NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
भारत
राजनीति
अगर वह सच को सच मान ले तो संघ परिवार के पास बचेगा क्या?
मुसलामानों और हिन्दुओं में अलगाव बनाने के मकसद से ताजमहल के रूप में पुराने वक्तों से एक मुद्दा छांट कर ले आया गया है.
एच. आई. पाशा
21 Oct 2017
taj mahal

गुजरात और हिमांचल के चुनाव सर पर हैं. लोक सभा के चुनाव में दो साल मुश्किल से रह गया है.जन विरोधी फैसलों के कारण बीजेपी अपने पैरों के नीचे ज़मीन हिलती महसूस कर रही है.जब उसे कुछ सूझ नहीं रहा है कि करे तो क्या करे तो उसने अपनी उसी पुरानी सक्रियता को गहनता देना शुरू कर दिया है जो उसके अपने विचार से हमेशा सुखद नतीजे ले आती है. यानि उसका वही पुराना प्रिय मुद्दा जो उसकी सन उन्नीस सौ सत्ताईस में बनी विचारधारा का सबसे बड़ा नहीं तो सबसे खास हिस्सों में ज़रूर रहा है.

इस बार वह मुसलामानों और हिन्दुओं में एक ताज़ा अलगाव बनाने के मकसद से पुराने वक्तों से एक और मुद्दा छांट कर ले आई है जिसकी शुरुआत ताजमहल से हुई और अब वह मुस्लिम हुक्मरानों ने हिन्दुओं के साथ क्या किया, क्या नहीं किया, इस पर नए नतीजे गढ़ कर अपने सुनने और पढने वालों के सामने पेश कर रही है. अगर आपको लगता है कि मुज़फ्फर नगर में दंगा भड़काने और बदले में बड़ा ईनाम पाने वाले संगीत सोम तथा बड़े सौम्य लहजे में ज़हर उगलने वाले पी. वी. एल. नरसिम्हा राव से लेकर सोशल मीडिया के धुरंधरों तक, सब यूँ ही अचानक मुस्लिम हुक्मरानों के पीछे पड़ गए है तो यह आपकी ग़लत फहमी है. सच यह है कि यह सब कुछ सोचा-समझा और सुनियोजित है. कब किसे क्या कहना है, किसी को कब गर्म और कब नर्म पड़ना है, सारी चीज़ें तय हैं. शुरुआत आदित्यनाथ ने की यह कह कर कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है ( इसलिए उत्तर प्रदेश के मुख्य पर्यटन स्थलों की नई लिस्ट में उसका नाम नहीं है ) अब वे नर्म पड़ गए है इसलिए उनका नया बयान है कि ताजमहल किसी ने बनाया हो पर बनाया तो भारतीय मजदूरों ने, इसलिए हम उसे बाहर की चीज़ नहीं कह सकते. आदित्यनाथ ने जो पहले कहा वह दरअस्ल कुत्ते वाली सीटी थी. जिन्हें सुनना था उन्होंने सुन लिया. आदित्यनाथ अब कुछ भी कहें, वे इशारा पा चुके हैं और वे अपना काम करते रहेंगे.

बात चूँकि ताजमहल से शुरू हुई इसलिए कुछ लोगों ने अपना फोकस मुग़लों पर रक्खा. हिन्दुओं पर उनका ज़ुल्म, उनकी धार्मिक असहनशीलता, वगैरह. बाकी लोग जो ज़्यादा जोशीले निकले, खास तौर से सोशल मीडिया वाले, उन्होंने पूरे आठ सौ साल के सारे मुस्लिम हुक्मरानों को लपेट लिया. यानि ताजमहल के बगल में क़ुतुब मीनार भी गुनाहगार बन कर खड़ा हो गया.

इतिहास के साथ एक बड़ी सहूलियत वाली बात है. सैकड़ों साल पहले क्या हुआ, आप उसे लेकर सारी दुनिया को किसी आखिरी फैसले तक नहीं ले जा सकते. आपके पास कुछ इतिहासकारों की दलीलें होंगी, कुछ विदेशी यात्रियों के संस्मरण होंगे, खुदाई से मिली कुछ चीज़े हो सकती हैं. इन्हीं के हवाले से आप अपनी बात को सच साबित करने की कोशिश कर सकते हैं. उन वक्तों के ज़ालिम और मज़लूमों को तो आप ढूँढ कर लाने से रहे. जिसे आपकी बात नहीं मानना वह नहीं मानेगा. यह न मानने के पीछे एक मक़सद, एक एजेंडा भी हो सकता है. कुछ स्थापित मान्यताएं होती हैं जिन्हें दुनिया तो मानती है लेकिन कुछ लोग अपने कुछ खास कारणों से नहीं मानते. ऐसी बहुत सी स्थापित मान्यताएं है जिन्हें आरएसएस नहीं मानता तो उसकी वजह भी साफ़ है. उसी वजह से वह इतिहास की अपनी ढपली बजाना चाहता है तो उसके लिए भी यह सहूलियत है. आप लाख दलीलें देते रहिये कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़ कर नहीं बनाया गया, जिसे नहीं मानना उसे नहीं मानना. उन लोगों को तो कतई नहीं मानना जिनका  आपकी बात मानने से नुक्सान होता हो. लोग अब तक यही जानते थे कि अकबर ने राणा प्रताप को हराया था, अब कई लोग यह मानेगे कि अकबर ने नहीं, राणा प्रताप ने अकबर को हराया था.

