NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
“आज सवाल पूछने वाले पत्रकार संगठन की ज़रूरत”
पत्रकारों पर हमले के खिलाफ दो दिन के सम्मेलन में कई अहम सवाल उठे, कुछ तीखी बहसें भी हुईं और अंतत: सभी ने इस सम्मेलन की मुख्य चिंता के प्रति समर्थन और एकजुटता जाहिर की।
अजय कुमार
24 Sep 2018
सीएएजे

“यह सदन एक ऐसे संगठन की ज़रूरत महसूस करता है जो न केवल पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सके, बल्कि सवाल पूछने की लोकतांत्रिक संस्कृति को ज़िंदा रख सके। यह संगठन देश के विभिन्न राज्यों और विभिन्न भाषाओं में काम कर रहे पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करेगा।” 

पत्रकारों पर हमलों के खिलाफ दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुआ दो दिन का राष्ट्रीय सम्मेलन इस संकल्प के साथ संपन्न हुआ। इन दो दिनों में पत्रकारों और पत्रकारिता की स्थिति को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।  

सम्मेलन के दूसरे दिन दो सत्र आयोजित हुए। पहले सत्र का विषय मानहानि और कानून के दुरुपयोग के सहारे पत्रकारों पर किये जाने वाले हमले से जुड़ा था।

द वायर के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने इलेक्ट्रॉनिक सन्देश के जरिये कहा कि अमीर लोगों द्वारा क्रिमिनल मानहानि के सहारे पत्रकारों को प्रताड़ित करने का चलन चल पड़ा है। हम पत्रकारों को एकजुट होकर इसका सामना करना जरूरी है।

इसके बाद सोनभद्र में स्थानीय पत्रकारिता कर रहे शिवदास ने अपनी बात कही।  शिवदास कहते हैं कि “क्या वास्तव में दिल्ली में उस स्तर की पत्रकारिता हो रही है,जिस तरह की पत्रकारिता होनी चाहिए। दिल्ली में एक छींक भी आ जाती है तो पूरा देश हिल जाता है लेकिन जिले के पत्रकार मर जाए फिर भी कोई पूछने वाला नहीं जबकि खबरों का असली सोर्स गाँव हैं। मैंने कई साल दिल्ली में पत्रकारिता की लेकिन इस पत्रकारिता में मेरा मन नहीं लगता था, मुझे खुद से चिढ़न होने लगी थी, अब मैं स्थानीय स्तर की पत्रकारिता करता हूँ, अब लगता है कि मेरे काम से किसी के जीवन में कुछ बदलाव आता होगा।  लेकिन हमारी मुश्किलें दिल्ली के पत्रकारों से कहीं ज्यादा हैं। इस पर बात करने वाला कोई नहीं।” 

कई सालों से राजस्थान पत्रिका  में काम कर रहे आवेश तिवारी ने भी इसी विषय पर अपनी बात रखी। 'बस अपना ही ग़म देखा है/ तुमने कितना कम देखा है'  विज्ञान व्रत के इस शेर की मार्फत अपनी बात शुरू करते हुए आवेश तिवारी कहते हैं कि “हम लोग केवल सोशल मीडिया पर चल रहे ट्रोल के बारे में बातें करते हैं लेकिन पत्रकारों पर हो रहे  हमलों का यह रत्ती भर भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता करना मुश्किल काम है। मैंने हॉस्टलों में लड़कियों के साथ हो दुर्व्यवहार का भंडाफोड़ किया और स्थानीय भीड़ मेरे खिलाफ हो गयी। स्थानीय पुलिस मेरे खिलाफ हो गयी। छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपने वाली बातों से नेताओं  को कोई मतलब नहीं होता, इन खबरों पर निगरानी करने का काम सरकारी अधिकारी करते हैं।

इसके बाद बिहार से आए पत्रकार पुष्यमित्र ने अपनी बात रखी। पुष्यमित्र ने कहा कि एक अनुमान के मुताबिक देशभर में पत्रकारिता की पूरी इंडस्ट्री तकरीबन एक लाख 35 हजार करोड़ की है। इसमें से केवल 300 करोड़ रुपये पत्रकारों के वेतन पर खर्च होते हैं। ऐसी स्थिति में पत्रकारिता में नैतिकता की बात करना मुश्किल है। इसी विषय पर बात करते हुए  छत्तीसगढ़ के पत्रकार कमल शुक्ला ने कहा कि आदिवासियों का अधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर बोलने पर सच को छुपाने वालों की तरफ से हमला तय है।

