इशरत जहां एनकाउंटर केस में कुछ पुलिस अधिकारियों का छूट जाना राज्य सरकारों और सभी नागरिकों के लिए चेत जाने का समय है। क्या भारत एक ऐसा देश हैं जहां पुलिस कानून के शासन की परवाह किए बिना लोगों की गोली मारकर हत्या कर देती है? परसा वेंकटेश्वर राव जेआर लिखते हैं कि क्यों कोर्ट जब आतंकी या पुलिस एनकाउंटर से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर आधारित न रहने वाले फ़ैसले देते हैं, तो वो अराजकता की स्थिति बनाते हैं।
विशेष सीबीआई कोर्ट के जज वीआर रावल ने गुजरात पुलिस के 3 अधिकारियों (आईजी जीएल सिंघल, रिटायर्ड डीएसपी तरूण भारोत और एएसआई अनाजु चौधरी) को निर्दोष ठहराते हुए जो तर्क दिए, वो पूरे तरीके से सही नहीं हैं, लेकिन आंशिक कानूनी बोध पैदा करते हैं। इसलिए यह फ़ैसला कई कानूनी सवाल खड़े करता है।
फिर यहां एक अतिरिक्त-कानूनी पहलू पर भी निर्भर हुआ जा रहा है, जिसके तहत डेविड हेडली ने बताया कि इशरत जहां लश्कर-ए-तैयबा (LeT) की सदस्य थी। डेविड हेडली पर मुंबई में 26 नवंबर 2008 का मास्टरमाइंड होने का शक जताया जाता है। इशरत जहां से संबंधित यह खुलासा अमेरिका की जांच एजेंसी FBI के सामने हेडली की अपराध-स्वीकृति से संबंधित दस्तावेज़ों में है।
पहले कानूनी तर्क पर बात करते हैं।
सामान्यत: यह तर्क दिया जाता है कि आरोपी पुलिसकर्मियों ने जो किया वह अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किया। मतलब, यहां कोई व्यक्तिगत मंशा नहीं थी। इससे संभावना पैदा होती है कि पुलिस से चूक हो गई होगी लेकिन यह काम अच्छी मंशा के साथ किया गया होगा।
इस तर्क पर वाद-विवाद हो सकता है लेकिन यह एक वैधानिक तर्क है। इस तर्क में सजा से बचने की बात नहीं होती, लेकिन अपराध की प्रबलता को कम कर दिया जाता है। लेकिन इस तर्क को आधार बनाकर न्यायाधीश रावल ने अपना फ़ैसला नहीं सुनाया। रावल ने यह माना कि अधिकारियों की कार्रवाई का आधार उन्हें IB से मिली सूचना थी। पुलिस अधिकारियों को बताया गया था कि कार में मौजूद इशरत जहां, जावेद शेख ऊर्फ प्राणेश पिल्लई और दूसरे लोग आतंकी थे।
न्यायाधीश रावल ने कहा, "कोई भी रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जो बताता हो कि पीड़ित आतंकी नहीं थे और IB की सूचनाएं सही नहीं थीं।" यहां हम अगर न्यायाधीश के नज़रिए से देखें तो जिसे भी आतंकी माना जाता है, उसे गोली मारी जा सकती है।
यहां तर्क है: एक आंतकी राज्य का दुश्मन होता है। उसके ऊपर कानून का शासन लागू नहीं होता। उन्हें तभी मारा जाना जरूरी नहीं होता, जब वे पुलिस के लिए ख़तरा बन गए हों। उन्हें गिरफ़्तार किए जाने की जरूरत नहीं है और ना ही वहां कानून द्वारा स्थापित नियम प्रक्रिया के प्रावधानों का पालन किए जाने की जरूरत है।
न्यायाधीश यहां यह तर्क नहीं दे रहा है कि पुलिस ने इशरत जहां और उसके सहयोगियों को आत्मरक्षा में मारा। वह कह रहा है कि IB की जानकारी और हेडली की अपराधस्वीकृति के आधार पर उन लोगों की पहचान आतंकी के तौर पर हुई, यह वज़ह उन्हें मार गिराने के लिए पर्याप्त थी।
यह बेहद सताने वाली पूर्व अवधारणा है, क्योंकि इससे किसी आतंकी के कैदी बनाए जाने और उससे आतंकी समूहों से जुड़ी ज़्यादा जानकारी हासिल करने की संभावना को नकार दिया जाता है। जबकि सामान्य समझ आतंकियों को प्राथमिक तौर पर हिरासत में लेने को कहती है और अब तक यही आतंकियों और जासूसों से निपटने का तरीका भी रहा है।
जज यहां यह तर्क नहीं दे रहा है कि पुलिस ने इशरत जहां और उसके सहयोगियों को आत्मरक्षा में मारा। वह कह रहा है कि IB की जानकारी और हेडली की अपराधस्वीकृति के आधार पर उन लोगों की पहचान आतंकी के तौर पर हुई, यह वज़ह उन्हें मार गिराने के लिए पर्याप्त थी।
मनमुताबिक आतंकियों को मारने वाला नियम भी कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए ही है। इसके लिए पुलिस को साबित करना होगा कि वह वक़्त वाकई में बहुत नाजुक था। लेकिन जून, 2004 में जो हुआ उस वक़्त ऐसी कोई स्थिति नहीं थी।
