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#अलीगढ़ : आपको किस बात में दिलचस्पी है, इंसाफ़ में या हिन्दू-मुस्लिम में?
इस नृशंस हत्याकांड के लिए कठोर से कठोर सज़ा की मांग सबको बिना किसी संकोच के करनी चाहिए, लेकिन कोई घटना केवल हिन्दू मुस्लिम के शामिल होने से साम्प्रदायिक नहीं हो जाती।
मुकुल सरल
08 Jun 2019
एएमयू में टप्पल की बच्ची के इंसाफ के लिए प्रदर्शन
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में टप्पल की बच्ची को इंसाफ के लिए मोमबत्ती जलाकर प्रदर्शन और प्रार्थना करते छात्र। फोटो : सैयद फरमान अहमद के हवाले से

आप जानते हैं, अलीगढ़ में क्या हुआ? अलीगढ़ में एक मासूम बच्ची से नृशंसता हुई है, इंसानियत की हत्या हुई है? लेकिन बहुत लोगों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता, उनको इंसाफ से ज़्यादा इस बात में दिलचस्पी है कि इसमें हिन्दू-मुस्लिम एंगल है या नहीं? और किस तरह सामाजिक सद्भाव को ध्वस्त कर धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील ताकतों को निशाने पर लिया जा सकता है।

कोई घटना केवल हिन्दू मुस्लिम के शामिल होने से साम्प्रदायिक नहीं हो जाती। उसके पीछे की वजह या मकसद भी साम्प्रदायिक होना चाहिए। इसलिए किसी भी घटना की तुलना करते समय इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। केवल इस वजह से हम किसी भी अपराध या हिंसा को सांप्रदायिक या धार्मिक मान लें कि उसमें पीड़ित और अपराधी-हमलावर अलग-अलग धर्म समुदाय से हैं तो हम ग़लती करते हैं।

और हाँ, अपराध है, तो उसके लिए कठोर से कठोर सज़ा की मांग सबको बिना किसी भेदभाव के करनी ही चाहिए, इसमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

अलीगढ़ के टप्पल की घटना भी ऐसी ही जघन्य घटना है। जहाँ एक मासूम की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। ये बेहद ही अमानवीय है। लेकिन आपके लिए यह जानना भी ज़रूरी है कि इस मामले के दोनों आरोपी गिरफ़्तार हो चुके हैं। हत्याकांड के पीछे की वजह पैसों का विवाद बताया गया है।

पुलिस के मुताबिक टप्पल के कानूगोयान मोहल्ला में उधार के रुपयों के विवाद में जाहिद और उसके दोस्त असलम ने अपने पड़ोसी बनवारी लाल शर्मा की ढाई साल की बच्ची को अगवा कर बेरहमी से मार डाला और शव को कूड़े के ढेर में डाल दिया। यह घटना रौंगटे खड़े कर देती है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। और इसमें तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। इस मामले में पुलिस की भी लापरवाही सामने आई है जिस वजह से पांच पुलिसवाले निलंबित कर दिए गए हैं।

इस मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई होगी और आरोपियों के ख़िलाफ़ एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भी लगाया जा रहा है। हालांकि इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का लगाया जाना कानून के जानकारों को भी समझ नहीं आ रहा है। फिलहाल इस मामले में एसआईटी का गठन कर दिया गया है जो इस पूरे मामले की गहनता से जांच करेगी।

लेकिन यहां यह जानना जरूरी है कि आरोपियों जाहिद और असलम के पक्ष में कौम को ख़तरा बताते हुए कोई आदमी सामने नहीं आया है। इसे मुसलमानों पर हमला बताते हुए कोई जलूस नहीं निकला गया है। कोई संगठन, कोई पार्टी इनके बचाव में आगे नहीं आई है, जैसे कठुआ मामले में आरोपियों को बचाने के लिए हिंदुत्ववादी तत्वों ने रैली निकाली थी जिसमें बीजेपी के नेता शामिल हुए थे और तिरंगा तक लहराया गया था। यहाँ तक कि पुलिस को कोर्ट में चार्जशीट दायर करने से भी रोका गया था। 
उस समय भी कठुआ के बरक्स सासाराम की बहस खड़ी करने की कोशिश की गई थी। ऐसी ही कोशिश दिल्ली के अंकित सक्सेना हत्याकांड के समय की गई थी। उसे भी कुछ तत्वों ने सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी, लेकिन अंकित के परिजनों की समझदारी की वजह से वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए।

ऐसी कोशिशें बार-बार की जाती हैं। दरअसल ऐसी कोशिश करने वाले तत्वों को न्याय से ज़्यादा दिलचस्पी तनाव और समाज के बंटवारे में होती है, ताकि उनकी राजनीतिक रोटियां आराम से सिंकती रहें। ये लोग बहुत शातिर और धूर्त होते हैं। एक तरह से ये अपराधियों, बलात्कारियों के समर्थक होते हैं। बस इन्हें ये देखना होता है कि अपराधी उनकी जात-बिरादरी या धर्म का है या दूसरे धर्म-मज़हब का।

अपराधी/आरोपी अगर अपने धर्म, दल या मतलब का हो तो उन्हें फूल माला पहनाने में भी नेता-मंत्री गुरेज नहीं करते और जेल में जाकर भी शुक्रिया अदा करते हैं। जयंत सिन्हा और साक्षी महाराज-कुलदीप सेंगर के मामलों से इन्हें समझा जा सकता है। कठुआ का उदाहरण ऊपर दिया ही जा चुका है।

ऐसे तत्व और उनके समर्थक ऐसी किसी भी घटना के होते ही एक विशेष राजनीति के तहत बिना कोई संवेदनशीलता दिखाए तुरंत सवाल उठाते हैं कि “कहां है अवार्ड वापसी गैंग?” “कहां हैं अख़लाक पर आंसू बहाने वाले?”, “कहां हैं आसिफ़ा के लिए इंसाफ मांगने वाले?”, “कहां हैं बड़ी बिंदी वाली महिलाएं?”, “कहां है मोमबत्ती गैंग?”, कहां हैं सिकुलर, वामी?”

