NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
भारत
राजनीति
अख़लाक़ मॉब लिंचिंग को चार साल: इंसाफ़ तो छोड़िए, अभी आरोप भी तय नहीं
आज हम फिर अख़लाक़ को याद कर रहे हैं। चार साल बाद भी अभी आरोपियों पर आरोप तय नहीं हुए हैं। उनके बाद न जाने कितने 'अख़लाक़' लिंच हो गए हैं और उन सभी के लिए इंसाफ़ अभी बहुत दूर है।
मुकुल सरल
28 Sep 2019
akhlaq case
फोटो साभार : financial express

आज फिर दादरी के बुजुर्ग अख़लाक़ की याद आई है। आज उनकी हत्या हुए पूरे चार साल हो गए हैं, लेकिन इंसाफ़ अभी न सिर्फ़ बाक़ी है, बल्कि बहुत दूर भी दिखता है।

चार साल बाद भी अभी आरोपियों पर आरोप तय नहीं हुए हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि लिंचिंग के मामले में 6 महीने में केस तय हो जाना चाहिए। अब अख़लाक़ के वकील सुप्रीम कोर्ट से उसी का आदेश लागू करवाने के लिए अवमानना का मामला दायर करने जा रहे हैं।

कब क्या हुआ?

28 सितंबर, 2015 की वो रात थी, जब ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाके के बिसाहड़ा गांव में 52 साल के मज़दूर मोहम्मद अख़लाक़ को एक उग्र भीड़ ने घर से खींचकर मार डाला और उनके युवा बेटे दानिश को गंभीर रूप से घायल कर दिया।

गांव में अफ़वाह उड़ी (उड़ाई गई) कि अख़लाक़ के घर में गौमांस है। और एक गुस्साई भीड़ ने उनके घर में हमला बोल दिया। भीड़ ने उनके घर के बर्तन चेक किए, रसोई देखी, फ्रिज़ खोलकर चेक किया और शोर मचा "गौमांस-गौमांस" और अख़लाक़ को बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया।

ये शायद मॉब लिंचिंग की शुरुआत थी। हमने उसी समय पहली बार मॉब लिंचिंग शब्द सुना और उसका अर्थ जाना। मॉब यानी भीड़ और लिंचिंग यानी घेरकर मार डालना। लेकिन उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वो आज तक जारी है। अख़लाक़ के बाद न जाने कितने ‘अख़लाक़’ लिंच हो गए।

राजस्थान के अलवर के पहलू ख़ान हों या अफ़राज़ुल, उत्तर प्रदेश के हापुड़ के कासिम हो या बुलंदशहर के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह (इंस्पेक्टर सुबोध अख़लाक़ मामले में जांच अधिकारी भी रहे)। ईद पर ट्रेन से घर जा रहा युवक जुनैद हो या फिर झारखंड के सरायकेला-खरसांवा ज़िले के तबरेज़ अंसारी और न जाने कौन-कौन...

ये हत्याएं एक अंतहीन सिलसिले की तरह आगे बढ़ती जा रही हैं। और इंसाफ़...बाक़ी ही नहीं बहुत दूर है, क्योंकि हत्या आरोपी ज़मानत पर छूट रहे हैं, बरी हो रहे हैं। मंत्री उनका फूल-माला से स्वागत कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री उन्हें अपनी रैली में आगे की कुर्सियों पर बैठा रहे हैं। हत्या को गैरइरादन हत्या या हादसे का नाम दिया जा रहा है। मुकदमे की धाराएं बदली जा रही हैं। और पीड़ित को ही दोषी बनाया जा रहा है।

अख़लाक़ केस में भी लगभग यही हुआ। अख़लाक़ की फ्रिज़ से निकले या 'निकाले गए' कथित मांस को गाय का मांस साबित करने और उन्हें और उनके परिवार को गौहत्या का दोषी साबित करने की कोशिश की गई। जबकि दादरी लैब की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि पुलिस द्वारा बरामद मांस, गाय का नहीं बल्कि बकरे का है। लेकिन बाद में मथुरा फोरेसिंक लैब की रिपोर्ट के जरिये ये साबित करने की कोशिश की गई कि बरामद मांस गाय का था।

अख़लाक़ पक्ष के वकील असद हयात कहते हैं कि अख़लाक़ की हत्या से लेकर अख़लाक़ और उनके परिवार को गाय हत्या का आरोपी बनाने के पीछे एक पूरा खेल रचा गया।

