NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
वॉशिंगटन पोस्ट के खुलासे के बाद भारत को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के नियमों में संशोधन करने की ज़रूरत
वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें आर्सेनल कंसल्टिंग नामक एक डिजिटल फ़ोरेंसिक्स फ़र्म के हवाले से खुलासा किया गया है कि भीमा कोरेगाँव की घटना में एक्टिविस्ट रोना विल्सन को फँसाने के लिए सबूतों को उनके लैपटॉप में प्लांट करने के लिए "बहुत संगठित" और "बेहद गुप्त" तरीक़े से लैपटॉप हैक किया गया था। 
दुष्यंत
12 Feb 2021
Translated by महेश कुमार
वॉशिंगटन पोस्ट के खुलासे के बाद भारत को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के नियमों में संशोधन करने की ज़रूरत

वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें आर्सेनल कंसल्टिंग नामक एक डिजिटल फ़ोरेंसिक्स फ़र्म के हवाले से खुलासा किया गया है कि भीमा कोरेगाँव की घटना में एक्टिविस्ट रोना विल्सन को फँसाने के लिए सबूतों को उनके लैपटॉप में प्लांट करने के लिए "बहुत संगठित" और "बेहद गुप्त" तरीक़े से लैपटॉप हैक किया गया था।  

यह खुलासा इस बात पर सोचने को मजबूर करता है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स के साक्ष्य कितने सार्थक हैं। इसी संबंध में दुष्यंत लिख रहे हैं।

——–

1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव की घटना और इसके बाद की घटनाएं किसी भी समझदार व्यक्ति को केवल एक ही निष्कर्ष पर पहुंचा सकती हैं: कि लोगों पर हिंसा और साजिश के आरोप लगाकर उन्हे मुकदमें में दुर्भावना तरीके से फंसाया गया है।

प्रेस के कुछ हल्कों द्वारा अहस्ताक्षरित "पत्र" लीक करना, वकीलों और पेशेवरों की आधी रात को नाटकीय और गैर-जरूरी गिरफ्तारी करना– और सभी का अपने घरों में पाया जाना- गिरफ्तारियाँ वैधानिक क़ानूनों का उल्लंघन है, मामले को हैंडल करने वाले पुलिस अधिकारियों द्वारा समय से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस करना, उपरोक्त हरकतें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि अभियुक्तों के साथ पक्षपात कर उन्हे सताया जा रहा है। 

पुलिस की जांच और उसके परिणामस्वरूप हुई गिरफ्तारी के ये वे पहलू हैं, जिनके आधार पर न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने तीखी निंदा की थी। उन्होंने अपने असहमतिपूर्ण फैसले में कहा था कि प्राथमिकी में जांच और गिरफ्तारी की वजह पूर्वाग्रह है और प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाना चाहिए।

अमेरिका स्थित वाशिंगटन पोस्ट अखबार में 10 फरवरी को प्रकाशित रपट से पता चलता है कि भीमा कोरेगांव मामले में लगभग सभी आरोपी लोगों के खिलाफ मामले की नींव को मज़बूत बनाने वाले दस्तावेजों को रॉन विल्सन के कंप्यूटर में एक अनाम हमलावर द्वारा मैलवेयर के जरिए रोपित किया गया था:

यह नई फोरेंसिक रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकला कि "पुलिस द्वारा जब्त किए गए लैपटॉप पर सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रचने के आरोपी सभी भारतीय कार्यकर्ताओं के एक समूह के खिलाफ प्रमुख सबूत डाले गए थे, पोस्ट में प्रकाशित कहानी आगे कहती है कि इस मामले के बारे में गहराते संदेह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कानून के शासन की जांच भी होती है।"  

मैसाचुसेट्स की डिजिटल फोरेंसिक फर्म आर्सेलर कंसल्टिंग ने वकीलों के अनुरोध पर जांच की और उनकी रिपोर्ट के अनुसार एक साइबर हमलावर ने गिरफ्तारी से पहले रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक किया और मालवेयर का इस्तेमाल कर विल्सन के लैपटॉप में कम से कम 10 पत्रों की इलेक्ट्रॉनिक कॉपी डाल दी थी॰…”,। 

