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राजनीति
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तुर्की-यूएई रिश्तों में सुपर ब्लूम के मायने क्या हैं?
तुर्की के लिए पूर्वी भूमध्य सागर में उसके अलग-थलग पड़ जाने और रूस के साथ उसके रिश्तों में बढ़ती टकराहट ने क्षेत्रीय देशों के साथ उसके सम्बन्धों में सुधार की ज़रूरत को अनिवार्य बना दिया है।
एम. के. भद्रकुमार
27 Nov 2021
turkish
24 नवंबर, 2021 को यूएई क्राउन प्रिंस शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान (बायें) की अंकारा में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन से मुलाक़ात।

यूएई क्राउन प्रिंस शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान के अंकारा दौरे और बुधवार को राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन के साथ उनकी मुलाक़ात के साथ ही पश्चिम एशिया में “कोरोनावायरस के बाद” की अपार भू-राजनीतिक संभावनाओं की नयी दशा-दिशा में उफ़ान आ गया है।

एमबीज़ेड नाम से जाने जाते क्राउन प्रिंस लगभग उस एक दशक के अंतराल के बाद तुर्की के दौरे पर थे, जिसमें यूएई-तुर्की के बीच के रिश्तों के लिए मुसीबतों का समय माना जाता रहा है। रिश्तों में आयी यह गिरावट अपने चरम की हद तक तब पहुंच गयी थी कि, जब तुर्की ने 2016 में एर्दोगन के ख़िलाफ़ नाकाम तख़्तापलट की कोशिश में अमीराती भूमिका का आरोप लगाया था और जिसके पीछे लगभग निश्चित रूप से अमेरिकी हाथ था।

भीतर ही भीतर चल रही यह दुश्मनी पिछले साल तब चरमोत्कर्ष पर तब पहुंच गयी थी, जब यूएई ने रंगीले तुर्की गैगस्टर से व्हिसलब्लोअर बने उस सेदत पीकर को आश्रय दिया था, जिसे लेकर एर्दोगन ग़ुस्से में थे और जिसने इस खाड़ी देश में अपने सुरक्षित ठिकाने से तुर्की सरकार में जाने माने वरिष्ठ लोगों को लेकर घटिया जानकारी लीक करते हुए पलटकर चोट पहुंचाने का विकल्प चुना था।

इस समय पेकर संयुक्त अरब अमीरात में रहता है और अब एक ऐसा विवादास्पद मुद्दा बनता जा रहा है, जिसे कोई छूना नहीं चाहता, लेकिन एमबीजेड और एर्दोगन दोनों एक दूसरे से मेल-मिलाप की कोशिश कर रहे हैं और संभव है कि एर्दोगन अबू धाबी की यात्रा करें। संभवत: एर्दोगन की इस यात्रा के लिए आधार तैयार करने के लिए तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोग्लू दिसंबर में अबू धाबी के दौरे पर होंगे।

अचानक हो रही इस हलचल से उसी तरह की स्थिति का पता चलता है, जिसे डेज़र्ट ब्लूम कहते हैं। डेज़र्ट ब्लूम जलवायु से जुड़ी एक ऐसी परिघटना होती है, जिसमें उन कीड़े, पक्षियों और छिपकलियों की छोटी प्रजातियों का प्रसार होता है, जिनकी अचानक कभी मौत हो गयी होती है। लेकिन इस परिघटना के विपरीत सुपरब्लूम होता है, जिसका वनस्पतिशास्त्री इस तरह वर्णन करते हैं कि यह घटनाओं के एक दुर्लभ संयोजन होता है और यह संयोजन इसे एक असाधारण परिघटना बना देता है।  

इन घटनाओं में सबसे प्रमुख है कोरोनावायरस की वजह से हुई तबाही, जिसने न सिर्फ़ वैश्विक अर्थव्यवस्था, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों में भी ऐतिहासिक बदलाव ला दिये हैं। इस बदलाव से पैदा हुई खलबली पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अपने सबसे ज़बरदस्त स्तर पर महसूस की जा रही है, जहां पेट्रोडॉलर वाले देश गहरी मंदी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं और इन देशों में एक उदास कर देने वाली, लंबी, पीछे हट जाने की दहाड़ मारती अमेरिकी छंटनी को देखा जा रहा है।  