हां, यह जरूर था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने के लिए LeT ने साजिश रची थी। पुलिस को सभी संदिग्धों की पकड़ने के लिए पूरी शक्तियां दी गई थीं। इशरत जहां और उसके सहयोगियों को गिरफ़्तार किया जाना था, अगर वे गिरफ़्तारी का विरोध करते, तब उनपर गोली चलाई जानी चाहिए थीं। लेकिन जो हुआ, उससे पूरे देश में पुलिस में गोली चलाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, भले ही कोई ऐसा करने की मंशा पहले से ना रखता हो।
इशरत जहां केस से पूरे देश में पुलिस और सरकार समेत हम सभी को सचेत हो जाना चाहिए। अलग-अलग वज़हों से पुलिस कई अतिरिक्त-न्यायिक हत्याओं के लिए जिम्मेदार रही है। इनमें से कुछ ही रिकॉर्ड पर आ पाई हैं और उनमें भी बहुत ही कम मामलों में जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को सजा मिल पाई है।
मनमुताबिक आतंकियों को मारने वाला नियम भी कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए ही है। इसके लिए पुलिस को साबित करना होगा कि वह वक़्त वाकई में बहुत नाजुक था। लेकिन जून, 2004 में जो हुआ, उस वक़्त ऐसी कोई स्थिति नहीं थी।
फिर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पुलिस के कड़क रवैये की वकालत करते हैं जिसका मतलब है कि जिस किसी पर वाम अतिवादी या इस्लामिक आतंकी होने का शक हो, उसे मार दिया जाए। इस धारणा में विश्वास होता है कि कुछ हत्याओं से डर पैदाकर दूसरे लोगों को नक्सली या जिहादी बनने से रोका जा सकता है। ठीक इसी तरीके पुलिस का काम धीरे-धीरे खराब होता है और हत्याएं करने का लाइसेंस जबरदस्ती मिलता है।
पुलिस में मौजूद दिग्गज एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस तरह की हत्याओं में जितने दोषी मारे जाते हैं, उतने ही निर्दोष भी निशाना बनते हैं और इससे लोगों को कानून के शासन के पालन का प्रोत्साहन नहीं मिलता। बल्कि उनका डर पुलिस से और बढ़ जाता है। इसी से कानून का शासन लागू करवाने वाली एजेंसियों की तानाशाही का रास्ता बनता है।
प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों का तक यह विचार है कि अगर आप एक पुलिसवाले को मारने के लिए हथियार दे देते हैं, तो वह एक हत्यारा बनेगा, ना कि लोगों के जीवन का रक्षक। यह उसी तरह का जंगल कानून है, जो नक्सली, जिहादी और धैर्य ना रखने वाले पुलिस अधिकारी चाहते हैं। इससे सभी लोग एक-दूसरे से युद्ध कर रहे होंगे।
इस तरह की अराजकता से बचने के लिए राज्य बनाए गए हैं, न्याय व्यवस्था का गठन किया गया है। इसलिए यह न्यायापालिका बनाई गई है ताकि कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति से कोई दूसरा व्यक्ति इसके ज़रिए संघर्ष कर सके।
इशरत जहां और उसके साथियों को मारने वाले पुलिस अधिकारियों के बारे में न्यायाधीश रावल का यह मत कि IB की सूचनाओं के आधार पर पुलिसवाले अच्छी मंशा के साथ काम कर रहे थे, वह मत बेहद घातक है। रावल ने जो नज़रिया अपनाया है, उसमें गलती होने की स्थिति में कोई जगह ही नहीं बचती। एक जज के लिए यह घातक नज़रिया है।
फिर कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो पुलिस के कड़क रवैये की वकालत करते हैं, जिसका मतलब है कि जिस किसी पर वाम अतिवादी या इस्लामिक आतंकी होने का शक हो, उसे मार दिया जाए। इस धारणा में विश्वास होता है कि कुछ हत्याओं से डर पैदाकर दूसरे लोगों को नक्सली या जिहादी बनने से रोका जा सकता है। ठीक इसी तरीके पुलिस का काम धीरे-धीरे खराब होता है और हत्याएं करने का लाइसेंस जबरदस्ती मिलता है।
इशरत जहां मामले का सबसे डरावना हिस्सा यह नहीं है कि वो आतंकवादी थी या नहीं। अगर मान भी लें कि वो एक आतंकवादी थी, तो अपना कर्तव्य निभा रहे पुलिसवालों को यह अनुमति कहां से मिल गई कि उसे मार सकें? अगर कुछ सिरफिरों को लगता है कि पुलिस का काम करने का ढंग यही है तो हम न्यायालयों को बंद कर सकते हैं और कानून की किताबों को नदियों में फेंक सकते हैं।
(पारसा वेंकटेश्वर राव जेआर एक लेखक, टिप्पणीकार और दिल्ली में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैँ।)
यह लेख मूलत: द लीफलेट में प्रकाशित हुआ था।
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Acquittal in Ishrat Jahan Encounter: A Licence to Kill?