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अख़लाक़ मॉब लिंचिंग को चार साल: इंसाफ़ तो छोड़िए, अभी आरोप भी तय नहीं
आज हम फिर अख़लाक़ को याद कर रहे हैं। चार साल बाद भी अभी आरोपियों पर आरोप तय नहीं हुए हैं। उनके बाद न जाने कितने 'अख़लाक़' लिंच हो गए हैं और उन सभी के लिए इंसाफ़ अभी बहुत दूर है।
मुकुल सरल
28 Sep 2019
akhlaq case
फोटो साभार : financial express

आज फिर दादरी के बुजुर्ग अख़लाक़ की याद आई है। आज उनकी हत्या हुए पूरे चार साल हो गए हैं, लेकिन इंसाफ़ अभी न सिर्फ़ बाक़ी है, बल्कि बहुत दूर भी दिखता है।

चार साल बाद भी अभी आरोपियों पर आरोप तय नहीं हुए हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि लिंचिंग के मामले में 6 महीने में केस तय हो जाना चाहिए। अब अख़लाक़ के वकील सुप्रीम कोर्ट से उसी का आदेश लागू करवाने के लिए अवमानना का मामला दायर करने जा रहे हैं।

कब क्या हुआ?

28 सितंबर, 2015 की वो रात थी, जब ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाके के बिसाहड़ा गांव में 52 साल के मज़दूर मोहम्मद अख़लाक़ को एक उग्र भीड़ ने घर से खींचकर मार डाला और उनके युवा बेटे दानिश को गंभीर रूप से घायल कर दिया।

गांव में अफ़वाह उड़ी (उड़ाई गई) कि अख़लाक़ के घर में गौमांस है। और एक गुस्साई भीड़ ने उनके घर में हमला बोल दिया। भीड़ ने उनके घर के बर्तन चेक किए, रसोई देखी, फ्रिज़ खोलकर चेक किया और शोर मचा "गौमांस-गौमांस" और अख़लाक़ को बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया।

ये शायद मॉब लिंचिंग की शुरुआत थी। हमने उसी समय पहली बार मॉब लिंचिंग शब्द सुना और उसका अर्थ जाना। मॉब यानी भीड़ और लिंचिंग यानी घेरकर मार डालना। लेकिन उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी है। अख़लाक़ के बाद न जाने कितने ‘अख़लाक़’ लिंच हो गए।

राजस्थान के अलवर के पहलू ख़ान हों या अफ़राज़ुल, उत्तर प्रदेश के हापुड़ के कासिम हो या बुलंदशहर के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह (इंस्पेक्टर सुबोध अख़लाक़ मामले में जांच अधिकारी भी रहे)। ईद पर ट्रेन से घर जा रहा युवक जुनैद हो या फिर झारखंड के सरायकेला-खरसांवा ज़िले के तबरेज़ अंसारी और न जाने कौन-कौन...

ये हत्याएं एक अंतहीन सिलसिले की तरह आगे बढ़ती जा रही हैं। और इंसाफ़...बाक़ी ही नहीं बहुत दूर है, क्योंकि हत्या आरोपी ज़मानत पर छूट रहे हैं, बरी हो रहे हैं। मंत्री उनका फूल-माला से स्वागत कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री उन्हें अपनी रैली में आगे की कुर्सियों पर बैठा रहे हैं। हत्या को गैरइरादन हत्या या हादसे का नाम दिया जा रहा है। मुकदमे की धाराएं बदली जा रही हैं। और पीड़ित को ही दोषी बनाया जा रहा है।

अख़लाक़ केस में भी लगभग यही हुआ। अख़लाक़ की फ्रिज़ से निकले या 'निकाले गए' कथित मांस को गाय का मांस साबित करने और उन्हें और उनके परिवार को गौहत्या का दोषी साबित करने की कोशिश की गई। जबकि दादरी लैब की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि पुलिस द्वारा बरामद मांस, गाय का नहीं बल्कि बकरे का है। लेकिन बाद में मथुरा फोरेसिंक लैब की रिपोर्ट के जरिये ये साबित करने की कोशिश की गई कि बरामद मांस गाय का था।

अख़लाक़ पक्ष के वकील असद हयात कहते हैं कि अख़लाक़ की हत्या से लेकर अख़लाक़ और उनके परिवार को गाय हत्या का आरोपी बनाने के पीछे एक पूरा खेल रचा गया।

वे तफ़सील से इस केस की परत दर परत खोलते हैं। वे याद दिलाते हैं कि उस बरस 2015 में 25 सितंबर की बकरीद थी, लेकिन गौहत्या की अफ़वाह तीन दिन बाद 28 सितंबर को उड़ती है और फिर भीड़ देर रात अख़लाक़ के घर हमला करके उनका क़त्ल कर देती है।

स्थानीय पुलिस आधी रात के बाद करीब एक बजे अख़लाक़ के घर के आगे के चौराहे से मांस के टुकड़े बरामद होना दिखाती है। कहा जाता है कि अख़लाक़ एक काली पन्नी में मांस के टुकड़े कूड़े पर फेंकने आया था। और पुलिस बिना सील किए ही जांच के लिए आगे भेज देती है।

जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि करीब 2 किलो मांस के टुकड़े और खाल बरामद की गई, जिसे जांच के लिए दादरी लैब भेजा जाता है। मगर दादरी लैब पहुंचते-पहुंचते इस मांस और खाल का वजन बढ़कर दो किलों से बढ़कर चार से पांच किलो हो जाता है। दादरी लैब इसे अपनी रिपोर्ट में लिखती है और बताती है कि जांच में पाया गया कि बरामद मांस और खाल गाय की नहीं बकरे की है। जिसे बाद में डिस्पोज करना बताया जाता है, यानी उसका निपटारा कर दिया जाता है। बाद में मांस के कुछ नमूने मथुरा लैब भेजे जाते हैं।