इस क्षेत्र के देशों को मौजूदा गंभीर वास्तविकता के अनुकूल होने के लिए कहा जा रहा है। इस तरह, इस समय इस क्षेत्र में चल रहे विभिन्न दशा और दिशाओं को फिर से निर्धारित करने में बांधने वाला एक सामान्य सूत्र यही है कि सऊदी अरब और यूएई के साथ ईरान के रिश्तों में आ रहे स्थायित्व और सामान्यीकरण से लेकर सीरिया और ईरान या तुर्की के साथ सऊदी अरब और मिस्र के रिश्तों में आ रहे स्थायित्व और सामान्यीकरण तक की ऐसी अभूतपूर्व स्थितियों में बतौर प्रवर्तक, उत्तेजक या उत्प्रेरक या यहां तक कि विनाशक के रूप में भी अमेरिका मौजूदगी नहीं देखी जा रही है,जो कि एक ख़ास बात है।

अमेरिकी छंटनी तो अभी शुरू ही हुई है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति पर इसका बेहतर प्रभाव पहले से ही दिख रहा है। इसका एक स्वाभाविक नतीजा तो यह भी है कि क्षेत्रीय देश वह सबकुछ कर रहे हैं, जो वे ख़ुद को उस अशांति से बचाने के लिए कर सकते हैं, जिस अशांति का उस स्थिति में पश्चिम एशिया और अफ़्रीका में फैलना तय है, जब कभी किसी मुद्दे को लेकर अमेरिका औऱ चीन आपस में भिड़ जायें। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के पहले अफ़्रीका दौरे के दौरान इसका संकेत तब मिला, जब उन्होंने अफ़्रीकी नेताओं को चीन से भय दिखाकर उनका ब्रेनवॉश करने की कोशिश की, लेकिन दूसरी तरफ़ उन्होंने अफ़्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के साथ रचनात्मक जुड़ाव के लिए चीन की भरपूर सराहना भी की।

इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अमेरिका का ध्यान हिंद-प्रशांत पर केंद्रित है, पश्चिम एशिया विश्व अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाले व्यापार मार्गों का चौराहा बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा। इस क्षेत्र के देश क्षेत्रीय संतुलन की कमी को लेकर बेहद सचेत हैं। उन्होंने शांति, स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए यथासंभव क्षेत्रीय सहमति की संभावनाओं की तलाश करना शुरू कर दिया है।

जैसे ही ईरान के प्रति वाशिंगटन की नियंत्रण रणनीति सुलझ जाती है और विकल्प सीमित हो जाते हैं, तो इस समय की यह एक अनिवार्य ज़रूरत बन जायेगी, और कोई भी क्षेत्रीय देश ईरानी विरोधी देशों के अमेरिकी नेतृत्व वाले इस क्षेत्रीय व्यूह रचना को पुनर्जीवित नहीं करना चाहेगा।

इस बीच, इन पेट्रोडॉलर देशों की अगुवाई करने वाले अमेरिका की क्षमता में इन देशों का समग्र विश्वास और भरोसा टूटा है। सऊदी अरब ज़्यादा तेल निकालने के राष्ट्रपति बाइडेन के संदेश की अनदेखी कर रहा है, ताकि अमेरिकियों के पास काम से आने-जाने या थैंक्सगिविंग और क्रिसमस यात्रा के लिए सस्ती गैसोलीन हो। उधर, ब्लिंकन की ओर से तथाकथित "इंडो-अब्राहमिक समझौते" के रूप में जाना जाने वाला तथाकथित मंत्रिस्तरीय समूह - यूएस, इज़राइल, यूएई और भारत के सरल निर्माण के बावजूद यूएई ने भी अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए तेल की क़ीमतों में कमी लाने के लिहाज़ से तेल उत्पादन को बढ़ाने से सऊदी की तरह ही इनकार कर देने का रुख़ अख़्तियार कर लिया है। दिलचस्प बात यह है कि ईरान के शीर्ष परमाणु वार्ताकार अली बघेरी कानी ने बुधवार को अमीरात के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाक़ात की।