ऐसे लोगों को समझाना मुश्किल है लेकिन इनके झूठ का पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी है। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि उन्नाव की पीड़िता कौन थी? और उसके अपराधी कौन हैं? उस समय देश में शुरू हुए आंदोलन में“जस्टिस फॉर आसिफ़ा” के साथ “जस्टिस फॉर उन्नाव” का भी नारा लगा और बाद में तो “जस्टिस फॉर ऑल” का हैशटैग भी चला। 

जो लोग कहते हैं कि विरोध आंदोलन सलेक्टिव होते हैं, ये सब मोदी और बीजेपी को बदनाम करने के लिए किया जाते हैं तो उनसे पूछना चाहिए कि निर्भया के आंदोलन के समय किसकी सरकार थी? बीजेपी की या कांग्रेस की? मोदी की या मनमोहन की?

उस समय का आंदोलन तो कठुआ और उन्नाव से भी बड़ा था। राष्ट्रपति भवन तक को घेर लिया गया था।

क्या उस समय किसी ने सरकार या बलात्कारियों को बचाने का प्रयास किया था! या आंदोलन करने वालों को कांग्रेस विरोधी, बीजेपी समर्थक कहा गया था? क्या उस समय संसद में हंगामा नहीं हुआ था। क्या उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को शर्मिंदा नहीं होना पड़ा था। क्या उस समय किसी ने हिन्दू-मुसलमान या कांग्रेस-बीजेपी का मुद्दा उठाया था। नहीं।

तो अब क्यों नहीं सरकार की ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए। जब केंद्र में भी मोदी सरकार ‘प्रचंड’ बहुमत से दोबारा चुनकर आई है और उत्तर प्रदेश में भी योगी सरकार है, जो रामराज के नाम पर राम की मूर्तियों का अनवारण कर रहे हैं, उनसे क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि यही है आपका रामराज? यही है आपकी कानून-व्यवस्था? 

अब तो बेरोज़गारी तरह अपराध के आंकड़े भी छिपाए जा रहे हैं। ताकि मंचों से कहा जा सके कि ‘अच्छे दिन’ चल रहे हैं। 2016 के बाद से राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ें तक नहीं मिल रहे हैं। 2017 के अंत में 2016 की रिपोर्ट जारी की गई थी उसके बाद से कोई रिपोर्ट जारी नहीं हुई। लेकिन उस समय तक के भी आंकड़ें देखें तो पता चलता है कि स्थिति कितनी ख़राब है। 2016 में बच्चों से अपराध के 1,06,958 मामले सामने आए जो 2015 से 13.6 फीसदी अधिक थे। इस तरह देखें तो बच्चों के साथ हर दिन 293 और हर घंटे 12 अपराध हो रहे हैं। इसी तरह 2016 तक आंकड़ों के मुताबिक हर रोज़ करीब बलात्कार के 106 मामले सामने आए। इनमें हर रोज़ बलात्कार का शिकार होने वाले बच्चों की संख्या करीब 46 है। 

बताया जा रहा है कि अलीगढ़ का आरोपी असलम 2014 में अपने ही रिश्तेदार की बच्ची के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार हो चुका है। 2017 में उस पर दिल्ली के गोकलपुरी में छेड़छाड़ और अपहरण का मामला दर्ज है।

इसलिए मामला हिन्दू-मुस्लिम से आगे बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा का है। अपराध नियंत्रण और कन्विक्शन रेट यानी सज़ा की दर का है। हमारे यहां सज़ा की दर बेहद कम है।

एनसीआरबी के ही 2016 के आंकड़ों के मुताबिक हत्या के मामलों में सज़ा होने की दर केवल 38.5 प्रतिशत है, जबकि अपहरण में 20.8 और बलात्कार में 25.5 फीसदी है। इसी तरह महिलाओं से बदसुलूकी के मामलों में सज़ा की दर 20.3 फीसदी है।

इसलिए सिर्फ़ फांसी की मांग करके ऐसे अपराधों को रोका नहीं जा सकता। इससे तो न्याय में और ज़्यादा देर होती है। हमें तो ज़्यादा से ज़्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर तुरंत न्याय की ज़रूरत है। ताकि अपराधियों के मन में डर पैदा हो।

और अंत में फिर पहली बात कि दो घटनाओं की तुलना करते समय बेहद सावधान रहने की जरूरत है। और जहां भी धर्म-संप्रदाय या तिरंगे की आड़ में अपराधियों/बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाए, जहां भी सत्ताधारी या उनके प्रतिनिधि अपराध में शामिल हों या अपराधियों को बचाने की कोशिश करें, ऐसे मामलों को अन्य सभी मामलों से ज़्यादा ज़ोर से, ज़्यादा मज़बूती से उठाए जाने की ज़रूरत है। और इसमें किसी को कोई संशय या संकोच नहीं होना चाहिए।

इसे भी पढ़ें : अलीगढ़ मर्डर केस: हमारे समाज के अमानवीय हो जाने की कहानी है

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