इस पूरे सत्र का संचालन कर रहे अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में दृश्य हिंसा से ज्यादा गंभीर अदृश्य हिंसा है। किसी के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज हो जाए तो कई सालों तक वह इस मामले में  परेशान रहता है। कुछ समय अंतरालों पर अपना आवासीय शहर छोड़कर दूसरे शहर मुकदमा लड़ने जाता है। स्थानीय क्षेत्रों की पत्रकारिता के हालात इतने बुरे हैं कि गैस सिलिंडर की खबर लिखने पर मानहानि का मुकदमा दर्ज हो जाता है।

इसके बाद अगला सत्र पत्रकारों  के खिलाफ किये जाने वाले सेंसरशिप और सर्विलांस के विषय से जुड़ा था। इस विषय पर बोलते हुए मीडिया वल्चर के लेखक जोसफ जोशी ने कहा कि  हम लोगों को वेतन के नाम पर खरीदा जाता है। हम और आप एक ऐसे ढांचे का हिस्सा बनते जा रहे हैं जिसमें ईमानदारी नहीं है। हमारे भीतर एक गहरी अनैतिकता का जमाव हो चुका है और हम सब  इसके अपराधी हैं। भाजपा और कांग्रेस से सेंशरशिप और सर्विलांस का कुछ भी लेना देना नहीं है। सरकारें बदलती हैं तो सच्चाई बदल जाती है। अगर हम खुद से नैतिक नहीं है तो सड़ते हुए  ढांचे को नहीं बचा सकते। इस  सत्र के संचालक अनिल यादव कहते हैं कि पत्रकारिता में चमक-दमक की भी लागत होती है। इस लागत को भी कई सवाल छुपाकर चुकता करना  पड़ता है।

जाने-माने  पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने बहुत ही कड़े शब्दों में कहा कि इस देश में न लोकतंत्र है, न संविधान है, न नियम हैं, न कानून है। यह देश एक बिजनेस मॉडल पर चल रहा है। यह दौर भी  पिछले दौर जैसा ही है। निराश मत होइए।

इसके बाद कारवां मैगजीन के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल ने अपनी बात रखी।  हरतोष ने कहा कि जिन लोगों को लगता है कि यह दौर पिछले दौर जैसा ही है, वह गलतफहमी में हैं।  यह दौर अब तक का सबसे भयावह दौर है, जहां सवाल पूछने पर पाबंदी है और सर्विलांस करना सबसे आसान काम है। 

अंत में पिछले दो दिनों से चल रही बातचीत से समझते हुए एक संकल्प प्रस्ताव रखा गया -

“देश भर से आए पत्रकारों के दो दिन के सम्मलेन से यह तथ्य और भी स्पष्ट हुआ है कि आज उन पत्रकारों के सामने अत्यंत ख़तरनाक स्थिति पैदा हो गई है जो सत्ता कि जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अपनी क़लम का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह के पत्रकारों की हत्याएं हुईं, उन पर हमले हुए और सरकारी तंत्र द्वारा उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया गया है। सरकार  चाहे जिस पार्टी की हो हालात कमोबेश एक जैसे हैं। राजनेता, माफिया और पुलिस के नापाक गठजोड़ की वजह से छोटे शहरों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए स्थिति और भी गंभीर है।

यह भी उल्लेखनीय है कि पत्रकारों के हितों की रक्षा करने वाले लगभग सभी संगठन और संस्थाएँ निष्क्रिय हो गई हैं। उनके सरोकार बदल गए हैं। अगर कोई पत्रकार अपने उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने संस्थान में  शिकायत दर्ज कराता है तो कोई नतीजा नहीं निकलता, न ही पत्रकार बिरादरी का समुचित समर्थन प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में यह सदन एक ऐसे संगठन की ज़रूरत महसूस करता है जो न केवल पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सके, बल्कि सवाल पूछने की लोकतांत्रिक संस्कृति को ज़िंदा रख सके। यह संगठन देश के विभिन्न राज्यों और विभिन्न भाषाओं में काम कर रहे पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जनमत तैयार  करेगा।