वाशिंगटन पोस्ट की स्टोरी के अनुसार, वकीलों के अनुरोध पर कई विशेषज्ञों ने फोरेंसिक रिपोर्ट की समीक्षा की और इन विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि रिपोर्ट एक मज़बूत निष्कर्ष पर पहुंच गई है। आर्सेनल कंसल्टिंग के संस्थापक को स्टोरी में यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि उनकी फर्म ने जो खोज की वह "अद्वितीय, "बेहद गुप्त" और "बहुत संगठित" है जो गहन रूप से परेशान करने वाली खोज है"। 

यदि कोई भारत के संविधान और भारत में लागू आपराधिक प्रक्रिया कानूनों को सख्ती से लागू करे तो उपरोक्त रिपोर्ट के आधार पर अभियुक्त के खिलाफ मामले को खारिज किया जा सकता है। 

इतना ही नहीं, बल्कि न्याय को सुनिश्चित करने के लिए वाशिंगटन पोस्ट में किए गए खुलासे के आधार उन अपराधियों की जांच कर उन्हें दंडित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को अब एक एसआईटी का गठन करना चाहिए। 

इस सुविख्यात समाचार पत्र में जिस तरह का खुलासा किया है, उसका प्रभाव इस विशेष मामले से भी बहुत परे हैं। वे केंद्र सरकार के खिलाफ लगे उन वाजिब और लगाए आरोपों से भी परे हैं कि वह स्वतंत्र प्रेस और नागरिक समाज के व्यक्तियों को प्रताड़ित करने के खतरनाक अभियान में लगी है।

सबसे पहली बात, ये खुलासे भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता की जड़ पर हमला करते हैं। अब हमारे पास नकली साक्ष्य के ठोस सबूत हैं जो इलेक्ट्रॉनिक रूप से बनाए गए हैं और यहाँ तक कि वे डिवाइस के मालिक से भी छिपे हुए हैं, इसलिए वे सबूत सवाल के घेरे में आ जाते हैं। इसलिए, यहां तक कि निष्पक्ष जांच के न्यूनतम तानेबाने को बनाए रखने और नियम कानून के सिद्धांतों का पालन करने के लक्ष्य के लिए या तो इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के उपयोग पर पूर्ण स्थगन की जरूरत होगी या इससे जुड़े मूल्य को काफी कम करना होगा।

दूसरा, हमें यह भी पूछने की जरूरत है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, अन्य संस्थानों के प्रमुखों, विपक्ष के नेताओं, सैन्य प्रमुखों के कम्प्यूटर्स में नकली सबूतों का रोपण किया जाता है तो क्या होगा? और यदि यह पहले ही किया जा चुका है तो क्या होगा?

न्यायाधीशों, राजनेताओं और संस्थानों के प्रमुखों के मामले में हमलावर पीड़ितों को ब्लैकमेल करने और भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने में कामयाब हो जाएंगे। ऐसा अगर सैन्य प्रमुखों के साथ होता है तो राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड सकती है। 

इसमें एक अन्य संवेदनशील श्रेणी आ जाती है वह वकीलों और पत्रकारों की है, जो आज़ादी की सुरक्षा की लड़ाई में सबसे आगे हैं। ऐसे समय में जब अभियोजन एजेंसियां या जांच एजेंसियां वकीलों के कंप्यूटर को शारीरिक रूप से आसानी से जब्त कर सकती हैं- जैसा कि हाल ही में वकील महमूद प्राचा के साथ हुआ था- और जब पत्रकारों को अभूतपूर्व उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, तो हमें एक राष्ट्र के रूप में उन वकीलों और पत्रकारों के मामले मीन प्रक्रिया को  थोड़ा और सख्त बनाने की जरूरत है जिन्हे मामलों में फंसाया जाता है। 