यूएई की सरकारी समाचार एजेंसी डब्ल्यूएएम ने कहा कि ईरान के उप विदेश मंत्री कानी ने संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार, अनवर गर्गश और अमीराती विदेश मामलों के राज्य मंत्री ख़लीफ़ा शाहीन अलमारर से मुलाक़ात की और उनके बीच की चर्चाओं में “अच्छे पड़ोसी के आधार पर रिश्तों को मज़बूत करने की अहमियत पर ज़ोर दिया और आपसी सम्मान", ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि के लिए काम करने और द्विपक्षीय आर्थिक और वाणिज्यिक रिश्तों को विकसित करने पर भी बल दिया गया।

लेकिन, ईरान के साथ यूएई की बातचीत ऐसे समय में हो रही है, जब एबीसी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक़ अगर इस सप्ताह के अंत में वियना में शुरू होने वाली आगामी वार्ता विफल हो जाती है, तो ऐसे हालत से निपटने के लिए इज़रायल सहित अमेरिका और उसके सहयोगी पहले से ही "प्लान बी" विकल्पों की एक सूची पर चर्चा कर रहे हैं।

आम धारणा तो यही है कि संयुक्त अरब अमीरात एक क्रांतिकारी विरोधी देश है, जो सामाजिक आंदोलनों और बढ़ती शक्तियों या इस क्षेत्र में तथास्थिति में बदलाव लाने की किसी भी संभावना को कमज़ोर करने की कोशिश में अमादा रहा है, लेकिन शायद इस समय उसे भी कमी-वेश की समीक्षा की ज़रूरत है। मूल रूप से, इसकी विदेश-नीति क्षेत्रीय स्थिरता को बनाये रखने पर ज़ोर देती है। इस क्षेत्र में इस तरह की स्थिरता और शांति संयुक्त अरब अमीरात को किसी भी तरह की क्षेत्रीय अव्यवस्था का शिकार होने से बचाती है।

कतर से लेकर लीबिया तक के लिहाज़ से संयुक्त अरब अमीरात की नीतियों को मुख्य रूप से रक्षात्मक रूप में ही देखा जा सकता है,यानी कि क्षेत्रीय व्यवस्था और अपनी सुरक्षा को बनाये रखने की कुंजी के रूप में अपनाया जाना वाला संयम। बेशक, यह इस विरोधाभास को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि राजनीतिक संयम की इस बात के बावजूद यूएई राजनीतिक सुधारों से किनारा किया हुआ है या फिर लीबिया और यमन में बेरहम गृहयुद्धों के साथ उसके संयम के इस विचार को जोड़ पाना मुश्किल है।  

बेशक (ईरान के साथ अपने रिश्ते को सहज बनाने के साथ-साथ) दमिश्क के साथ संयुक्त अरब अमीरात के तालमेल में सीरिया में संघर्ष के बाद के पुनर्निर्माण के लिहाज़ से दिलचस्प संभावनायें भी हैं। इसी तरह, रचनात्मक बातचीत शुरू करने, तनाव कम करने, सामान्य लक्ष्य की तलाश और तुर्की के साथ आर्थिक रिश्तों को मज़बूती देने को लेकर उच्चतम स्तर पर संयुक्त अरब अमीरात की यह कूटनीति सहज संभावनाओं के दरवाज़े खोलती है।  

