NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ऐसे तो नहीं होगा आयुष्मान उत्तराखंड!
सवाल ये है कि जब सरकार के पास स्वास्थ्य महकमे में जरूरी बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। अस्पतालों में डॉक्टर ही नहीं हैं। डॉक्टर है तो बेड नहीं है। बेड है तो एनेस्थेस्टिस्ट नहीं है। ऐसे में अटल आयुष्मान योजना या कोई भी योजना कैसे सफल होगी।
वर्षा सिंह
07 Jan 2019
उत्तराखंड : सड़क पर ही बच्चे का जन्म

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति समझने के लिए इतना कहना भी बहुत हो सकता है कि यहां के पहाड़ी गांवों में महिलाओं के बच्चे सड़क पर पैदा होते हैं। ये बात हिमालयी राज्य में बहुत आमतौर पर कही जाती है। स्वास्थ्य सेवाएं यहां मीलों दूरी पर हैं। उत्तरकाशी-चमोली ज़िलों में गर्भवती महिला को प्रसव के लिए पौड़ी के श्रीनगर मेडिकल कॉलेज आना पड़ता है। प्रसव पीड़ा के दौरान वह ये दूरी तय कर पायी तो ठीक है, वरना सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना होगा। कई ऐसे गांव हैं, जहां सड़क नहीं पहुंची है, तो वहां गर्भवती महिला खाट पर लिटा कर पैदल ही एंबुलेंस या अस्पताल तक लायी जाती है।

बदहाल 108 एंबुलेंस सेवा

पहाड़ी ज़िलों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं हैं ही नहीं। किसी तरह मरीज़ को अस्पताल तक ले जाने का दावा करने वाली 108 एंबुलेंस सेवा भी अक्सर किसी न किसी झमेले में फंसी रहती है। जैसे कि इस समय 108 एंबुलेंस सेवा के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। वेतन भुगतान समेत कई मांगों को लेकर 108 एंबुलेंस सेवा के 717 फील्ड कर्मचारी हड़ताल पर हैं। इस सेवा का संचालन करने वाली कंपनी जीवीके ईएमआरआई के स्टेट हेड मनीष टिंकू का दावा है कि हड़ताल से एंबुलेंस सेवाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

सड़क पर प्रसव की घटनाएं बेहद आम

नए वर्ष की दो घटनाएं भी स्वास्थ्य महकमे की तस्वीर को बहुत हद तक स्पष्ट कर देंगी। ये घटनाएं भी पर्वतीय अंचल की नहीं हैं बल्कि राजधानी देहरादून की हैं। पहली घटना एक जनवरी की रात की है। देहरादून के पंडितवाड़ी क्षेत्र में रहने वाली महिला को प्रसव पीड़ा हुई। उनका पति उन्हें प्रेमनगर अस्पताल ले गया। वहां मौजूद डॉक्टर ने महिला को दून महिला अस्पताल रेफर कर दिया। डॉक्टर ने कहा कि उनके अस्पताल में एनेस्थेटिस्ट नहीं है। महिला का ऑपरेशन करना होगा। इसलिए रेफर किया। महिला के पति ने अस्पताल वालों से एंबुलेंस के लिए कहा। तो उसके लिए भी मना कर दिया। फिर 108 एंबुलेंस के लिए फोन पर फोन किए। बहुत इंतज़ार के बावजूद एंबुलेंस नहीं मिली। महिला दर्द से तड़प रही थी। मजबूरन पति ने उसे ऑटो में बिठाया और दून महिला अस्पताल के लिए निकला। रास्ते में ही महिला को तेज प्रसव पीड़ा हुई। सड़क पर बच्चे का जन्म हुआ। इतनी असुविधाओं के बीच नवजात कड़ाके की ठंड का सामना नहीं कर सका। न ही जन्म के समय नवजात को इलाज मिल सका और उसकी मौत हो गई।

दूसरी घटना 3 जनवरी की है। हरबर्टपुर में रहनेवाली गर्भवती महिला को विकासनगर अस्पताल तक पहुंचना था। 108 एंबुलेंस सेवा को फोन लगाये। लेकिन हड़ताल के चलते एंबुलेंस नहीं मिली। टैक्सी के लिए गरीब दंपति के पास पैसे नहीं थे। पति ने रिक्शे पर बिठाकर विकासनगर अस्पताल तक पहुंचने की कोशिश की। लेकिन तेज प्रसव पीड़ा से गुजर रही महिला के पास इतना समय नहीं था। उसने सड़क पर ही बच्चे को जन्म दिया। मां और बच्चे दोनों स्वस्थ रहे, और इसमें अस्पताल का कोई योगदान नहीं रहा।

रुद्रप्रयाग की रहने वाली प्रियंका बड़थ्वाल तपाक से कहती हैं कि पहाड़ों में तो बच्चे सड़क पर ही पैदा होते हैं। उन्होंने खुद प्रसव पीड़ा के दौरान रुद्रप्रयाग से पौड़ी के श्रीनगर अस्पताल तक का सफ़र तय किया था। उनके पास गांव की लड़कियों की ऐसी कई कहानियां हैं।

उत्तरकाशी की ज़िला पंचायत अध्यक्ष जशोदा राणा कहती हैं कि हमारे जनपद में तो एक भी डॉक्टर नहीं है।