इसलिए, कम से कम, हमें सुरक्षा की उस प्रकृति के बारे में बातचीत शुरू करने की जरूरत है जिसे कुछ दफ्तरों को दी जानी चाहिए जहां तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का संबंध है।

केंद्रीय और राज्य विधायिका, बार एसोसिएशन, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट, और प्रेस काउंसिल को इन घटनाओं के बारे में गंभीर विचार करने की जरूरत है-यदि कुछ और नहीं तो कम से कम आत्म-चिंतन या अपनी समझ के लिए ऐसा करना चाहिए।

यह कहना कि यह स्थिति अद्वितीय है, मामलों को बहुत हल्के में लेना होगा। इससे जो कुछ दांव पर लगा है वह एक अरब से अधिक नागरिकों की आजादी और भारत के लोकतंत्र की छाप है। अब हमारे पास खोने के लिए एक पल भी नहीं है।

(दुष्यंत एक वकील हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

After Washington Post Exposé India Needs to Amend Rules on Electronic Evidence

Electronic Evidence
Bhima Koregaon
Special investigation team
Washington Post newspaper

Related Stories

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

भीमा कोरेगांव: HC ने वरवर राव, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा को जमानत देने से इनकार किया

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

अदालत ने वरवर राव की स्थायी जमानत दिए जाने संबंधी याचिका ख़ारिज की

भीमा कोरेगांव: बॉम्बे HC ने की गौतम नवलखा पर सुनवाई, जेल अधिकारियों को फटकारा

सामाजिक कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को लगातार दंडित किया जा रहा है: सुधा भारद्वाज

2021 में सुप्रीम कोर्ट का मिला-जुला रिकॉर्ड इसकी बहुसंख्यकवादी भूमिका को जांच के दायरे में ले आता है!

अदालत ने सुधा भारद्वाज को 50,000 रुपये के मुचलके पर जेल से रिहा करने की अनुमति दी

एल्गार परिषद मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सुधा भारद्वाज की ज़मानत के ख़िलाफ़ एनआईए की याचिका ख़ारिज की


बाकी खबरें

  • crime against children
    सबरंग इंडिया
    2020 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1.28 लाख से अधिक मामले, फिर भी इस मुद्दे पर घोर सन्नाटा
    23 Sep 2021
    दिल्ली के श्मशान में दलित बच्ची से दुष्कर्म और हत्या का खौफनाक खुलासा, राजस्थान में एक और बच्ची से रेप की खबर आई सामने
  •  Bengal
    भाषा
    बंगाल : बस के नहर में गिरने से छह प्रवासी मजदूरों की मौत
    23 Sep 2021
    पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में एक बस के नहर में गिरने से छह प्रवासी मजदूरों की मौत हो गयी
  • SC
    भाषा
    पेगासस मामला : न्यायालय स्वतंत्र जांच का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर अगले हफ्ते सुनाएगा फैसला
    23 Sep 2021
    पीठ ने कहा, ‘‘हम अगले सप्ताह तक तकनीकी विशेषज्ञ दल के सदस्यों के नाम तय कर पाएंगे और फिर अपना आदेश देंगे।’’
  • Uttarakhand
    अजीत सिंह
    अक्षय ऊर्जा योजना की आड़ में कंपनियों ने कब्ज़ा ली सरकारी और ग्रामीणों की ज़मीनें
    23 Sep 2021
    गांव वालों की तरफ से शिकायत से जुड़ी सारी प्रक्रिया पूरा करने के बाद भी जिलाधिकारी का कहना है कि उन्हें मामले का पता ही नहीं है।
  • Will Taliban Rule in Afghanistan
    अमिताभ रॉय चौधरी
    क्या तालिबानी हुकूमत से तापी परियोजना में आएगी जान, भारत को होगा फायदा?
    23 Sep 2021
    अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के साथ, तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस पाइप लाइन परियोजना को गति मिल सकती है, जो अंततः भारत को फायदा दे सकती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License