे थे या फिर बाद में। बहरहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मसले पर सरकार और प्रशासन को नोटिस जारी कर गलत को गलत बोलने वालों के लिए उम्मीद जिन्दा रखी है।

पुलिस की लापरवाही से नहीं, हैरानी सरकार के रुख से

14 सितंबर को हाथरस में घटी गैंगरेप की घटना में पुलिस की लापरवाही कतई नहीं चौंकाती है। ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष से कमाई नहीं होती है और अमूमन पुलिस दोषी पक्ष से लेन-देन करती है- यह बात देश का आम नागरिक बगैर किसी सबूत के भी मान लेता है। मगर, जब मामला बड़ा होता जाता है, सरकार की नज़र में आता है तो बड़े अधिकारियों की देखरेख में ‘गलती’ सुधार ली जाती है- यह भी देश के लोग मान कर चलते हैं। हाथरस गैंगरेप में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

अलीगढ़ के अस्पताल में 13 दिन तक इलाज होता रहा। पुलिस ने देर से ही सही मगर लड़की का बयान लिया, गैंगरेप की बात लड़की ने बतायी और नाम भी लिए। यह सब रिकॉर्ड में है। छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार अभियुक्तों पर गैंगरेप की धारा पुलिस को देर से ही सही, लेकिन लगानी पड़ी। मगर, आश्चर्य की बात है कि उसी अस्पताल के न्यूरो सर्जन जिनकी निगरानी में पीड़िता थी उनका बयान आता है कि गैंगरेप की बात उन्हें नहीं मालूम!

पीड़िता के परिजन लगातार ब्लीडिंग होने की बात बताते रहे, किसी ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया! पीड़िता की हालत बिगड़ती चली गयी और इसके पीछे यह बड़ा कारण था। जब पीड़िता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर किया जा रहा था तब भी प्रशासन या सरकार को एअर लिफ्ट देनी चाहिए थी। मगर, नहीं दी गयी। युवती नहीं बची।

यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि गैंगरेप केस में पहले छेड़खानी का केस दर्ज हुआ। पीड़िता के बयान दर्ज करने की जरूरत नहीं समझी गयी। देर से बयान लेने पुलिस पहुंची और जब मामला सुर्खियों में आया तो 22 सितंबर को गैंगरेप का केस दर्ज हुआ। इस दौरान परिजन कहते रहे कि बच्ची बगैर कपड़ों में मिली थी, उसके जीभ कटी थे, वह बोल नहीं पा रही थी, वह चलने लायक नहीं थी। मगर, पुलिस ने संज्ञान नहीं लिया। आरोपियों की गिरफ्तारी भी तुरंत नहीं हुई। और गैंगरेप की धाराएं तो बाद में लगायी गयी।

क्या अन्याय नहीं है गैंगरेप पीड़ित परिवार का नार्को टेस्ट?

दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में यहां तक भी स्थिति को मन मारकर लोग स्वीकार करते हैं, प्रशासन को कोसते हैं, सरकार को कोसते हैं। मगर, अचानक पुलिस के आला अधिकारियों के बयान आने लगे कि लड़की से बलात्कार नहीं हुआ!  तो, आश्चर्य की सीमा भी अनंत हो जाती है। मरने वाली युवती के मुंह से कैमरे पर लिया गया बयान क्या इस तरह से खारिज हो सकता है! अदालत से बाहर कोई इस बयान को झुठला नहीं सकता। मगर, झुठलाया गया। पुलिस अफसर और सत्ताधारी नेताओं ने इसे झुठलाया। यहीं से यह दिखने लगा कि योगी सरकार की सहानुभूति पीड़ित पक्ष के साथ नहीं है। अब दोषी लोगों के साथ पीड़ित परिवार को भी रख दिया गया है। उनका भी नार्को टेस्ट होगा– यह अन्याय है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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