NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मुफ़लिसी की क़ैद : मोदी युग में खेत-मज़दूरों की मज़दूरी शायद ही बढ़ी है
कोई भी योजना उन्हें छू नहीं पाती है, न ही कोई क़ानून उन तक पहुंचता है- लेकिन उन्हें फिर भी उम्मीद है कि किसानों के पक्ष में बेहतर फ़ैसला होने से उन्हें भी लाभ होगा।
सुबोध वर्मा
04 Jan 2021
Translated by महेश कुमार
किसान

दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बीच पड़ने वाली गाजीपुर सीमा पर, मनीष और उनके कुछ दोस्त कुछ दिनों पहले ही किसानों के धरने में शामिल हुए हैं। वे बागपत जिले से हैं, जो कि विरोध प्रदर्शन के स्थल से कुछ दर्जन किलोमीटर दूर है, लेकिन यह कोई अन्य महाद्वीप, या फिर कोई और युग हो सकता है।

मनीष ने बताया, “गन्ने के मौसम में, हमें लगभग एक महीने के लिए दाल-रोटी और करीब  250 रुपये प्रति दिन मज़दूरी मिलती है। जब खेतों में काम नहीं होता तो मैं किसी भी निर्माण कार्य से जुड़ी मज़दूरी खोजने की कोशिश करता हूं। मुझे अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों की देखभाल करनी है, लेकिन में इतना नहीं कमा पाता हूँ...आप कह सकते हो की हम सिर्फ ज़िंदा हैं,"। 

उनके रिश्ते के भाई, रविंदर, अपनी कमाई की चौंकाने वाले और घातक-अर्थशास्त्र की व्याख्या करते हैं। “पिछले कई वर्षों से दैनिक मज़दूरी व्यावहारिक रूप से वहीं की वहीं हैं। भूमि-मालिकों का कहना है कि उन्हें खुद की उपज का पर्याप्त पैसा नहीं मिल रहा है, तो हम आपको अधिक मज़दूरी कहां से दें।”

यही एक वजह है दोनों ने फैंसला किया कि कुछ दिनों के लिए गाजीपुर सीमा पर जाते हैं- क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद किसानों (भूमि मालिकों) का सफल संघर्ष अंततः उन्हें भी कुछ लाभ उपलब्ध कराए।

ज़िंदा रहने का वेतन–न्यूनतम बढ़ोतरी 

मज़दूरी की दर पर श्रम ब्यूरो ने हाल ही में जो आंकड़े जारी किए उनसे पता चलता है कि यूपी में खेत-मज़दूरों की दैनिक मज़दूरी सितंबर 2015 में लगभग 200 रुपए से बढ़कर सितंबर 2020 में मात्र 272 रुपए हुई है। यानि पाँच वर्ष में केवल 72 रुपए की कुल वृद्धि या प्रति वर्ष लगभग 15 रुपए या 7 प्रतिशत की वृद्धि है। यह देखने में उतनी बुरी नहीं लगती है, लेकिन यदि आप उन पांच वर्षों में मूल्य वृद्धि की प्रति वर्ष औसत 4.4 प्रतिशत इसमें समायोजित कर लें तो यह वृद्धि प्रति वर्ष लगभग 2.5 प्रतिशत रह जाती है। प्रति दिन 272 रुपए मज़दूरी और उस पर प्रति वर्ष 2.5 प्रतिशत की औसत वृद्धि- मनीष और उनके खेतिहर मज़दूर साथियों की अनन्त गरीबी का बयान करती है और वे इसकी जकड़न में रहने पर मजबूर है।

आप नीचे उपलब्ध कराए गए चार्ट में विभिन्न किस्म के काम करने वाले खेत-नज़दूरों की मज़दूरी में पूर्ण वृद्धि को देख सकते हैं। खेती से संबंधित विभिन्न किस्म के कार्यों के लिए जैसे कि जुताई या हल चलाना, बुवाई, कटाई/पछोरना/भूसी निकालना, सिंचाई और खड़ी फसलों की सामान्य देखभाल करना और पौधों की सुरक्षा करना (जिसमें कीटनाशक, उर्वरक आदि छिड़कना शामिल है) इस सब काम के लिए पुरुष मज़दूरों की मज़दूरी में 12-16 रुपए और महिला मज़दूरों की मज़दूरी में 10-14 रुपए की वृद्धि हुई है। 

ये पूरे भारत के औसत दरें हैं: कुछ राज्यों में हालात बहुत ज्यादा बदतर हैं। मज़दूरी के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे खराब राज्यों में से एक है, और अधिकांश उत्तरी राज्य भी इसी की श्रेणी में आते हैं।