वकील असद हयात पूछते हैं कि कथित तौर पर बरामद गोश्त को मौके पर ही क्यों नहीं सील किया गया? फिर दादरी लैब पहुंचने पर इस गोश्त का वजन बढ़ कैसे गया? यही नहीं दादरी लैब ने मांस का निपटारा कर दिया और एक नमूना प्लास्टिक के डिब्बे में पुलिस को भेजा गया। लेकिन इसे जब फाइनल जांच के लिए मथुरा लैब भेजा जाता है तो ये नमूना शीशे के जार में भेजा जाता है। असद पूछते हैं कि क्या ये सबूत के साथ खुले तौर पर छेड़छाड़ नहीं है। क्यों न समझा जाए कि नमूने को बदल दिया गया?

इसी तरह वे गवाहों के विरोधाभास पर सवाल करते हैं। वे कहते हैं कि घटना के काफी समय बाद दो गवाह सामने आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने 25 सितंबर को अख़लाक़ और उनके बेटे को एक बछड़ा ले जाते हुए देखा। पूछने पर उन्होंने बताया कि ये सींग मारता है इसलिए इसे ऐसी जगह बांधने के लिए ले जा रहे हैं जहां ये किसी को सींग न मार सके।

बाद में दो और नए गवाह आते हैं जो कहते हैं कि उन्होंने बकरीद के दिन 25 सितंबर को अख़लाक़ को अपने मकान के बाहर सहन (आंगन) में बछड़े को ज़िबह यानी काटते हुए देखा। गवाह कहते कि वे यह देखकर डर गए और डर के मारे किसी को नहीं बताया। फिर तीन दिन बाद 28 सितंबर की रात को गौकशी का शोर उठता है और बताया जाता है कि अख़लाक़ काली पन्नी में गौमांस को बाहर फेंकने आए। पुलिस को 100 नंबर पर डायल कर कहा जाता है कि यहां गाय काट दी गई। इसी दौरान इसकी मंदिर से घोषणा होती है। और फिर अख़लाक़ के घर हमला होता है।

जिस व्यक्ति ने पुलिस को सीधे फोन करके बताया कि यहां गाय काट दी गई है, उस व्यक्ति से पूछताछ नहीं की गई जबकि वह एक मुख्य गवाह या साजिशकर्ता हो सकता है, क्योंकि मौके से कोई डेड बॉडी बरामद नहीं हुई। फिर कैसे सीधे पुलिस को ये फोन किया गया कि गाय काट दी गई है? यही नहीं करीब दस महीने बाद अख़लाक़ के परिवार के ख़िलाफ़ गौकशी की एफआईआर दर्ज करने के लिए कोर्ट में एप्लीकेशन दी जाती है।

इसके ख़िलाफ़ अख़लाक़ का परिवार हाईकोर्ट में अर्जी भी देता है और असद के मुताबिक हाईकोर्ट इस कहानी पर पुलिस को फटकार भी लगाता है।

इस मामले में एक तरफ़ जहां पीड़ित को आरोपी बनाने की कोशिशें दिखती हैं वहीं आरोपियों को बचाने की लगातार कोशिशें भी दिखती हैं। अख़लाक़ की हत्या के आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं। इस मामले में कुल 18 आरोपी थे। जिनमें से एक की मौत हो चुकी है और बाक़ी 17 को ज़मानत मिल चुकी है। इनमें से एक अन्य मामले में जेल में है। इस तरह इस समय 16 आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं।

आज इस मामले को चार साल पूरे हो गए लेकिन अदालत में चार्ज तक फ्रेम नहीं हुए। वकील असद हयात कहते हैं कि जुलाई, 2017 में तहसीन पूनावाले केस में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि ऐसे केस 6 महीने के भीतर डिसाइड यानी तय होने चाहिए।

असद बताते हैं कि जब हमने गौतमबुद्ध नगर ज़िले की सूरजपुर स्थित सेशन कोर्ट (कोर्ट नंबर-9) में इस बाबत एप्लीकेशन दी तो कोर्ट ने लिख दिया कि ये निर्देश हमपर लागू नहीं होता क्योंकि हम लिंचिंग केस के लिए गठित स्पेशल कोर्ट नहीं हैं।

असद कहते हैं कि इसका मतलब साफ है कि राज्य सरकार अभी तक लिंचिंग के मामलों के लिए कोई स्पेशल कोर्ट भी गठित नहीं कर पाई है। इसके अलावा इस कोर्ट में हर आरोपी की तरफ से अलग-अलग याचिकाएं लग रही हैं और मामला आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने बताया कि इस मामले में अब अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को है लेकिन हम इस मामले में जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का केस दाखिल करेंगे।
 
ख़ैर कुल मिलाकर इंसाफ अभी दूर है। अख़लाक़ के परिवार से अपना गांव छूट गया है। अख़लाक़ के बेटे दानिश जो इस हमले में घायल हुए थे, उदास लफ़्ज़ों में कहते हैं कि अब वहां शायद कभी जाना नहीं होगा... और वे वहां कभी वापस जाना भी नहीं चाहेंगे, क्योंकि वह गांव, उनकी यादों में अब ख़ुशनुमा गांव नहीं रहा, बल्कि बार-बार उसी ख़ौफ़नाक़ घटना की याद दिलाता है।

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