आप जब एक खास धार्मिक सम्प्रदाय के साथ अपनी काल्पनिक एतिहासिक घटनाओं को जोड़ कर उसका पुरज़ोर प्रचार करने लगते हैं तो उस सम्प्रदाय के कई लोग आप ही की बातों को एक नई खोज समझ कर उन्हें सच मानने लगते हैं. भले ही वे बातें उनकी सामान्य समझ से परे हों. इस सच को आरएसएस से बेहतर हमारे यहाँ कोई नहीं जानता. अशिक्षा और गरीबी के मिले-जुले प्रभाव का फायदा उसने भरपूर उठाया है.

त्यौहार के दिनों में फैलाया जा रहा है कि मुस्लिम हुक्मरां हिन्दुओं को अपना त्यौहार मनाने नहीं देते थे. पटाखों के खिलाफ कोर्ट के मौजूदा फैसले को सीधे-सीधे औरंगज़ेब से जोड़ दिया गया कि उसने भी कुछ ऐसा ही किया था. मुस्लिम आताताइयों ने आरएसएस और उसके हमखयालों के मुताबिक जो ज़ुल्म हिन्दुओं पर ढाए उसमें यह एक नया इज़ाफा है. अब आप कहते रहिये. अबू फज़ल की आईने अकबरी के हवाले से कहिये कि अकबर के दरबार में बाक़एदा पटाखों के साथ दीवाली मनाई जाती थी. इटैलियन यात्री germelli careri का संस्मरण उन्हें सुनाइये कि किस तरह औरंगज़ेब के युद्ध शिविरों में धूम-धाम से लोग होली खेलते थे. अवध और बंगाल के नवाब कितनी संजीदगी से दिवाली और दुर्गा पूजा का आयोजन करते थे, इस बात के जितने प्रमाण आप चाहे पेश कर दें. वे या तो आपको सुन कर अनसुना कर देंगे या फिर साफ़ ही कह देंगे कि हम नहीं मानते. ये उन बातों को उसी तरह नहीं मानेंगे जिस तरह वे यह मानने को कभी तैयार नहीं हुए कि औरंगज़ेब के मौलवियों से बेहतर रिश्ते बनारस और वृन्दावन के पंडितों के साथ थे, टीपू सुल्तान ने मराठा हमलावरों से श्री रंगा पटनम के प्राचीन मंदिर की रक्षा की थी, मंगल के दिन गोश्त बेचने पर पाबंदी सबसे पहले बहादुर शाह ज़फर ने लगाई थी, मोहम्मद बिन कासिम ने हिंदुस्तान में गाय न खाने का हुक्म अपने सिपाहियों को दिया था, निज़ाम उद्दीन औलिया अपनी खानकाह पर हिन्दू औरतों और मर्दों के साथ मिल कर पूरे हफ्ते भर वसंत उत्सव मनाते  थे...

अगर मान लेंगे तो इनके पास फिर बचेगा क्या?  

Courtesy: सबरंग इंडिया,
Original published date:
21 Oct 2017
ताज महल
आर.एस.एस

Related Stories


बाकी खबरें

  • gautam navlakha
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एल्गार परिषद: नवलखा को तलोजा जेल के 'अंडा सेल' में भेजा गया, सहबा हुसैन बोलीं- बिगड़ गई है तबीयत
    25 Oct 2021
    हुसैन ने पूछा- “नवलखा को उनके विचारों के लिए कब तक सताया जाएगा और अधिकारी उनकी विचारधारा को तोड़ने के लिए किस हद तक जाएंगे।''
  • skm
    लाल बहादुर सिंह
    किसान आंदोलन को उसके उन "शुभचिंतकों" से बचाना होगा जो संघ-भाजपा की भाषा बोल रहे हैं 
    25 Oct 2021
    जाहिर है मुद्दा  आधारित आंदोलन में सबका विचार हर प्रश्न पर एक हो, इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन आंदोलन की unity in action हर हाल में बनी रहे, इसे बेशक सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • Sardar Udham
    हर्षवर्धन, अंकुर गोस्वामी
    सरदार उधम: एक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी की महागाथा
    25 Oct 2021
    निर्देशक ने निश्चित ही एक ऐतिहासिक किरदार के जीवन के अनछुए पहलुओं को दर्शाने  के लिए गहरा शोध किया है। फिल्म यह भली प्रकार से दिखाती है कि उधम सिंह, सिर्फ बदले की भावना से प्रेरित एक जोशीले नौजवान…
  • congress
    शुभम शर्मा, अजय सहारन
    क्रांतिकारी और कांग्रेस
    25 Oct 2021
    क्रांतिकारियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने कांग्रेस पार्टी को अलग दिशा के बजाय संपूर्ण बदलाव और प्रगतिशील दिशाओं के रास्ते पर आगे चलने के लिए हमेशा मजबूर किया है।
  • RASHEED KIDWAI
    शिरीष खरे
    चर्चा में नई किताब 'भारत के प्रधानमंत्री'
    25 Oct 2021
    कश्मीर पर नेहरू की नीति कितनी उचित है या अनुचित, यह समझने के लिए हमें वर्ष 1947 के अगस्त से अक्टूबर के महीनों में जाना होगा। और इसमें हमारी मदद कर सकती है, पत्रकार रशीद किदवई की नई पुस्तक 'भारत के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License