खेती का काम मौसमी होता है, और इस बात पर भी निर्भर करता है कि पूरे साल में कितनी फसलें की जानी है, काम भी बदलता रहता है। इन मौसमों के बीच, खेतिहर मज़दूरो को किसी भी किस्म के काम की दरकार रहती है, इस सब में कमाई के लिए शहरों या कस्बों में पलायन करना भी शामिल है।

बढ़ती महंगाई वेतन बढ़ोतरी को निगल जाती है

नीचे दिए गया चार्ट से पता चलता है कि मुद्रास्फीति क्या बला है- इसे वार्षिक मूल्य वृद्धि के प्रतिशत में इया गया है- ये मज़दूरी में मामूली वृद्धि को दर्शाता है। चूंकि अक्टूबर 2015 से सितंबर 2020 की अवधि के दौरान औसत वार्षिक मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत थी, खेत मज़दूरों के लिए श्रम ब्यूरो का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL),जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक ने प्रकाशित किया है में मूल्य वृद्धि को वार्षिक वेतन में वृद्धि में समायोजित करने से पता चलता है कि वेतन वृद्धि लगभग स्थिर है- पुरुषों के लिए वृद्धि 0.5 प्रतिशत से 1.6 प्रतिशत है और महिलाओं के लिए 0.4 प्रतिशत से 3.1 प्रतिशत के बीच है। महिलाओं के लिए 3.1 प्रतिशत की वृद्धि जुताई के काम के कारण है, खेती का एक ऐसा काम जिसे महिलाएं बहुत कम करती है, और इसे सुरक्षित रूप से अनदेखा किया जा सकता है।

इसका मतलब यह है कि 10-15 रुपये की यह बढ़ोतरी व्यर्थ है और पिछले लंबे पांच वर्षों में उनकी कमाई वहीं की वहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो खेत-मज़दूरों का जीवन स्तर बहुत खराब हो गया है इसलिए वे बीमारियों, शिक्षा और विवाह/मौतों के लिए जो हर किसी के जीवन के जरूरी कार्य हैं- के लिए ऋण लेते हैं और जिसे वे चुका नहीं पाते हैं और नतीजतन ब्याज के साथ उनका कर्ज़ बढ़ता जाता है। मुफ़लिसी उन्हें इसी तरह झकझोरती रहती है जिसका कोई अंत नज़र नहीं आता है। 

शिल्पकर भी बहुत पीड़ित हैं 

नीचे दिए गए चार्ट में आप पाएंगे कि खेती से जुड़े पारंपरिक शिल्प या अन्य मैनुअल काम में शामिल लोगों की स्थिति काफी बदतर है। आप देखें कि पिछले पांच वर्षों में पुरुष बुनकरों की मज़दूरी में महज 13 रुपए की वृद्धि हुई है, जबकि महिला बुनकरों की दैनिक मज़दूरी की दरों में मामूली गिरावट आई है। बीड़ी बनाने, बांस और बेंत की टोकरी की बुनने और विभिन्न हस्तकला की वस्तुओं को बनाने वालों की भी कुछ ऐसी ही दशा है।

पहले के समय की तरह, अधिकांश लोगों के लिए ये काम उनकी आय के पूरक हैं। लेकिन जैसे-जैसे कृषि संकट गहराता जा रहा है, और भूमि मालिक लागत को बचाने के लिए मज़दूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल कर रहे है, कई परिवार जो ज़िंदा रहने के लिए इस तरह के काम पर निर्भर थे- वे जहां भी जाते हैं वहां के आर्थिक समीकरण उन्हें निर्दयता से पीसते है।

ग़ैर-कृषि मज़दूरी भी समान हैं 

कृषि की कुछ धाराओं को यानि कुछ फसलों को शहरी बुद्धिजीवियों ने किसानों के भविष्य के लिए उज्ज्वल बताया था। इनमें फलों और सब्जियों की खेती या डेयरी/पोल्ट्री व्यवसाय शामिल हैं। दरअसल, बदलाव के चलते बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान सब्जी की खेती करते हैं ताकि उन्हे तेजी से नकदी मिल सके। लेकिन अब उनका भी मुनाफा कम होता जा रहा है। जो लोग भूमिहीन हैं वे बड़े खेतों और डेरियों/पोल्ट्री में भी काम कर रहे होते हैं। यहां भी उनकी मज़दूरी (नीचे चार्ट के रूप में) समान रुझान दिखाती है- फलों और सब्जियों और पशुपालन में काम करने वालों की पिछले पांच वर्षों में वार्षिक वृद्धि महज़ 13 रुपए की रही है।