नैनीताल की ज़िला पंचायत अध्यक्ष सुमित्रा प्रसाद कहती हैं कि नैनीताल अकेला कुमाऊं के छह ज़िलों का भार संभालता है।

हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल के पीआरओ आलोक उप्रेती कहते हैं कि उनके यहां से किसी मरीज को कभी लौटाया नहीं जाता। लेकिन ये भी सच है कि यहां प्रसूति विभाग में बेड कभी खाली नहीं मिलते।

दून महिला अस्पताल में तो फर्श पर महिलाओं के प्रसव की खबरें सुर्खियां बनती हैं।

मीलों दूर स्वास्थ्य सेवाएं

महिलाओं के प्रसव की घटनाएं उदाहरण मात्र हैं। किसी भी बीमारी के इलाज के लिए गढ़वाल परिक्षेत्र के लोग श्रीनगर या देहरादून आते हैं और कुमाऊं परिक्षेत्र नैनीताल ज़िले के हल्द्वानी जाता है। क्योंकि यहां डॉक्टर पहाड़ पर जाकर अपनी सेवाएं नहीं देना चाहता। पर्वतीय ज़िलों से पलायन की ये भी एक बड़ी वजह है। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल के पीआरओ आलोक उप्रेती कहते हैं कि जिन स्टुडेंट्स ने सरकार से सब्सिडी लेकर राज्य के मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की है। जिन्होंने अपने बॉन्ड में ये भरकर दिया है कि वे पहाड़ी ज़िलों में अपनी सेवाएं देंगे। पढ़ाई पूरी होने के बाद वे भी मैदानों का रुख कर लेते हैं। उप्रेती कहते हैं कि ऐसे डॉक्टरों की डिग्रियां निरस्त करने की कार्रवाई की जानी चाहिए, तब कोई भी डॉक्टर पहाड़ों पर सेवाएं देने से इंकार नहीं कर सकेगा।

फिर कैसे होगा आयुष्मान उत्तराखंड!

अब सवाल ये है कि जब सरकार के पास स्वास्थ्य महकमे में जरूरी बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। अस्पतालों में डॉक्टर ही नहीं हैं। डॉक्टर है तो बेड नहीं है। बेड है तो एनेस्थेस्टिस्ट नहीं है। ऐसे में अटल आयुष्मान योजना या कोई भी योजना कैसे सफल होगी।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी कहते हैं कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमराई हुई हैं। पर्वतीय जिलों में बिल्कुल डॉक्टर नहीं है। नर्सिंग स्टाफ नहीं है। फार्मासिस्ट नहीं है। मेडिकल फैसिलिटीज़ नहीं हैं। दवाइयों की व्यवस्था नहीं है। तो ऐसी हालत में आधी-अधूरी योजना लागू करने वाली बात है। वे सवाल उठाते हैं कि पहले ही आर्थिक रुप से कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले राज्य की सरकार अटल आयुष्मान योजना लागू करने के लिए बजट कहां से लाएगी।

अटल आयुष्मान योजना में राज्य के सभी तेईस लाख परिवारों को हर वर्ष पांच लाख रुपये तक का इलाज सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दिया जाएगा। इसके तहत 1350 बीमारियां कवर की जा रही हैं। 25 दिसंबर 2018 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर ये योजना शुरू की गई। फिलहाल इस योजना के कार्ड बनवाने के लिए नगर निगमों और ऑन लाइन बड़ी संख्या में आवेदन किये जा रहे हैं। जगह जगह से बहुत सारे गड़बड़झाले की रिपोर्टें भी आ रही हैं।

राज्य के वित्त मंत्री प्रकाश पंत कहते हैं कि अभी हमने सप्लीमेंट्री में इस योजना के लिए करीब 72 करोड़ का प्रावधान किया है। योजना के तहत जितने धन की आवश्यकता होगी उसकी बजट से पूर्ति की जाएगी। कैबिनेट मंत्री ने बताया कि इसके लिए हमने राज्य स्वास्थ्य अभिकरण बनाया गया है और इस अभिकरण को बजट से लिंक किया गया है। उनका दावा है कि पर्वतीय ज़िलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

108 एंबुलेंस सेवा को लेकर कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि इस सेवा को संचालित कर रही कंपनी के साथ राज्य सरकार का करार जुलाई 2018 में ही पूरा हो गया था। फिलहाल कंपनी को एक्स्टेंशन दिया गया है। इसी महीने नए टेंडर निकाले जाएंगे। पहाड़ों की लाइफ लाइन कही जाने वाली 108 सेवा के ध्वस्त होने पर कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत का कहना है कि सरकार इस पर नज़र बनाये हुए है। फिलहाल मैनेजमेंट की समस्या दिखती है। कंपनी की दिक्कतें खत्म नहीं हुईं तो एमओयू को बदला जा सकता है।

उत्तराखंड अब भी आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर नहीं हो सका है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन देना ही राज्य पर भारी पड़ जाता है। जनता के स्वास्थ्य के लिहाज से अटल आयुष्मान योजना बहुत अच्छी होती, यदि अस्पताल इसके लिए तैयार होते। फिलहाल तो डॉक्टरों की कमी राज्य का सबसे बड़ा मर्ज है।


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License