यह सम्मेलन इस पहल को जारी रखते हुए कमेटी के विस्तार के सभी प्रयास किए जाने का दायित्व आयोजन समिति को सौंपता है। इस विस्तार की प्रक्रिया में प्रांतीय, भाषाई और जेंडर प्रतिनिधित्व का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होगा। विस्तृत कमेटी को घटनाओं और मुद्दों के संकलन व उन पर उपयुक्त कार्ययोजनाएँ प्रस्तावित करने का एक तंत्र विकसित करने की जिम्मेदारी लेनी होगी।”

caaj
attacks on journalists
journalism
freedom of expression
press
Indian media

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का अमृतकाल है

पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर महाविद्यालय की अवैध वसूली

डराये-धमकाये जा रहे मीडिया संगठन, लेकिन पलटकर लड़ने की ज़रूरत

हिन्दू दक्षिणपंथ द्वारा नफरत फैलाने से सांप्रदायिक संकेतों वाली राजनीति बढ़ जाती है  

यूपी बोर्डः पेपर लीक मामले में योगी सरकार के निशाने पर चौथा खंभा, अफ़सरों ने पत्रकारों के सिर पर फोड़ा ठीकरा

गणेश शंकर विद्यार्थी : वह क़लम अब खो गया है… छिन गया, गिरवी पड़ा है

परदे से आज़ादी-परदे की आज़ादी: धर्म और शिक्षा से आगे चला गया है हिजाब का सवाल

जम्मू-कश्मीर में मीडिया का गला घोंट रही सरकार : प्रेस काउंसिल

रामदेव विरोधी लिंक हटाने के आदेश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया की याचिका पर सुनवाई से न्यायाधीश ने खुद को अलग किया


बाकी खबरें

  • PM care Fund
    स्मृति कोप्पिकर
    पीएम-केयर्स फ़ंड का मालिक है कौन?
    28 Sep 2021
    किसी भी ऐसे फ़ंड को गोपनीयता के घेरे में नहीं रखा जा सकता है जिसमें लाखों भारतीयों ने दान किया हो क्योंकि उस पर भारत सरकार की मुहर थी और इस फ़ंड के नाम पर पर ही प्रधानमंत्री ने किसी भी संकट के दौरान…
  • bhagat singh
    मुकुल सरल
    हमें यह शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है : भगत सिंह की पसंदीदा शायरी
    28 Sep 2021
    ऐसे कई मशहूर शे'र हैं जो भगत सिंह के नाम से याद किए जाते हैं और उन्हीं के लिखे समझे जाते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। ये शे’र उस दौर के अलग-अलग मशहूर शायरों के हैं जो भगत सिंह को बहुत पसंद थे और वे अक्सर…
  • stray cattle
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: यूपी में किसानों से लिए आफ़त बने आवारा और छुट्टा पशु, चुनाव में बढ़ सकती हैं भाजपा की मुश्किलें
    28 Sep 2021
    यूपी के किसान पहले से ही बेहाल थे और अब आवारा पशुओं के चलते इनकी बदहाली कोढ़ में खाज सरीखी हो गई है। गोवंश संरक्षण के दिखावे के चलते किसानों को ऐसी अंधेरी खाईं में ढकेल दिया गया है, जहां से निकलने का…
  • biden
    एम. के. भद्रकुमार
    बड़े चक्र में गोल-गोल घूम रहा है क्वाड
    28 Sep 2021
    अब तक क्वाड से बहुत कम हासिल हुआ है। 2,145 शब्दों का साझा वक्तव्य एक बार फिर सामान्य चीज़ों की ही बात करता नज़र आता है।
  • Bhagat Singh
    प्रबल सरन अग्रवाल
    विशेष: भगत सिंह के बाद क्रांतिकारी आंदोलन का क्या हुआ?
    28 Sep 2021
    भगत सिंह की शहादत के बाद भी उनके साथी समाजवाद और आज़ादी के झंडे को उसी जोशो-खरोश के साथ उठाए रहे। आज भगत सिंह के जन्मदिवस पर उनके सभी साथियों को याद करना भी ज़रूरी है। तभी हम 1920-1930 के क्रांतिकारी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License