वे तफ़सील से इस केस की परत दर परत खोलते हैं। वे याद दिलाते हैं कि उस बरस 2015 में 25 सितंबर की बकरीद थी, लेकिन गौहत्या की अफ़वाह तीन दिन बाद 28 सितंबर को उड़ती है और फिर भीड़ देर रात अख़लाक़ के घर हमला करके उनका क़त्ल कर देती है।

स्थानीय पुलिस आधी रात के बाद करीब एक बजे अख़लाक़ के घर के आगे के चौराहे से मांस के टुकड़े बरामद होना दिखाती है। कहा जाता है कि अख़लाक़ एक काली पन्नी में मांस के टुकड़े कूड़े पर फेंकने आया था। और पुलिस बिना सील किए ही जांच के लिए आगे भेज देती है।

जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि करीब 2 किलो मांस के टुकड़े और खाल बरामद की गई, जिसे जांच के लिए दादरी लैब भेजा जाता है। मगर दादरी लैब पहुंचते-पहुंचते इस मांस और खाल का वजन बढ़कर दो किलों से बढ़कर चार से पांच किलो हो जाता है। दादरी लैब इसे अपनी रिपोर्ट में लिखती है और बताती है कि जांच में पाया गया कि बरामद मांस और खाल गाय की नहीं बकरे की है। जिसे बाद में डिस्पोज करना बताया जाता है, यानी उसका निपटारा कर दिया जाता है। बाद में मांस के कुछ नमूने मथुरा लैब भेजे जाते हैं।

वकील असद हयात पूछते हैं कि कथित तौर पर बरामद गोश्त को मौके पर ही क्यों नहीं सील किया गया? फिर दादरी लैब पहुंचने पर इस गोश्त का वजन बढ़ कैसे गया? यही नहीं दादरी लैब ने मांस का निपटारा कर दिया और एक नमूना प्लास्टिक के डिब्बे में पुलिस को भेजा गया। लेकिन इसे जब फाइनल जांच के लिए मथुरा लैब भेजा जाता है तो ये नमूना शीशे के जार में भेजा जाता है। असद पूछते हैं कि क्या ये सबूत के साथ खुले तौर पर छेड़छाड़ नहीं है। क्यों न समझा जाए कि नमूने को बदल दिया गया?

इसी तरह वे गवाहों के विरोधाभास पर सवाल करते हैं। वे कहते हैं कि घटना के काफी समय बाद दो गवाह सामने आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने 25 सितंबर को अख़लाक़ और उनके बेटे को एक बछड़ा ले जाते हुए देखा। पूछने पर उन्होंने बताया कि ये सींग मारता है इसलिए इसे ऐसी जगह बांधने के लिए ले जा रहे हैं जहां ये किसी को सींग न मार सके।

बाद में दो और नए गवाह आते हैं जो कहते हैं कि उन्होंने बकरीद के दिन 25 सितंबर को अख़लाक़ को अपने मकान के बाहर सहन (आंगन) में बछड़े को ज़िबह यानी काटते हुए देखा। गवाह कहते कि वे यह देखकर डर गए और डर के मारे किसी को नहीं बताया। फिर तीन दिन बाद 28 सितंबर की रात को गौकशी का शोर उठता है और बताया जाता है कि अख़लाक़ काली पन्नी में गौमांस को बाहर फेंकने आए। पुलिस को 100 नंबर पर डायल कर कहा जाता है कि यहां गाय काट दी गई। इसी दौरान इसकी मंदिर से घोषणा होती है। और फिर अख़लाक़ के घर हमला होता है।

जिस व्यक्ति ने पुलिस को सीधे फोन करके बताया कि यहां गाय काट दी गई है, उस व्यक्ति से पूछताछ नहीं की गई जबकि वह एक मुख्य गवाह या साजिशकर्ता हो सकता है, क्योंकि मौके से कोई डेड बॉडी बरामद नहीं हुई। फिर कैसे सीधे पुलिस को ये फोन किया गया कि गाय काट दी गई है? यही नहीं करीब दस महीने बाद अख़लाक़ के परिवार के ख़िलाफ़ गौकशी की एफआईआर दर्ज करने के लिए कोर्ट में एप्लीकेशन दी जाती है।

इसके ख़िलाफ़ अख़लाक़ का परिवार हाईकोर्ट में अर्जी भी देता है और असद के मुताबिक हाईकोर्ट इस कहानी पर पुलिस को फटकार भी लगाता है।

इस मामले में एक तरफ़ जहां पीड़ित को आरोपी बनाने की कोशिशें दिखती हैं वहीं आरोपियों को बचाने की लगातार कोशिशें भी दिखती हैं। अख़लाक़ की हत्या के आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं। इस मामले में कुल 18 आरोपी थे। जिनमें से एक की मौत हो चुकी है और बाक़ी 17 को ज़मानत मिल चुकी है। इनमें से एक अन्य मामले में जेल में है। इस तरह इस समय 16 आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं।

