NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ऐतिहासिक महापड़ावः मांग को लेकर हजारों वीमेन स्कीम वर्कर्स हुईं शामिल
वे स्वास्थ्य देखभाल, शिशुओं और बच्चों के लिए भोजन जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं देती हैं लेकिन उन्हें लापरवाह सरकार द्वारा 'वॉलिंटियर्स' के रूप में ही माना जाता है।
सुबोध वर्मा
13 Nov 2017
mahapadav

राजधानी दिल्ली में वीमेन स्कीम वर्कर्स के ऐतिहासिक 'महापाड़ाव' के तीसरे और आखिरी दिन पार्लियामेंट स्ट्रीट के पास हजारों महिलाएं अपनी मजदूरी और लाभ को नियमित श्रमिकों के रूप में मान्यता दिलाने की मांग को लेकर इकट्ठा हुईं। इस महापड़ाव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तथा सहायिका, मिड-डे-मील रसोइएं, ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा (ASHA) तथा शहरी क्षेत्रों की स्वास्थ्य कार्यकर्ता ऊषा (USHA), तथा सरकार के कई अन्य योजनाओं में संलग्न कार्यकर्ता शामिल रहीं। स्कूलों में कार्यरत शिक्षा मित्र समेत एएनएम योजना के कार्यकर्ता एवं आजीविका मिशन श्रमिक आदि मिलाकर विभिन्न योजनाओं से जुड़े हुए करीब 1 करोड़ श्रमिक हैं।

इन श्रमिकों को बाध्य करने वाली जो चीज है वह ये कि सरकार उन्हें 'नियमित' श्रमिकों के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया, उन्हें 'योजनाओं' में काम करने वाले 'वॉलिंटियर्स' के रूप में वर्गीकृत किया गया। इसका अर्थ यह कि उन्हें नियमित मजदूरी से इनकार कर दिया गया है, उनके काम के आधार पर भुगतान किया जाता है। नियमित सरकारी कर्मचारी को दिए जाने वाली सामाजिक सुरक्षा देने से भी उन्हें आम तौर पर इनकार कर दिया जाता है। यह स्थिति यूपीए सरकार द्वारा उसके कार्यकाल में शुरू की गई थी जिसे वर्तमान की मोदी सरकार ने भी जारी रखा है।

वास्तव में मोदी सरकार ने एनजीओ में आंगनवाड़ी, पीएचसी आदि का अधिग्रहण कर इन सभी योजनाओं को कम करने, फंड घटाने तथा इन असहाय 'स्वयंसेवकों'पर वर्कलोड बढ़ाने के उपायों की एक श्रृंखला शुरू की है।

यदि आप किसी विशिष्ट आशा या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के कार्य दिवस को देखें तो इनके अन्याय पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं। किसी आशा से उम्मीद की जाती है कि वह अपने क्षेत्र के अंतर्गत गांवों के सभी निवासियों की स्वास्थ्य स्थिति की जांच करे। यानी कम से कम 5000 लोग। वह रोजाना चक्कर लगाती है और तत्काल चिकित्सा या अन्य सुविधाएं मुहैय्या कराती हैं। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य तथा सुरक्षित प्रसव में इनकी प्रमुख भूमिका है, आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को उचित समय पर अस्पताल पहुंचाती हैं। आशा कार्यकर्ता से गर्भनिरोधक व्यवस्था, बच्चों के प्रतिरक्षण तथा पोलियो ड्रॉप या डी-वर्मिंग टैबलेट जैसी नियमित अभियान वाली दवाओं के वितरण की उम्मीद की जाती है। अपने क्षेत्र में हर प्राधिकारियों के साथ बैठक में भाग लेने के अलावा वह दर्जनों रजिस्टरों में सभी गतिविधियों का पूरा रिकार्ड रखती हैं।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तथा सहायिकाओं का काम सिर्फ डे-केयर सेंटर में शिशुओं की देखभाल करना है लेकिन उनका काम किशोर बच्चों, गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की देखभाल, पोषण आदि तक बढ़ जाता है। मिड-डे-मील बनाने वाली कार्यकर्ता स्कूल में न केवल खाना बनाती हैं बल्कि स्कूलों में आवश्यक खाद्य वस्तुओं के संचयन, स्कूलों की सफाई और अन्य प्रकार के कामों में सहायता करती हैं।