एक बड़ा और बहुत ही लोकप्रिय काम निर्माण कार्य है- जिसमें सड़क और राजमार्ग बनाना, बांध परियोजनाएं, भवन निर्माण आदि आते है। इनमें भी हालत खेदजनक है, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है। इसके अलावा, विविध ग़ैर-कृषि काम हो सकते हैं, जिनकी तलाश हताश मज़दूरों को होती हैं और वे उनमें काम करते हैं। लेकिन मज़दूरी और वृद्धि की दरें वैसी ही रहती हैं। 

हालांकि देश में 'समान काम के लिए समान वेतन' जैसा एक क़ानून मौजूद है, बावजूद इसके महिला श्रमिकों को अनिवार्य रूप से पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। मनीष बताते हैं कि उनकी पत्नी गन्ने के खेतों में मौसमी काम करती है (निराई, खड़े गन्नों को बांधना, सूखी पत्तियों को हटाना, आदि) लेकिन उन्हे इस काम के लिए मात्र 175 रुपए से लेकर 200 रुपए और भोजन मिलता है। "मालिक उन्हे खाना पकाने के ईंधन के लिए गन्ने की सूखी पत्तियों को इकट्ठा करने की अनुमति दे देता है, इसलिए इसे भी महिला के वेतन के हिस्से के रूप में गिना जाता है," उसने उदास स्वर उक्त बात बताई।

क्या किसानों का संघर्ष नए कृषि क़ानूनों को रद्द करने में उनकी मदद करेगा? इस मामले में पीलीभीत के जगपाल अनिश्चित हैं लेकिन वे आंदोलन का समर्थन करते हैं क्योंकि किसान बेहतर कीमतों की लड़ाई लड़ रहे हैं, जैसे कि एमएसपी आदि। “हम आशा करते हैं कि अगर उन्हें बेहतर कीमतें मिलती है, तो वे हमारी मज़दूरी में भी सुधार करेंगे। अन्यथा, वे (किसान) एक दिन हमारे जैसे ही हो जाएंगे।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Prison of Poverty: Agri Workers’ Wages Have Barely Increased in Modi Years

Agri workers
agricultural labour
Farmer protests
MSP
Ghazipur protest site
farm labour wages
Labour Bureau

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

छोटे-मझोले किसानों पर लू की मार, प्रति क्विंटल गेंहू के लिए यूनियनों ने मांगा 500 रुपये बोनस

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

क्यों है 28-29 मार्च को पूरे देश में हड़ताल?

28-29 मार्च को आम हड़ताल क्यों करने जा रहा है पूरा भारत ?

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा


बाकी खबरें

  • Victims of Tripura
    मसीहुज़्ज़मा अंसारी
    त्रिपुरा हिंसा के पीड़ितों ने आगज़नी में हुए नुकसान के लिए मिले मुआवज़े को बताया अपर्याप्त
    25 Jan 2022
    प्रशासन ने पहले तो किसी भी हिंसा से इंकार कर दिया था, लेकिन ग्राउंड से ख़बरें आने के बाद त्रिपुरा सरकार ने पीड़ितों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। हालांकि, घटना के तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के…
  • genocide
    अजय सिंह
    मुसलमानों के जनसंहार का ख़तरा और भारत गणराज्य
    25 Jan 2022
    देश में मुसलमानों के जनसंहार या क़त्ल-ए-आम का ख़तरा वाक़ई गंभीर है, और इसे लेकर देश-विदेश में चेतावनियां दी जाने लगी हैं। इन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
  • Custodial Deaths
    सत्यम् तिवारी
    यूपी: पुलिस हिरासत में कथित पिटाई से एक आदिवासी की मौत, सरकारी अपराध पर लगाम कब?
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार दावा करती है कि उसने गुंडाराज ख़त्म कर दिया है, मगर पुलिसिया दमन को देख कर लगता है कि अब गुंडाराज 'सरकारी' हो गया है।
  • nurse
    भाषा
    दिल्ली में अनुग्रह राशि नहीं मिलने पर सरकारी अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने विरोध जताया
    25 Jan 2022
    दिल्ली नर्स संघ के महासचिव लालाधर रामचंदानी ने कहा, ‘‘लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल, जीटीबी हस्पताल और डीडीयू समेत दिल्ली सरकार के अन्य अस्पतालों के नर्सिंग स्टाफ ने इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग…
  • student
    भाषा
    विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में, नयी हकीकत को स्वीकार करना होगा: रिपोर्ट
    25 Jan 2022
    रिपोर्ट के अनुसार महामारी के कारण उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों में विश्वविद्यालयों के सामने अनेक विषय आ रहे हैं और ऐसे में विश्वविद्यालयों का भविष्य खतरे में है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License