आज इस मामले को चार साल पूरे हो गए लेकिन अदालत में चार्ज तक फ्रेम नहीं हुए। वकील असद हयात कहते हैं कि जुलाई, 2017 में तहसीन पूनावाले केस में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि ऐसे केस 6 महीने के भीतर डिसाइड यानी तय होने चाहिए।

असद बताते हैं कि जब हमने गौतमबुद्ध नगर ज़िले की सूरजपुर स्थित सेशन कोर्ट (कोर्ट नंबर-9) में इस बाबत एप्लीकेशन दी तो कोर्ट ने लिख दिया कि ये निर्देश हमपर लागू नहीं होता क्योंकि हम लिंचिंग केस के लिए गठित स्पेशल कोर्ट नहीं हैं।

असद कहते हैं कि इसका मतलब साफ है कि राज्य सरकार अभी तक लिंचिंग के मामलों के लिए कोई स्पेशल कोर्ट भी गठित नहीं कर पाई है। इसके अलावा इस कोर्ट में हर आरोपी की तरफ से अलग-अलग याचिकाएं लग रही हैं और मामला आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने बताया कि इस मामले में अब अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को है लेकिन हम इस मामले में जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का केस दाखिल करेंगे।
 
ख़ैर कुल मिलाकर इंसाफ अभी दूर है। अख़लाक़ के परिवार से अपना गांव छूट गया है। अख़लाक़ के बेटे दानिश जो इस हमले में घायल हुए थे, उदास लफ़्ज़ों में कहते हैं कि अब वहां शायद कभी जाना नहीं होगा... और वे वहां कभी वापस जाना भी नहीं चाहेंगे, क्योंकि वह गांव, उनकी यादों में अब ख़ुशनुमा गांव नहीं रहा, बल्कि बार-बार उसी ख़ौफ़नाक़ घटना की याद दिलाता है।

mob lynching
mob voilence
Akhlaq Lynching
Indian judiciary
Corruption in Judiciary
Supreme Court
hindutva terorr
BJP
RSS
hindu-muslim
Religious riots

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

राजीव गांधी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े

रुड़की से ग्राउंड रिपोर्ट : डाडा जलालपुर में अभी भी तनाव, कई मुस्लिम परिवारों ने किया पलायन

हिमाचल प्रदेश के ऊना में 'धर्म संसद', यति नरसिंहानंद सहित हरिद्वार धर्म संसद के मुख्य आरोपी शामिल 


बाकी खबरें

  • alternative media
    अफ़ज़ल इमाम
    यूपी चुनावः कॉरपोरेट मीडिया के वर्चस्व को तोड़ रहा है न्यू मीडिया!
    27 Jan 2022
    पश्चिमी यूपी में एक अहम बात यह देखने को मिल रही है कि कई जगहों पर वहां के तमाम लोग टीवी न्यूज के बजाए स्थानीय यूट्यूब चैनलों व वेबसाइट्स पर खबरें देखना पसंद कर रहे हैं। यह सिलसिला किसान आंदोलन के समय…
  • राज कुमार
    गोवा चुनाव: सिविल सोसायटी ने जारी किया गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो
    27 Jan 2022
    गोवा के युवाओं, विभिन्न संस्थाओं और गणमान्य नागरिकों ने मिलकर गोवा का हरित घोषणा-पत्र यानी गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो जारी किया है। इस बारे में हमने आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट से जुड़े स्वभू कोहली से…
  • कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.86 लाख नए मामले, 573 मरीज़ों की मौत
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2.86 लाख नए मामले, 573 मरीज़ों की मौत
    27 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,86,384 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 3 लाख 71 हज़ार 500 हो गयी है।
  • sb
    एजाज़ अशरफ़
    मेरा हौसला टूटा नहीं है : कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज
    27 Jan 2022
    जब मैं 21 साल की हुई, तो मैं यह चुनाव करने को लेकर आज़ाद थी कि मैं भारतीय होना चाहती हूं या अमेरिकी होना चाहती हूं। मैंने बुनियादी तौर पर भारतीय होने को चुना, क्योंकि तब तक मैं पहले से ही सामाजिक…
  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान में तख्तापलट के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी, 3 महीने में 76 प्रदर्शनकारियों की मौत
    27 Jan 2022
    24 जनवरी को तख्तापलट के खिलाफ हुए देश-व्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा तीन और प्रदर्शनकारियों की गोली मार कर हत्या कर दी गई है और दर्जनों लोग घायल हुए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License