इस तरह, एमबीज़ेड की इस अंकारा यात्रा ने प्रौद्योगिकी, परिवहन, स्वास्थ्य, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने के सिलसिले में दोनों देशों की ज़बरदस्त दिलचस्पी को सामने ला दिया है। इस बातचीत के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने "तुर्की की अर्थव्यवस्था की मदद करने और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए तुर्की में निवेश के लिए 10 बिलियन डॉलर के फ़ंड की घोषणा" की है, यह निवेश मुख्य रूप से "रणनीतिक निवेश" है, जो ख़ास तौर पर ऊर्जा, स्वास्थ्य और खाद्य पदार्थ जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।  

तुर्की की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और एर्दोगन के लिए यह महत्वपूर्ण है कि 2023 के चुनाव में नये सिरे से जनादेश हासिल करने से पहले इस संकट से वह प्रभावी ढंग से निपट लें। यूएई का यह क़दम भी आर्थिक विचारों से ही प्रेरित है। तुर्की एक बड़ा और आकर्षक बाज़ार है। लीरा के अवमूल्यन के साथ तुर्की अब निवेश करने के लिए एक बहुत अच्छी जगह है, जहां छोटी और लंबी दोनों ही अविध के दरम्यान अच्छा-ख़ास फ़ायदा मिल सकता है।

यह सुपरब्लूम उस थोड़े समय के लिए रेगिस्तान में खिलने वाले मौसम से इस मायने में अलग है कि यह एक ऐसी वानस्पतिक घटना है, जिसमें वे फूल ग़ैर-मामूली तौर पर बड़ी संख्या में अंकुरित हो जाते हैं, जिसके बीज रेगिस्तान की मिट्टी में निष्क्रिय रहते हैं और लगभग एक ही समय में खिल उठते हैं। ऐसी अफ़वाहें हैं कि संयुक्त अरब अमीरात तुर्की के रक्षा उत्पादों को एक बड़ी मात्रा में ख़रीदारी करेगा।

यूएई की दिलचस्पी एर्दोगन और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के बीच कथित तौर पर मध्यस्थता करने में है। यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन ज़ायद ने 9 नवंबर को दमिश्क में असद से मुलाक़ात की थी।

9 नवंबर, 2021 को सीरिया के राष्ट्रपति बशर असद (दायें) संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख़ अब्दुल्ला बिन ज़ायद अल नाहयान के बीच दमिश्क में बातचीत।

कल बातचीत के बाद न तो एर्दोगन और न ही एमबीज़ेड ने कोई बयान दिया है। लेकिन, सच्चाई यही है कि वे आपस में मिले और जल्द ही फिर से मिलने की योजना बना रहे हैं, ये इनके बीच के साझे विश्वास की मज़बूती का संकेत हैं कि पिछली दुश्मनी को ख़त्म किया जा सकता है और ऐसा होना भी चाहिए।  

कोई शक नहीं कि यह एक बड़ी तस्वीर है। मज़बूत, अटूट अमेरिकी समर्थन पर टिके खाड़ी गठबंधनों का क्षुद्र नेटवर्क तबाह हो रहा है; यूएई-सऊदी के बीच का समीकरण उतार-चढ़ाव की स्थिति में हैं। लोकप्रिय अरब आंदोलनों के समग्र रूप से कमज़ोर पड़ जाने से तुर्की की विदेश नीतियों को लेकर यूएई के ख़तरे की धारणा में कमी आ गयी है।

दूसरी तरफ़, तुर्की के लिए पूर्वी भूमध्य सागर में उसके अलग-थलग पड़ जाने और रूस के साथ उसके रिश्तों में बढ़ती टकराहट ने क्षेत्रीय देशों के साथ उसके सम्बन्धों में सुधार की ज़रूरत को अनिवार्य बना दिया है। हालांकि, सऊदी अरब और मिस्र के साथ तुर्की के रिश्ते सामान्य होने में समय ले रहा है, यूएई ने तुर्की तक अपनी पहुंच को सुलभ बनाने और रिश्तों को अपेक्षाकृत जल्दी सामान्य करने के इस मौक़े को समय रहते लपक लिया है।  

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें:

A Superbloom in Turkish-UAE Ties

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