क्या यह अंशकालिक स्वयंसेवक (वॉलिंटिर्स) के रूप में किया जा सकता है? दिल्ली में बैठी सरकार और उसके नौकरशाहों को ऐसा लगता है कि ऐसा किया जा सकता है। उन्होंने लोगों के लिए देखभाल करने के सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों को सौंपा है, विशेष रूप से बच्चों व महिलाओं के लिए लेकिन विशिष्ट पितृसत्तात्मक अहंकार के चलते वे मानते हैं कि इन्हें पूर्ण भुगतान की आवश्यकता नहीं है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तथा आशा/ऊषा कई वर्षों से अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं और उन्होंने कई राज्यों में क्रूर दमन का सामना किया है। हाल ही में उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में गांव के रहने वाले करीब 10 लाख लोगों के हस्ताक्षर महिला तथा बाल विकास मंत्रालय को सौंपा। इसके बावजूद सरकार लोक कल्याण में सरकारी खर्चों में वृद्धि न कर इसे नजरअंदाज कर रही है। इसके चलते कार्यकर्ताओं में बेहद नाराजगी है और बड़े कार्यवाही के लिए मांग लगातार बढ़ रही है।

यही कारण है कि वे न केवल कार्यकर्ताओं के महापड़ाव के लिए दिल्ली में इकट्ठा हुए बल्कि उनके नारों और अर्थपूर्ण आलोचनाओं से विशिष्ट स्थान मिला।

mahapadav

mahapadav
worker 's mahapadav
female workers
Modi
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • cartoon
    सोनिया यादव
    यूपी चुनाव : क्या ग़ैर यादव ओबीसी वोट इस बार करेंगे बड़ा उलटफेर?
    14 Jan 2022
    2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लगभग 39 प्रतिशत वोट शेयर में कुर्मी और कोइरी के साथ-साथ नॉन डॉमिनेंट ओबीसी ने भी भारी संख्या योगदान दिया था। हालांकि इस बार समाजवादी पार्टी की ग़ैर यादव ओबीसी वोट…
  • North Bengal
    डॉ सुखबिलास बर्मा
    उत्तर बंगाल के राजबंशियों पर खेली गई गंदी राजनीति
    14 Jan 2022
    भाजपा और टीएमसी दोनों ही राजबंशी के उच्च मध्यम वर्ग के एक तबके की भावनाओं को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो अक्सर राजनीतिक नेताओं द्वारा निभाए गए झांसों में विश्वास करते हैं। 
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफरती धर्म संसद पर कार्रवाई क्यों नहीं ?
    14 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार बात कर रहे हैं कि जिस तरह धर्म संसद में नफरती बयान दिए गए और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया, सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साध रखी है ?
  • Michael Lobo Resignation
    राज कुमार
    गोवा चुनावः डेढ़ महीने में एक चौथाई विधायकों का इस्तीफ़ा
    14 Jan 2022
    गोवा में दिसंबर 2021 से लेकर अब तक 10 विधायक इस्तीफा देकर दल बदल कर चुके हैं। इस समय गोवा में क्या चुनावी हलचल है? क्या घटनाक्रम चल रहा है? आइये! नज़र डालते हैं।
  • south africa
    पवन कुलकर्णी
    श्रमिक संघों ने दक्षिण अफ्रीकी डेयरी दिग्गज पर पेट्रोल बम हमले करवाने और धमकाने के आरोप लगाये
    14 Jan 2022
    इन धमकियों और खतरों के बीच, क्लोवर में श्रमिकों की कार्यवाई को कर्मचारी एकजुटता के साथ-साथ नागरिक समाज की ओर से इसके बहिष्कार अभियान को मिलते बढ़ते समर्थन से और अधिक मजबूती प्राप्त हुई है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License